मैंने कहा – क्या आप समझते हैं कि वहां आपकी चिकित्सा यहां से अच्छी होगी? बाबूजी बोले – क्या जाने, क्यों मेरा जी अम्मा के दर्शनों को लालायित हो रहा है। मुझे ऐसा मालूम होता है कि मैं वहां बिना दवा-दर्पण के भी अच्छा हो जाऊंगा।
मैं – यह आपका केवल विचार-मात्र है।
बाबूजी – शायद ऐसा ही हो। लेकिन मेरी विनय स्वीकार करो। मैं इस रोग से नहीं, इस जीवन से ही दुःखित हूं।
मैंने अचरज से उनकी ओर देखा।
बाबूजी फिर बोले – हां, इस जिंदगी से तंग आ गया हूं। मैं अब समझ रहा हूं मैं जिस स्वच्छ लहराते हुए निर्मल जल की ओर दौड़ा जा रहा था, वह मरुभूमि है। मैं इस प्रकार जीवन के बाहरी रूप का लट्टू हो रहा था। परन्तु अब मुझे उसकी आंतरिक अवस्थाओं का बोध हो रहा है। इन चार वर्षों में मैंने इस उपवन में खूब भ्रमण किया और उसे आदि से अन्त तक कंटकमय पाया। यहां न नीति है, न धर्म है, न सहानुभूति, न सहायता। परमात्मा के लिए मुझे इस अग्नि से बचाओ। यदि और कोई उपाय न हो तो अम्मा को एक पत्र ही लिख दो। वह अवश्य यहां आयेंगी। अपने अभागे पुत्र का दुःख उनसे न देखा जायेगा। उन्हें इस सोसाइटी की हवा अभी नहीं लगी, वह आयेंगी। उनकी वह ममता पूर्ण दृष्टि, वह मोहपूर्ण शुश्रूषा मेरे लिए सौ औषधियों का काम करेगी। उनके मुख पर वह ज्योति प्रकाशमय होगी, जिसके लिए मेरे नेत्र तरस रहे हैं। उनके हृदय में स्नेह है, विश्वास है। यदि उनकी गोद में मैं मर भी जाऊं तो मेरी आत्मा को शांति मिलेगी।
मैं समझी कि यह बुखार की बक-बक है। नर्स से कहा – जरा इनका टेंपरेचर तो लो, मैं अभी डॉक्टर के पास जाती हूं। मेरा हृदय एक अज्ञात भय से कांपने लगा। नर्स ने थर्मामीटर निकाला, परन्तु ज्यों ही वह बाबूजी के समीप गयी, उन्होंने उसके हाथ से वह यंत्र छीनकर पृथ्वी पर पटक दिया। उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। फिर मेरी ओर एक अवहेलना पूर्ण दृष्टि से देखकर कहा – साफ-साफ क्यों नहीं कहती हो कि मैं क्लब-घर जाती हूं जिसके लिए तुमने ये वस्त्र धारण किए हैं और गाउन पहनी है। खैर, उधर घूमती हुई यदि डॉक्टर के पास जाना, तो कह देना कि यहां टेंपरेचर उस बिंदु पर पहुंच चुका है, जहां आग लग जाती है।
मैं और भी अधिक भयभीत हो गई। हृदय में एक करुण चिंता का संचार होने लगा, गला भर आया। बाबूजी ने नेत्र मूंद लिए थे और उनकी सांस वेग से चल रही थी। मैं द्वार की ओर चली कि किसी को डॉक्टर के पास भेजूं। यह फटकार सुनकर स्वयं कैसे जाती? इतने में बाबूजी उठ बैठे और विनीत भाव से बोले – श्यामा! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। बात दो सप्ताह से मन में थी, पर साहस न हुआ। आज मैंने निश्चय कर लिया कि कह ही डालूं। मैं अब फिर अपने घर जाकर वही पहले की-सी जिंदगी बिताना चाहता हूं। मुझे अब इस जीवन से घृणा हो गई है और यही मेरी बीमारी का मुख्य कारण है। मुझे शारीरिक वहीं, मानसिक कष्ट है। मैं फिर तुम्हें वही पहले की-सी सलज्ज, काम-काज करने वाली, नीचा सिर करके चलने वाली, रामायण पढ़ने वाली, चरखा कातने वाली, ईश्वर से डरने वाली, पति-श्रद्धा से परिपूर्ण स्त्री को देखना चाहता हूं। मैं विश्वास करता हूं तुम मुझे निराश न करोगी। तुमको सोलहों आना अपनी बनाना और सोलहों आना तुम्हारा बनना चाहता हूं। मैं अब समझ गया कि उसी सादे पवित्र जीवन में वास्तविक सुख है। बोलो स्वीकार है? तुमने सदैव मेरी आज्ञाओं का पालन किया है, इस समय निराश न करना नहीं तो इस कष्ट और शोक का न जाने कितना भयंकर परिणाम हो।
मैं सहसा कोई उत्तर न दे सकी। मन में सोचने लगी – इस स्वतंत्र जीवन में कितना सुख था? ये मजे वहां कहां? क्या इतने दिन स्वतंत्र वायु में विचरण करने के पश्चात् फिर उसी पिंजड़े में जाऊं? वही लौंडी बनकर रहूं? क्यों इन्होंने मुझे वर्षों स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया, वर्षों देवताओं की, रामायण की, पूजा-पाठ की, व्रत-उपवास की बुराई की, हंसी उड़ायी? अब जब मैं उन बातों को भूल गई, उन्हें मिथ्या समझने लगी, तो फिर मुझे उसी अंधकूप में धकेलना चाहते हैं। मैं तो इन्हीं की इच्छा के अनुसार चलती हूं फिर मेरा अपराध क्या है? लेकिन बाबूजी के मुख पर एक ऐसी दीनतापूर्ण विवशता थी कि मैं प्रयत्न करने पर भी स्वीकार न कर सकी। बोली – आखिर आपको यहां क्या कष्ट है?
मैं उनके विचारों की तह तक पहुंचना चाहती थी।
बाबूजी फिर उठ बैठे और मेरी ओर कठोर दृष्टि से देखकर बोले – बहुत ही अच्छा होता कि तुम इस प्रश्न को मुझसे पूछने के बदले अपने ही हृदय से पूछ लेती। क्या अब मैं तुम्हारे लिए वही हूं जो आज से तीन वर्ष पहले था? मैं तुमसे अधिक शिक्षा-प्राप्त, अधिक जानकार होकर तुम्हारे लिए वह नहीं रहा, जो पहले था – चाहे तुमने इसका अनुभव न किया हो, परन्तु मैं स्वयं कर रहा हूं – तो मैं कैसे अनुमान करूं कि उन्हीं भावों ने तुम्हें स्खलित न किया होगा? नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष चिह्न देख पड़ते हैं कि तुम्हारे हृदय पर उन भावों का और भी अधिक प्रभाव पड़ा है। तुमने अपने को ऊपरी बनाव-श्रृंगार और विलास के भंवर में डाल दिया है और तुम्हें उसकी लेश-मात्र भी सुधि नहीं है। अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि सभ्यता, स्वेच्छाचारिता का भूत स्त्रियों के कोमल हृदय पर बड़ी सुगमता से कब्जा कर सकता है। क्या अब से तीन वर्ष पूर्व भी तुम्हें यह साहस हो सकता था कि मुझे इस दशा में छोड़कर किसी पड़ोसिन के यहां गाने-बजाने चली जाती? मैं बिछौने पर रहता, और तुम किसी के घर जाकर कलोलें करती? स्त्रियों का हृदय आधिक्य प्रिय होता है परन्तु इस नवीन आधिक्य के बदले मुझे वह पुराना आधिक्य कहीं ज्यादा पसन्द है। उस आधिक्य का फल आत्मिक एवं शारीरिक अभ्युदय और हृदय की पवित्रता थी, पर इस आधिक्य का परिणाम है छिछोरापन, निर्लज्जता, दिखावा और स्वेच्छाचार। उस समय यदि तुम इस प्रकार मिस्टर दास के सम्मुख हंसती-बोलती, तो मैं या तो तुम्हें मार डालता, या स्वयं विषपान कर लेता। परन्तु बेहयाई ऐसे जीवन का प्रधान तत्त्व है। मैं सब कुछ स्वयं देखता और सहता हूं। कदाचित सहे भी जाता यदि इस बीमारी ने मुझे सचेत न कर दिया होता। अब यदि तुम यहां बैठी भी रहो, तो मुझे सन्तोष न होगा क्योंकि मुझे यह विचार दुःखित करता रहेगा कि तुम्हारा हृदय यहां नहीं है। मैंने अपने को उस इंद्रजाल से निकालने का निश्चय कर लिया है, जहां धन का नाम मान है, इन्द्रिय-लिप्सा का सभ्यता और भ्रष्टता का विचार स्वातंत्र्य। बोलो मेरा प्रस्ताव स्वीकार है? मेरे हृदय पर वज्रपात-सा हो गया। बाबूजी का अभिप्राय पूर्णतया हृदयंगम हो गया। अभी हृदय में कुछ पुरानी लज्जा बाकी थी। यह यंत्रणा असह्य हो गई। लज्जित हो उठी। अन्तरात्मा ने कहा – अवश्य! मैं अब वह नहीं हूं जो पहले थी। उस समय मैं इनको अपना इष्टदेव मानती थी, इनकी आज्ञा शिरोधार्य थी पर अब वह मेरी दृष्टि में एक साधारण मनुष्य है। मिस्टर दास का चित्र मेरे नेत्रों के सामने खिंच गया। कल मेरे हृदय पर इस दुरात्मा की बातों का कैसा नशा छा गया था, वह सोचते ही नेत्र लज्जा से झुक गए। बाबूजी की आंतरिक अवस्था उनके मुखड़े से ही प्रकाशमान हो रही थी। स्वार्थ और विलास-लिप्सा के विचार मेरे हृदय से दूर हो गए। उनके बदले ये शब्द ज्वलंत अक्षरों में लिखे हुए नजर आये – तूने फैशन और वस्त्राभूषण में अवश्य उन्नति की है, तुझमें अपने स्वार्थों का ज्ञान हो आया है, तुझ में जीवन के सुख भोगने की योग्यता अधिक हो गई है, तू अब अधिक गर्विणी, दृढ़ हृदय और शिक्षा-संपन्न भी हो गई लेकिन तेरे आत्मिक बल का विनाश हो गया, क्योंकि तू अपने कर्त्तव्य को भूल गई।
मैं दोनों हाथ जोड़कर बाबूजी के चरणों पर गिर पड़ी। कंठ रुंध गया, एक शब्द भी मुंह से न निकला, अश्रुधारा बह चली।
अब मैं फिर अपने घर पर आ गई हूं। अम्माजी अब मेरा अधिक सम्मान करती हैं, बाबूजी सन्तुष्ट दिख पड़ते हैं। वह अब स्वयं प्रतिदिन संध्या-वंदना करते हैं।
मिसेज दास के पत्र कभी-कभी आते हैं। वह इलाहाबादी सोसायटी के नवीन समाचारों से भरे होते हैं। मिस्टर दास और मिस भाटिया के संबंध में कलुषित बातें उड़ रही हैं। मैं इन पत्रों का उत्तर तो देती हूं परन्तु चाहती हूं कि वह अब न आते तो अच्छा होता। वह मुझे उन दिनों की याद दिलाते हैं, जिन्हें मैं भूल जाना चाहती हूं।
कल बाबूजी ने बहुत-सी पुरानी पोथियां अग्निदेव को अर्पण की। उनमें ऑस्कर वाइल्ड की कई पुस्तकें थी। वह अब अंग्रेजी पुस्तक बहुत कम पढ़ते है। उन्हें कार्लाइल, रस्किन और एमरसन के सिवा और कोई पुस्तक पढ़ते मैं नहीं देखती। मुझे तो अपनी रामायण और महाभारत में फिर वहीं आनंद प्राप्त होने लगा। चरखा अब पहले से अधिक चलाती हूं क्योंकि इस बीच चरखे ने खूब प्रचार पा लिया है।
