निर्मला-मुंशी प्रेमचंद भाग -9

बात कुछ न थी, मगर वकील साहब हताश होकर चारपाई पर गिर पड़े और माथे पर हाथ रखकर चिन्ता में मग्न हो गए। उन्होंने जितना समझा था, बात उससे कहीं अधिक बढ़ गई थी। उन्हें अपने ऊपर क्रोध आया कि मैंने पहले ही क्यों न इस लौंडे को बाहर रखने का प्रबन्ध किया। आजकल जो यह महारानी इतनी खुश दिखाई देती हैं, इसका रहस्य अब समझ में आया।

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पहले कभी इतनी सजी-सजायी न रहती थी, बनाव-बुनाव भी न करती थी, पर अब देखता हूं लेकिन प्रौढ़ बुद्धि ने समझाया कि इस अवसर पर क्रोध की जरूरत नहीं। कहीं इसने भाँप लिया, तो गजब ही हो जायेगा। हां, जरा इसके मनोभावों को टटोलना चाहिए। बोले – यह तो मैं जानता हूँ कि तुम्हें दो-चार मिनट पढ़ाने से उसका कोई हरज नहीं होता, लेकिन आवारा लड़का है, अपना काम न करने का उसे एक बहाना तो मिल जाता है। कल अगर फेल हो गए, तो साफ कह देगा – मैं तो दिन-भर पढ़ाता रहता था। मैं तुम्हारे लिए कोई मिस नौकर रख दूंगा। कुछ ज्यादा खर्च न होगा। तुमने मुझसे पहले कहा ही नहीं। वह तुम्हें भला क्या पढ़ाता होगा? दो-चार शब्द बताकर भाग जाता होगा। इस तरह तुम्हें कुछ भी न आएगा।

निर्मला ने तुरंत इस आक्षेप कर खंडन किया – नहीं, यह बात तो नहीं। वह मुझे दिल लगाकर पढ़ाते हैं, और उनकी शैली भी ऐसी है कि पढ़ने में मन लगता है। आप एक दिन जरा उनका समझाना देखिए। मैं तो समझती हूं कि मिस इतने ध्यान से न पढ़ाएंगी।

मुंशीजी अपनी प्रश्न-कुशलता पर मूंछों पर ताव देते हुए बोले – दिन में एक ही बार पढ़ाता है या कई बार?

निर्मला अब भी इन प्रश्नों का आशय न समझी। बोली – पहले तो शाम ही को पढ़ा देते थे, अब कई दिनों से एक बार आकर लिखना भी देख लेते हैं। वह तो कहते हैं कि मैं अपने क्लास में सबसे अच्छा हूं। अभी परीक्षा में इन्हीं को प्रथम स्थान मिला था, फिर आप कैसे समझते हैं कि उनका पढ़ने में जी नहीं लगता? मैं इसलिए और भी कहती हूं कि दीदी समझेगी, इसी ने आग लगायी है? मुफ्त में मुझे यह ताने सुनने पड़ेंगे। अभी जरा ही देर हुई, धमकाकर गयी हैं।

मुंशीजी ने दिल में कहा, खूब समझता हूँ। तुम कल की छोकरी होकर मुझे चराने चली? दीदी का सहारा लेकर अपना मतलब पूरा करना चाहती है। बोले – मैं नहीं समझता, बोर्डिंग का नाम सुनकर क्यों लौंडे की नानी मरती। और लड़के खुश होते हैं कि अपने दोस्तों में रहेंगे, यह उल्टे रो रहा है। अभी कुछ दिन पहले तक यह दिल लगाकर पढ़ता था। यह उसी मेहनत का नतीजा है कि अपने क्लास में सबसे अच्छा है, लेकिन इधर कुछ दिनों से सैर-सपाटे का चस्का पड़ चला है। अगर अभी से रोक-थाम न की गई, तो पीछे करते-धरते न बन पड़ेगा। तुम्हारे लिए मैं मिस रख दूंगा।

दूसरे दिन मुंशीजी प्रातःकाल कपड़े-लत्ते पहनकर बाहर निकले। दीवानखाने में कई मुवक्किल बैठे हुए थे। इनमें एक राजा साहब भी थे, जिनसे मुंशीजी को कोई हजार सालाना मेहनताना मिलता था। मगर मुंशीजी उन्हें वहीं छोड़कर दस मिनट में आने का वादा करके बग्घी पर बैठकर स्कूल के हेडमास्टर के यहाँ पहुँचे। हेडमास्टर साहब बड़े सज्जन पुरुष थे। वकील साहब का बहुत आदर-सत्कार किया, पर उनके यहाँ एक लड़के की भी जगह खाली न थी। सभी कमरे भरे हुए थे। इंस्पेक्टर साहब की कड़ी ताकीद थी कि मुफस्सिल के लड़कों को जगह देकर तब शहर के लड़कों को लिया जाये। इसलिये कोई जगह खाली भी हुई तो भी मंसाराम को जगह न मिल सकेगी; क्योंकि कितने ही बाहरी लड़कों के प्रार्थनापत्र रखे हुए थे। मुंशीजी वकील थे, रात-दिन ऐसे प्राणियों से साबिका रहता, जो लोभवश असंभव को भी संभव, असाध्य को भी साध्य बना सकते है। समझे, शायद कुछ दे दिलाकर काम निकल जाये – दफ्तर के क्लर्क से ढंग की कुछ बातचीत करना चाहिए, पर उसने हँसकर कहा – मुंशीजी, यह कचहरी नहीं, स्कूल है। हेडमास्टर साहब के कानों में इसकी भनक भी पड़ गई, तो जामे से बाहर हो जायेंगे और मंसाराम को खड़े-खड़े निकाल देंगे। संभव है, अफसरों से शिकायत कर दें। बेचारे मुंशीजी अपना-सा मुंह ले कर रह गए। दस बजते-बजते झुंझलाते हुए घर लौटे। मंसाराम उसी वक्त घर से स्कूल जाने को निकला। मुंशीजी ने कठोर नेत्रों से उसे देखा, मानो वह उनका शत्रु हो और घर में चले गए।

एक दिन मुंशीजी बैठे भोजन कर रहे थे कि मंसाराम भी नहाकर खाने आया। मुंशीजी ने इधर उसे महीनों से नंगे बदन न देखा था। आज उस पर निगाह पड़ी, तो होश उड़ गए। हड्डियों का ढाँचा सामने खड़ा था। मुख पर अब भी ब्रह्मचर्य का तेज था, पर देह घुलकर काँटा हो गई थी। पूछा आजकल तुम्हारी तबीयत अच्छी नहीं है क्या? इतने दुबले क्यों हो?

मंसाराम ने धोती ओढ़कर कहा – तबीयत तो बिल्कुल अच्छी है।

मुंशीजी – फिर इतने दुबले क्यों हो?

मंसाराम – दुबला तो नहीं हूं। मैं इससे ज्यादा मोटा कब था?

मुंशीजी – वाह, आधी देह भी नहीं रही और कहते हो, मैं दुर्बल नहीं हूँ। क्यों दीदी, यह ऐसा ही था?

रुक्मिणी आंगन में खड़ी तुलसी को जल चढ़ा रही थी। बोली – दुबला क्यों होगा, अब तो बड़ी अच्छी तरह लालन-पालन हो रहा है। मैं गंवारिन थी, लड़कों को खिलाना पिलाना नहीं जानती थी। खोमचा खिला-खिलाकर इनकी आदत बिगाड़ देती थी। अब तो एक पढ़ी-लिखी गृहस्थी के कामों में चतुर औरत पान की तरह फेर रही है न! दुबला हो उसका दुश्मन!

मुंशीजी – दीदी, तुम बहुत उपन्यास करती हो। तुमसे किसने कहा कि लड़कों को बिगाड़ रही हो। जो काम दूसरे के किए न हो सके, वह तुम्हें खुद करना चाहिए। यह नहीं कि घर से कोई नाता न रखो। जो अभी खुद लड़की है, वह दूसरों की देख-भाल क्या करेगी? यह तुम्हारा काम है।

रुक्मिणी – जब तक अपना समझती थी, करती थी। जब तुमने गैर समझ लिया तो मुझे क्या पड़ी है कि तुम्हारे गले से चिपकूं? पूछो कै दिन से दूध नहीं पिया? जाकर कमरे में देख आओ, नाश्ते के लिए जो मिठाई भेजी गई थी, वह पड़ी सड़ रही है। मालकिन समझती हैं; ‘मैंने तो खाने का सामान रख दिया, कोई न खाए तो क्या मैं मुँह में डाल दूं?’ तो भैया, इस तरह वे लड़के पलते होंगे, जिन्होंने कभी लाड़-प्यार का सुख नहीं देखा। तुम्हारे लड़के बराबर पान की तरह फेरे जाते रहे हैं, अब अनाथों की तरह रहकर सुखी पर सुनती हूँ कि लड़के को स्कूल में रखने का प्रबन्ध कर रहे हो। बेचारे को घर में आने तक की मनाही है। मेरे पास आते भी डरता है और फिर मेरे पास रखा ही क्या रहता है, जो जाकर खिलाऊंगी?

इतने में मंसाराम दो फुलके खाकर उठ खड़ा हुआ। मुंशीजी ने पूछा – क्या तुम खा चुके? अभी बैठे एक मिनट से ज्यादा नहीं हुआ। तुमने खाया क्या, दो ही फुलके तो लिये थे।

मंसाराम ने सकुचाते हुए कहा – दाल और तरकारी भी तो थी। ज्यादा खा जाता हूँ तो गला जलने लगता है, खट्टी डकारें आने लगती हैं।

मुंशीजी भोजन करके उठे तो बहुत चिंतित थे। अगर लड़का यों ही दुबला होता गया तो उसे कोई भयंकर रोग पकड़ लेगा। उन्हें रुक्मिणी पर इस समय बहुत क्रोध आ रहा था। उन्हें यही जलन है कि मैं घर की मालकिन नहीं हूँ। यह नहीं समझती कि मुझे घर की मालकिन बनने का क्यों अधिकार है? बनी तो थी साल-भर तक मालकिन – एक पाई की भी बचत न होती थी। इस आमदनी में रूपकला दो-ढाई सौ बचा लेती थी। इनके राज में वहीं आमदनी खर्च को भी पूरी न पड़ती थी। कोई बात नहीं, लाड़-प्यार ने इन लड़कों को चौपट कर दिया। इतने बड़े-बड़े लड़कों को इसकी क्या जरूरत कि जब कोई खिलाए तो खाएं? इन्हें तो खुद अपनी फिक्र करनी चाहिए। मुंशीजी दिन भर इस उधेड़बुन में पड़े रहे। दो-बार मित्रों से जिक्र किया। लोगों ने कहा – उसके खेल-कूद में बाधा न डालिए। अभी से उसे कैद न कीजिए। खुली हवा में चरित्र के भ्रष्ट होने की उससे कहीं कम संभावना है, जितनी बन्द कमरे में। कुसंगत से जरूर बचाइए, मगर यह नहीं कि उसे घर से निकलने ही न दीजिए। युवावस्था में एकान्तवास चरित्र के लिए बहुत ही हानिकारक है।

मुंशीजी को अपनी गलती मालूम हुई। घर लौटकर मंसाराम के पास गये। वह अभी स्कूल से आया था और बिना कपड़े उतारे एक किताब सामने खोलकर, सामने खिड़की की ओर ताक रहा था। उसकी दृष्टि एक भिखारिन पर लगी हुई थी, जो अपने बालक को गोद में लिये भिक्षा माँग रही थी। बालक माता की गोद में बैठा हुआ ऐसा प्रसन्न था, मानो वह किसी राजसिंहासन पर बैठा हो। मंसाराम उस बालक को देखकर रो पड़ा। यह बालक क्या मुझसे अधिक सुखी नहीं है? इस अनन्त विश्व में ऐसी कौन-सी वस्तु की सृष्टि नहीं कर सकते ईश्वर, ऐसे बालकों को जन्म ही क्यों देते हो, जिनके भाग्य में मातृवियोग का दुःख भोगना बदा हो? आज मुझ-सा अभागा संसार में कोई है? किसे मेरे खाने-पीने की, मरने-जीने की सुध है। अगर आज मैं मर भी जाऊँ तो किसके दिल को चोट लगेगी? पिता को अब मुझे रुलाने में मजा आता है, वाह मेरी माता! तुम्हारा लाडला बेटा आज आवारा कहा जा रहा है! वही पिताजी, जिनके हाथों में तुमने हम तीनों भाइयों के हाथ पकड़ाए थे, आज मुझे आवारा और बदमाश कह रहे हैं। मैं इस योग्य भी नहीं कि इस घर में रह सकूँ? यह सोचते-सोचते अपार वेदना से फूट-फूटकर रोने लगा।

उसी समय तोताराम कमरे में आकर खड़े हो गए। मंसाराम ने चटपट आँसू पोंछ डाले और सिर झुकाकर खड़ा हो गया। मुंशीजी ने शायद यह पहली बार उसके कमरे में कदम रखा था। मंसाराम का दिल धड़-धड़ करने लगा कि देखें आज क्या आफत आती है। मुंशीजी ने उसे रोते देखा, तो एक क्षण के लिए उनका वात्सल्य घोर निद्रा से चौक पड़ा। घबराकर बोले – क्यों, रोते क्यों हो बेटा, किसी ने कुछ कहा है?

मंसाराम ने बड़ी मुश्किल से उमड़ते हुए आँसुओं को रोककर कहा – जी नहीं, रोता नहीं हूं।

मुंशीजी – तुम्हारी अम्मा ने तो कुछ नहीं कहा?

मंसाराम – जी नहीं, वह तो मुझसे बोलती ही नहीं।

मुंशीजी – क्या करूँ बेटा, शादी तो इसलिए की थी कि बच्चों को माँ मिल जायेगी, लेकिन यह आशा पूरी नहीं हुई। तो क्या बिल्कुल नहीं बोलती?

मंसाराम – जी नहीं, इधर महीनों से नहीं बोली।

मुंशीजी – विचित्र स्वभाव की औरत है, मालूम नहीं होता कि क्या चाहती है। मैं जानता कि उसका ऐसा मिजाज होगा, तो कभी शादी न करता। रोज एक-न-एक बात लेकर उठ खड़ी होती है। उसी ने मुझसे कहा था कि यह दिन भर न जाने कहाँ गायब रहता है। मैं उसके दिल की बात क्या-जानता था? समझा तुम कुसंगत में पड़कर शायद दिन भर घूमा करते हो। कौन ऐसा पिता है, जिसे अपने प्यारे पुत्र को आवारा फिरते देखकर रंज न हो? इसलिए मैंने तुम्हें बोर्डिंग हाउस में रखने का निश्चय किया। बस, और कोई बात नहीं थी, बेटा! मैं तुम्हारा खेलना-कूदना बंद नहीं करना चाहता था। तुम्हारी माता छोड़कर चली गई, तो मैं तो हूँ।

बालक का सरल, निष्कपट हृदय पितृप्रेम में पुलकित हो उठा। मालूम हुआ कि साक्षात् भगवान खड़े हैं। नैराश्य और क्षोभ से विकल होकर उसने अपने पिता को निष्ठुर और न जाने क्या-क्या समझ रखा था। विमाता से उसे कोई गिला न था। अब उसे ज्ञात हुआ कि मैंने अपने देवतुल्य पिता के साथ कितना अन्याय किया है। पितृभक्ति की एक तरंगसी हृदय में उठी और वह पिता के चरणों पर सिर रखकर रोने लगा। मुंशीजी करुणा से विकल हो गए। जिस पुत्र को एक क्षण-भर आँखों से ओझल देखकर उनका हृदय व्यग्र हो उठता था; जिसके शील, बुद्धि और चरित्र का अपने-पराये सभी बखान करते थे, उसी के प्रति उनका हृदय इतना कठोर क्यों हो गया? वह अपने ही प्रिय को शत्रु समझने लगे, उसको निर्वासन देने को तैयार हो गए। निर्मला पुत्र और पिता के बीच दीवार बनकर खड़ी थी। निर्मला को अपनी ओर खींचने के लिए पीछे हटना पड़ता था, पिता तथा पुत्र में अन्तर बढ़ता जाता था। फलतः आज यह दशा हो गई है कि अपने अभिन्न पुत्र से उन्हें इतना छल करना पड़ रहा है। आज बहुत सोचने के बाद उन्हें एक ऐसी युक्ति सूझी है, जिससे आशा हो रही है कि वह निर्मला को बीच से निकाल कर अपने दूसरे बाजू को अपनी तरफ कर लेंगे। उन्होंने उस युक्ति का आरंभ कर दिया है। लेकिन इसमें अभीष्ट सिद्ध होगा या नहीं, इसे कौन जानता है?

जिस दिन से तोताराम ने निर्मला के बहुत मिन्नत-समाजत करने पर भी मंसाराम को बोर्डिंग हाउस भेजने का निश्चय किया था, उस दिन से उसने मंसाराम से पढ़ना छोड़ दिया था। यहां तक कि बोली भी न थी। उसे स्वामी की अविश्वासपूर्ण तत्परता का कुछ-कुछ आभास हो गया था। उफ्फोह! इतना शक्की मिजाज! ईश्वर ही इस घर में लाज रखे। इनके मन में ऐसी-ऐसी दुर्भावनाएँ भरी हुई हैं। मुझे इतनी गयी-गुजरी समझते हैं। ये बातें सोच-सोचकर कई दिनों तक रोती रही। तब उसने सोचना शुरू किया, इन्हें क्यों ऐसा संदेह हो रहा है? मुझमें ऐसी कौन-सी बात है, जो इनकी आंखों में खटकती है? बहुत सोचने पर भी उसे अपने में कोई ऐसी बात नजर न आई। तो क्या उसका मंसाराम से पढ़ना, उससे हँसना-बोलना ही इनके सन्देह का कारण है? तो फिर मैं पढ़ना छोड़ दूंगी, भूलकर भी मंसाराम से न बोलूंगी, उसकी सूरत न देखूँगी।

लेकिन यह समस्या उसे असाध्य जान पड़ती थी। मंसाराम से हँसने-बोलने में उसकी विलासिनी कल्पना उत्तेजित भी होती थी तृप्त भी। उससे बातें करते हुए एक अपार सुख का अनुभव होता था, जिसे वह शब्दों में प्रकट न कर सकती थी। कुवासना की उसके मन में छाया भी न थी। वह स्वप्न में भी मंसाराम से कलुषित प्रेम करने की बात न सोच सकती थी। प्रत्येक प्राणी को अपने हमजोलियों के साथ हंसने-बोलने की जो एक नैसर्गिक तृष्णा होती है, उसी वृत्ति का यह एक अज्ञात साधन था। अब वह अतृप्त तृष्णा निर्मला के हृदय में दीपक की भांति जलने लगी। रह-रहकर उसका मन किसी अज्ञात वेदना से विफल हो जाता। खोयी हुई किसी अज्ञात वस्तु की खोज में इधर-उधर ढूंढ़ती-फिरती, जहाँ बैठी वहाँ बैठी ही रह जाती, किसी काम में जी न लगता। हां, जब मुंशीजी आते तो वह अपनी सारी तृष्णाओं को नैराश्य में डूबाकर, उनसे मुस्कराकर इधर-उधर की बातें करने लगती।

कल जब मुंशीजी भोजन करके कचहरी चले गये, तो रुक्मिणी ने निर्मला को खूब तानों से छेदा – जानती थी कि यहाँ बच्चों का पालन-पोषण करना पड़ेगा, तो क्यों घर वालों से नहीं कह दिया कि वहाँ मेरा विवाह न करो। वहाँ जाती, जहाँ पुरुष के सिवा और कोई न होता। वही यह बनाव-चुनाव और छवि देखकर खुश होता; अपने भाग्य को सराहता। यहाँ बुड्ढा आदमी तुम्हारे रंग-रूप, हाव-भाव पर क्या लट्टू होगा? इसने इन्हीं बालकों की सेवा करने के लिए तुमसे विवाह किया है, भोग-विलास के लिए नहीं।

वह बड़ी देर तक शव पर नमक छिड़कती रही, पर निर्मला ने चूं तक न की। वह अपनी सफाई तो पेश करना चाहती थी, पर कर न सकती थी। अगर कहे कि मैं वही कर रही हूँ जो मेरे स्वामी की इच्छा है, तो घर का भण्डा फूटता है। अगर वह परिणाम हो। वह यों बड़ी स्पष्टवादिनी थी, सत्य कहने में उसे संकोच या भय न होता था, लेकिन इस नाजुक मौके पर उसे चुप्पी साधनी पड़ी। इसके सिवाय दूसरा उपाय न था। वह देखती थी कि मंसाराम बहुत विरक्त और उदास रहता है; यह भी देखती थी कि वह दिन-दिन दुर्बल होता जाता है; लेकिन उसकी वाणी और कर्म दोनों ही पर मुहर लगी हुई थी। चोर के घर चोरी हो जाने से उसकी जो दशा होती है, वही दशा इस समय निर्मला की हो रही थी।