उस समय उनको उत्तर देने की शक्ति मुझमें कहां थी? हां, अब जान पड़ता है कि वह यूरोपियन सभ्यता के चक्कर में पड़े हुए थे। अब वह स्वयं ऐसी बातें नहीं करते, वो जोश अब ठंडा हो चला है।
इसके कुछ दिन बाद हम इलाहाबाद चले आए। बाबूजी ने पहले ही एक दो-मंजिला मकान ले रखा था – सब तरह से सजा-सजाया। हमारे यहां पांच नौकर थे – दो स्त्रियां, दो पुरुष और एक महाराज। अब मैं घर के कुल काम-काज से छुट्टी पा गई। कभी जी घबराता तो कोई उपन्यास लेकर पढ़ने लगती।
यहां फूल और पीतल के बर्तन कम थे। चीनी की रकाबियां और प्याले अलमारियों में सजे रखे थे। भोजन मेज़ पर आता था। बाबूजी बड़े चाव से भोजन करते। मुझे पहले कुछ शरम आती थी लेकिन धीरे-धीरे मैं भी मेज़ पर ही भोजन करने लगी। हमारे पास एक सुन्दर टमटम भी थी। अब हम पैदल बिलकुल न चलते। किसी से मिलने दस पग भी जाना होता, तो गाड़ी तैयार कराई जाती। बाबूजी कहते थे – यही फैशन है।
बाबूजी की आमदनी अभी बहुत कम थी। भली-भांति खर्च भी न चलता था। कभी-कमी मैं उन्हें चिंताकुल देखती तो समझाती कि जब आय इतनी कम है तो व्यय इतना क्यों बढ़ा रखा है? कोई छोटा-सा मकान ले लो। दो नौकरों से काम चल सकता है, लेकिन बाबूजी मेरी बातों पर हंस देते और कहते – मैं अपनी दरिद्रता का ढिंढोरा अपने आप क्यों पीटें? दरिद्रता प्रकट करना दरिद्र होने से अधिक दुःखदायी होता है। भूल जाओ कि हम लोग निर्धन हैं, फिर लक्ष्मी हमारे पास आप दौड़ी आएगी। खर्च बढ़ना, आवश्यकताओं का अधिक होना ही द्रव्योपार्जन की पहली सीढ़ी है। इससे हमारी गुप्त शक्तियां विकसित हो जाती हैं और हम उन कष्टों को झेलते हुए आगे पग धरने के योग्य होते हैं। संतोष दरिद्रता का दूसरा नाम है।
अस्तु, हम लोगों का खर्च दिन-दिन बढ़ता ही जाता था। हम लोग सप्ताह में तीन बार थियेटर जरूर देखने जाते। सप्ताह में एक बार मित्रों को भोज अवश्य ही दिया जाता। अब मुझे सूझने लगा कि जीवन का लक्ष्य सुखभोग ही है। ईश्वर को हमारी उपासना की इच्छा नहीं। उसने हमें उत्तम-उत्तम वस्तुएं भोगने के लिए ही दी हैं। उनको भोगना उसकी सर्वोत्तम आराधना है। एक ईसाई लेडी मुझे पढ़ाने तथा गाना सिखाने लगी। घर में एक पियानो भी आ गया। इन्हीं आनंदों में फंसकर मैं रामायण और भक्तमाल को भूल गई। वे पुस्तकें मुझे अप्रिय लगने लगी। देवताओं से विश्वास उठ गया।
धीरे-धीरे यहां के बड़े लोगों से स्नेह और सम्बन्ध बढ़ने लगा। यह एक बिलकुल नई सोसायटी थी। इसके रहन-सहन, आहार-व्यवहार और आचार-विचार मेरे लिए सर्वथा अनोखे थे। मैं इस सोसायटी में ऐसी जान पड़ती जैसे मोर में कौआ। इन लेडियों की बातचीत कभी थियेटर और घुड़दौड़ के विषय में होती, कभी टेनिस, समाचार पत्रों और अच्छे-अच्छे लेखकों के लेखों पर। उनके चातुर्य, बुद्धि की तीव्रता, फुर्ती और चपलता पर मुझे अचंभा होता। ऐसा मालूम होता कि वे ज्ञान और प्रकाश की पुतलियां हैं। वे बिना घूंघट बाहर निकलतीं। मैं उनके साहस पर चकित रह जाती। वे मुझे भी कभी-कभी अपने साथ ले जाने की चेष्टा करतीं, लेकिन में लज्जावश न जा सकती। मैं उन लेडियों को कभी उदास या चिंतित न पाती। मिस्टर दास बहुत बीमार थे, परंतु मिसेज दास के माथे पर चिंता का चिह्न तक न था। मिस्टर बागड़ी नैनीताल में तपेदिक का इलाज करा रहे थे, पर मिसेज बागड़ी नित्य टेनिस खेलने जाती थी। इस अवस्था में मेरी क्या दशा होती, मैं ही जानती हूं।
इन लेडियों की रीति-नीति में एक आकर्षण-शक्ति थी, जो मुझे खींचे लिए जाती थी। मैं उन्हें सदैव आमोद-प्रमोद के लिए उत्सुक देखती, और मेरा भी जी चाहता कि उन्हीं की भांति मैं भी निस्संकोच हो जाती। उनका अंग्रेजी वार्त्तालाप सुन, मुझे मालूम होता कि ये देवियां हैं। मैं अपनी इन त्रुटियों की पूर्ति के लिए प्रयत्न किया करती थी।
इसी बीच में मुझे एक खेदजनक अनुभव होने लगा। यद्यपि बाबूजी पहले से मेरा अधिक आदर करते, मुझे सदैव ‘डियर-डार्लिंग’ आदि कहकर पुकारते थे, यद्यपि मुझे उनकी बातों में एक प्रकार की बनावट मालूम होती थी। ऐसा प्रतीत होता, मानों ये बातें उनके हृदय से नहीं, केवल मुख से निकलती हैं। उनके स्नेह और प्यार में हार्दिक भावों की जगह अलंकार ज्यादा होता था, किंतु और भी अचम्भे की बात यह है कि अब मुझे बाबूजी पर वह पहले की-सी श्रद्धा न रही। अब उनके सिर की पीड़ा से मेरे हृदय में पीड़ा न होती थी। मुझमें आत्म-गौरव का आविर्भाव होने लगा था। अब मैं अपना बनाव-श्रृंगार इसलिए करती थी कि संसार में यह भी मेरा कर्तव्य है, इसलिए कि मैं किसी एक पुरुष की व्रतधारिणी हूं। अब मुझे भी अपनी सुन्दरता पर गर्व होने लगा था। मैं अब किसी दूसरे के लिए नहीं, अपने लिए जीती थी। त्याग तथा सेवा का भाव मेरे हृदय से लुप्त होने लगा था।
मैं अब भी परदा करती थी परंतु हृदय अपनी सुन्दरता की सराहना सुनने के लिए व्याकुल रहता था। एक दिन मिस्टर दास तथा और भी अनेक सभ्य गण बाबूजी के साथ बैठे हुए थे। मेरे और उनके बीच में केवल एक परदे की आड़ थी। बाबूजी मेरी इस झिझक से बहुत ही लज्जित थे। इसे वह अपनी सभ्यता में काला धब्बा समझते थे। कदाचित वह दिखाना चाहते थे कि मेरी स्त्री इसलिए परदे में नहीं हैं कि वह रूप तथा वस्त्राभूषण में किसी से कम है बल्कि इसलिए कि अभी उसे लज्जा आती है। वह मुझे किसी बहाने से बार-बार परदे के निकट बुलाते, जिसमें उनके मित्र मेरी सुन्दरता और वस्त्राभूषण देख लें। अन्त में कुछ दिन बाद मेरी झिझक गायब हो गई। इलाहाबाद आने के पूरे दो वर्ष बाद मैं बाबूजी के साथ बिना परदे के सैर करने लगी। सैर के बाद टेनिस की नौबत आई। अन्त में मैंने क्लब में जाकर दम लिया। पहले यह टेनिस और क्लब मुझे तमाशा-सा मालूम होता था, मानो वे लोग व्यायाम के लिए नहीं, बल्कि फैशन के लिए टेनिस खेलने आते थे। वे कभी न भूलते थे कि हम टेनिस खेल रहे हैं। उनके प्रत्येक काम में, झुकने में, दौड़ने में, उचकने में एक कृत्रिमता होती थी, जिससे यह प्रतीत होता था कि इस खेल का प्रयोजन कसरत नहीं केवल दिखावा है।
क्लब में इससे भी विचित्र अवस्था थी। वह पूरा स्वांग था, अदा और बेजोड़। लोग अंग्रेजी के चुने हुए शब्दों का प्रयोग करते थे, जिसमें कोई सार न होता था। नकली हंसी हंसते थे, जिसका कोई असर न होता था। स्त्रियों की वह फूहड़ निर्लज्जता और पुरुषों की वह भाव-शून्य स्त्री-पूजा मुझे न भाती थी। चारों ओर अंग्रेजी चाल-ढाल की हास्यजनक नकल थी। परंतु क्रमशः मैं भी वह रंग पकड़ने और उन्हीं का अनुकरण करने लगी। अब अनुभव हुआ कि इन प्रदर्शन-लोलुपता में कितनी शक्ति है। मैं अब नित्य नए शृंगार करती, नित्य नया रूप भरती, केवल इसलिए कि क्लब में सबकी आंखों में चुभ जाऊं! अब मुझे बाबूजी के सेवा-सत्कार से अधिक अपने बनाव-श्रृंगार की धुन रहती थी। यहां तक कि यह शौक एक नशा-सा बन गया। इतना ही नहीं, लोगों से अपने सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर मुझे एक अभिमान-मिश्रित आनंद का अनुभव होने लगा। मेरी लज्जाशीलता की सीमाएं विस्तृत हो गईं। वह दृष्टिपात जो कभी मेरे शरीर के प्रत्येक रोए को खड़ा कर देता और वह हास्य-कटाक्ष, जो कभी मुझे विष खा लेने को प्रेरित कर देता, उनसे अब मुझे एक उन्मादपूर्ण हर्ष होता था। परन्तु जब कभी मैं अपनी अवस्था पर आंतरिक दृष्टि डालती तो मुझे बड़ी घबराहट होती थी। यह नाव किस घाट लगेगी? कभी-कभी इरादा करती कि क्लब न जाऊंगी परन्तु समय आते ही फिर तैयार हो जाती। मैं अपने वश में न थी। मेरी सत्कल्पनाएं निर्बल हो गई थी।
दो वर्ष और बीत गए और अब बाबूजी के स्वभाव में एक विचित्र परिवर्तन होने लगा। वह उदास और चिंतित रहने लगे। मुझसे बहुत कम बोलते। ऐसा जान पड़ता कि उन्हें कठिन चिन्ता ने घेर रखा है, या कोई बीमारी हो गई है। मुंह बिलकुल सूखा गया था। तनिक-तनिक सी बात पर नौकरों पर झल्लाने लगते और बाहर बहुत कम जाते।
अभी एक ही मास पहले वह सौ काम छोड़कर क्लब अवश्य जाते थे, वहां गए बिना उन्हें चैन न पड़ती थी, अब अधिकतर अपने कमरे में आराम-कुर्सी पर लेटे हुए समाचार-पत्र और पुस्तकें देखा करते थे। मेरी समझ में न आता कि बात क्या है?
एक दिन उन्हें बड़े जोर का बुखार आया, दिन-भर बेहोश रहे, परन्तु मुझे उनके पास बैठने में अंकुश-सा लगता था। मेरा जी एक उपन्यास में लगा हुआ था। उनके पास जाती और पल-भर में फिर लौट आती। टेनिस का समय आया, तो दुविधा में पड़ गई कि जाऊं या न जाऊं। देर तक मन में यह संग्राम होता रहा। अन्त को मैंने यही निर्णय किया कि मेरे यहां रहने से यह कुछ अच्छे तो हो नहीं जायेंगे, इससे मेरा यहां बैठा रहना बिलकुल निरर्थक है। मैंने बढ़िया वस्त्र पहने, रैकेट लेकर क्लब-घर जा पहुंची। वहां मैंने मिसेज दास और मिसेज बागची से बाबूजी की दशा बतलायी, और सजल नेत्र चुपचाप बैठी रही। जब लोग कोर्ट में जाने लगे और मिस्टर दास ने मुझसे चलने को कहा तो मैं ठंडी आह भरकर कोर्ट में जा पहुंची और खेलने लगी।
आज से तीन वर्ष पूर्व बाबूजी को इसी प्रकार बुखार आ गया था। मैं रात भर उन्हें पंखा झलती रही थी। हृदय व्याकुल था और यही जी चाहता था कि इनके बदले मुझे बुखार आ जाए, परन्तु यह उठ बैठें। पर अब हृदय तो स्नेह-शून्य हो गया था, दिखावा अधिक था। अकेले रोने की मुझमें क्षमता न रह गई थी। मैं सदैव की भांति रात को नौ बजे लौटी। बाबूजी का जी कुछ अच्छा जान पड़ा। उन्होंने मुझे केवल दबी दृष्टि से देखा और करवट बदल ली, परन्तु मैं लेटी तो मेरा हृदय अपनी स्वार्थपरता और प्रमोदासक्ति पर धिक्कारता रहा।
मैं सब अंग्रेजी उपन्यासों को समझने लगी थी। हमारी बातचीत अधिक उत्कृष्ट और आलोचनात्मक होती थी।
हमारा सभ्यता का आदर्श अब बहुत ही उच्च हो गया था। हमको अब अपनी मित्र-मंडली से बाहर दूसरों से मिलने-जुलने में संकोच होता था। अब हम अपने से छोटी श्रेणी के लोगों से बोलने में अपना अपमान समझते थे। नौकरों को अपना नौकर समझते थे, और बस। हमको उनके निजी मामलों से कुछ मतलब न था।
हम उनसे अलग रहकर उनके ऊपर अपना रौब जमाए रखना चाहते थे। हमारी इच्छा यह थी कि वह हम लोगों को साहब समझें। हिन्दुस्तानी स्त्रियों को देखकर मुझे उनसे घृणा होती थी, उनमें शिष्टता न थी। खैर!
बाबूजी का जी दूसरे दिन भी न संभला। मैं क्लब न गयी। परन्तु जब लगातार तीन दिन तक उन्हें बुखार आता गया और मिसेज दास ने बार-बार नर्स बुलाने का आदेश किया, तो मैं सहमत हो गई। उस दिन से रोगी की सेवा-शुश्रूषा से छुट्टी पाकर बड़ा हर्ष हुआ। यद्यपि दो दिन मैं क्लब न गई थी, परन्तु मेरा जी वहीं लगा रहता था, बल्कि अपने भीरुतापूर्ण त्याग पर क्रोध भी आता था।
एक दिन तीसरे पहर मैं कुर्सी पर लेटी हुई अंग्रेजी पुस्तक पढ़ रही थी। अचानक मन में विचार आया कि बाबूजी का बुखार असाध्य हो जाय तो? पर इस विचार से लेश-मात्र भी दुःख न हुआ। मैं इस शोकमय कल्पना का मन-ही-मन आनन्द उठाने लगी। मिसेज दास, मिसेज नायक, मिसेज श्रीवास्तव, मिस खरे, मिसेज शरण अवश्य ही मातमपुर्सी करने आयेंगी। उन्हें देखते ही मैं सजल नेत्र हो उठूंगी और कहूंगी – बहनों! मैं लुट गयी। हाय मैं लुट गई, अब मेरा जीवन अंधेरी रात के भयानक वन या शमशान के दीपक के समान हैं, परन्तु मेरी अवस्था पर दुःख न प्रकट करो। मुझ पर जो पड़ेगी, उसे मैं उस महान आत्मा के मोक्ष के विचार से सह लूंगी।
मैंने इस प्रकार मन में एक शोकपूर्ण व्याख्यान की रचना कर डाली। यहां तक कि अपने उस वस्त्र के विषय में भी निश्चय कर लिया, जो मृतक के साथ श्मशान जाते समय पहनूंगी। इस घटना की शहर भर में चर्चा हो जाएगी। सारे कैन्टोंमेंट के लोग मुझे संवेदना के पत्र भेजेंगे। तब मैं उनका उत्तर समाचार-पत्रों में प्रकाशित करा दूंगी कि मैं प्रत्येक शोक-पत्र का उत्तर देने में असमर्थ हूं। हृदय के टुकड़े- टुकड़े हो गए हैं, उसे रोने के सिवा और किसी काम के लिए समय नहीं है। मैं इस हमदर्दी के लिए उन लोगों की कृतज्ञ हूं और उनसे विनयपूर्वक निवेदन करती हूं कि वे मृतक की आत्मा की सद्गति के निमित्त ईश्वर से प्रार्थना करें। मैं इन्हीं विचारों में डूबी हुई थी कि नर्स ने आकर कहा – आपको साहब याद करते हैं। यह मेरे क्लब जाने का समय था। मुझे उनका बुलाना अखर गया, लेकिन एक मास हो गया। वह अत्यन्त दुर्बल हो रहे थे। मुझे उन पर दया आई। बैठ गई और ढाढस देते हुए बोली – क्या करूं? कोई दूसरा डॉक्टर बुलाऊं?
बाबूजी आंखों नीची करके अत्यन्त करुण भाव से बोले – यहां कभी नहीं अच्छा हो सकता, मुझे अम्मा के पास पहुंचा दो।
