इस पर चारों महानुभाव हँसे। इस काम से फुरसत पाकर अब मकान का प्रश्न उठा। कुबेरदास 30 हजार देने पर तैयार थे, पर कानूनी कार्रवाई किए बिना सन्देह की गुंजाइश थी। यह गुंजाइश क्यों कर रखी जाए। एक दलाल बुलाया गया। नाटा-सा आदमी था, पोपला मुँह, कोई 70 की अवस्था। नाम था चोखेलाल। कुबेरदास ने कहा- चोखेलाल जी से हमारी तीन साल की दोस्ती है। आदमी क्या रत्न हैं।
भीमचंद- देखो चोखेलाल, हमें यह मकान बेचना है। इसके लिए कोई अच्छा ग्राहक लाओ। तुम्हारी दलाली पक्की।
कुबेरदास- बाजार का हाल अच्छा नहीं है, लेकिन फिर भी हमें यह तो देखना पड़ेगा कि रामनाथ के बाल-बच्चों को टोटा न हो। (चोखेलाल के कान में) तीस से आगे न जाना।
भीमचंद- देखिए कुबेरदास, यह अच्छी बात नहीं है।
कुबेरदास- तो मैं क्या कर रहा हूं। मैं तो यही कह रहा था कि अच्छा दाम लगवाना।
चोखेलाल- आप लोगों को यह कहने की जरूरत नहीं। मैं अपना धर्म समझता हूँ। रामनाथजी मेरे भी थे। मुझे यह भी मालूम है कि इस मकान के बनवाने में एक लाख से कम एक पाई भी नहीं लगी, लेकिन बाजार का हाल क्या आप लोगों में छिपा है? इस समय इसके 25 हजार से बेसी नहीं मिल सकते। सुभीते से कोई ग्राहक मिल जाये, तो दस-पाँच हजार और मिल जाएँगे, लेकिन इस समय तो 25 हजार भी मुश्किल से मिलेंगे। लो दही और लाव दही की बात है। घासीराम-25 हजार तो बहुत कम हैं भाई, और न सही 30 हजार तो करा दो।
चोखेलाल- 30 क्या मैं 40 करा दूं, पर कोई ग्राहक तो मिले। आप लोग कहते हैं, लो मैं 30 हजार की बातचीत करूंगा।
धनीराम- जब तीस हजार में ही देना है तो कुबेरदास जी ही क्यों न ले लें।इतना सस्ता माल दूसरों को दिया जाएं?
कुबेरदास- आप सब लोगों की राय हो तो ऐसा ही कर लिया जाए।
धनीराम ने हां, हां कहकर हामी भरी। भीमचंद मन में ऐंठ कर रह गए। यह सौदा भी पक्का हो गया। आज ही वकील ने बैनामा लिखा। तुरन्त रजिस्ट्री भी हो गई। सुशीला के सामने बैनामा लाया गया, तो उसने एक लंबी साँस ली और सजल नेत्रों से उस पर हस्ताक्षर कर दिए। अब उसे उसके सिवा और कहीं शरण नहीं है। बेवफा मित्र की भांति यह घर भी सुख के दिनों में साथ देकर दुःख के दिनों में उसका साथ छोड़ रहा है।
पंच लोग सुशीला के आंगन में बैठ, बिरादरी के रुक्के लिख रहे हैं और अनाथ विधवा ऊपर झरोखे पर बैठी भाग्य को रो रही है। इधर रुक्का तैयार हुआ, उधर विधवा की आंखों से आँसू की बूंदें निकल कर रुक्के पर गिर पड़ी।
धनीराम ने ऊपर देखकर कहा- पानी का छींटा कहां से आया?
संतलाल- बाई बैठी रो रही है। उसने रुक्के पर अपने रक्त के आँसुओं की मुहर लगा दी है।
धनीराम- (ऊंचे स्वर में) अरे, तो तू रो क्यों रही है, बाई? यह रोने का समय नहीं है। तुझे तो प्रसन्न होना चाहिए कि पंच लोग तेरे घर में आज यह शुभ-कार्य करने लिए जमा हैं। जिस पति के साथ तूने इतने दिनों भोग-विलास किया, उसी का पीछा सुधारने में तू दुःख मानती है।
बिरादरी में रुक्का फिरा। इधर तीन-चार दिन पंचों ने भोज की तैयारियों में बिताए। घी धनीराम की आढ़त से आया। मैदा-चीनी की आढ़त भी उन्हीं की थी। पाँचवें दिन प्रातःकाल ब्रह्म-भोज हुआ। संध्या-समय बिरादरी का ज्योनार। सुशीला के द्वार पर बग्घियों और मोटरों की कतारें खड़ी थी। भीतर मेहमानों की पंगत, थीं। आँगन, बैठक, दालान, बरोठा, ऊपर की छत, नीचे-ऊपर मेहमानों से भरा हुआ था। लोग भोजन करते थे और पंचों को सराहते थे।
‘खर्च तो सभी करते हैं, पर इंतजाम का सलीका चाहिए। ऐसे स्वादिष्ट पदार्थ बहुत कम खाने में आते हैं।’
‘सेठ चम्पाराम के भोज के बाद ऐसा भोज रामनाथ जी का ही हुआ है।
‘अमृतियाँ कैसी कुरकुरी हैं।’
‘रसगुल्ले मेवों से भरे हैं।’
‘सारा श्रेय पंचों को है।’
धनीराम ने नम्रता से कहा- आप भाइयों की दया है जो ऐसा कहते हो। रामनाथ से भाईचारे का व्यवहार था। नहीं करते तो कौन करता। चार दिन से सोना नसीब नहीं हुआ।
‘आप धन्य हैं, मित्र हों तो ऐसे हों।’
‘क्या बात है। आपने रामनाथजी का नाम रख लिया। बिरादरी यही खाना- खिलाना देखती है। रोकड़ देखने नहीं आती।’
‘मेहमान लोग बखान-बखान कर तर माल जड़ा रहे थे और उधर कोठी में बैठी हुई सुशीला सोच रही थी संसार में ऐसे स्वार्थी लोग भी हैं। सारा संसार स्वार्थमय हो गया? सब पेटों पर हाथ फेर-फेरकर भोजन कर रहे हैं। कोई इतना भी नहीं पूछता कि अनाथों के लिए भी कुछ बचा या नहीं।
एक महीना गुजर गया। सुशीला को एक-एक पैसे की तंगी हो रही थी। नकद था ही नहीं, गहने निकल गए थे। अब थोड़े से बरतन बच रहे थे। उधर छोटे- छोटे बहुत से बिल चुकाने थे। कुछ रुपये डॉक्टर के, कुछ दरजी के, कुछ बनियों के। सुशीला को यह रकम घर का बचा-खुचा सामान बेचकर चुकानी पड़ी। और महीना पूरा होते-होते उसके पास कुछ न बचा। बेचारा संतलाल एक दुकान पर मुनीम था। कभी-कभी वह आकर एकाध रुपया दे देता। इधर खर्च का हाथ फैला हुआ था। लड़के अवस्था को समझते थे। माँ को छेड़ते न थे, पर मकान के सामने से कोई खोंमचे वाला निकल जाता और वे दूसरे लड़कों को फल या मिठाइयाँ खाते देखते, तो उनके मुंह में चाहे पानी न आए, आँखों में अवश्य भर जाता था। ऐसी ललचायी आँखों से ताकते थे कि दया आती थी। वह बच्चे, जो थोड़े दिन पहले मेवे-मिठाई की ओर ताकते न थे, अब एक-एक पैसे की चीज को तरसते थे। वही सज्जन, जिन्होंने बिरादरी को भोजन करवाया था, अब घर के सामने से निकल जाते, पर कोई झाँकता न था।
शाम हो गई थी। सुशीला चूल्हा जलाए रोटियाँ सेंक रही थी और दोनों बालक चूल्हे के पास रोटियों को क्षुधित नेत्रों से देख रहे थे। चूल्हे के दूसरे ऐले पर दाल थी। दाल के पकने का इंतजार था। लड़की ग्यारह साल की थी, लड़का आठ साल का।
मोहन अधीर होकर बोला, अम्मा, मुझे सूखी रोटियाँ ही दे दो। बड़ी भूख लगी है।
सुशीला- अभी दाल कच्ची है भैया।
