लेकिन विवाह के बाद राजेन्द्र को नया अनुभव हुआ। महिलाओं का आना-जाना प्रायः बंद हो गया। इसके साथ ही मर्द दोस्तों की आमद-रफ्त बढ़ गई। दिन भर उनका ताँता लगा रहता था। सुलोचना उनके आदर-सत्कार में लगी रहती। पहले एक -दो महीने तक तो राजेन्द्र ने इधर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब कई महीने गुजर गये और स्त्रियों ने बहिष्कार का त्याग न किया, तो उन्होंने एक दिन सुलोचना से कहा- यह लोग आजकल अकेले ही आते हैं।
सुलोचना ने धीरे से कहा- हां, देखती तो हूँ।
राजेन्द्र- इनकी औरतें तो तुमसे परहेज नहीं करतीं?
सुलोचना- शायद करती हों।
राजेन्द्र- अगर ये लोग विचारों के बड़े स्वाधीन हैं। इनकी औरतें भी शिक्षित हैं, फिर क्या बात है?
सुलोचना ने दबी जबान से कहा- मेरी समझ में कुछ नहीं आता।
राजेन्द्र ने कुछ देर असमंजस में पड़कर कहा- हम लोग किसी दूसरी जगह चले जाएँ तो क्या हर्ज? वहाँ तो कोई हमें न जानता होगा।
सुलोचना ने अबकी तीव्र स्वर में कहा- दूसरी जगह क्यों जाएँ? हमने किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं है, किसी से कुछ माँगते नहीं। जिसे आना हो, आए, न आना हो, न आए। मुँह क्यों छिपाएं ?
धीरे-धीरे राजेन्द्र पर और रहस्य खुलने लगा, जो महिलाओं के व्यवहार से कहीं अधिक घृणास्पद और अपमानजनक था। राजेन्द्र को अब मालूम होने लगा कि ये महाशय जो आते हैं और घंटों बैठे सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर बहस किया करते हैं। वास्तव में विचार विनिमय के लिए नहीं, बल्कि रूप की उपासना के लिए आते हैं। उनकी आँखें सुलोचना को खोजती रहती हैं। उनके कान उसी की बातों की ओर लगे रहते हैं। उसके रूप-माधुर्य का आनंद उठाना ही उनका अभीष्ट है। यहाँ उन्हें यह संकोच नहीं होता, जो किसी भले आदमी की बहू-बेटी की ओर आंख नहीं उठने देता। शायद वे सोचते हैं, यहाँ उन्हें कोई रोक-टोक नहीं है।
कभी-कभी जब राजेन्द्र की अनुपस्थिति में कोई महाशय आ जाते, तो कुत्सित संकेतों से, अपनी रहस्यपूर्ण बातों से, अपनी लम्बी साँसों से उसे दिखाना चाहते थे कि हम भी तुम्हारी कृपा के भिखारी हैं, अगर राजेन्द्र का तुम पर सोलहों आना अधिकार है, तो थोड़ी-सी दक्षिणा के अधिकारी हम भी हैं। सुलोचना उस वक्त जहर का घूंट पीकर रह जाती।
अब तक राजेन्द्र और सुलोचना दोनों क्लब जाया करते थे। यहाँ उदार सज्जनों का अच्छा जमघट रहता था। जब तक राजेन्द्र को किसी की ओर से संदेह न था, यह उसे आग्रह करके अपने साथ ले जाते थे। सुलोचना के पहुँचते ही यहाँ एक स्फूर्ति-सी उत्पन्न हो जाती थी। जिस मेज़ पर सुलोचना बैठती, उसे लोग घेर लेते थे। कभी-कभी सुलोचना गाती भी थी। उस वक्त सब-के-सब उन्मत्त हो जाते।
क्लब में महिलाओं की संख्या अधिक न थी। मुश्किल से पाँच छह लेडियाँ आती थीं, मगर ये भी सुलोचना से दूर-दूर रहती थीं, बल्कि अपनी भाव-भंगियों और कटाक्षों से वे उसे जता देना चाहती थीं कि तुम पुरुषों का दिल खुश करो, हम कुल-बंधुओं के पास नहीं आ सकतीं।
लेकिन जब राजेन्द्र पर इस कटु सत्य का प्रकाश हुआ, तो उन्होंने क्लब जाना छोड़ दिया, मित्रों के यहाँ आना-जाना बंद कर दिया, और अपने यहाँ आने वालों की भी उपेक्षा करने लगे। वे चाहते थे कि मेरे एकांतवास में कोई विघ्न न डाले। आखिर उन्होंने बाहर आना-जाना छोड़ दिया। अपने चारों ओर छल-कपट का जाल- सा बिछा हुआ मालूम होता था। किसी पर विश्वास न कर सकते थे, किसी से सद्व्यवहार की आशा नहीं। सोचते, ऐसे धूर्त, कपटी, दोस्ती की आड़ में गला काटने वाले आदमियों से मिले ही क्यों?
वे स्वभाव से मिलनसार आदमी थे। पक्के वारबाश। यह एकांतवास जहाँ न कोई सैर थी, न विनोद, न कोई चहल-पहल, उनके के लिए कठिन कारावास से कम न था। यद्यपि कर्म और वचन से सुलोचना की दिलजोई करते रहते थे, लेकिन सुलोचना की सूक्ष्म और सशंक आँखों से अब यह बात छिपी न थी कि यह अवस्था इनके लिए दिन-दिन असह्य होती जाती थी। वह दिल में सोचती, इनकी यह दशा मेरे ही कारण तो है, मैं ही तो इनके जीवन की काँटा हो गई।
एक दिन उसने राजेन्द्र से कहा- आजकल क्लब क्यों नहीं चलते? कई सप्ताह हुए, घर से निकले तक नहीं?
राजेन्द्र ने बेदिली से कहा- मेरा जी कहीं जाने को नहीं चाहता। अपना घर सबसे अच्छा है।
सकुलोचना- जी ऊबता ही होगा। मेरे कारण यह तपस्या क्यों करते हो? मैं तो न जाऊंगी। उन स्त्रियों से मुझे घृणा होती है। उनमें एक भी ऐसी नहीं, जिसके दामन पर काले दाल नहीं, लेकिन सब सीता बनी फिरती हैं। मुझे तो उनकी सूरत से चिढ़ हो गई है, मगर तुम क्यों नहीं जाते? कुछ दिल ही बहल जाएगा ।
राजेन्द्र- दिल नहीं, पत्थर बहलेगा। जब अंदर आग लगी हुई हो, तो बाहर शांति कहाँ?
सुलोचना चौंक पड़ी। आज पहली बार उसने राजेन्द्र के मुँह से ऐसी बात सुनी। वह अपने ही को बहिष्कृत समझती थी। अपना अनादर जो कुछ था, उसका था। राजेन्द्र के लिए तो अब भी सब दरवाजे खुले हुए थे। वह जहाँ चाहे जा सकते हैं, जिससे चाहें मिल सकते हैं, उनके लिए कौन-सी रुकावट है। लेकिन नहीं, अगर उन्होंने किसी कुलीन स्त्री से विवाह किया होता तो उनकी यह दशा क्यों होती? प्रतिष्ठित घरानों की औरतें आतीं, आपस में मैत्री बनती, जीवन सुख से कटता, रेशम-में-रेशम का पैबंद लग जाता। अब तो उसमें टाट का पैबंद लग गया। मैंने आकर सारे तालाब को गंदा कर दिया। उसके मुख पर उदासी छा गई।
राजेन्द्र को भी तुरंत मालूम हो गया कि उनकी जुबान से एक ऐसी बात निकल गई, जिसके दो अर्थ हो सकते हैं। उन्होंने फौरन बात बनायी-क्या तुम समझती हो कि हम और तुम अलग-अलग हैं? हमारा और तुम्हारा जीवन एक है। जहां तुम्हारा आदर नहीं मैं वहां कैसे जा सकता हूँ? फिर मुझे भी समाज के उन सियारों से घृणा हो रही है। मैं इन सबों के कच्चे चिट्ठे जानता हूँ। पद या उपाधि या धन से किसी की आत्मा शुद्ध नहीं हो जाती। जो ये लोग करते हैं, वह अगर कोई नीचे दरजे का आदमी करता, उसे कहीं मुँह दिखाने की हिम्मत न होती, मगर यह लोग अपनी सारी बुराई उदारतावाद के पर्दे में छिपाते हैं। इन लोगों से दूर रहना ही अच्छा है।
सुलोचना का चित शांत हो गया।
