दूसरे साल सुलोचना की गोद में एक चाँद-सी बालिका का उदय हुआ। उसका नाम रखा गया शोभा। कुंवर साहब का स्वास्थ्य इन दिनों कुछ अच्छा न था। मंसूरी गये हुए थे। यह खबर पोते ही राजेन्द्र को तार दिया कि जच्चा और बच्चा को लेकर यहाँ आ जाओ।
लेकिन राजेन्द्र इस अवसर पर न जाना चाहते थे। अपने मित्रों की सज्जनता और उदारता की अन्तिम परीक्षा लेने का इससे अच्छा और कौन-सा अवसर हो सकता था। सलाह हुई एक शानदार दावत दी जाए। प्रोग्राम में संगीत भी शामिल था, कई अच्छे-अच्छे गवैए बुलाए गये, अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, मुसलमानी, सभी प्रकार के भोजनों का प्रबंध किया गया।
कुँवर साहब गिरते-पड़ते मंसूरी से आए। उसी दिन दावत थी। नियत समय पर निमंत्रित लोग एक-एक करके आने लगे। कुँवर साहब स्वयं सबका स्वागत कर रहे थे। खाँ साहब आए, मिर्जा साहब आए, मीर साहब आए, मगर पंडितजी और बाबूजी, और लाला साहब और चौधरी साहब कक्कड़, मेहरा और चोपड़ा, कौल और हुक्कू श्रीवास्तव और खरे किसी का पता न था।
यही सब लोग होटलों में सब-कुछ खाते थे, अण्डे और शराब उड़ाते थे, इस विषय में किसी तरह का विवेक या विचार न करते थे। फिर आज क्यों तशरीफ नहीं लाये? इसलिए नहीं के छूतछात का विचार था, बल्कि इसलिए कि वह अपनी उपस्थिति को इस विवाह के समर्थन की सनद समझते थे और यह सनद देने की उनकी इच्छा न थी।
दस बजे रात तक कुंवर साहब फाटक पर खड़े रहे। लेकिन उस वक्त तक कोई न आया, तो कुँवर साहब ने आकर राजेन्द्र से कहा- अब लोगों का इंतजार फिजूल है। मुसलमानों को खिला दो और बाकी सामान गरीबों को दिला दो।
राजेन्द्र एक कुर्सी पर हतबुद्धि-से बैठे हुए थे। कुंठित स्वर से बोले- जी हां, यही तो मैं सोच रहा हूँ।
कुंवर- मैंने तो पहले ही समझ लिया था। हमारी तौहीन नहीं हुई। खुद उन लोगों की कलई खुल गई।
राजेन्द्र- खैर, परीक्षा तो हो गई। कहिए तो अभी जाकर एक-एक की खबर लूँ।
कुंवर साहब ने विस्मित होकर कहा- क्या उनके घर जाकर?
राजेन्द्र- जी हां। पूछूं कि आप लोग जो समाज-सुधार का राग अलापते फिरते हैं, वह किस बल पर?
कुवंर- व्यर्थ है। जाकर आराम से लेटो। नेक और बद की सबसे बड़ी पहचान अपना दिल है। अगर हमारा दिल गवाही दे कि यह काम बुरा नहीं है, तो फिर सारी दुनिया मुँह फेर ले, हमें किसी की परवाह न करनी चाहिए।
राजेन्द्र- लेकिन मैं इन लोगों को यों न छोड़ूंगा एक-एक की बखिया उधेड़ कर रख न दूँ तो नाम नहीं।
यह कहकर उन्होंने पत्तल और कसोरे उठवा-उठवा कर कंगालों को देना शुरू किया।
राजेन्द्र सैर करके लौटे ही थे कि वेश्याओं का एक दल सुलोचना को बधाई देने के लिए आ पहुंचा। जुहरा की एक सगी भतीजी थी, गुलनार। सुलोचना के यहाँ पहले बराबर आती-जाती थी। इधर दो साल से न आयी थी। यह उसी का बधाई था। दरवाजे पर अच्छी खासी भीड़ हो गई थी। राजेन्द्र ने शोरगुल सुना। गुलनार ने आगे बढ़कर उन्हें सलाम किया और बोली- बाबूजी, बेटी मुबारक। बधाई लायी हूं।
राजेन्द्र पर मानो लकवा-सा गिर गया। सिर झुक गया और चेहरे पर कालिमा- सी पूत गयी। न मुंह से बोले, न किसी को बैठने का इशारा किया, न वहाँ से हिले। बस, मूर्तिवत खड़े रह गये। एक बाजारी औरत से नाता पैदा करने का ख्याल इतना लज्जास्पद था, इतना जघन्य कि उसके सामने सज्जनता भी मौन रह गई। इतना शिष्टाचार भी न कर सके कि सब को कमरे में जाकर बिठा तो देते। आज पहली बार उन्हें अपने अद्य पतन का अनुभव हुआ। मित्रों की कुटिलता और महिलाओं की उपेक्षा को वह उनका अन्याय समझते थे अपना अपमान नहीं, लेकिन यह बधाई उनकी अबाध्य उदारता के लिए भी भारी था।
सुलोचना का जिस वातावरण में पालन-पोषण हुआ, वह एक प्रतिष्ठित हिंदू कुल का वातावरण था। यह सच है कि अब भी सुलोचना नित्य जुहरा के मजार की परिक्रमा करने जाती थी, मगर जुहरा अब एक पवित्र स्मृति थी, दुनिया की मलिनताओं और कलुषताओं से रहित। गुलनार से नातेदारी और परस्पर का विवाह दूसरी बात थी। जो लोग तस्वीरों के सामने सिर झुकाते हैं, उन पर फूल चढ़ाते हैं, वे भी मूर्ति-पूजा की निंदा करते हैं। एक स्पष्ट है, दूसरा सांकेतिक। एक प्रत्यक्ष है दूसरा आंखों से छिपा हुआ।
सुलोचना अपने कमरे में चिक की आड़ में खड़ी राजेन्द्र का असमंजस और क्षोभ देख रही थी। जिस समाज को उसने अपना उपास्य बनाना चाहा था, जिसके द्वार पर सिजदे करते उसे बरसों हो गये थे, उसकी तरफ से निराश होकर, उसका हृदय इस समय उससे विद्रोह करने पर तुला हुआ था। उसके जी में आता था, गुलनार को बुलाकर गले लगा लूँ। जो लोग मेरी बात भी नहीं पूछते, उनकी खुशामद क्यों करूं? यह बेचारियां इतनी दूर से आयी हैं, मुझे अपना ही समझकर तो। उनके दिल में प्रेम तो है, यह मेरे दुःख-सुख में शरीक होने को तैयार तो हैं।
आखिर राजेन्द्र ने सिर उठाया और शुष्क मुस्कान के साथ गुलनार से बोले- आइए, आप लोग अंदर चले आइए। यह कहकर वह आगे- रास्ता दिखाते हुए दीवानखाने की ओर चले कि सहसा महरी निकली और गुलनार के हाथ में एक पुर्जा देकर चली गयी। गुलनार ने यह पुर्जा लेकर देखा उसे राजेन्द्र के हाथ में देकर वहीं खड़ी हो आई। राजेन्द्र ने पुर्जा देखा, लिखा था- बहन गुलनार, तुम यहाँ नाहक आयी। हम लोग यों ही बदनाम हो रहे हैं। अब और बदनाम मत करो, बधाई वापस ले जाओ। कभी मिलने को जी चाहे, तो रात को आना और अकेली। मेरा जी तुम्हारे गले लिपटकर रोने के लिए तड़प रहा है, मगर मजबूर हूं।
राजेन्द्र ने पुर्जा फाड़कर फेंक दिया और उद्दंड होकर बोले- इन्हें लिखने दो। मैं किसी से नहीं डरता। अंदर आओ।
गुलनार वे एकदम पीछे फिरकर कहा- नहीं, बाबूजी, अब हमें आज्ञा दीजिए।
राजेन्द्र- एक मिनट तो बैठो।
गुलनार- जी नहीं। एक सेकंड भी नहीं।
