‘क्यों?’
इसलिए कि मैं हूँ पुरूष हूं। इस छोटे-से परिवार का मुख्य अंग हूँ। इसलिए कि तुम्हारे ही कारण मुझे… राजेन्द्र कहते-कहते रुक गये, पर सुलोचना उनके मुँह से निकलने वाले शब्दों को ताड़ गई। उसका चेहरा तमतमा उठा, मानो छाती में बरछी-सी लग गई। मन में ऐसा उद्वेग उठा कि इसी क्षण यह घर छोड़कर, सारी दुनिया से नाता तोड़कर चली जाऊं और इन्हें कभी मुँह न दिखाऊँ। अगर इसी का नाम विवाह है कि किसी की मर्जी की गुलाम होकर रहूं, अपमान सहन करूं, तो ऐसे विवाह को दूर ही से सलाम है।
वह तैश में आकर कमरे से निकलना चाहती थी कि कुँवर साहब ने लपक कर उसे पकड़ लिया और बोले- क्या करती हो बेटी, घर में जाओ, क्यों रोती हो? अभी तो मैं जीता तुम्हें क्या गम है। राजेन्द्र बाबू ने कोई ऐसी बात नहीं कही और न कहना चाहते थे। फिर आपस की बातों का क्या बुरा मानना। किसी अवसर पर तुम भी जो जी में आए कह लेना।
यों समझाते हुए कुँवर साहब उसे अंदर ले गये। वास्तव में सुलोचना कभी गुलनार से मिलने की इच्छुक न थी। वह उससे स्वयं भागती थी। एक क्षणिक आवेश में उसने गुलनार को वह पुर्जा लिख दिया था। मन में स्वयं समझाती थी, ऐसे लोगों से मेल-जोल रखना मुनासिब नहीं, लेकिन राजेन्द्र ने यह विरोध किया, यही उसके लिए असह्य था। यह मुझे मना क्यों करें? क्या मैं इतना भी नहीं समझती? क्या इन्हें मेरी ओर से इतनी शंका है। इसीलिए, कि मैं कुलीन नहीं हूं। मैं अभी-अभी गुलनार से मिलने जाऊंगी, जिद्दन जाऊंगी। देखूं, मेरा क्या करते हैं।
लाड़-प्यार में पली हुई सुलोचना को कभी किसी ने तीखी आँखों से न देखा था। कुँवर साहब उसकी मर्जी के गुलाम थे। राजेन्द्र भी इतने दिनों उसका मुँह जोहते रहे। अब अकस्मात् यह तिरस्कार और फटकार पाकर उसकी स्वेच्छा प्रेम और आत्मीयता के सारे नातों को पैरों-से कुचल डालने के लिए विकल हो उठी। यह सब कुछ सह लेगी, पर यह धौंस, यह अन्याय, यह अपमान उससे न सहा जाएगा।
उसने खिड़की से सिर निकलकर कोचवान को पुकारा। और जोर से बोली- गाड़ी लाओ, मुझे चौक जाना है, अभी लाओ।
कुंवर साहब ने पुचकार कर कहा- बेटी सिल्लो, क्या कर रही हो। मेरे ऊपर दया करो। इस वक्ता कहीं मत जाओ, नहीं हमेशा के लिए पछताना पड़ेगा। राजेन्द्र बाबू भी बड़े गुस्सेवर आदमी हैं। फिर तुमसे बड़े हैं, ज्यादा विचारवान हैं, उन्हीं का कहना मान जाओ। मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुम्हारी माँ जब थीं, तो कई बार ऐसी नौबत आयी कि मैंने उनसे कहा, घर से निकल जाओ। पर उस प्रेम की देवी ने कभी घर के बाहर पांव नहीं निकाला। इस वक्त धैर्य से काम लो। मुझे विश्वास है, जरा देर में राजेन्द्र बाबू खुद लज्जित होकर तुम्हारे पास अपना अपराध क्षमा कराने आएँगे।
सहसा राजेन्द्र ने आकर पूछा- गाड़ी क्यों मंगवायी कहाँ जा रही हो?
राजेन्द्र का चेहरा इतना क्रोधोन्मत्त हो रहा- था कि सुलेचना सहम उठी। दोनों आँखों से ज्वाला-सी निकल रही थी। नथने फफक रहे थे। पिंडलियां काँप रही थीं। यह कहने की हिम्मत न पड़ी कि गुलनार के घर जाती हूँ। गुलनार का नाम सुनते ही शायद वह मेरी गर्दन पर सवार हो जाएंगे- इस भय से वह काँप उठी। आत्म-रक्षा का भाव प्रबल हो गया। बोली- जरा अम्मा के मजार तक जाऊंगी। राजेन्द्र ने डपटकर कहा- कोई जरूरत नहीं वहाँ जाने की।
सुलोचना ने कातर स्वर में कहा- क्यों, अम्मा के मजार तक जाने की भी रोक है?
राजेन्द्र ने उसी ध्वनि में कहा- हाँ।
सुलोचना- तो फिर अपना घर सँभालो, मैं जाती हूँ।
राजेन्द्र- जाओ, तुम्हारे लिए क्या, यह न सही, दूसरा घर सही।
अभी तक तस्मा बाकी था, वह कट गया। यों शायद सुलोचना वहाँ से कुँवर साहब के बँगले पर जाती, दो-चार दिन रूठी रहती, फिर राजेन्द्र उसे मना लाते और मामला तय हो जाता, लेकिन इस चोट ने समझौते और संधि की जड़ काट दी। सुलोचना दरवाजे तक पहुँची थी, वहीं चित्र-लिखित-सी खड़ी रह गई। मानो किसी ऋषि के शाप ने उसके प्राण खींच लिये हों। वहीं बैठ गई। न कुछ बोल सकी, न कुछ सोच सकी। जिसके सिर पर बिजली गिर पड़ी हो, वह क्या सोचे, क्या रोए, क्या बोले? राजेन्द्र के यह शब्द बिजली से कहीं अधिक घातक थे।
सुलोचना कब तक वहाँ बैठी रही, उसे कुछ खबर न थी। जब उसे कुछ होश आया, तो घर में सन्नाटा छाया हुआ था। घड़ी की तरफ आंख उठी, एक बज रहा था। सामने आरामकुर्सी पर कुँवर साहब नवजात शिशु को गोद में लिये सो गये थे। सुलोचना ने उठकर बरामदे में झाँका, राजेन्द्र अपने पलँग घर लेटे हुए थे। उसके जी में आया, इसी वक्त इन्हीं के सामने जाकर कलेजे में छुरी मार ले और इन्हीं के सामने तड़प-तड़प कर मर जाऊँ। वह घातक शब्द याद आ गये। उनके मुँह से ऐसे शब्द निकले क्यों कर। इतने चतुर, इतने उदार और इतने विचारशील होकर भी वह जबान पर ऐसे शब्द क्यों कर ला सके?
उसका सारा सतीत्व, भारतीय आदर्शों की गोद में पली हुई भूमि पर आहत पड़ी हुई, अपनी दीनता पर रो रहा था। यह सोच रही थी, अगर मेरे नाम पर यह दाग न होता, मैं भी कुलीन होती, तो क्या यह शब्द इनके मुँह से निकल सकते थे? लेकिन मैं बदनाम हूँ, दलित हूँ, त्याज्य हूं, मुझे सब कुछ कहा जा सकता है। उफ, इतना कठोर हृदय, क्या वह किसी दशा में राजेंद्र पर इतना कठोर प्रहार कर सकती थी?
बरामदे में बिजली की रोशनी थी। राजेन्द्र के मुख पर क्षोभ या ग्लानि का नाम भी न था। क्रोध की कठोरता अब तक उनके मुख को विकृत किए हुए थी। शायद इन आंखों में आँसू देखकर अब भी सुलोचना के आहत हृदय को तस्कीन होती, लेकिन वहाँ तो अभी तक तलवार खिंची हुई थी। उसकी आंखों में सारा संसार सूना हो गया।
सुलोचना फिर अपने कमरे में आयी। कुँवर साहब की आंखें अब भी बन्द थी। इन चन्द घंटों ही में उनका तेजस्वी मुख कांतिहीन हो गया था। गालों पर आंसुओं की रेखाएँ सूख गई थीं। उसने उनके पैरों के पास बैठ सच्ची भक्ति के आँसू बहाए। हाय! मुझ अभागिन के लिए इन्होंने कौन-कौन से कष्ट नहीं झेले, कौन-कौन-से अपमान नहीं सहे, अपना सारा जीवन ही मुझ पर अर्पण कर दिया और उसका हृदय-विदारक अंत।
सुलोचना ने फिर बच्ची को देखा, अगर उसका गुलाब का-सा विकसित मुख देखकर भी उसके हृदय में ममता की तरंग न उठी। उसने उसकी तरफ से मुँह फेर लिया। यही उस अपमान की मूर्तिमान वेदना है, जो इतने दिनों मुझे भोगनी पड़ी। मैं इसके लिए क्यों प्राण संकट में डालूं? अगर उसके निर्दयी पिता को उसका प्रेम है, तो उसको पाले। और एक दिन वह भी इसी तरह रोए, जिस तरह आज मेरे पिता को रोना पड़ रहा है। ईश्वर अबकी अगर जन्म देना, तो किसी भले आदमी के घर जन्म देना।
जहाँ जुहरा का मजार था, उसी के बगल में एक और मजार बना हुआ है। जुहरा के मजार पर घास जम आयी है, जगह-जगह से चूना गिर गया है, लेकिन दूसरा मजार साफ-सुथरा और सजा हुआ है। उसके चारों तरफ गमले रखे हुए हैं और मजार तक जाने के लिए गुलाब के बेलों की रविशों बनी हुई हैं।
शाम हो गई है। सूर्य की क्षीण, उदास, पीली किरणें मानो उस मजार पर आंसू बहा रही हैं। एक आदमी एक तीन-चार साल की बालिका को गोद में लिये हुए आया और उस मजार को रूमाल से साफ करने लगा। रबिशों में जो पत्तियाँ पड़ी थी, उन्हें चुनकर साफ कीं और मजार पर सुगंध छिड़कने लगा। बालिका दौड़-दौड़कर तितलियों को पकड़ने लगी।
यह सुलोचना का मजार है। उसकी आखिरी नसीहत थी, कि मेरी लाश जलाई न जाए, मेरी माँ की बगल में मुझे सुला दिया जाए । कुँवर साहब तो सुलोचना के बाद छह महीने से ज्यादा न चल सके। हाँ राजेन्द्र अपने अन्याय का पश्चात्ताप कर रहे हैं।
शोभा अब तीन साल की हो गई है और उसे विश्वास है कि एक दिन उसकी माँ इसी मजार से निकलेगी।
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