Actresses by Munshi Premchand
Actresses by Munshi Premchand

रंगमंच का परदा गिर गया। तारादेवी शकुंतला का पार्ट खेलकर दुष्यंत के सम्मुख खड़ी, ग्लानि, वेदना और तिरस्कार से उत्तेजित भावों को आग्नेय शब्दों में प्रकट कर रही थी, दर्शक-वृंद शिष्टता के नियमों की उपेक्षा करके मंच की ओर उन्मत्तों की भांति दौड़ पड़े थे और तारादेवी के चरणों पर गिर पड़े। सारा स्टेज फूलों से पट गया, आभूषणों की वर्षा होने लगी। यदि उसी क्षण मेनका का विमान नीचे आकर उसे उड़ा न ले जाता, तो कदाचित् उस धक्कम-धक्के में दस-पांच आदमियों की जान पर बन जाती। मैनेजर ने तुरन्त आकर दर्शकों को गुण-ग्राहकता का धन्यवाद दिया और वादा भी किया कि दूसरे दिन फिर यही तमाशा होगा। तब लोगों का मोहोन्माद शांत हुआ। मगर एक युवक उस वक्त भी मंच पर खड़ा रहा। लंबे कद का था, तेजस्वी मुद्रा, कुंदन का-सा रंग, देवताओं का-सा स्वरूप, गठीला देह, मुख से एक ज्योति-सी प्रस्फुटित हो रही थी। कोई राजकुमार मालूम होता था।

जब सारे दर्शकगण बाहर निकल गए, उसने मैनेजर से पूछा – ‘क्या मैं तारादेवी से एक क्षण के लिए मिल सकता हूं?’

मैनेजर ने उसी उपेक्षा के भाव से कहा – ‘जी नहीं। क्षमा कीजिएगा। यह नियमों के विरुद्ध है।’

युवक ने और कुछ न कहा, निराश होकर स्टेज के नीचे उतर पड़ा और बाहर जाना ही चाहता था कि मैनेजर ने पूछा – ‘जरा ठहर जाए, आपका कार्ड?’

युवक ने जेब से कागज का एक टुकड़ा निकालकर कुछ लिखा और दे दिया। मैनेजर ने पुर्जे को उड़ती हुई निगाह से देखा – कुंवर निर्मलकांत चौधरी, ओ. बी. ई.। मैनेजर की कठोर मुद्रा कोमल हो गई। कुंवर निर्मलकांत – शहर के सबसे बड़े रईस और ताल्लुकेदार साहित्य के उज्ज्वल रत्न, संगीत के सिद्धहस्त आचार्य, उच्चकोटि के विद्वान, आठ दस लाख सालाना के नफेदार, जिनके दान से देश की कितनी ही संस्थाएं चलती थीं – इस समय एक क्षुद्र प्रार्थी के रूप में खड़े थे। मैनेजर अपने उपेक्षा-भाव पर लज्जित हो गया। विनम्र शब्दों में बोला, क्षमा कीजिएगा, मुझसे बड़ा अपराध हुआ। मैं अभी तारादेवी के पास हुजूर का कार्ड लिए जाता हूं।

कुंवर साहब ने उससे रुकने का इशारा करके कहा – ‘नहीं, अब रहने ही दीजिए, मैं कल पांच बजे आऊंगा। इस वक्त तारादेवी को कष्ट होगा। यह उनके विश्राम का समय है।’

मैनेजर – ‘मुझे विश्वास है कि वह आपकी खातिर इतना कष्ट सहर्ष सह लेंगी, मैं एक मिनट में आता हूं।’

किंतु कुंवर साहब अपना परिचय देने के बाद अब अपनी आतुरता पर संयम का परदा डालने के लिए विवश थे। मैनेजर को सज्जनता का धन्यवाद दिया और कल आने का वादा करके चले गए।

तारा एक साफ-सुधरे और सजे हुए कमरे में मेज़ के सामने किसी विचार में मग्न बैठी थी। रात का वह दृश्य उसकी आंखों के सामने नाच रहा था। ऐसे दिन जीवन में क्या बार-बार आते हैं? कितने मनुष्य उसके दर्शनों के लिए विकल हो रहे थे। बस, एक दूसरे पर फटे पड़ते थे। कितनों को उसने पैरों ने ठुकरा दिया था – हां, ठुकरा दिया था। मगर उस समूह में केवल एक दिव्यमूर्ति अविचलित रूप से खड़ी थी। उसकी आंखों में कितना गंभीर अनुराग था, कितना दृढ़ संकल्प ऐसा जान पड़ता था मानो, उसके दोनों नेत्र उसके हृदय में चुभे जा रहे हों। आज फिर उस पुरुष के दर्शन होंगे या नहीं, कौन जानता है? लेकिन यदि आज उनके दर्शन हुए, तो तारा उनसे एक बार बातचीत किए बिना न जाने लगी।

यह सोचते हुए उसने आईने की ओर देखा, चेहरा कमल के फूल-सा खिला था। कौन कह सकता था कि यह नव-विकसित पुष्प पैंतीस बसंत की बहार देख चुका है। वह कांति, वह कोमलता, वह चपलता, वह माधुर्य किसी नवयौवन को लज्जित कर सकता था। तारा एक बार फिर हृदय में प्रेम का दीपक जला बैठी। आज से बीस साल पहले एक बार उसको प्रेम का कटु अनुभव हुआ था। तब से यह एक प्रकार का वैधव्य-जीवन व्यतीत करती रही। कितने प्रेमियों ने अपना हृदय उसे भेंट करना चाहा था, पर उसने किसी की ओर आंख उठाकर भी न देखा था। उसे उनके प्रेम में कपट की गंध आती थी। मगर आह! आज उसका संयम उसके हाथ से निकल गया। एक बार फिर उसे हृदय में उसी मधुर वेदना का अनुभव हुआ, जो बीस साल पहले हुआ था। एक पुरुष का सौम्य स्वरूप उसकी आंखों में बस गया, हृदय-पट पर खिंच गया। उसे वह किसी तरह भूल न सकती थी। उसी पुरुष को उसने मोटर पर जाते देखा होता, तो कदाचित उधर ध्यान भी न करती, पर उसे अपने सम्मुख प्रेम का उपहार हाथ में लिये देखकर वह स्थिर न रह सकी।

सहसा दाई ने आकर कहा – ‘बाईजी, रात की सब चीजें रखी हुई हैं, कहिए तो लाऊं।’ तारा ने कहा – ‘नहीं, मेरे पास चीज लाने की जरूरत नहीं, मगर ठहरो, क्या-क्या चीजें हैं। ढेर-का-ढेर तो लगा है।’ ‘बाईजी, कहां तक गिनाऊं – अशर्फियां हैं, ब्रूचेज, बाल के पिन, बटन, लॉकेट, अंगूठियां सभी तो हैं। एक छोटे-से डिब्बे में एक सुंदर हार है। मैंने आज तक वैसा हार नहीं देखा। सब संदूक में रख दिया है।’

‘अच्छा, वह संदूक मेरे पास ला।’ दाई ने संदूक लाकर मेज़ पर रख दिया। उधर एक लड़के ने एक पत्र लाकर तारा को दिया। तारा ने पत्र को उत्सुक नेत्रों से देखा – कुंवर निर्मलकांत, ओ. बी. ई.। लड़के से पूछा – ‘यह पत्र किसने दिया। वह तो नहीं, जो रेशमी साफा बांधे हुए थे?’

लड़के ने केवल इतना कहा – ‘मैनेजर साहब ने दिया है। और लपका हुआ बाहर चला गया।’

संदूक में सबसे पहले डिब्बा नजर आया। तारा ने उसे खोला तो सच्चे मोतियों का सुंदर हार था। डिब्बे में एक तरफ एक कार्ड भी था। तारा ने लपक कर उसे निकाल लिया और पढ़ा – ‘कुंवर निर्मलकांत.. कार्ड उसके हाथ से गिर पढ़ा। वह झपटकर कुरसी से उठी और बड़े वेग से कई कमरों और बरामदों को पार करती मैनेजर के सामने आकर खड़ी हो गई। मैनेजर ने खड़े होकर उसका स्वागत किया और बोला – ‘मैं रात की सफलता पर आपको बधाई देता हूं।’

तारा ने खड़े-खड़े पूछा – ‘कुंवर निर्मलकांत क्या बाहर हैं? लड़का पत्र देकर भाग गया। मैं उससे कुछ पूछ न सकी।’

कुंवर साहब का रुक्का तो रात ही तुम्हारे चले आने के बाद मिला था।’

‘तो आपने उसी वक्त मेरे पास क्यों न भेज दिया?’

मैनेजर ने दबी जबान से कहा – ‘मैंने समझा, तुम आराम कर की होगी, कष्ट देना उचित न समझा और भाई, साफ बात यह है कि मैं डर रहा था, कहीं कुंवर साहब को तुमसे मिलाकर तुम्हें खो न बैठूं। अगर मैं औरत होता, तो उसी वक्त उनके पीछे हो लेता। ऐसा देवरूप पुरुष मैंने आज तक नहीं देखा। वह तो रेशमी साफा बांधे खड़े थे तुम्हारे सामने। तुमने भी तो देखा था।’

तारा ने मानो अर्धनिद्रा की दशा में कहा – ‘हां, देखा तो था – क्या वह फिर आएंगे?’ ‘हां, कल पांच बजे। बड़े विद्वान आदमी हैं, और इस शहर के सबसे बड़े रईस।’

‘आज मैं रिहर्सल में न आऊंगी।’

कुंवर साहब आते होंगे। तारा आईने के सामने बैठी है और दाई उसका श्रृंगार कर रही है। श्रृंगार किया जाता था। कवियों, चित्रकारों और रसिकों ने श्रृंगार की मर्यादा-सी बांध दी थी। आंखों के लिए काजल लाजिमी था, हाथों के लिए मेंहदी, पांवों के लिए महावर। एक-एक अंग एक-एक आभूषण के लिए निर्दिष्ट था। आज वह परिपाटी नहीं रही। आज प्रत्येक रमणी अपनी सुरुचि, सुबुद्धि और तुलनात्मक भाव से श्रृंगार करती है। उसका सौंदर्य जिस उपाय से आकर्षण की सीमा पर पहुंच सकता है, वही उसका आदर्श होता है। तारा इस कला में निपुण थी। वह पंद्रह साल से इस कम्पनी में थी और यह समस्त जीवन उसने पुरुषों के हृदय से खेलने ही में व्यतीत किया था। किस चितवन से, किस मुस्कान से, किस अंगड़ाई से, किस तरह केशों के बिखेर देने से दिलों का कत्लेआम हो जाता है, इस कला में कौन उससे बढ़कर हो सकता था। आज उसने चुन-चुनकर आजमाये हुए तीर तरकस से निकाले, और जब अपने अस्त्रों से सजकर वह दीवानखाने में आयी तो जान पड़ा, मानो संसार का सारा माधुर्य उसकी बलाएं ले रहा है। वह मेज़ के पास खड़ी होकर कुंवर साहब का कार्ड देख रही थी, पर उसके कान मोटर की आवाज की ओर लगे हुए थे। वह चाहती थी कि कुंवर साहब इसी वक्त आ जायें ओर उसे इसी अंदाज से खड़े देखें। इसी अंदाज से वह इसके अंग-प्रत्यंगों की पूर्ण छवि देख सकते थे। उसने अपनी श्रृंगार-कला से काल पर विजय पा ली थी। कौन कह सकता था कि यह चंचल नवयौवन उस अवस्था को पहुंच चुकी है, जब हृदय को शांति की इच्छा होती है, वह किसी आश्रम के लिए आतुर हो उठता है, और उसका अभिमान जनता के आगे सिर झुका देता है?

तारादेवी को बहुत इंतजार न करना पड़ा। कुंवर साहब शायद मिलने के लिए उससे भी अधिक उत्सुक थे। दस ही मिनट के बाद उनकी मोटर की आवाज आयी। तारा संभल गई। एक क्षण में कुंवर साहब ने कमरे में प्रवेश किया। तारा शिष्टाचार के लिए हाथ मिलाना भी भूल गई। प्रौढ़ावस्था में भी प्रेम की उद्विग्नता और असावधानी कुछ कम नहीं होती। वह किसी सलज्जा युवती की भांति सिर झुकाए खड़ी रही।

कुंवर साहब की निगाह आते ही उसकी गर्दन पर पड़ी। वह मोतियों का हार, जो उन्होंने रात को भेंट किया था, चमक रहा था। कुंवर साहब को इतना आनंद और कभी न हुआ था। उन्हें एक क्षण के लिए ऐसा जान पड़ा मानो उनके जीवन की सारी अभिलाषा पूरी हो गई। बोले – ‘मैंने आपको आज इतने सबेरे कष्ट दिया, क्षमा कीजिएगा। यह तो आपके आराम का समय होगा?’

तारा ने सिर से खिसकती हुई साड़ी को संभालकर कहा – ‘इससे ज्यादा आराम और क्या हो सकता था कि आपके दर्शन हुए। मैं इस उपहार के लिए और क्या आपको मानों धन्यवाद देती हूं। अब तो कभी-कभी मुलाकात होती रहेगी?’

निर्मलकांत वे मुस्कराकर कहा – ‘कभी-कभी नहीं रोज। आप चाहे मुझसे मिलना पसंद न करें, पर एक बार इस ड्योढ़ी पर सिर को झुका ही जाऊंगा।’

तारा ने भी मुस्कुराकर उत्तर दिया – ‘उसी वक्त तक जब तक कि मनोरंजन की कोई नई वस्तु नजर न आ जाय? क्यों?’

‘मेरे लिए यह मनोरंजन का विषय नहीं, जिंदगी और मौत का सवाल है। हां, तुम इसे विनोद समझ सकती हो, मगर कोई परवाह नहीं। तुम्हारे मनोरंजन के लिए यदि मेरे प्राण भी निकल जायें, तो मैं अपना जीवन सफल समझूंगा।’

दोनों तरफ से इस प्रीत को निभाने के वादे हुए, फिर दोनों ने नाश्ता किया और कल भोजन का न्योता देकर कुंवर साहब विदा हुए।