Actresses by Munshi Premchand
Actresses by Munshi Premchand

एक महीना गुजर गया। कुंवर साहब दिन में कई-कई बार आते। उन्हें एक क्षण का वियोग भी असह्य था। कभी दोनों बजरे पर दरिया की सैर करते, कभी हरी-हरी घास पर पार्कों में बैठे बातें करते, कभी गान-बजाना होता, नित्य नए प्रोग्राम बनते थे। सारे शहर में मशहूर था कि ताराबाई ने कुंवर साहब को फांस लिया और दोनों हाथों से सम्पत्ति लूट रही है। पर तारा के लिए कुंवर साहब का प्रेम ही एक ऐसी सम्पत्ति थी, जिसके सामने दुनिया भर की दौलत हेय थी। उन्हें अपने सामने देखकर उसे किसी वस्तु की इच्छा न होती थी।

मगर एक महीने तक इस प्रेम के बाजार में घूमने पर भी तारा को वह वस्तु न मिली, जिसके लिए उसकी आत्मा लोलुप हो रही थी। वह कुंवर साहब से प्रेम की, अपार और अतुल प्रेम की, सच्चे और निष्कपट प्रेम की बातें रोज सुनती थी, पर उसमें विवाह का शब्द न आने पाता था, मानो प्यासे को बाजार में पानी छोड़कर और सब कुछ मिलता हो। ऐसे प्यासे को पानी के सिवा और किसी चीज से तृप्ति हो सकती है? प्यास बुझाने के बाद, सम्भव है, और चीजों की तरफ उसकी रुचि हो, पर प्यासे के लिए तो पानी सबसे मूल्यवान पदार्थ है। वह जानती थी कि कुंवर साहब उसके इशारे पर प्राण तक दे देंगे, लेकिन विवाह की बातें क्यों उनकी जबान से नहीं निकलती? क्या इस विषय का कोई पत्र लिखकर अपना आशय कह देना सम्भव था? फिर क्या वह उसको केवल विनोद की वस्तु बनाकर रखना चाहते हैं? यह अपमान उससे न सहा जायेगा। कुंवर के एक इशारे पर वह आग में कूद सकती थी, पर यह अपमान उसके लिए असह्य था। किसी शौक़ीन रईस के साथ वह इससे कुछ दिन पहले शायद एक-दो महीने रह जाती और उसे नोंच-खसोट कर अपनी राह लेती। किन्तु प्रेम का बदला प्रेम है, कुंवर साहब के साथ वह यह निर्लज्ज जीवन न व्यतीत कर सकती थी।

कुंवर साहब के भाई-बंधु भी गाफ़िल न थे, वे किसी भांति उन्हें ताराबाई के पंजे से छुड़ाना चाहते थे। कहीं कुंवर साहब का विवाह ठीक कर देना ही एक ऐसा उपाय था, जिसके सफल होने की आशा थी और यही उन लोगों ने किया। उन्हें यह भय तो न था कि कुंवर साहब इस ऐक्ट्रस से विवाह करेंगे। हां, यह अवश्य था कि कहीं रियासत का कोई हिस्सा उसके नाम कर दें, या उसके आने वाले बच्चों को रियासत का मालिक बना दें। कुंवर साहब पर चारों ओर से दबाव पड़ने लगे। यहां तक कि यूरोपियन अधिकारियों ने भी उन्हें विवाह कर लेने की सलाह दी।

उस दिन संध्या समय कुंवर साहब ने ताराबाई के पास जाकर कहा – ‘तारा, तुमसे एक बात कहता हूं इंकार न करना।’

तारा का हृदय उछलने लगा। बोली – ‘कहिए, क्या बात है? ऐसी कौन वस्तु है, जिसे आपकी भेंट करके मैं अपने को धन्य समझूं?’

बात मुंह से निकलने की देर थी। तारा ने स्वीकार कर लिया और हर्षोल्लास की दशा में रोती हुई कुंवर साहब के पैरों पर गिर पड़ी।

एक क्षण के बाद तारा ने कहा – ‘मैं तो निराश हो चली थी। आपने बड़ी लम्बी परीक्षा ली।

कुंवर साहब ने जबान दांतों-तले दबायी, मानों कोई अनुचित बात सुन ली हो।

‘यह बात नहीं है तारा! अगर मुझे विश्वास होता कि तुम मेरी याचना स्वीकार कर लोगी, तो कदाचित् पहले ही दिन मैंने भिक्षा के लिए हाथ फैलाया होता, पर मैं अपने को तुम्हारे योग्य नहीं पाता था। तुम सद्गुणों की खान हो, और मैं…मैं जो कुछ हूं वह तुम जानती ही हो। मैंने निश्चय कर लिया था कि उम्र भर तुम्हारी उपासना करता रहूंगा। शायद कभी प्रसन्न होकर तुम मुझे बिना मांगे ही वरदान दे दो। बस, यही मेरी अभिलाषा थी। मुझमें अगर कोई गुण है तो यही कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं। जब तुम साहित्य, संगीत या धर्म पर अपने विचार प्रकट करने लगती हो, तो मैं दंग रह जाता हूं। मुझे आश्चर्य यही है कि इस समय मैं मारे खुशी के पागल क्यों नहीं हो जाता।’

कुंवर साहब देर तक अपने दिल की बातें कहते रहे। उनकी वाणी कभी इतनी प्रगल्भ न हुई थी।

तारा सिर झुकाए सुनती थी, पर आनंद की जगह उसके मुख पर एक प्रकार का क्षोभ – लज्जा से मिला अंकित हो रहा था। यह पुरुष इतना सरल हृदय, इतना निष्कपट है। इतना विनीत, उदार।

सहसा कुंवर साहब ने पूछा – ‘तो मेरे भाग्य किस दिन उदय होंगे, तारा? दया करके बहुत दिनों के लिए न टालना।’

तारा ने कुंवर साहब की सरलता से परास्त होकर चिंतित स्वर में कहा – ‘कानून का क्या कीजिएगा?’

कुंवर साहब ने तत्परता से उत्तर दिया – ‘इस विषय में तुम निश्चिंत रहो, तारा मैंने वकीलों से पूछ लिया है। एक कानून ऐसा है, जिसके अनुसार हम और तुम एक प्रेम-सूत्र में बंध सकते हैं। उसे सिविल-मैरिज कहते हैं। बस, आज ही के दिन वह शुभ मुहूर्त आएगा, क्यों?’

तारा सिर झुकाए रही। बोल न सकी।

‘मैं प्रातःकाल आ जाऊंगा। तैयार रहना।’

कुंवर साहब चले गए, पर तारा वहीं मूर्ति की भांति बैठी थी। पुरुषों के हृदय से क्रीड़ा करने वाली चतुर नारी क्यों इतनी विमूढ़ हो गई है।

विवाह का एक दिन और बाकी है। तारा को चारों ओर से बधाइयां मिल रही हैं। थियेटर के सभी स्त्री-पुरुषों ने अपने सामर्थ्य के अनुसार उसे अच्छे-अच्छे उपहार दिये हैं। कुंवर साहब ने भी आभूषणों से सजा हुआ एक सिंगारदान भेंट किया है। उनके दो-चार अंतरंग मित्रों ने भांति-भांति के सौगात भेजे हैं, पर तारा के सुन्दर मुख पर हर्ष की रेखा भी नहीं नजर आती। वह क्षुब्ध और उदास है। उसके मन में चार दिन से निरंतर यही प्रश्न उठ रहा है – क्या कुंवर के साथ वह विश्वासघात करे? जिस प्रेम के देवता ने उसके लिए अपने कुल-मर्यादा को तिलांजलि दे दी, अपने बंधुओं से नाता तोड़ा, जिसका हृदय हिमकरण के सामान निष्कलंक है, पर्वत के समान विशाल, उसी से कपट, करे! नहीं, वह इतनी नीचता नहीं कर सकती। अपने जीवन में उसने कितने ही युवकों से प्रेम का अभिनय किया था, कितने ही प्रेम के मतवालों को वह सब्जबाग दिखा चुकी थी, पर कभी उसके मन में ऐसी दुविधा न हुई थी, कभी उसके हृदय ने उसका तिरस्कार न किया था। क्या इसका कारण इसके सिवा कुछ और था कि ऐसा अनुराग उसे और कहीं न मिला था।

क्या वह कुंवर साहब का जीवन सुखी बना सकती है? हां, अवश्य। इस विषय में उसे लेश मात्र भी संदेह नहीं था। भक्ति के लिए ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो असाध्य हो, पर क्या वह प्रकृति को धोखा दे सकती है? ढलते हुए सूर्य में मध्याह्न का-सा प्रकाश हो सकता है। असम्भव। वह स्फूर्ति, वह चपलता, वह विनोद, वह सरल छवि, वह तल्लीनता, वह त्याग, वह नहीं, वह कितना ही चाहे पर कुंवर साहब के जीवन को सुखी नहीं बना सकती। बूढ़ा बैल कभी जवान बछड़े के साथ नहीं चल सकता।

आह! उसने यह नौबत ही क्यों आने दी? उसने क्यों कृत्रिम साधनों से, बनावटी सिंगार से कुंवर को धोखे में डाला? अब इतना सब कुछ हो जाने पर वह किस मुंह से कहेगी कि मैं रंगी हुई गुड़िया हूं, जवानी मुझसे कब की विदा हो चुकी, अब केवल उसका पद-चिह्न रह गया है।

रात के बारह बज गए थे। तारा मेज़ के सामने इन्हीं चिंताओं में मग्न बैठी हुई थी। मेज़ पर उपहारों के ढेर लगे हुए थे, पर वह किसी चीज की ओर आंख उठाकर भी न देखती थी। अभी चार दिन पहले वह इन्हीं चीजों पर प्राण देती थी, उसे हमेशा ऐसी चीजों की तलाश रहती थी, जो काल के चिह्नों को मिटा सके, पर अब उन्हीं चीजों से उसे घृणा हो रही है। प्रेम सत्य है – और सत्य और मिथ्या, दोनों एक साथ नहीं रह सकते।

तो तारा ने सोचा क्यों न यहां से कहीं भाग जाए? किसी ऐसी जगह चली जाए, जहां कोई जानता भी न हो। कुछ दिनों के बाद जब कुंवर का विवाह हो जाए, तो वह फिर आकर उनसे मिले और यह सारा वृत्तांत उनसे कह सुनाए। इस समय कुंवर पर वज्रपात-सा होगा – हाय! न-जाने उनकी क्या दशा होगी, पर उसके लिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं है। अब उसके दिन रो-रोकर कटेंगे, लेकिन उसे कितना ही दुःख क्यों न हो, वह अपने प्रियतम के साथ छल नहीं कर सकती। उसके लिए इस स्वर्गीय प्रेम की स्मृति, इसकी वेदना ही बहुत है। इससे अधिक उसका अधिकार नहीं।

दाई ने आकर कहा – ‘बाई जी चलिए, कुछ थोड़ा-सा भोजन कर लीजिए। अब तो बारह बज गए।’

तारा ने कहा – ‘नहीं, जरा भी भूख नहीं है। तुम जाकर खा लो।’

दाई – ‘देखिए, मुझे भूल न जाइयेगा। मैं भी आपके साथ चलूंगी।’

तारा – ‘अच्छे कपड़े बनवा रखे हैं न?’

दाई – ‘अरे बाई जी, मुझे अच्छे कपड़े लेकर क्या करना है? आप अपना कोई उतारा दे दीजिएगा।’

दाई चली गई। तारा ने घड़ी की ओर देखा। सचमुच बारह बज गए थे। केवल एक घंटे और है। प्रातःकाल कुंवर साहब उसे विवाह-मंदिर में ले जाने के लिए आ जाएंगे। हाय! भगवान जिस पदार्थ से तुमने इतने दिनों तक उसे वंचित रखा, वह आज क्यों सामने लाए? यह भी तुम्हारी क्रीड़ा है?

तारा ने एक सफेद साड़ी पहन ली। सारे आभूषण उतारकर रख दिए। गर्म पानी मौजूद था। साबुन और पानी से मुंह धोया और आईने के सम्मुख जाकर खड़ी हो गई – कहां थी वह छवि, वह ज्योति, जो आंखों को लुभा लेती थी। रूप वही था, पर कांति कहां? अब भी वह यौवन का स्वांग भर सकती है?

तारा को अब वहां एक क्षण भी और रहना कठिन हो गया। मेज़ पर फैले आभूषण और विलास की सामग्रियां मानो उसे काटने लगी। यह कृत्रिम जीवन असह्य हो उठा, खस की टट्टियों और बिजली के पंखों से सजा हुआ शीतल भवन उसे भट्टी के समान तपाने लगा।

उसने सोचा – कहां भागकर जाऊं। रेल में भागती हूं तो भागने न पाऊंगी। सवेरे ही कुंवर साहब के आदमी आएंगे और चारों तरफ मेरी तलाश होने लगेगी। वह ऐसे रास्ते से जायेगी, जिधर किसी का ख्याल भी न जाय।

तारा का हृदय इस समय गर्व से छलका पड़ता था। वह दुःखी न थी, निराश न थी। वह फिर कुंवर साहब से मिलेगी, किन्तु वह निस्वार्थ संयोग होगा। प्रेम के बनाए हुए कर्त्तव्य-मार्ग पर चल रही है, फिर दुःख क्यों हो और निराशा क्यों हो?

सहसा उसे खयाल आया – ऐसा न हो, कुंवर साहब उसे वहां न पाकर शोक-विह्वलता की दशा में कोई अनर्थ कर बैठें। इस कल्पना से उसके रोंगटे खड़े हो गए। एक क्षण के लिए उसका मन कातर हो उठा। फिर वह मेज़ पर जा बैठी, और यह पत्र लिखने लगी –

‘प्रियतम, मुझे क्षमा करना। मैं अपने को तुम्हारी दासी बनने के योग्य नहीं पाती। तुमने मुझे प्रेम का वह स्वरूप दिखा दिया, जिसकी इस जीवन में मैं आशा न कर सकती थी। मेरे लिए इतना ही बहुत है। मैं जब तक जिऊंगी, तुम्हारे प्रेम में मग्न रहूंगी। मुझे ऐसा जान पड़ रहा है। मैं फिर आऊंगी, फिर तुम्हारे दर्शन करूंगी, लेकिन उसी दशा में, जब तुम विवाह कर लोगे। यही मेरे लौटने की शर्त है। मेरे प्राणों के प्राण, मुझसे नाराज न होना। ये आभूषण, जो तुमने मेरे लिए भेजे थे, अपनी ओर से नववधू के लिए छोड़ जाती हूं। केवल यह मोतियों का हार, जो तुम्हारे प्रेम का पहला उपहार है, अपने साथ लिये जाती हूं। तुमसे हाथ जोड़कर कहती हूं मेरी तलाश न करना। मैं तुम्हारी हूं और सदा तुम्हारी रहूंगी…’

तुम्हारी,

तारा

यह पत्र लिखकर तारा ने मेज़ पर रख दिया, मोतियों का हार गले में डाला और बाहर निकल आई। थियेटर हाल से संगीत की ध्वनि आ रही थी। एक क्षण के लिए उसके पैर बंध गए। पंद्रह वर्षों का पुराना संबंध आज टूटा जा रहा था। सहसा उसने मैनेजर को आते देखा। उसका कलेजा धक से हो गया। वह बड़ी तेजी से लपक कर दीवार की आड़ में खड़ी हो गई। ज्यों ही मैनेजर निकल आया, वह अहाते के बाहर आयी और कुछ दूर गलियों में चलने के बाद उसने गंगा का रास्ता पकड़ा।

गंगा-तट पर सन्नाटा छाया हुआ था। दस-पांच साधु-बैरागी धूनी के सामने लेटे थे। दस-पांच यात्री कंबल जमीन पर बिछाकर सो रहे थे। गंगा किसी विशाल सर्प की भांति रेंगती चली जाती थी। एक छोटी-सी नौका किनारे पर लगी हुई थी। मल्लाह नौका में बैठा हुआ था। तारा ने मल्लाह को पुकारा – ‘ओ मांझी, उस पर नाव ले चलेगा?’

मांझी ने जवाब दिया – ‘इतनी रात गए नाव न जाई।’

मगर दूनी मजदूरी की बात सुनकर उसने डांड उठाया और नाव को खोलता हुआ बोला – ‘सरकार उस पार कहां जाना है?’

‘उस पार एक गांव में जाना है।’

‘मुदा इतनी रात जाए कोनो सवारी-सिकारी न मिली।’

‘कोई हर्ज नहीं, तुम मुझे उस पार पहुंचा दो।’

मांझी ने नाव खोल दी। तारा उस पर जा बैठी, और नौका मंद गति से चलने लगी, मानो जीवन स्वप्न-साम्राज्य में विचर रहा हो।

इसी समय एकादशी का चांद, पृथ्वी से उस पार, अपनी उज्ज्वल नौका खेता हुए निकला और व्योम-सागर को पार करने लगा।