गुलनार के चले जाने के बाद राजेन्द्र अपने कमरे में जा बैठे। जैसी पराजय उन्हें आज हुई, वैसी पहले कभी नहीं हुई। वह आत्माभिमान, वह सच्चा क्रोध, जो अन्याय के काल के ज्ञान से पैदा होता है, लुप्त हो गया था। उसकी जगह लज्जा और ग्लानि थी। इसे बधाई की क्यों सूझी। यों तो कभी आती-जाती न थी, आज न जाने कहां से फट पड़ी। कुवंर साहब होंगे उतने उदार। उन्होंने जुहरा के नातेदारों से भाई-चारे का निबाह किया होगा, मैं इतना उदार नहीं हूँ। कहीं सुलोचना छिपकर इसके पास आती-जाती तो नहीं। लिखा भी तो है कि मिलने को जी चाहे तो रात को आना और अकेली- क्यों न हों, खून तो वही है। मनोवृत्ति यही, विचार वही, आदर्श वही। माना, कुंवर साहब के घर में पालन-पोषण हुआ मगर रक्त का प्रभाव इतनी जल्दी नहीं मिट सकता। अच्छा, दोनों बहिनें मिलती होंगी, तो उनमें क्या बातें होती होंगी? इतिहास या नीति की चर्चा तो हो नहीं सकती। वही निर्लज्जता की बातें होती होंगी। गुलनार अपना वृत्तांत करती होगी, उस बाजार के खरीदारों और दुकानदारों के गुण-दोष पर बहस होती होगी। यह हो ही नहीं सकता कि गुलनार इसके पास आते ही अपने को भूल जाए और कोई भद्दी, अनर्गल और कलुषित बात न करें। एक क्षण में उनके विचारों ने पलटा खाया, मगर आदमी बिना किसी से मिले- जुले रह भी तो नहीं सकता। यह भी तो एक तरह की भूख है। भूख में अगर शुद्ध भोजन न मिले तो आदमी अशुद्ध खाने से भी परहेज नहीं करता। अगर इन लोगों ने सुलोवना को अपनाया होता, उसका यों बहिष्कार न करते, तो उसे क्यों ऐसे प्राणियों से मिलने की इच्छा होती, उसका कोई दोष नहीं, यह सारा दोष परिस्थितियों का है, जो हमारे अतीत की याद दिलाती रहती हैं।
राजेन्द्र इन्हीं विचारों में पड़े हुए थे कि कुंवर साहब आ पहुंचे और कटु स्वर में बोले- मैंने सुना गुलनार अभी बधाई लाई थी, तुमने उसे लौटा दिया।
राजेन्द्र का विरोध सजी हो उठा। बोले- मैंने तो नहीं लौटाया, सुलोचना ने लौटाया। पर मेरे खयाल में अच्छा किया।
कुँवर-तो यह कहो तुम्हारा इशारा था। तुमने इन पतितों को अपनी ओर खींचने का कितना अच्छा अवसर हाथ से खो है! सुलोचना को देखकर जो कुछ असर पड़ा, वह मिटा दिया। बहुत संभव था कि एक प्रतिष्ठित आदमी से नाता रखने का अभिमान उसके जीवन में एक नये युग का आरम्भ करता, मगर तुमने इन बातों पर जरा भी ध्यान न दिया।
राजेन्द्र ने कोई जवाब न दिया। कुंवर साहब जरा उत्तेजित होकर बोले- आप लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि हरेक बुराई मजबूरी से होती है। चोर इसलिए चोरी नहीं करता कि चोरी में उसे विशेष आनन्द आता है, बल्कि केवल इसलिए कि जरूरत उसे मजबूर कर देती है। हां, यह जरूरत वास्तविक है या काल्पनिक इसमें मतभेद हो सकता है। स्त्री के मैके जाते समय कोई गहना बनवाना एक आदमी के लिए जरूरी हो सकता है। दूसरे के लिए बिलकुल गैर जरूरी। क्षुधा से व्यथित होकर एक आदमी अपना ईमान खो सकता है, दूसरा मर जायगा पर किसी के सामने हाथ न फैलायेगा, पर प्रकृति का यह नियम आप जैसे विद्वानों को न भूलना चाहिए कि जीवन-लालसा प्राणी मात्र में व्यापक है। जिंदा रहने के लिए आदमी सब कुछ कर सकता है। जिंदा रहना जितना ही कठिन होगा, बुराइयाँ भी उसी मात्रा में बढ़ेंगी, जितना ही आसान होगा उतनी ही बुराइयां कम होंगी। हमारा यह पहला सिद्धांत न होना चाहिए कि जिंदा रहना हरेक के लिए सुलभ हो। राजेन्द्र बाबू आपने इस वक्त इन लोगों के साथ वही व्यवहार किया जो दूसरे आपके साथ कर रहे हैं और जिससे आप बहुत दुःखी हैं।
राजेन्द्र ने इस लम्बे व्याख्यान को इस तरह सुना, मानो कोई पागल बक बक कर रहा हो। इस तरह की दलीलों का वह खुद कितनी बार समर्थन कर चुके हैं। पर दलीलों से व्यथित अंग की पीड़ा नहीं शांत होती। पतित स्त्रियों का नातेदार की हैसियत सा द्वार पर आना इतना अपमानजनक था कि राजेन्द्र किसी दलील से पराभूत होकर उसे भूल न सकते थे। बोले- मैं ऐसे प्राणियों से कोई संबंध नहीं रखता। यह विष अपने घर में नहीं फैलाना चाहता।
सहसा सुलोचना भी कमरे में आ गई। प्रसवकाल का असर अभी बाकी था पर उत्तेजना ने चेहरे को आरक्त कर रखा था। राजेन्द्र सुलोचना को देखकर तेज हो गये। वह उसे जता देना चाहते थे कि इस विषय में एक रेख तक का जा सकता हूं। उसके आगे किसी तरह नहीं जा सकता। बोले मैं यह कभी पसंद न करूंगा कोई बजारू औरत किसी भेष में मेरे घर में आये। रात को अकेले आने या सूरत बदलकर आने से क्या इस बुराई का असर मिट सकता है। मैं समाज के दंड से नहीं डरता, नैतिक विष से डरता हूं।
सुलोचना अपने विचार में मर्यादा-रक्षा के लिए काफी आत्मसमर्पण कर चुकी थी। उसकी आत्मा ने अभी तक क्षमा न किया था। तीव्र स्वर में बोली- क्या तुम चाहते हो कि मैं अकेली जान दे दूं ? कोई तो हो, जिससे आदमी हंसे बोले।
राजेन्द्र ने गर्म होकर कहा- हंसने- बोलने का इतना ही शौक था, तो मेरे साथ विवाह न करना चाहिए था। विवाह का बंधन बड़ी हद तक त्याग का बंधन है। जब तक संसार में विधान का राज्य है, और स्त्री कुल मर्यादा की रक्षक समझी जाती है, उस वक्त तक कोई मर्द यह स्वीकार न करेगा कि उसकी पत्नी बुरे आचरण के प्राणियों से किसी प्रकार का संसर्ग रखे।
कुँवर साहब समझ गये कि वाद-विवाद से राजेन्द्र और भी जिद पकड़ लेंगे और मुख्य विषय लुप्त हो आएगा, इसलिए नम्र स्वर में बोले- लेकिन बेटा, यह क्यों ख्याल करते हो कि ऊंचे दरजे की पढ़ी-लिखी स्त्री दूसरों के प्रभाव में आ जाएगी, और अपना प्रभाव न डालेगी?
राजेन्द्र – इस विषय में शिक्षा पर मेरा विश्वास नहीं। शिक्षा ऐसी कितनी बातों को मानती है, जो रीति- नीति और परम्परा की दृष्टि में त्याज्य हैं? अगर पाँव फिसल जाए, तो हम उसे काटकर फेंक नहीं देते, पर मैं इस (Analogy) के सामने सिर झुकाये को तैयार नहीं हूं। मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि मेरे साथ रहकर पुराने सम्बन्धों का त्याग करना पड़ेगा। इतना ही नहीं, मन को ऐसा बना लेना पड़ेगा कि ऐसे लोगों से उसे खुद घृणा हो। हमें इस तरह अपना संस्कार करना पड़ेगा कि समाज अपने अन्याय पर लज्जित हो, न कि हमारे आचरण ऐसे भ्रष्ट हो जाएँ कि दूसरों की निगाह में यह तिरस्कार औचित्य का स्थान पा जाए।
सुलोचना ने उद्धत होकर कहा- स्त्री इसके लिए मजबूर नहीं है कि वह आपकी आंखों से देखे और आपके कानों से सुने। उसे यह निश्चय करने का अधिकार है कि कौन-सी बीच उसके हित की है, कौन-सी नहीं।
कुँवर साहब भयभीत होकर बोले- सिल्ली, तुम भूली जाती हो कि बातचीत में हमेशा मुलायम शब्दों का व्यवहार करना चाहिए। हम झगड़ा नहीं कर रहे हैं, केवल एक प्रश्न पर अपने-अपने विचार प्रकट कर रहे हैं।
सुलोचना ने निर्भीकता से कहा- जी नहीं, मेरे लिए बेड़ियाँ तैयार की जा रही हैं। मैं इन बेड़ियों को नहीं पहन सकती। मैं अपनी आत्मा को उतना ही स्वाधीन समझाती हूं, जितना कोई मर्द समझता है।
राजेन्द्र ने अपनी कठोरता पर कुछ लज्जित होकर कहा- मैंने तुम्हारी आत्मा की स्वाधीनता को छीनने की कभी इच्छा नहीं की और न मैं इतना विचारहीन हूं। शायद तुम भी इसका समर्थन करोगी, लेकिन क्या तुम्हें विपरीत मार्ग पर चलते देखूँ तो मैं समझा नहीं सकता?
सुलोचना- उसी तरह, जैसे मैं तुम्हें समझा सकती हूँ। तुम मुझे मजबूर नहीं कर सकते।
राजेन्द्र – मैं इसे नहीं मान सकता।
सुलोचना- अगर मैं अपने किसी नातेदार से मिलने जाऊं, तो आपकी इज्जत में बट्टा लगता है। क्या इसी तरह आप यह स्वीकार करेंगे कि आपका व्यभिचारियों से मिलना-जुलना मेरी इज्जत में दाग लगाता है?
राजेन्द्र – हां, मैं मानता हूँ।
सुलोचना – आपका कोई व्यभिचारी भाई आ जाए, तो आप उसे दरवाजे से भगा देंगे?
राजेन्द्र- तुम मुझे इसके लिए मजबूर नहीं कर सकती।
सुलोचना – और आप मुझे मजबूर कर सकते हैं?
‘बेशक’
