ऐसा माना जाता है कि राम के पुत्र कुश ने उजड़ी हुई अयोध्या का पुनर्निर्माण किया इसके न तो पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं और न अवशेष। इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि अभी तक इतिहासकार और पुरातत्वविद त्रेतायुग का काल निर्धारित कर सके हैं। न लंका युद्ध की तिथियां सुनिश्चित हो सकीं हैं और न राम का शासन। सामाजिक परिवेश को दृष्टिगत करते हुए यह कहना औचित्यपूर्ण ही लगता है कि राम के पुत्र कुश ने अपने पूर्वजों की उजड़ती नगरी का पुनर्निमाण किया। मनुष्य का यह जन्मगत स्वभाव है कि वह अपने पैतृक संपत्ति और भूमि को कभी भूल नहीं सकता। कमोबेश यही स्थिति आज भी है। मनुष्य के इस स्वभाव का ज्वलंत उदाहरण सन् 2020 में कोविड महामारी के समय सभी ने देखा। जब देश के विभिन्न क्षेत्रों से कोई वाहन सुविधा उपलब्ध न होने पर असंख्य परिवार अपने बच्चों को लेकर पैदल ही अपने-अपने गांव की ओर निकल पड़े। संभव है कि उजाड़ हो रही अयोध्या के निवासियों ने कुश से संपर्क कर नगर का विकास करने की प्रार्थना की होगी। तब कुश ने जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं में यथासंभव सुधार किया होगा। परिस्थितियां सामान्य नहीं रही होंगी। एक बार पुनर्निमाण प्रक्रिया के बाद दोबारा विकास कार्य की कोई सूचना नहीं मिलती। वस्तुत: कुश द्वारा अयोध्या के पुनर्निर्माण का कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। यह केवल जनश्रुतियों पर आधारित है।
इतिहास साक्षी है कि तत्कालीन समय में स्मारक, मंदिर, देवालय और पूजा स्थल विशेष निर्मित करने की परंपरा विकसित नहीं हुई थी। अतः यह कहना औचित्यहीन होगा कि राम पुत्र लव या कुश में से किसी ने कोई स्मारक, मंदिर, देवालय और पूजा स्थल का निर्माण किया था। इतिहासकार अभी तक यह सिद्ध करने में सफल नहीं हुए हैं कि अयोध्या में पहला मंदिर कब और किसने बनाया। लोक मान्यताओं में अयोध्या आस्था का केंद्र बनी रही। संतों का आवागमन होता रहा।
धार्मिक महत्ता, वाल्मीकि कृत रामायण में अयोध्या का उल्लेख, लोक मान्यताओं और मनुष्य के स्वभाव को दृष्टिगत करते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी संत ने अयोध्या में अपना आश्रम बनाया होगा। कब? किस संत ने बनाया होगा? यह निर्धारित नहीं किया जा सकता लेकिन सम्राट विक्रमादित्य के अयोध्या आगमन से पूर्व ही यह संभव हुआ होगा। इतिहासकारों के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य उज्ज्यनी से जब यहां पहुंचे तब यहां आबादी नहीं थी। विशाल वन क्षेत्र था। ऐसा माना जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य को संतों से ज्ञात हुआ था कि यह क्षेत्र राम की जन्म स्थली है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि रामायण काल में काष्ठ शिल्प अपने चरम पर था। संभवतः उस काल में शिलाओं से भवन निर्माण कला विकसित नहीं हुई थी। अतः राम कालीन भवन, राजप्रासाद, मंत्रियों के आवास, सुरक्षा स्तंभ, अयोध्यावासियों के घर एवं नगर सुरक्षा प्रकोष्ठ सभी लकड़ी के बने हुए थे। धीरे-धीरे जनविहिन होती गई अयोध्या नगरी की सभी भवन धराशाई हो गए और उनका नाम-ओ-निशान मिट गया। ऐसी स्थिति में सम्राट विक्रमादित्य को न तो नगर के अवशेष मिले और न आबादी। संभवतः सरयू नदी तट के समीप किसी संत या संतों के आश्रम मिले होंगे और उन्हीं संतों से ज्ञात हुआ होगा कि यह राम जन्म भूमि है। इतिहासकारों के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य ने यहां राम मंदिर का निर्माण किया। इस मंदिर का निर्माण घने जंगल को काट कर किया गया या अन्य स्थान पर, इस विषय पर इतिहासकार सर्वदा मौन हैं। सम्राट विक्रमादित्य द्वारा निर्मित मंदिर कौन-सा है यह भी स्पष्ट नहीं है। उसका अस्तित्व अभी भी है या नहीं यह भी स्पष्ट नहीं है। मंदिर के अतिरिक्त सम्राट विक्रमादित्य ने सरोवर, महल, कूप आदि का निर्माण करवाया था। वह सब कहां हैं? कोई नहीं जानता।
इतिहासकारों के एक वर्ग के अनुसार शुंग वंश के प्रथम शासक पुष्यमित्र ने अयोध्या में बने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। संभवतः यह वही मंदिर था जिसका निर्माण सम्राट विक्रमादित्य ने किया था। कालिदास ने भी अयोध्या के राम मंदिर का उल्लेख किया है। सम्राट विक्रमादित्य ने सबसे पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण किया यह तो स्पष्ट होता है लेकिन इससे पहले किसने राम मंदिर का निर्माण किया यह अज्ञात है।
5वीं शताब्दी में अयोध्या बौद्ध केंद्र बना। ऐसे साक्ष्य इतिहासकारों के पास हैं कि उस काल में यहां 20 बौद्ध मंदिर थे और उनके साथ एक भव्य मंदिर भी था। इससे स्पष्ट होता है कि 5वीं शताब्दी में बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित हुए अयोध्या में बौद्ध धर्मावलंबियों ने सनातन धर्म का सम्मान करते हुए मंदिर को हानि नहीं पहुंचाई। संभवतः यह सम्राट विक्रमादित्य द्वारा निर्मित राम मंदिर रहा होगा। इतिहासकारों के अनुसार 11वीं शताब्दी में कन्नौज के राजा जयचंद ने यह सिद्ध करने के लिए कि राम मंदिर का निर्माण उसने करवाया है, शिलालेख से सम्राट विक्रमादित्य का नाम हटवाकर अपना नाम लिखवा दिया। सिंकदर लोदी के शासनकाल के दौरान भी भव्य राममंदिर था। विदेशी आक्रांताओं ने सनातन धर्म के पवित्र स्थलों का विध्वंस करना शुरू किया और संभवतः उसी क्रम में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा निर्मित राम मंदिर भी आक्रांताओं की भेंट चढ़ गया।
