दशग्रीव को मोक्ष प्रदान करने के उपरांत अयोध्या वापस लौट कर राम ने कितने वर्ष शासन किया? इस विषय पर विभिन्न मत हैं। डॉ सरोज गुप्ता द्वारा संपादित पुस्तक ‘विश्व साहित्य और रामकथा : अंतरराष्ट्रीय शोध-संगोष्ठी का कार्यवृत्त’ में पृष्ठ संख्या 165 पर महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय, भोपाल की हिंदी प्राध्यापक डॉ आशा गौतम ने अपने लेख में उल्लेख किया है – “राम ने लंका विजय के उपरांत अयोध्या वापस लौट एक वर्ष तक शासन किया।” वस्तुत: महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार राम ने सम्राट पद ग्रहण करने के बाद लगभग 18 वर्षों तक शासन किया। मर्यादा पुरुषोत्तम राम इस सृष्टि के सभी सद्गुणों के भंडार हैं। अयोध्यावासियों को राम राज्य के लिए चौदह वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी।
राजा के रूप में राम के आदर्श
भगवान राम के एक आदर्श राजा के स्वरुप में महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित हैं। ननिहाल से लौटे भाई भरत को बड़े भैया के वनगमन का पता चलता है तो वह राम को खोजने के लिए चल दिए। जगत प्रसिद्ध राम-भरत मिलाप होता है। उस समय भगवान राम ने भरत के राज्य व्यवस्था के संबंध में कुछ सवाल पूछे। जो आज भी आदर्श हैं।
बुजुर्गों का सम्मान
राम अपने भाई भरत से कहते हैं – “हे भरत! तुम अपने राज्य में विद्वानों, रक्षकों, नौकरों, गुरुओं, पिता के समान पूज्य बड़े बूढ़ों, चिकित्सकों का सत्कार तो करते हो न। हे! भाई तुम बाण और अस्त्र विद्या में निपुण तथा नीतिशास्त्र विशारद धनुर्वेद के आचार्यों का आदर सत्कार तो करते हो न।” राम अपने भाई भरत से जिस तरह से प्रश्न किए उसके पीछे यही आश्रय था कि यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो अतिशीघ्र ऐसा करना प्रारंभ कर दो। एक प्रकार से राम भरत को बुजुर्गों का सम्मान करने का निर्देश दे रहे हैं क्योंकि उनके आशीर्वाद से ही राज्य का संचालन सुचारु रूप से संभव है।
राज्य व्यवस्था के लिए निर्देश
राम ने भरत को मंत्रियों और सेनापति के चुनाव के लिए निर्देश दिए। आज भी राम द्वारा दिए दिशा-निर्देशों का उतना ही महत्व है जितना तत्कालीन समय में था। राम ने पूछा- “हे तात! क्या तुमने अपने विश्वसनीय वीर, नीतिशास्त्र के जानने वाले लोभ में न फंसने वाले, प्रमाणिक कुल उत्पन्न और संकेत को समझने वाले व्यक्तियों को मंत्री बनाया है क्योंकि हे राघव! मंत्रणा को धारण करने वाले नीतिशास्त्र विशारद सचिवों के द्वारा गुप्त रखी हुई मंत्रणा ही राजाओं की विजय का मूल होती है। तुम स्वयं ही तो किसी बात का निर्णय नहीं कर लेते। तुम्हारा विचार कार्य रूप में परिणत होने से पूर्व दूसरे राजाओं को विदित तो नहीं हो जाता।” यहां राम भरत को राजा के लिए एकाधिकार की व्यवस्था को त्याज्य बताया है। राम के अनुसार योग्य मंत्रियों और दूसरे विद्वानों की सलाह से शासन चलाना ही सर्वोत्तम है। राम कहते हैं – “हे भरत! तुम हजार मूर्खों की अपेक्षा एक बुद्धिमान परामर्शदाता को रखना अच्छा समझते हो ना? क्योंकि संकट के समय बुद्धिमान व्यक्ति महान कल्याण करता है।”
राज्य में शांति के लिए सेना संबंधित भगवान के निर्देश
राम के अनुसार राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखना अति आवश्यक है। राम भरत से पूछते हैं – “हे केकैई नंदन! तुम्हारे राज्य में उग्र दंड से उत्तेजित प्रजा तुम्हारा अथवा तुम्हारे मंत्रियों का अपमान तो नहीं करती? “हे भरत!
क्या तुमने व्यवहार कुशल सूर बुद्धिमान धीर पवित्र स्वामी भक्त और कर्म कुशल व्यक्ति को अपना सेना अध्यक्ष बनाया है? तुम्हारी सेना में जो अत्यंत बलवान युद्ध विद्या में निपुण सुपरीक्षित और पराक्रमी सैनिक है उन्हें पुरस्कृत कर सम्मानित करते हो या नहीं। उनका उत्साह वर्धन करते हो या नहीं? तुम सेना के लोगों को कार्य अनुरूप भोजन और वेतन जो उचित परिमाण में और उचित काल में देना चाहिए। उसे यथा समय देने में विलंब तो नहीं करते?”
राज्यकर्मियों को समय पर वेतन देने का निर्देश
राम ने राज्य की सुचारु व्यवस्था के लिए कर्मचारियों को समय पर वेतन देने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा – “हे भरत! राज कर्मचारियों का वेतन ठीक समय पर न मिलने से राज कर्मचारी विरुद्ध हो जाते हैं और स्वामी की निंदा करते हैं। राज कर्मचारियों का ऐसा करना भारी अनर्थ की बात समझी जाती है।”
शासन को निर्विघ्न रूप से संचालित करने में गुप्तचर विभाग अहम भूमिका अदा करता है। इस विषय में राम ने भरत से पूछा – “हे भरत! तुम्हारी गुप्तचर व्यवस्था तो अचूक है या नहीं?” राम ने भरत से अगला प्रश्न किया – “हे राघव! पापी लोगों से रहित मेरे पूर्वजों के द्वारा सुरक्षित तथा समृद्ध कौशल देश सुखी तो है या नहीं?”
प्रजा हित के लिए निर्देश
राम ने भरत को प्रजा के हित को सर्वोपरि रखने का आदेश दिया। राम कहते हैं – “हे भरत! पशुपालन कृषि आदि में लगे हुए तुम्हारी सब प्रजा सुखी तो है ना? लेन-देन के कार्य में लिप्त रहकर ही वैश्य लोग धन-धान्य से युक्त होते हैं ना?”
प्रजा से संबंधित एक महत्वपूर्ण प्रश्न राम ने भरत से पूछा था। वह प्रश्न आज भी उतना ही महत्व रखता है जितना तत्कालीन समय में रखता था। राम ने पूछा – “हे भरत! तुम प्रतिदिन प्रात:काल उठकर और सब प्रकार से सुभाषित होकर दोपहर से पहले ही सभा में जाकर प्रजा से मिलते हो या नहीं?” यह कार्य एक निपुण राजा के लिए अत्यंत आवश्यक पहले भी था और आज भी है। प्रजा से नित्य प्रति दिन भेंट करने से प्रजा का मनोबल बढ़ता है।
आर्थिक पहलू
आय और व्यय के विषय में भी भरत को शिक्षा देने के उद्देश्य से राम ने भरत से पूछा – “हे भरत! तुम्हारी आय अधिक और खर्च न्यूनतम है ना? तुम्हारे कोश का धन नाच-गाने वालों में तो नहीं ले लुटाया जाता? तुम्हारे राज्य में घूस लेकर अपराधियों को छोड़ तो नहीं दिया जाता? अमीर और गरीब का झगड़ा होने पर तुम्हारे मंत्री लोभ रहित होकर दोनों का मुकदमा न्याय पूर्वक निपट आते हैं या नहीं?”
अपने अध्ययन काल में राम ने अपने गुरु से जो शिक्षा ग्रहण की थी उसी को राम ने भरत के समक्ष दोहराया था। संभवतः राम को यह आशंका थी कि भरत पिता और भाई के वियोग में कहीं अपने दायित्वों को तो भूल नहीं गया है। अपराधों और अपराधियों पर अंकुश के संदर्भ में राम ने भरत से पूछा – “हे भरत! झूठे अपराधों के कारण दंडित लोगों को आंखों से गिरने वाले आंसू अपने भोग विलास के लिए शासन करने वाले राजा उसके पुत्र राज्य कर्मचारियों और उसके पशुओं का नाश कर डालते हैं।” अयोध्या कांड का यह प्रसंग भगवान राम के एक राजा के रूप में उच्च आदर्शों को प्रस्तुत करता है। समय अर्थात इतिहास साक्षी है कि राम ने जब सत्ता का अधिग्रहण किया तो वह उस समय सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ शासन था। जिसमें कोई दुखी नहीं था।
राम राज्य
राम के राजा बनने के बाद अयोध्या में सर्वत्र खुशहाली और प्रसन्नता थी। वहां दुख और दरिद्रता का कोई नामोनिशान तक नहीं था। न कोई अकाल मृत्यु को प्राप्त होता था और न किसी को कोई पीड़ा होती थी। कारण कि सभी लोग अपने वर्ण और आश्रम के अनुरूप धर्म में तत्पर होकर वेद मार्ग पर चलते थे। राम के राज्य में राजनीति स्वार्थ से प्रेरित न होकर प्रजा की भलाई के लिए थी। इसमें अधिनायकवाद की छाया मात्र भी नहीं थी। राम का राज्य मानव कल्याण के आदर्शों से युक्त था। राम ने नगरवासियों की सभा में यह स्पष्ट घोषणा की – “भाइयों! यदि मैं कोई अनीश की बात कहूं तो तुम लोग निसंकोच मुझे रोक देना।”
वैदिक धर्म की रक्षा के लिए राम का अवतरित हुए। मारीच रावण को समझाते हुए राघव के गुणों का वर्णन और रावण को सन्मार्ग दिखाने के संदर्भ में कहते हैं – राम साक्षात विग्रहवान धर्म है। वह साधु और सत्य पराक्रमी है। जैसे इंद्र समस्त देवताओं के अधिपति हैं उसी प्रकार राम समस्त जगत के राजा हैं।
साम्राज्य विस्तार
सत्ता अधिग्रहण के उपरांत राम ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। वाल्मीकि कृत रामायण में इसका उल्लेख मिलता है। राम के मामा युधाजित्ने के संदेश में गंधर्व देश का वर्णन महर्षि गार्ग्य ने राम के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा – “यह जो फल-मूलों से सुशोभित गन्धर्वदेश सिन्धु नदी के दोनों तटों पर बसा हुआ है, बड़ा सुन्दर प्रदेश है। वीर रघुनन्दन! गन्धर्वराज शैलूष की संतानें तीन करोड़ महाबली गन्धर्व, जो युद्ध की कला में कुशल और अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न हैं, उस देश की रक्षा करते हैं। काकुत्स्थ! महाबाहो! आप उन गन्धर्वों को जीत कर वहां सुन्दर गन्धर्व नगर बसाइये। अपने लिये उत्तम साधनों से सम्पन्न दो नगरों का निर्माण कीजिए। वह देश बहुत सुन्दर है। वहां दूसरे किसी की गति नहीं है। आप उसे अपने अधिकार में लेना स्वीकार करें और वहां की प्रजा को सुख-समृद्धि प्रदान करें। मैं आपको ऐसी सलाह नहीं देता, जो अहितकारक हो।”
महर्षि और मामा का वह कथन सुनकर रघुनाथ को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरत की ओर देखा। तदनन्तर राघवेन्द्र ने उन ब्रह्मर्षि से प्रसन्नता पूर्वक हाथ जोड़कर कहा – ‘ब्रह्मर्षे! ये दोनों कुमार तक्ष और पुष्कल, जो भरत के वीर पुत्र हैं, उस देश में विचरेंगे और मामा से सुरक्षित रहकर धर्म पूर्वक एकाग्रचित्त हो उस देशका शासन करेंगे। ये दोनों कुमार भरत को आगे करके सेना और सेवकों के साथ वहां जायँगे तथा उन गन्धर्व पुत्रों का संहार करके अलग-अलग दो नगर बसायेंगे।
उन दोनों श्रेष्ठ नगरों को बसाकर उनमें अपने दोनों पुत्रों को स्थापित करके अत्यन्त धर्मात्मा भरत फिर मेरे पास लौट आयेंगे। ब्रह्मर्षि से ऐसा कहकर राम ने भरत को वहां सेना के साथ जाने की आज्ञा दी और दोनों कुमारों का पहले ही राज्याभिषेक कर दिया। तत्पश्चात् सौम्य नक्षत्र अर्थात, मृगशिरा नक्षत्र में अङ्गिरा के पुत्र महर्षि गार्ग्य को आगे करके सेना और कुमारों के साथ भरत ने यात्रा की। इन्द्र द्वारा प्रेरित हुई देवसेना के समान वह सेना नगर से बाहर निकली। राम भी दूर तक उसके साथ-साथ गये। वह देवताओं के लिये भी दुर्जय थी।
तक्षशिला एवं पुष्कलावत नगर
भरत और मामा युधाजित् दोनों ने मिलकर बड़ी तीव्र गति से सेना और सवारियों के साथ गन्धर्वों की राजधानी पर धावा बोल दिया। वह महाभयंकर संग्राम लगातार सात रात तक चलता रहा, परंतु दोनों में से किसी भी एक पक्ष की विजय नहीं हुई। तब रामानुज भरत ने कुपित होकर गन्धर्वो पर काल देवता के अत्यन्त भयंकर अस्त्र का, जो संवर्त नाम से प्रसिद्ध है का प्रयोग किया। इस प्रकार महात्मा भरत ने क्षण भर में तीन करोड़ गन्धर्वों का संहार कर डाला। वह गन्धर्व कालपाश से बद्ध हो संवर्तास्त्र से विदीर्ण कर डाले गये। समस्त गन्धर्वों का संहार हो जाने पर कैकेयी कुमार भरत ने वहां दो समृद्धिशाली सुन्दर नगर बसाये। मनोहर गन्धर्व देश में तक्षशिला नाम की नगरी बसाकर उसमें उन्होंने तक्ष को राजा बनाया और गान्धार देश में पुष्कलावत नगर बसा कर उसका राज्य पुष्कल को सौंप दिया।
दोनों श्रेष्ठ पुरों की रमणीयता देखते ही बनती थी। अनेक ऐसे विस्तृत पदार्थ उनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनका नाम अभी तक नहीं लिया गया है। सुन्दर श्रेष्ठ गृह तथा बहुत से सत महले मकान वहां की श्रीवृद्धि कर रहे थे। अनेकानेक शोभासम्पन्न देव मन्दिरों तथा ताल, तमाल, तिलक और मौलसिरी आदि के वृक्षों से भी उन दोनों नगरों की शोभा एवं रमणीयता बढ़ गयी थी। पाँच वर्षों में उन राजधानियों को अच्छी तरह आबाद करके राम के छोटे भाई कैकेयी कुमार महाबाहु भरत फिर अयोध्यामें लौट आये। वहां पहुंच कर भरत ने द्वितीय धर्मराज के समान महात्मा रघुनाथ को उसी तरह प्रणाम किया। भरत के मुँह से गन्धर्व देश का समाचार सुनकर भाइयों सहित राम को बड़ी प्रसन्नता हुई। तत्पश्चात् श्रीराघवेन्द्र अपने भाइयोंसे यह अद्भुत वचन बोले – “सुमित्रानन्दन! तुम्हारे ये दोनों कुमार अङ्गद और चन्द्रकेतु धर्मके ज्ञाता हैं। इनमें राज्य की रक्षा के लिये उपयुक्त दृढ़ता और पराक्रम है। अतः मैं इनका भी राज्याभिषेक करूँगा। तुम इनके लिये किसी अच्छे देश का चुनाव करो, जो रमणीय होने के साथ ही विघ्न-बाधाओं से रहित हो और जहां ये दोनों धनुर्धर वीर आनन्दपूर्वक रह सकें।”
चंद्रकांत नगर
राम ने भरत से कहा – “सौम्य! ऐसा देश देखो! जहाँ निवास करने से दूसरे राजाओं को पीड़ा या उद्वेग न हो। आश्रमों का भी नाश न करना पड़े और हम लोगों को किसी की दृष्टि में अपराधी भी न बनना पड़े।” राम के ऐसा कहने पर भरत ने उत्तर दिया – “यह कारुपथ नामक देश बड़ा सुन्दर है। वहाँ किसी प्रकार की रोग-व्याधि का भय नहीं है।”
वहां महात्मा अङ्गद के लिये नयी राजधानी बसायी जाय तथा चन्द्रकेतु या चन्द्रकान्त के रहने के लिये ‘चन्द्रकान्त’ नामक नगर का निर्माण कराया जाय, जो सुन्दर और आरोग्यवर्धक हो। भरत की कही हुई इस बात को रघुनाथ ने स्वीकार किया और कारुपथ देश को अपने अधिकार में करके अङ्गद को वहां का राजा बना दिया।
अंगदीया नगर
क्लेश रहित कर्म करने वाले राम ने अंगद के लिये ‘अंगदीया’ नामक रमणीय पुरी बसायी, जो परम सुन्दर होने के साथ ही सब ओर से सुरक्षित भी थी। चन्द्रकेतु अपने शरीर से मल्ल के समान हृष्ट-पुष्ट थे। उनके लिये मल्ल देशमें ‘चन्द्रकान्ता’ नाम से विख्यात दिव्य पुरी बसायी गयी, जो स्वर्ग की अमरावती नगरीके समान सुन्दर थी। इससे राम, लक्ष्मण और भरत तीनों को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन सभी रणदुर्जय वीरों ने स्वयं उन कुमारों का अभिषेक किया।
एकाग्रचित्त तथा सावधान रहने वाले उन दोनों कुमारों का अभिषेक करके अंगद को पश्चिम तथा चन्द्रकेतु को उत्तर दिशा में भेजा गया। अंगद के साथ तो स्वयं सुमित्रा कुमार लक्ष्मण गये और चन्द्रकेतु के सहायक या पार्श्वक भरत हुए। लक्ष्मण अंगदीया पुरी में एक वर्ष तक रहे और उनका दुर्धर्ष पुत्र अंगद जब दृढ़तापूर्वक राज्य सँभालने लगा, तब वे पुनः अयोध्या को लौट आये।
इसी प्रकार भरत भी चन्द्रकान्ता नगरी में एक वर्ष से कुछ अधिक काल तक ठहरे रहे और चन्द्रकेतु का राज्य जब दृढ़ हो गया, तब वे पुनः अयोध्या में आकर राम के चरणों की सेवा करने लगे। लक्ष्मण और भरत दोनों का राम के चरणों में अनन्य अनुराग था। दोनों ही अत्यन्त धर्मात्मा थे। राम की सेवा में रहते उन्हें बहुत समय बीत गया परंतु स्नेहाधिक्य के कारण उनको कुछ भी ज्ञात न हुआ। वे तीनों भाई पुरवासियों के कार्य में सदा संलग्न रहते और धर्मपालन के लिये प्रयत्नशील रहा करते थे।
धर्म साधन के स्थानभूत अयोध्यापुरी में वैभव सम्पन्न होकर रहते हुए वह तीनों भाई यथा समय घूम फिरकर प्रजा की देखभाल करते थे। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि राम ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। राजत्व धर्म का पालन करते हुए सुरक्षा को चाक-चौबंद किया। प्रजा को सुखानुभूति हुई। इसके अतिरिक्त राम ने अपने साम्राज्य के कुशल संचालन हेतु और पारिवारिक वैमनस्य उत्पन्न न हो उस दृष्टिगत रखते हुए विभिन्न क्षेत्रों में अपने भतीजों को उत्तरदायित्व सौंपा। इससे राजनीतिक उठा-पटक की सभी संभावनाएं समाप्त हो गई। राजा के रूप में उन्होंने सभी विभागों का कुशल संचालन किया।
लव-कुश का राज्याभिषेक
महर्षि वसिष्ठ दिशा-निर्देशों के अनुसार राम ने अपने दोनों पुत्रों का राज्याभिषेक किया। महर्षि वसिष्ठ ने कहा – “राजन्! नरेश्वर! आप इन कुश और लव का राज्याभिषेक कीजिये। दक्षिण कोशल में कुश को और उत्तर कोशल में लव को राजा बनाइये। तेज चलने वाले दूत शीघ्र ही शत्रुघ्न के पास भी जायें और उन्हें हम लोगों की इस महायात्रा का वृत्तान्त सुनायें। इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये।”
भरत ने पुरवासियों को महर्षि वसिष्ठ का संदेश सुनाया। संदेश सुनकर तथा पुरवासियों को नीचे मुख किए दुख से संतप्त हो गए। यह देख महर्षि वसिष्ठ ने राम से कहा – “वत्स राम! पृथ्वी पर पड़े हुए इन प्रजाजनों की ओर देखो। इनका अभिप्राय जानकर इसी के अनुसार कार्य करो। इनकी इच्छा के विपरीत करके इन बेचारों का दिल न दुखाओ।”
वसिष्ठ जी के कहने से रघुनाथ ने प्रजाजनों को उठाया और सबसे पूछा – “मैं आप लोगों का कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?”
तब प्रजावर्ग के सभी लोग राम से बोले – “रघुनन्दन! आप जहां भी जायेंगे, पीछे-पीछे हम भी वहीं चलेंगे।”
पुरवासियों की दृढ़ भक्ति देख राम ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी इच्छा का अनुमोदन किया और अपने कर्तव्य का निश्चय करके रघुनाथ ने उसी दिन दक्षिण कोशल के राज्य पर वीर कुश को और उत्तर कोशल के राजसिंहासन पर लव को अभिषिक्त कर दिया। अभिषिक्त हुए अपने उन दोनों महामनस्वी पुत्र कुश और लव को गोद में बिठाकर उनका गाढ आलिङ्गन करके महाबाहु राम ने बारम्बार उन दोनों के मस्तक सूँघे। फिर उन्हें अपनी-अपनी राजधानी में भेज दिया।
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के उत्तरकाण्ड (108/3-7) में उल्लेख किया है कि राम ने कुश के लिए विंध्य पर्वत के किनारे कुशवती नामक नगर का निर्माण कराया। इसी प्रकार लव के लिए श्रावस्ती नामक नगर बसाया। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार लव और कुश के लिए दो अलग नगरों की स्थापना का समाचार सुनकर शत्रुघ्न ने भी अपने दोनों पुत्रों का राज्याभिषेक कर दिया (वाल्मीकि कृत रामायण, उत्तरकाण्ड, 108/8-9) शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु को मधुरा (सुबाहुर्मधुरां लेभे शत्रुघाती च वैदिशम्) और दूसरे पुत्र शत्रुघाती को विदिशा का राज्य प्राप्त हुआ (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, 108/10)। शत्रुघ्न ने अपने दोनों पुत्रों के राज्याभिषेक की सूचना राम को दी। राम ने विरोध प्रकट करने के स्थान पर प्रसन्नता व्यक्त की। वस्तुत: राम ने अपना राज धर्म का निर्वहन किया।
