अतिप्राचीन काल से ही राम की कथा भारतीय संस्कृति में ही नहीं अपितु सातों महाद्वीपों में रची बसी है। राम का महान चरित्र सारी दुनिया के लोगों को सही राह पर चलने की शिक्षा देता आ रहा है। पाश्चात्य इतिहासकारों और विद्वानों का एक वर्ग राम कथा कल्पना मात्र मानता हैं। हम यहां उसकी व्याख्या नहीं करेंगे क्योंकि यह एक पुस्तक-विशेष का विषय है। अन्य इतिहासकार, विचारक और विद्वान कहते हैं कि हमारे पास भगवान राम के सच होने का क्या प्रमाण है। वस्तुत: रामायण और राम काल्पनिक नहीं हैं। आज इसके पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं। ऐसा माना जाता है कि ऋग्दवेद का काल में ही महर्षि वाल्मिकी ने रामायण की रचना की।
दिल्ली में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदा यानि आई सर्व ने वैज्ञानिक शोध के बाद राम के अस्तित्व का दावा किया है। आई सर्व ने आधुनिक विज्ञान से जुड़ी 9 विधाओं, अंतरिक्ष विज्ञान, जेनेटिक्स, जियोलॉजी, एर्कियोलॉजी और स्पेस इमेजरी आदि पर आधारित शोध के आधार पर यह सिद्ध किया है। वेद और रामायण में विभिन्न आकाशीय और खगोलीय स्थीतियों का उल्लेख मिलता है। जिसे आधुनिक विज्ञान की मदद से 9 हजार साल ईसापूर्व से लेकर 7 हजार साल ईसापूर्व तक प्रमाणिक तरीके से क्रमानुसार सिद्ध किया गया है। आई सर्व की निदेशक सरोज बाला के अनुसार- “एक उल्लेख मिलता है राम के जन्म से 2 वर्ष पूर्व कि दशरथ ने पुत्रेश्रेष्ठी यज्ञ किया था। तब से लेकर हनुमान के सीता से मिलने तक लगभग 25 के आकाशीय दृश्य हू-ब-हू मिलते हैं। जो आज नक्षत्र हैं वह 25600 साल में पुनः नहीं होंगे। इसमें वास्तविक सच्चाई है। हमने मूल्यांकित किया और रिकॉर्ड किया।” अब प्रश्न यह है कि क्या हजारों साल पहले के चांद-तारों और नक्षत्रों की स्थितियों को बताने वाले प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर और रामायण से लेकर वेदों में उल्लिखित नक्षत्रों की स्थिति का तुलनात्मक अध्य्यन करके यह सिद्ध किया जा सकता है कि राम की जन्म तिथि क्या है? रावण वध किस तिथि को हुआ? राम के राज्याभिषेक की तिथि क्या है? आई सर्व का शोध ऐसे अनेक प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ में देता है। वाल्मीकि कृत रामायण में रामकथा से संबंधित खगोलीय स्थितियों के साथ मिलान किया गया है। भारत में चैत्र शुक्लपक्ष की नवमी को राम का जन्मदिन मनाया जाता है तो इसकी वजह भी रामायण में वर्णित तारों की स्थिति ही है। वाल्मीकि कृत रामायण में भगवान राम के जन्म का क्या वर्णन है कि चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौशल्या देवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोकवन्दित राम को जन्म दिया, यानि जिस दिन राम का जन्म हुआ उस दिन अयोध्या के ऊपर तारों की सारी स्थिति का उल्लेख है। रामायण में वर्णित नक्षत्रों की स्थिति को नासा द्वारा इस्तेेमाल किए जाने वाले सॉफ्टवेयर प्लैनेटेरियम गोल्ड में उस वक्त की सितारों की स्थिती से मिलान और तुलना की गई। इस कंम्प्यूट्रीकृत शोध के उपरांत जो परिणाम प्राप्त हुआ उसके अनुसार – “सूर्य मेष राशि में उच्च स्थान पर है। शुक्र मीन राशि में उच्च स्थान पर उपस्थित है।
मंगल मकर राशि में उच्च स्थान पर है। शनि तुला राशि में उच्च स्थान पर है। बृहस्पति कर्क राशि में उच्च स्थान पर मौजूद है। कर्क लगन है। पुनर्वसु के पास चन्द्रमा मिथुन से कर्क राशि की ओर बढ़ता हुआ दृष्टिगोचर होता है।” अतः राम के जन्म की तिथि वर्तमान कैलेंडर में 10 जनवरी, 5114 ईसा पूर्व निर्धारित हुई। इसका अभिप्राय यह हुआ कि उस तिथि को दोपहर 12 बजे अयोध्या के आकाश पर सितारों की स्थिति वाल्मीकि कृत रामायण और सॉफ्टवेयर दोनों में एक जैसी है। 5114 ईसा पूर्व में वर्तमान के 2023 वर्ष और जोड़ दिए जाएं तो यह मूल रूप से 7137 ईसा पूर्व का समय निर्धारित होता है। अब एक और प्रश्न यहां उत्पन्न होता है कि क्या सिंधुघाटी सभ्यता के आस-पास राम का अस्तित्व था? इस प्रसंग पर आगे विमर्श करेंगे। आई सर्व की निदेशक सरोज बाला के अनुसार- “वाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि दशरथ कहते हैं – ‘मेरी राशि नीची है, तो कल राम को राजा बना दो।’ 5 जनवरी, ईसा पूर्व वही राशियां हैं। यह स्थिति 4 जनवरी, 5089 ईसा पूर्व को चैत्र पक्ष शुक्ल नवमी की थी।” सबको ज्ञात है कि उसी समय राम वनवास गए थे। अयोध्या का अक्षांश-देशांस वही थे। इसी आधार पर राम के वनवास की तारीख 4 जनवरी, 5089 ईसा पूर्व आती है। इसके बाद ही राम वनवास के लिए चले गए। अब हम अपने प्रश्न पर आते हैं कि क्या सिंधुघाटी सभ्यता के आस-पास राम का अस्तित्व था? वाल्मीकि कृत रामायण में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो राम के जीवन काल को सात हजार वर्ष से भी पहले ले जाते हैं। इस विषय पर एक बार पुनः शोध की आवश्यकता है। आधुनिक विज्ञान और अनुसंधान के अनुसार सिंधुघाटी सभ्यता का काल दस हजार वर्ष पूर्व सिद्ध हो रहा है। अतः ऐसी स्थिति में राम की जन्म तिथि का मूल्यांकन पुनः करने की आवश्यकता है।
पुनर्वसु नक्षत्र :
27 नक्षत्र में सबसे उत्तम पुनर्वसु नक्षत्र माना गया है। इस नक्षत्र में राम ने जन्म लिया था। इस नक्षत्र में व्यक्ति के सामने कई कठिनाइयां आती हैं लेकिन व्यक्ति सभी से लड़कर आगे निकल जाता है और महायोद्धा कहलाता है। वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णन के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दशरथ को एक महर्षि के दिशा-निर्देश पर सम्राट दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया। जिसके फलस्वरूप दरशथ के यहां चार पुत्रों का जन्म हुआ। राम भाईयों में सबसे बड़े और अपनी बहन से छोटे पौराणिक ग्रंथों में राम के विषय में वर्णन मिलता है कि वह त्रेता युग में थे। लेखकों का अनुमान है कि उनका काल लगभग 5,000 ईसा पूर्व था। अन्य शोधकर्ता राम को कुरु और वृष्णि नेताओं की पुन: सूचियों के आधार पर 1250 ईसा पूर्व के आस-पास रहने के लिए अधिक उपयुक्त स्थान देते हैं। भारतीय पुरातत्वविद हंसमुख धीरजलाल सांकलिया के अनुसार- “जो प्रोटो और प्राचीन भारतीय इतिहास में विशिष्ट है, यह सब शुद्ध अटकलें हैं।”
राम के महाकाव्य का रचनाकाल
रामायण अपने वर्तमान रूप में आमतौर पर 7वीं और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच की है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के एक प्रोफेसर जॉन ब्रॉकिंगटन के अनुसार- “मूल पाठ संभवतः अधिक प्राचीन काल में मौखिक रूप से रचित और प्रसारित किया गया था।” आधुनिक विद्वानों ने एक सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में विभिन्न शताब्दियों का सुझाव दिया है। ब्रॉकिंगटन के विचार में- “भाषा, शैली और काम की सामग्री के आधार पर लगभग पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व की तारीख सबसे अनुमानित अनुमान है।”
राम के जन्म पर शोध
महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में राम के जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है – चैत्र मास की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र में, पांच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर राम का जन्म हुआ। यहां केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। बृहस्पति उच्चस्थ है तथा चन्द्रमा स्वगृही। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। इस प्रकार बृहस्पति तथा सूर्य के उच्च होने का पता चल जाता है। बुध हमेशा सूर्य के पास ही रहता है। अतः सूर्य मेष राशि में उच्च स्थान पर होने पर बुद्ध का कन्या राशि उच्च स्थान पर होना असंभव है। इस प्रकार उच्च होने के लिए बचते हैं शेष तीन ग्रह मंगल, शुक्र तथा शनि। इसी कारण से प्रायः सभी विद्वानों ने राम के जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है। एक शोध के अनुसार राशि चक्र नक्षत्रों और विषुवों की तुलना में ग्रहों और नक्षत्रों की समान स्थिति 25690 वर्षों में दोहराई नहीं गई है। मराठी शोधकर्ता विद्वान डॉ पद्माकर विष्णु वर्तक ने प्रथम दृष्टया इस समय को संभाव्य माना है। उनका कहना है कि वाल्मीकि कृत रामायण में एक स्थल पर विन्ध्याचल तथा हिमालय की ऊंचाई को समान बताया गया है। विन्ध्याचल की ऊंचाई 5,000 फीट है।
यह प्रायः स्थिर है। जबकि हिमालय की ऊंचाई वर्तमान में 29,029 फीट है। यह निरंतर वर्धनशील है। दोनों पर्वतों की ऊंचाई का अंतर 24,029 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यता के अनुसार हिमालय 100 वर्षों में 3 फीट बढ़ता है। अतः 24,029 फीट बढ़ने में हिमालय को करीब 8,01,000 वर्ष लगे होंगे। अतः वर्तमान से लगभग 8,01,000 वर्ष पहले हिमालय की ऊंचाई विन्ध्याचल के समान रही होगी। जिसका उल्लेख वाल्मीकी कृत रामायण में वर्तमान कालिक रूप में हुआ है। इस तरह डॉ वर्तक को प्रथम दृष्टया यह समय संभव लगता है। उनका स्वयं मानना है कि वह किसी अन्य स्रोत से इस समय की पुष्टि नहीं कर सकते हैं। अपने ग्रंथ ‘वास्तव रामायण’ में डॉ वर्तक ने मुख्यतः ग्रह गतियों के आधार पर गणितीय गणना करके वाल्मीकी कृत रामायण में उल्लिखित ग्रह स्थिति के अनुसार राम की वास्तविक जन्म-तिथि 4 दिसंबर, 7323 ईसा पूर्व को सुनिश्चित किया है। उनके अनुसार इसी तिथि को दिन में 1:30 से 3:00 बजे के बीच राम का जन्म हुआ होगा। नासा अमेरिका एजेंसी के जैमिनि-11आकाश यान द्वारा वर्ष 2002 में एडम ब्रिज अर्थात वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित रामसेतु के लिए गए चित्रों के वैज्ञानिक विश्लेषण करने के उपरांत कहा गया था कि भारत तथा श्रीलंका को जोड़ने वाले इस सेतु के अवशेष मनुष्यों द्वारा निर्मित हैं। यह सेतु लगभग 17.5 लाख वर्ष पुराना हैं। नासा के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध, अनुसंधान, अन्वेषण और वैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद वाल्मीकि कृत रामायण का काल साढ़े सत्रह लाख साल पुराना सिद्ध होता है।
खर-दूषण से युद्ध और सूर्य ग्रहण
महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में राम के वनवास के 13वें वर्ष के उत्तरार्ध में खर-दूषण से युद्ध के समय पड़ने वाले सूर्यग्रहण का उल्लेख है। वाल्मिकी ने यह भी उल्लेख किया है कि वह अमावस्या का दिन था और मंगल ग्रह मध्य में था।
रामायण में वर्णित अन्य ग्रहण
महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के किष्किंधा कांड में बाली वध वाले दिन सूर्य ग्रहण (4/15/3) का उल्लेख है। रामायण के सुंदरकांड में चंद्र ग्रहण का उल्लेख है। जब हनुमान ने अशोक वाटिका में सीता को देखा (5/19/14, 5/29/7, 5/35/87)। विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर ऐसा माना है कि राम 39 वर्ष की आयु में चौदह वर्ष का वनवास समाप्त करके अयोध्या वापस आये थे। यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि जब राम 14 वर्ष का वनवास समाप्त कर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को अयोध्या वापस आए तो दीपावली का पर्व कार्तिक अमावस्या को क्यों मनाया जाता है? इस प्रश्न पर सभी इतिहासकार, विद्वान, रामायण विशेषज्ञ, आधुनिक शोधकर्ता सर्वथा मौन रहते हैं। क्यों? आज तक कोई नहीं जानता।
