अथर्ववेद में अयोध्या को स्वर्ग के बराबर बताया गया है। अथर्ववेद (10/2/31) में कहा गया है ‘अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या’ तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।। अर्थात ‘आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवताओं की नगरी है’। वाल्मीकि कृत रामायण के अनुसार यह नगर सूर्य वंश की राजधानी था। अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन अर्थात लगभग 144 किलोमीटर लम्बाई और तीन योजन यानि लगभग 36 किलोमीटर चौड़ाई में बसी थी। अनेक शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा।
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:॥
(अर्थात, सात पवित्र नगरों में क्रमश: अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची (कांचीपुरम), अवंतिका, उज्जैन और द्वारिका शामिल हैं। इन सात नगरों को सप्तपुरी भी कहा जाता है। अयोध्या के धार्मिक महत्व के कारण ही प्राचीन सप्तपुरियों में पहला स्थान अयोध्या को दिया गया है। )
स्कन्दपुराण के अनुसार सरयू के तट पर दिव्य शोभा से युक्त दूसरी अमरावती के समान अयोध्या नगरी है। अयोध्या मूल रूप से मंदिरो का शहर है। जैन मत के अनुसार यहां चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। क्रम से पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ जी, दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ जी, चौथे तीर्थंकर अभिनंदननाथ जी, पांचवे तीर्थंकर सुमतिनाथ जी और चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ जी। इसके अलावा जैन और वैदिक दोनों मतो के अनुसार राम का जन्म भी इसी भूमि पर हुआ। ऐसा माना जाता है कि सभी तीर्थंकर इक्ष्वाकु वंश से थे।
पहले अयोध्या नगर कोसल जनपद की राजधानी था। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार तब इसका क्षेत्रफल 96 वर्ग मील था। सातवीं शाताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अयोध्या का भ्रमण किया और उसके अनुसार यहां 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3000 भिक्षु रहते थे।
रामजन्मभूमि
अयोध्या नगर के पश्चिमी हिस्से में स्थित रामकोट में स्थित अयोध्या का सर्वप्रमुख स्थान रामजन्मभूमि है।
कनक भवन
हनुमान गढ़ी के निकट स्थित कनक भवन एक मंदिर है। टीकमगढ़ की रानी ने सन् 1891 में बनवाया था।
हनुमान गढ़ी
नगर के केन्द्र में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहां हनुमान जी सदैव वास करते हैं। यहां का सबसे प्रमुख हनुमान मंदिर “हनुमानगढ़ी” के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि हनुमान जी यहां एक गुफा में रहते थे और रामजन्मभूमि और रामकोट की रक्षा करते थे। इस मन्दिर के निर्माण के पीछे की एक कथा प्रचलित है। सुल्तान मंसूर अली अवध का नवाब था। एक बार उसका एकमात्र पुत्र गंभीर रूप से पड़ गया। प्राण बचने के आसार नहीं रहे, रात्रि की कालिमा गहराने के साथ ही उसकी नाड़ी उखड़ने लगी तो सुल्तान ने थक हार कर संकटमोचक हनुमान जी के चरणों में माथा रख दिया। हनुमान ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम का ध्यान किया और सुल्तान के पुत्र की धड़कनें पुनः प्रारम्भ हो गई। अपने इकलौते पुत्र के प्राणों की रक्षा होने पर अवध के नवाब मंसूर अली ने बजरंगबली के चरणों में माथा टेक दिया। जिसके बाद नवाब ने न केवल हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया। ताम्रपत्र पर लिखकर ये घोषणा की कभी भी इस मंदिर पर किसी राजा या शासक का कोई अधिकार नहीं रहेगा और न ही यहां के चढ़ावे से कोई कर वसूल किया जाएगा। उसने 52 बीघा भूमि हनुमान गढ़ी व इमली वन के लिए उपलब्ध करवाई। लेकिन कहते हैं कि अयोध्या न जाने कितनी बार बसी और उजड़ी, लेकिन फिर भी एक स्थान जो हमेशा अपने मूल रूप में रहा वो हनुमान टीला है जो आज हनुमान गढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है।
आचार्य पीठ श्री लक्ष्मण किला
महान संत स्वामी श्री युगलानन्यशरण जी महाराज की तपस्थली यह स्थान देश भर में रसिकोपासनके आचार्य पीठ के रूप में प्रसिद्ध है। ईस्वी सन् 1818 में ईशराम पुर (नालन्दा) में जन्मे स्वामी युगलानन्यशरण जी का रामानन्दीय वैष्णव-समाज में विशिष्ट स्थान है। 52 बीघे में विस्तृत आश्रम की भूमि आपको ब्रिटिश काल में शासन से दान-स्वरूप मिली थी।
राजद्वार मंदिर
यह अयोध्या के महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है, जो उत्तर प्रदेश के अयोध्या क्षेत्र, हनुमान गढ़ी के पास स्थित है। यह भव्य मंदिर एक उच्च पतला शिखर वाला एक उच्च भूमि पर खड़ा है और दूर से दिखाई देता है। मंदिर राम को समर्पित है।
नागेश्वर नाथ मंदिर
ऐसा कहा जाता है कि नागेश्वर नाथ मंदिर को राम के पुत्र कुश ने बनवाया था। माना जाता है जब कुश सरयू नदी में नहा रहे थे तो उनका बाजूबंद खो गया था। बाजूबंद एक नाग कन्या को मिला जिसे कुश से प्रेम हो गया। वह शिवभक्त थी। कुश ने उसके लिए यह मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि यही एकमात्र मंदिर है जो विक्रमादित्य के काल के पहले से है।
श्रीअनादि पञ्चमुखी महादेव मन्दिर
अन्तर्गृही अयोध्या के शिरोभाग में गोप्रतार घाट पर पञ्चमुखी शिव का स्वरूप विराजमान है। इसे अनादि माना जाता है।
राघवजी का मन्दिर
यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसमें राम के साथ सीता की मूर्ति बिराजमान नहीं है।
सप्तहरि
राम की लीला के अतिरिक्त अयोध्या में श्रीहरि के अन्य सात प्राकट्य हुए हैं। जिन्हें सप्तहरि के नाम से जाना अलग-अलग समय देवताओं और मुनियों की तपस्या से प्रकट हुए भगवान् विष्णु के सात स्वरूपों को ही सप्तहरि के नाम से जाना जाता है। इनके नाम भगवान “गुप्तहरि”, “विष्णुहरि”, “चक्रहरि”, “पुण्यहरि”, “चन्द्रहरि”, “धर्महरि” और “बिल्वहरि” हैं। इनके अलावा यहां जैन मंदिर बौद्ध धर्म, इस्लाम और अनेक संतों की तपस्या स्थली के आश्रम मौजूद हैं।
