वाल्मीकि कृत रामायण में एक स्थान पर कथानक में आश्चर्यजनक मोड़ आता है जब राजा दशरथ ने राम को युवराज बनाने की घोषणा की। संपूर्ण अयोध्या में यह समाचार खुशियों की सौगात लेकर आया लेकिन जब तक यह घोषणा महोत्सव में बदलती उससे पहले ही माता कैकेई ने कोपभवन में पहुंच गई। सभी प्रयास विफल हो गए। अतः राम को वनवास जाना पड़ा।
युवराज की घोषणा :
अयोध्या नरेश दशरथ वृद्ध हो चले थे। अतः परंपरा के अनुसार बड़े पुत्र राम को उन्होंने युवराज बनाने की घोषणा कर दी। राजसभा में सभी ने तालियां बजाकर राजा दशरथ की घोषणा का स्वागत किया। सभी प्रफुल्लित हो गये। सभी को राजा दशरथ से यही आशा थी और परंपरा भी यही थी। इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं था। राज ऋषि और राज पुरोहित ने अगले दिन को विशेष तिथि बताकर शुभष्य शीघ्रम कहा। दशरथ ने भी सभी विद्वत जनों के कथन को स्वीकार कर अयोध्या में भव्य आयोजन की घोषणा कर दी। नगर में ढोल-नगाड़ों से वातावरण खुशनुमा हो गया।
लक्ष्मण ने राम को बधाई देते हुए कहा – “आशा के विपरित राजाज्ञा की घोषणा आश्चर्य चकित हैं। शिव इस घोषणा की रक्षा करें।”
राम केवल मुस्कुराए थे। कहा कुछ नहीं।
युवराज पद पर राम के नाम की घोषणा राजप्रासाद में में पहुंची तो एक दूसरे को बधाई देने का तांता लग गया। इस शुभ सूचना से कोई एक था जो आहत हुआ। आहत होने का कारण भी था। कारण था एक वचन और दो वरदान। वचन-दशरथ और कैकेई का विवाह से पूर्व कैकेई के पिता को दिया गया वह वचन की कैकेई की कोख से जन्म लेने वाला पुत्र ही युवराज होगा। वचन दो। दशरथ कैकेई के सौन्दर्य पर मोहित थे। दे दिया वचन। वरदान, एक युद्ध के समय राजा दशरथ के प्राण बचाने के एवज में दशरथ ने कैकेई को दो वरदान मांगने को कहा। कैकेई ने सही समय पर वरदान फलीभूत होने की बात कहकर उस दशरथ को मुक्त कर दिया।
वनवास प्रसंग
न दशरथ को आशा थी और न राजपरिवार को कि राम के युवराज पद पर सुशोभित करने की घोषणा एक ऐसा विवाद पैदा कर देगा जो भविष्य के लिए एक सबक बन जाएगा। परंपराएं कैसे टूटती हैं यह सभी ने देखा। परंपराओं का दोहन कैसे किया जाता है यह एक उदाहरण बन गया। राजपरिवार में आंतरिक द्वेष को सभी ने महसूस किया। राजपरिवार में एक पत्नी और एक मां का मोह क्या होता है? बहुपत्नी प्रथा का दुष्प्रणाम क्या होता है? पिता की विवशता? राजपरिवार में बच्चों में भी भेद किया जाता है? ऐसे ही प्रश्न घर-घर में एक दूसरे से पूछे जा रहे थे। असलियत क्या है कोई नहीं जानता था। जो राजकर्मचारियों से परिचित थे वह ज्यादा उत्सुक थे। राजकर्मचारी मौन धारण किए हुए हैं। शपथ जो ले रखी है गोपनीयता की।
इधर राजा दशरथ को एक सेवक ने सूचना दी कि महारानी कैकेई अपने कक्ष में बंद हो गई हैं। किसी को न तो प्रवेश की अनुमति दे रही हैं और न किसी से बात कर रही हैं। राज्योत्सव के चिंतन-मनन में व्यस्त दशरथ को समझ नहीं आया कि अचानक महारानी कैकेई को क्या हुआ? विमुखता का क्या कारण हो सकता है? इस खुशनुमा माहौल में ऐसी बेरूखी? वृद्ध राजा दशरथ को दो सेवकों ने सहारा देकर सिंहासन से उठाकर खड़ा किया और महारानी कैकेई के कक्ष के द्वार पर ले गये।
दशरथ ने कक्ष में प्रवेश करते हुए कहा – “कैकेई! विमुखता का क्या कारण है?”
“वचन और वरदान।”
“अर्थात?” दशरथ ने चौंकते हुए कहा।
“वचन! जो आपने मेरे पिता को दिया था।… वृद्धावस्था में आपकी स्मृति क्षीण हो गई है।”
“नहीं कैकेई! क्षीण नहीं हुई है। स्मरण है। अक्षरत: स्मरण है। लेकिन…।”
दशरथ अपनी बात पूरी करते उससे पहले ही कैकेई बोल पड़ी – “लेकिन क्या दश! उनको दिया वचन पूर्ण कीजिए।”
“प्रिय! परंपराओं का निर्वहन भी एक सामाजिक दायित्व है।”
हंसते हुए कैकेई बोली – “परंपरा! कौन-सी परंपरा दश? कहां उल्लिखित हैं परंपराएं? … और जो वचन पूर्ति की परंपरा है उसका क्या? वचन देना भी एक परंपरा है और वचन पूरा करना भी परंपरा है दश।”
परंपराओं की दुहाई देने वाले राजा दशरथ उत्तरहीन हो गये। पर्यंक पर धम्म से बैठते हुए कंपकंपाती हुई आवाज में बोले – “तुम क्या चाहती हो प्रिय?”
“दोनों वरदान मांगती हूं आज।”
गहरी सांस लेकर राजा दशरथ बोले – “मांगों क्या मांगती हो। मैं भी ऋणमुक्त होना चाहता हूं ताकि प्रातः काल के उत्सव का निर्देशन कर सकूं।”
“मेरे पिता को दिया वचन और पहले वरदान के रूप में मेरे पुत्र भरत को राजगद्दी….।”
इतना सुनते ही दशरथ कांपते हुए बोले – “क्या मांग रही हो तुम?”
दशरथ की बात को अनसुना करते हुए कैकेई ने कहा – “… और दूसरे वरदान में राम को वनवास….।” “क्या?”
“…चौदह साल का वनवास। समझ गये आप?”
दशरथ मूर्क्षित हो गये।
सीता ने राम के चरण स्पर्श करते हुए कहा – “आर्य! मेरे जीवन में यह पल अतिशीघ्र आएगा मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा। आपको हार्दिक शुभकामनाएं आर्य।”
राम मुस्कुराए। बोले – “हर्ष विकंपित कर से तुमने अपना पत्नीव्रता धर्म का निर्वहन किया है। मैं तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करता हूं। लेकिन….।” इतना कहकर राम मौन हो गये।
हल्की मुस्कान के साथ सीता ने कहा – “लेकिन! लेकिन क्या आर्य? यह शब्द तो मैंने पहली बार सुना है आपके मुख से। बताइए न लेकिन का तात्पर्य क्या है आर्य?” बच्चों की भांति मचलते हुए सीता ने कहा।
गंभीर होकर राम ने कहा – “ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरुश्री ने एक अवसर पर कहा था – किसी भी कार्य को तब संपन्न माना जाना चाहिए जो बिना किसी बाधा के पूरा हो। कार्य संपन्न होने से पूर्व प्रसन्नता छलावा है।”
स्वीकार्य आर्य। आपका कथन स्वीकार है। गुरुश्री की शिक्षा को भी नमन है आर्य। अर्ध-दिवस पश्चात हार्दिक प्रसन्नता का अवसर मिलने वाला है तो इस पर को व्यर्थ क्यों करें।”
“सत्य कथन सीते। धैर्य मनुष्य को प्रतिभाशाली बनाता है। अतः धैर्यपूर्वक प्रातः काल की प्रतीक्षा करना हमारा कर्तव्य है। धर्म है।”
“आपको संशय क्यों है आर्य?” “संशय नहीं संरक्षण की प्रतीक्षा है सीते।”
“आपके गूढ़ रहस्य को समझ पाना मेरे लिए संभव नहीं है। संभव और असंभव…..।”
सीता अपनी बात पूरी कह पाती उससे पहले ही एक दासी ने आकर हाथ जोड़ते हुए कहा – “असंभव संभव हो गया देवी।” इतना कहकर दासी कांपने लगी। राम ने दासी की स्थिति को देखते हुए कहा – “अभय। दासी अभय। निश्चिंत होकर कहो। क्या असंभव संभव हो गया?”
वनवास गमन
चौदह वर्ष का वनवास दिया गया था। राम के साथ उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण अयोध्या स्थित अपने राजप्रासाद से निकले और निम्नलिखित स्थानों से होते हुए वह आगे बढ़ते-बढ़ते लंका तक पहुंच गए। अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान अयोध्या से लंका के बीच इन 7 जगहों पर रुके थे राम, लक्ष्मण और सीता।
श्रीरामचरितमानस के अनुसार जब राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से शुरू करते हुए श्रीलंका में खत्म की थी। इस दौरान उनके साथ जिस जगह भी जो घटनाएं हुई। अनेक शोधकर्ताओं ने लगभग 200 स्थानों की पहचान की है जहां राम ने वनवास के चौदह वर्ष व्यतीत किए। यहां आज हम आपको उनमें से सात ऐसे प्रमुख स्थानों के बारे में बता रहे हैं जहां वनवास के समय श्रीराम होकर गए थे या ठहरे थे।
अयोध्या
वर्तमान अयोध्या उत्तर प्रदेश में फैजाबाद के समीप एक उपनगर है। अयोध्या नगरी राम के जन्मस्थान के रूप में जानी जाती है। यहां अनेक मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल हैं। जो इन्हें रामायण से जोड़ते हैं। कनक भवन मंदिर, हनुमान गढ़ी मंदिर, सरयू नदी घाट आदि रमणीय स्थल हैं। इसी अयोध्या नगर को त्याग कर राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास के लिए निकले थे। भोर में अनेक प्रशासनिक अधिकारियों और अयोध्यावासियों को सोते हुए छोड़ कर सरयू नदी पार कर चुपचाप निकल गए थे। जब अयोध्या से राम निकले तो वह वेदी कुंड, सीता कुंड, जनौरा आदि स्थलों से होते हुए आगे बढ़े। कुछ दूर तक अयोध्या के निवासी भी उनके साथ चले थे। वाल्मीकि कृत रामायण के दूसरे अध्याय में इसका उल्लेख मिलता है। रामचरितमानस के 1/346 से 2/84 दोहे तक इसका विवरण है।
अयोध्या से चित्रकूट तक यात्रा प्रसंग
वनवास मिलने के उपरांत राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या के राजप्रासाद से निकलने के उपरांत अनेक स्थानों पर ठहरे। उन स्थानों का विवरण निम्नलिखित है –
तमसा नदी तट फैजाबाद
अयोध्या के समीप है तमसा नदी। मान्यता है कि राम ने वनवास जाते समय पहली रात यहां ही विश्राम किया था। आज इस स्थान को मंडाह भी कहा जाता है। यह स्थान अयोध्या से करीब 20 किलोमीटर दूर है (वाल्मीकि कृत रामायण 2/46/1-17 तथा 28)।
चकिया, फैजाबाद
पुरवा चकिया तमसा नदी के तट से कुछ दूर गौराघाट के पास है। यह वह स्थान है जिससे आगे की यात्रा श्रीराम ने तय की थी। उनके पीछे आ रहे अयोध्यावासियों को यहां से वापस भेज दिया था। यहां आज राम का मंदिर है।(वाल्मीकि रामायण 2/46/18-34)।
टाहडीह, फैजाबाद
चकिया के समीप एक स्थान है टाडडीह। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस स्थान का नाम ‘डाह’ की वजह से पड़ा है। स्थानीय बोली में डाह का अर्थ होता है एक साथ रोना। कहा जाता है कि राम के चले जाने के बाद यहां काफी लोग एक साथ रोने लगे थे। जिसके बाद इसका नाम टाहडीह पड़ा। यहां अभी राम परिवार का मंदिर है। वाल्मिकी कृत रामायण 2/47/1- 13 में इसका उल्लेख मिलता है।
सूर्य कुंड, फैजाबाद
टाहडीह से आगे चलने पर दो किलोमीटर दूरी पर है एक कुंड। जिसे सूर्यकुंड कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि राम ने यहां स्नान किया था। यहां राम ने सूर्य की पूजा की थी। इस कारण से इसका नाम सूर्य कुंड रखा गया। (वाल्मीकि कृत रामायण 2/46/21-34)।
सीता कुंड, सुल्तानपुर
यहां गोमती नदी के किनारे महर्षि वालमीकि का आश्रम है। इस स्थान से पर राम ने गोमती नदी पार की थी। संभवतः यहां सीता जी ने स्नान भी किया था।
कलेवातारा, प्रतापगढ़
ऐसा माना जाता है कि इस रास्ते से होते हुए राम वनवास में आगे बढ़े थे। कलेवातारा नदी का वर्तमान नाम बकुलाही है।
श्रृंगवेरपुर, इलाहाबाद
इस स्थान का नाम सिंगरोर है। यह स्थान इलाहाबाद से लगभग 20 किलोमीटर दूर गंगाजी के किनारे है। वाल्मीकि कृत रामायण के अनुसार यहां केवट प्रसंग हुआ था। इसके आसपास अनेक स्थान रामायणकालीन प्रसंगों से जोड़े जाते हैं (वाल्मीकि कृत रामायण 2/50/28-2/52/92)।
रामसैया, इलाहाबाद
सिंगरोर में एक रामसैया नाम का स्थान भी है। जिसके विषय में कहा जाता है कि यहां राम ने रात में विश्राम किया था। निशाद राज गुह ने यहां घास की शैया तैयार की थी। इसके अलावा इसके समीप वीरासन नामक स्थान के विषय में कहा जाता है कि रात को लक्ष्मण जी ने वीरासन पर बैठ कर रात को पहरा दिया था। इसके पास एक सीताकुंड है। जहां से सुमंत को वापस अयोध्या भेजा था।
कुरई, इलाहाबाद
कहते है कि श्रृंगवेरपुर में गंगा नदी पार करते समय सीता गंगा पार से एक मुट्ठी रेत लाई थीं। उस रेत की कूरी कर उन्होंने भगवान शिव की पूजा की थीं। आज इस जगह पर भगवान शिव का मंदिर है। इसके बाद राम ने यहां रात का विश्राम किया था। (वाल्मीकि कृत रामायण 2/52/92 एवं 93)
भरद्वाज आश्रम, इलाहाबाद
प्रयागराज में एक टीले पर यह आश्रम बना हुआ है। इस स्थान के लिए कहा जाता है कि राम और भरत का मिलन इसी स्थान पर हुआ था। इसके अतिरिक्त यहां राम ने अक्षयवट में पूजा और परिक्रमा की थी। यमुनाघाट पर ही राम, सीता और लक्ष्मण ने रात्रि विश्राम किया था। इसके बाद राम शिव मंदिर ऋषियन से होते हुए आगे बढ़े थे। (वाल्मीकि कृत रामायण 2/54/5 एवं 2/55/1-11)
चित्रकूट, मध्य प्रदेश
वाल्मीकि कृत रामायण और पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर माना जाता है कि यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक चित्रकूट नामक स्थान पर राम, सीता और लक्ष्मण ने लगभग ग्यारह वर्ष यहां ठहरे थे। यहीं पर राम और सीता की मुलाकात सात अमर संतों में से एक अत्री और उनकी पत्नी अनुसूया देवी से हुई थी। वर्तमान चित्रकूट में सब कुछ राम से संबंधित है। रामघाट, हनुमान धारा, कामदगिरी, जानकी कुंड, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी, सीता की रसोई, देवी अनुसूया मंदिर हैं।
सीता पहाड़ी, चित्रकूट
सीता रसोई समेत अनेक प्रसंग इस पहाड़ी से जुड़े हुए बताए जाते हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार यहां सीता ने चावल पसाए थे। आज जिसे चिकनी शिला कहा जाता है, इसके पास एक सीता पहाड़ी है। जिसके विषय में कहा जाता है कि यहां राम ने विश्राम किया था। (वाल्मीकि कृत रामायण 2/55/23-33)
चित्रकूट और उसके आस-पास के क्षेत्रों में राम, सीता और लक्ष्मण ने बहुत समय व्यतीत किया था। स्थानीय निवासी यहां की अनेक कहानियां सुनाते हैं।
दशरथ कुंड
यहां एक कुंड है। इसे दशरथ कुंड कहते हैं। ‘लोरी’ नामक स्थान के पास ही राम को दशरथ जी के स्वर्गवास का आभास हो गया था। इसके बाद उन्होंने यहां बिना दर्शन किए दशरथ जी का श्राद्ध किया था।
प्राचीन आश्रम
लालापुर में पहाड़ की चोटी पर महर्षि वाल्मीकि का एक प्राचीन आश्रम है। यहां राम की महर्षि वाल्मीकि से भेंट हुई थी।
कामद गिरि
लोक मान्यताओं के अनुसार कामद गिरि में लंबे समय तक राम रहे थे।
कोटितीर्थ
चित्रकूट में कोटितीर्थ नामक एक स्थान है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि एक कोटि मुनि से मिलने राम आए थे।
देवांगना
चित्रकूट के देवांगना नामक स्थान पर राम के दर्शन के लिए देव कन्याएं यहां एकत्रित हुई थीं।
रामघाट
रामघाट चित्रकूट का प्रसिद्ध स्थल है। यह वह स्थान है जहां वनवास काल में राम, सीता और लक्ष्मण रहते थे। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास को यहां राम और लक्ष्मण के दर्शन हुए थे।
भरत कूप
चित्रकूट में एक कूप अर्थात कुंआ है। इसे भरत कूप कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि भरत राम के राज्याभिषेक के लिए जब सभी तीर्थों का जल लाए थे तो भरत ने चित्रकूट आकर इस कूप का जल भी लिया था।
गुप्त गोदावरी
गुप्त गोदावरी में सीता यहां स्नान करती थीं। यहीं मयंक नामक चोर ने उनके वस्त्राभूषण चुराए थे और लक्ष्मण मयंक नामक चोर को दण्ड दिया था।
अमरावती आश्रम
अमरावती आश्रम के लिए राम विश्राम की बात कही जाती है। (वाल्मीकि कृत रामायण तीसरा अध्याय।)
पुष्करणी
पुष्करणी टिकरिया के लिए कहा जाता है कि टिकरिया और मारकुंडी के बीच एक विशाल पुष्करणी में राम ने अपने हथियार और कपड़े धोये थे।
मारकुंडी
मारकुंडी मार्कण्डेय के लिए कहा जाता है कि वहां भगवान राम ने शिव की पूजा की थी।
चित्रकूट में राम लगभग 12 वर्ष तक रहे थे। इसके विपरित अनेक विद्वानों का मत है कि राम 12 साल 5 महीने तक चित्रकूट के अलावा अन्य स्थानों पर रहे थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार राम लगभग करीब डेढ़ वर्ष तक ही चित्रकूट में रहे थे। अयोध्या से चित्रकूट तक आने में राम को लगभग दस दिन लगे थे। इसके बाद लंबे समय तक वह चित्रकूट और उसके समीपवर्ती स्थानों पर रहे। चित्रकूट से राम सुतीक्षण आश्रम तक गए थे और यहां आस पास घूमते रहे थे और उन्होंने इस दौरान कई ऋषि मुनियों के दर्शन किए थे।
चित्रकूट और उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में एक लंबा समय व्यतीत करने के उपरांत राम सीता और लक्ष्मण के साथ दक्षिण दिशा की ओर चले।
शरभंगा, सतना
चित्रकूट के बाद राम वर्तमान मध्यप्रदेश के सतना नगर से होकर आगे बढ़े थे। सतना में एक शरभंग आश्रम है। चित्रकूट के बाद भगवान राम यहां पहुंचे थे। ऐसी मान्यता है कि राम को देवराज इन्द्र के दर्शन यहां हुए थे। शरभंग नाम को लेकर कहा जाता है कि शरभंग मुनि ने योगाग्नि में स्वयं को भस्म किया था।
अश्वमुनि आश्रम, सतना
वाल्मीकि कृत रामायण में अश्वमुनि के आश्रम का वर्णन ऋषियों के लिए सुरक्षित स्थल के रूप में आया है। शरभंग आश्रम के पास अश्वमुखी देवी का मंदिर है। इसके पास एक सिद्धा पहाड़ है, जिसके लिए कहा जाता है कि यह ऋषियों की अस्थियों के ढेर से बना है। इसमें रंग-बिरंगी बजरी निकलती है। ऐसा भी कहा जाता है कि यहां राम ने इस भूमि को राक्षसों से विहीन करने की भीष्म प्रतिज्ञा की थी। (वाल्मीकि कृत रामायण, तीसरा अध्याय)। इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेश में अनेक स्थान ऐसे भी हैं जिनका उल्लेख वाल्मीकि कृत रामायण में नहीं मिलता है लेकिन स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार उन स्थानों को रामायण से जोड़ा जाता है।
रक्सेलवा, सतना
सतना में अवस्थित रक्सेलवा गांव का नाम राकस यानि राक्षस के अपभ्रंश से बना है। कहा जाता है कि यहां पर श्रीराम ने बड़ी संख्या में राक्षसों का निर्मम संहार किया था। यह स्थान सीता रसोई से चार किलोमीटर की दूरी पर लेड़हरा पर्वत के पास है। इसका प्राचीन नाम रामशैल माना जाता है।
बृहस्पति कुंड, पन्ना
राम वर्तमान में पन्ना नगर के बृहस्पति कुंड के समीप से होकर निकले थे। ऐसा माना जाता है कि बृहस्पति कुंड के समीप देव गुरु बृहस्पति ने यज्ञ किया था। संभवतः आश्रम की स्थापना के कारण यह यज्ञ किया गया था। यह स्थान पहाड़ी खेरा से लगभग 6 किलोमीटर दूर है।
सारंगधर, पन्ना
सारंगधर को लेकर माना जाता है कि श्रीराम ने भुजा उठाकर राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की थी। तभी हाथ उठाने के लिए उन्होंने सारंग धनुष धरती पर टिकाया था। इस कारण इस स्थान का नाम सारंगधर पड़ा। इस जगह को आज एक अद्भुत वट वृक्ष की वजह से भी जाना जाता है। इसके पत्ते बडे़ होकर दोने का आकार ले लेते हैं।
भरभरा, कटनी
पन्ना से होते हुए भगवान राम कटनी पहुंचे थे। यह स्थान कटनी जबलपुर मार्ग पर कटनी से 60 किलोमीटर दूर है। लोक प्रचलित मान्यताओं के अनुसार भरभरा गांव में राम ने शिव की पूजा की थी। यह स्थान एक नदी के किनारे है।
रामघाट पिपरिया, जबलपुर
वर्तमान जबलपुर में नर्मदा नदी के पास मगरमुहा के पास राम घाट है। राम ने यहां से नर्मदा नदी पार की थी।
पासी घाट, होशंगाबाद
नर्मदा के किनारे उमरधा के निकट पासी घाट में राम ने एक स्थान पर रात्रि विश्राम किया था और अगले दिन प्रातःकाल में स्नान किया था। नर्मदा जी के किनारे राम ने बिल्व पत्रों से भगवान शिव की पूजा की थी। अतः इसे बिल्वाम्रक तीर्थ कहा जाता है।
रामगिरि, नागपुर
लोक कथाओं में कहा जाता है कि सुतीक्ष्ण आश्रम जाते समय सीता जी ने यहां स्नान किया था। अब यहां राम मंदिर है और इस गांव का नाम रामगिरि हैं। यह जगह नागपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर है।
सालबर्डी, अमरावती
वनगमन के समय नागपुर के सालबर्डी गांव के पास राम ने एक रात्रि विश्राम किया और शिव पूजा की थी। यहां मोढू नदी में सीता नहानी और श्रीराम मन्दिर हैं।
सप्तश्रृंगी पर्वत, नासिक
सुतीक्ष्ण मुनि के अनेक आश्रम मिले हैं। राम की सुतीक्ष्ण मुनि से संभवतः यहीं भेंट हुई थी। राम दस वर्ष दण्डक वन में घूमकर वापस इसी आश्रम में आए थे। इसके अलावा सप्तश्रृंगी देवी मंदिर पंचवटी प्रवास की अवधि में भगवान राम यहां दुर्गा मां के दर्शन के लिए आते थे। यह स्थान उनके मार्ग से थोड़ा अलग है। उन्होंने अनेक नदियां पार कर विकट मार्गों से होते हुए सुतीक्ष्ण मुनि से भेंट की थी।
टेकारी, नागपुर
वर्तमान महाराष्ट्र के नागपुर जिले में टेकारी में अवस्थित यह सरोवर उस स्मृति से जुड़ा है जब राम वनवास के समय में यहां आए थे। ऐसा माना जाता है कि पहले यहां पानी का अभाव था। किन्तु अब इसमें जल हमेशा उपलब्ध रहता है। ऐसी भी मान्यता है कि स्थानीय लोगों का दुख दूर करने के लिये राम ने स्वयं इस सरोवर के निर्माण में हाथ बंटाया था। इतना ही नहीं राम ने स्थानीय लोगों को यह आश्वासन दिया था कि इसमें हमेशा जल बना रहेगा।
नया दरबार, उमरिया
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार सोनभद्र और महानदी के पवित्र संगम पर राम ने दशरथ जी का श्राद्ध किया था। आज भी सोनभद्र के किनारे प्राचीन बस्ती के अवशेष नदी में मिलते हैं। यहां मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम हुआ करता था जो डूब क्षेत्र में आ गया है। ऐसा माना जाता है कि राम यहां मार्कण्डेय ऋषि से मिलने आए थे।
ताला बांधगढ़, उमरिया
ताला बांधगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में एक पहाड़ी पर राम का प्राचीन मन्दिर स्थित है। यहां लक्ष्मण शैया, भगवान वराह, कच्छपावतार, मत्स्यावतार, हनुमान जी आदि के अनेक मन्दिर हैं। राम दण्डकारण्य भ्रमण करते हुए यहां आये थे।
गंधिया, शहडोल
शहडोल जिले में जयसिंह नगर से लगभग 15 किलोमीटर दूर गंधिया नामक ग्राम के पास राम एक रात्रि यहां रुके थे और भोजन किया था। यहां एक रसोई बनी है। जिसे सीतामढ़ी के रूप में जाना जाता है।
हरचोका
यहां मबइ नदी के किनारे सीतामढ़ी है। माना जाता है कि सीता मां ने यहां भोजन किया था। बता दें कि अयोध्या से पंचवटी तक अनेक सीता रसोइयां मिली हैं और यह भी उनमें से एक है।
थापा
इसके बाद रापा में भी एक सीतामढ़ी है। रापा नदी के किनारे पहाड़ी पर एक तल घर में भगवान शिव का प्राचीन विग्रह है। ऐसी मान्यता है कि वनवास काल में राम जी ने यहाँ रात्रि विश्राम किया था।
छतोड़ा
छतोड़ा में भी नेऊर नदी के किनारे एक सीतामढ़ी है। जिसके लिए कहा जाता है कि यहां राम ने भोजन किया था और विश्राम किया था।
विश्रामपुर
अम्बिकापुर का प्राचीन नाम विश्रामपुर माना जाता है। यहां राम का मंदिर है। माना जाता है कि राम और सीता यहां अनेक वर्षों तक रहे थे।
उड़गी
यह स्थान राम के लिए नहीं बल्कि उनके भाई लक्ष्मण की के कारण काफी लोकप्रिय है। ऐसा कहा जाता है कि वनवास काल में राम सरगुजा के जंगलों में लंबी अवधि तक रहे हैं। उनकी यात्रा की स्मृति में अन्य अवशेषों के साथ लक्ष्मण पंजा भी मिलता है अर्थात् यहां लक्ष्मण जी के पावन चरण चिह्न हैं। आज वनवासी लोग यहां भंडारा करते हैं और लक्ष्मण जी से मन्नत मांगते हैं। मनोकामना पूरी होने के बाद वनवासी पुनः यहां आते हैं।
पायन मरहट्टा
पायन का अर्थ चरण है। ऐसा माना जाता है कि वनवास काल में राम, लक्ष्मण और सीता इसी मार्ग से गए थे। यहां से आगे उन्होंने महानदी पार की थी और यहां उनके चरण चिन्ह हैं।
सरासोर
सरासोर श्रीराम ने सरा नामक असुर का वध किया था। भगवान शिव की पूजा की थी। ऐसा माना जाता है कि सरा नामक असुर तपस्वियों को परेशान करता था और राम ने उसे मारकर क्षेत्र सुरक्षित किया था। आजकल यहां मेला भी लगता है।
शिव मंदिर बगीचा
यहां सीता जी ने वनवासियों को शीत ज्वर से बचाने के लिए तुलसी के पौधों का बगीचा लगाया था। यह क्षेत्र बगीचा के नाम से प्रसिद्ध हो गया। ऐसी प्रचलित मान्यता है कि सीता अपने साथ तुलसी के पौधों के लिए बीज लेकर चलती थीं और हर स्थान पर तुलसी के बीजों को रोप दिया करतीं थीं।
लक्ष्मण पंजा, रिंगार घाट
लक्ष्मण ने वराह रूप में विचर रहे राक्षस का संहार किया था यहां। लक्षमण के पांवों के निशान यहां एक पत्थर पर बने हैं जिनकी पूजा की जाती है। यहां अब कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है।
लक्ष्मीगुड़ी, जसपुर
सीता ने यहां वनवासी महिलाओं को बांस की टोकरी बनाना सिखाया था। इसी के समीप रायपुर घरघोड़ा मार्ग पर गेरवानी गांव के पास जंगल में लक्ष्मण के पांवों की पूजा होती है। माना जाता है कि राम जानकी यहां से ही गए थे। रायगढ़ से रायगढ़ से 21 किलोमीटर दूर भूपदेवपुर स्टेशन के पास जंगल में राम झरना है। इस झरने के लिए कहा जाता है कि राम, सीता और लक्ष्मण ने यहां स्नान किया था। एक चमत्कार है कि झरने का पानी किसी भी मौसम में घटता बढ़ता नहीं है।
पैसर घाट, पैसर
वनवास के समय राम जी ने यहां से नदी पार की थी। इसके बाद विश्राम वट गिधोरी है। जहां एक प्राचीन वट वृक्ष है। जिसे विश्राम वट कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि तीनों ने यहां विश्राम किया था। राम वन गमन पथ में महर्षि वाल्मीकि के अनेक आश्रमों में मिले थे। यहीं पास में तुरतुरिया में भी एक आश्रम है।
श्रीराम मंदिर, गुल्लू
ऐसी मान्यता है कि यहां नदी के किनारे-किनारे यात्रा करते हुए गुल्लू के निकट राम ने महानदी पार की थी। कभी महानदी गुल्लू से सट कर बहती थी। तभी नदी का पानी मंदिर की बावड़ी में आता था। वहीं, रायपुर से 49 किलोमीटर दूर आरंग में एक प्राचीन शिव मंदिर है। इसके विषय में कहा जाता है कि वनवास के समय राम ने इसकी स्थापना की थी। इसके अतिरिक्त फिंगेश्वर नाथ मंदिर की भी स्थापना राम ने की थी।
दंडकारण्य
राम ने वनवास का काफी वक्त दंडकारण्य में बिताया था। आज उस दंडकारण्य को छत्तीसगढ़ कहा जाता है।
माण्डव्य आश्रम
छत्तीसगढ़ के राजिम में फिंगेश्वर मार्ग पर प्राचीन माण्डव्य आश्रम में राम ऋषि दर्शन के लिए आए थे। इसी स्थान के पास सरगी नाला नाम की एक जगह है। जिसके लिए कहा जाता है कि यहां राम ने अपने हथियार धोए थे। राजीम में राजीव लोचन नामक स्थान पर राम ने विष्णु भगवान की पूजा की थी।
कुलेश्वर नाथ मंदिर
राजीम में एक कुलेश्वर नाथ मंदिर है, जिसके लिए कहा जाता है कि यहां सीता ने जनक वंश के कुल देव भगवान शिव की पूजा की थी. अभी यहां कुलेश्वर नाथ मंदिर की बहुत मान्यता है. इसके अलावा एक लोमश ऋषि का आश्रम है।
धमतरी
धमतरी से 5 किलोमीटर दूर महानदी के किनारे भगवान शिव का प्राचीन मन्दिर है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां से राम गुजरे थे। वहीं पास ही में विश्रामपुर में एक मंदिर है। जिसे राम लक्षमण मंदिर कहा जाता है। यहां राम और लक्ष्मण रुके थे।
ऋषि मण्डल नगरी, धमतरी
यहां अनेक मंदिर या आश्रम हैं। ऐसा माना जाता है कि राम यहां लंबे तक रुके थे। उन्होंने लोमश (राजीम), वाल्मीकि (तुरतुरिया), माण्डव्य (फिंगेश्वर), शृंगी (सिहावा), शरभंग (दलदली), लोमश और शरभंग (डोंगरी) अंगीरा (घटुला) अगस्त्य (हर्दीभाटा या खारूगढ़), पुलस्त्य (दुधावा), कर्क या कंक (कांकेर डोगरी) जैसे ऋषियों से भेंट की थी।
अगस्त आश्रम
अगस्त्य आश्रम ऋषि मण्डल में सभी सात ऋषियों के आश्रम हैं। ऐसा कहा जाता है कि राम सभी आश्रमों के दर्शन के लिए गए थे। वह यहां भी आए थे।
शरभंग आश्रम
शरभंग जी के और भी अनेक आश्रम मिले हैं। ऐसा कहा जाता है कि सभी स्थलों पर राम व शरभंग जी की भेंट नहीं हुई थी लेकिन श्रीराम यहां रहने वाले संतों के दर्शन के लिए यहां आए थे।
अंगिरा आश्रम
अंगिरा आश्रम घटुला नगरी से करीब 20 किलोमीटर दूर है। यहां राम अंगिरा ऋषि से मिलने आए थे।
मुचकुंद आश्रम
मुचकुंद आश्रम नगरी से 27 किलोमीटर दूर है और यहां मैचका नाम के एक गांव में मुचकुंद ऋषि का आश्रम है। आश्रम के पास सुंदर तालाब और सीता एवं अन्य देवों की प्रतिमाएं हैं।
वाल्मीकि आश्रम
वाल्मीकि आश्रम सीता अभ्यारण्य सिहावा से दक्षिण दिशा में सीता नदी को चित्रोत्पला नदी कहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि राम वनगमन के पूरे रास्ते में वाल्मीकि आश्रम थे।
कर्क आश्रम
राम ने काफी रास्ता महानदी के किनारे पूरा किया था और माना जाता है कि ऋषि कर्क ने राम को शत्रु के हथियार ध्वस्त करने की विद्या सिखाई थी।
गड़िया मंदिर
वनवास के समय राम कांकेर जिले के दुधावा कर्क ऋषि आश्रम पहुंचे और यहां से रामपुर जुनवानी, कांकेर गढिय़ा पहाड़, भंडारीपारा प्राचीन शिवमंदिर होते केशकाल की ओर बढ़ गए थे। ऐसा कहा जाता है कि जोगी गुफा में राम कंक ऋषि से मिलने आए थे।
शिव मंदिर कांकेर
गढिय़ा पहाड़ में कंक ऋषि से मिलने के बाद राम वर्तमान शहर के भंडारीपारा क्षेत्र में पहुंचे थे। मान्यता है कि राम ने भंडारीपारा में तालाब किनारे रामनाथ महादेव की स्थापना करते शिव पूजन किया था। इसके पास एक और शिव मंदिर है। इसके विषय में कहा जाता है कि यहां भी राम का आगमन हुआ था।
राकस हाडा, नारायणपुर
नारायणपुर में राकस हाडा में राम ने यहां राक्षसों का भयंकर विनाश किया था। यहां तक कहा जाता है कि नारायणपुर से 11 किलोमीटर दूर श्रीराम द्वारा मारे गए राक्षसों की हड्डियों का ढेर है। राकस हाड़ा का अर्थ हैं- राक्षस की हड्डियां। इसके पास ही कुछ गुफाएं भी हैं। इससे भी जुड़े रामायण के कई प्रसंग हैं।
शिव मंदिर चित्रकोट, बस्तर
राम वनगमन मार्ग में ऐसे अनेक स्थान हैं जहां भगवान शिव का मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि राम ने अपने वनवास के दौरान कई जगह शिवलिंग की स्थापना की थी। आज वहां शिवजी के मंदिर हैं। इन्द्रावती नदी के पास भी राम रुके थे। यहां भी राम ने शिवलिंग की स्थापना की थी।
शिव मंदिर इंजरम, कोंटा
कोंटा नगर से लगभग 8 किलोमीटर दूर उत्तर में शबरी नदी के किनारे इंजरम गांव के पास एक शिव मंदिर है। इसके विषय में कहा जाता है यहां राम ने भगवान शिव की पूजा की थी।
कोरापुट
ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ के कोंटा के बाद राम उड़ीसा की तरफ बढ़े थे। ऐसी मान्यता है कि कोरापुट के गुप्तेश्वर रामगिरी में रामगिरि पर्वत पर राम के आने का पवित्र चिह्न है।
मल्कानगिरी
उड़ीसा के मल्कानगिरी में खैरपुट बाली मेला और गोविन्द पल्ली मार्ग पर खैरपुट नाम का एक गांव है। इसके पास एक प्राकृतिक कुंड है और इस कुंड के विषय में कहा जाता है कि यहां सीता स्नान करती थीं। इसके अतिरिक्त इस कुंड में पाई जाने वाली मछलियों की कहानी भी सीता से जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा खैरपुट के अम्मा कुंड से 15 किलोमीटर दूर एक सीता कुंड भी है और यहां सीता की तलवार ठकुराइन की तलवार के नाम से आज भी पूजी जाती है।
बालीमेला, मल्कानगिरी
बालीमेला को सुग्रीव के भाई बाली से जोड़कर देखा जाता है। इसके समीप मल्लीकेश्वर नाम का एक मंदिर है। जहां भगवान शिव की पूजा की गई थी। यहां के आदिवासियों का मानना है कि किष्किंधा यही है।
शबरी सलेरू संगम, मल्कानगिरी
यहां सलेरू और शबरी नदी का पवित्र संगम है। ऐसा माना जाता है कि सीता जी ने यहां स्नान किया था। इस नदी के किनारे आगे की यात्रा तय की थी। इस नदी के आगे का हिस्सा वर्तमान तेलंगाना में भी है। वहां से राम के अनेक प्रसंग जुड़े हैं।
कोनावरम, खम्मम
यहां शबरी और गोदावरी नदी का संगम है। ऐसा कहा जाता है कि इसके पास राम स्वामी देव स्थानम है। यहां राम कुछ समय तक रहे थे। इसके पास भद्राचलम से कुछ दूरी पर पर्णशाला है। इसके विषय में कहा जाता है कि राम ने यहां कुछ दिन निवास किया था।
पर्णशाला
पर्णशाला एक ऐसी जगह है, जिसे लेकर कई अन्य कहानियां भी प्रसिद्ध है। अनेक विद्वानों का मत है कि पंचवटी यहीं है। यहां से ही सीता का अपहरण हुआ था। अनेक दस्तावेजों में पंचवटी के नासिक में होने का उल्लेख मिलता है। यहां तक कि पर्णशाला के पास अनेक ऐसे स्थान हैं, इनके विषय में कहा जाता है यहां श्रीराम की कुटिया थी।
कंदकुर्ती, निजामाबाद
निजामाबाद से करीब 30 किलोमीटर दूर गोदावरी माजरा और हल्दीहोल नदी का संगम है। कहा जाता है कि वनवास के दौरान राम यहां आए थे।
श्रीराम मंदिर, बासर
बासर के विषय में कहा जाता है कि यह वह स्थान है जहां पूर्वकाल में राजा दशरथ भी आ चुके थे। उसके बाद राम गए थे। ऐसी मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ का संकल्प लिया था। राम के वनवास का लंबा समय वर्तमान महाराष्ट्र में व्यतीत हुआ। वर्तमान महाराष्ट्र में भी रामायण कालीन स्थल पाए जाते हैं।
रालेगांव, यवतमाल
रालेगांव से वर्तमान महाराष्ट्र राज्य की सीमा प्रारंभ हो जाती है। यवतमाल जनपद के रालेगांव में सीता का मंदिर है। सीता के श्राप से अभी भी इस गांव में गेहूं पैदा नहीं होता है। यवतमाल में नांदेड़ की सीमा के पास उनकेश्वर नामक स्थल पर श्ररभंग ऋषि का आश्रम है। यहां से राम निकले थे।
रामेश्वर माहुर, नांदेड़
राम ने यहां एक दिन का विश्राम किया था और भगवान शिव की पूजा की थी। इसके समीप है मुर्डेश्वर। मुर्डेश्वर के विषय में कहा जाता है कि राम को देखने के लिए यहां शिवजी मुड़ गए थे इसलिए इसे मुर्डेश्वर कहा जाता है.
सिंदखेड़ राजा, बुलढाणा
बुलढाणा जिले के सिंदखेड राजा में एक अत्यन्त प्राचीन शिव मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि इसकी स्थापना राम ने की थी।
नागरतास मंदिर, जालना
ऐसा माना जाता है कि यहां शेवली के पास राम ने किसानों को हल चलाना सिखाया था और शिव पूजा की थी। आज भी यहां किसान शिव मंदिर में पूजा करते हैं और हल की पूजा की जाती है। इसके समीप है शेवली तालुका। इसके विषय में कहा जाता है कि यहां राम ने शम्भू नाम के राक्षस का वध किया था। वहीं रामतीर्थ में दशरथ जी के श्राद्ध करने की बात कही जाती है।
राक्षसभुवन, बीड़
शनैश्वर मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां राम पर शनि की साढे़साती लगी थी। उन्होंने शनि देव की यहां विशेष पूजा अर्चना की थी। आज भी शनि को शांत करने के लिए दूर-दूर से लोग गोदावरी के किनारे शनि पूजा के लिए आते हैं।
पाटौदा, नासिक
पंचवटी प्रवास के दौरान राम आस-पास के क्षेत्रों में भ्रमण करते रहे थे। तभी उन्होंने पाटौदा गांव में रामेश्वर लिंग की स्थापना की थी। यहां स्थापित शिव लिंग में आज भी सर्वदा पानी रहता हैं। इसके पास ही एक प्राचीन अगस्त्येश्वर आश्रम है। कहा जाता है कि राम और अगस्त्य मुनि की यहां भेंट हुई थी।
जनस्थान, नासिक
वाल्मीकि कृत रामायण में नासिक का उल्लेख पंचवटी के रूप में मिलता है। ऐसा माना जाता है कि यही वह स्थान है जहां पर लक्ष्मण ने सुपर्ण्खा की नाक काटी थी। संभवतः इसी कारण इस स्थान का नाम नासिक पड़ा। यहां का राम मंदिर पंचवटी के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यहां सीता गुफा और कपालेश्वर मंदिर भी हैं। हर 12 साल में तीर्थयात्री यहां कुंभ मेला देखने आते हैं। नासिक में पंचवटी से लगभग 8-10 किलोमीटर दूर गोदावरी और कपिला नदी के संगम पर ये जगह है। ऐसा कहा जाता है कि इसी जगह पर लक्ष्मण जी ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। नासिका काटने की कहानी को लेकर ही इस शहर का नाम नासिक है। ऐसा माना जाता है कि त्रेतायुग में यह क्षेत्र जन स्थान के नाम से प्रसिद्ध था। राक्षस राजा रावण का यह प्रमुख केंद्र था। वाल्मीकि कृत रामायण के अनुसार यहां राक्षस खर 14 हजार राक्षसों के साथ रहता था। ऐसा कहा जाता है कि अगस्त्य मुनि ने राम को पूरी तरह हथियारों से सुसज्जित कर पंचवटी भेजा था।
पंचवटी, नासिक
नासिक गोदावरी के किनारे पांच वट वृक्षों का एक स्थान है। इसे पंचवटी कहा जाता है। जहां रावण ने माता सीता का अपहरण किया था। तेलंगाना में पर्णशाला नाम की एक जगह है। यहां की पर्णशाला के पास कुछ ऐसे स्थान हैं, जिनके लिए कहा जाता है वहां राम की कुटिया थी।
सीता सरोवर, नासिक
पंचवटी के पास म्हसरूल में दो सरोवर राम और सीता के नाम पर हैं। ऐसा कहा जाता है कि दोनों इन सरोवरों में स्नान करते थे। इसके अतिरिक्त इसके पास रामसेज पर्वत नाम की जगह है। जहां के विषय में मान्यता है कि यहां राम और सीता ने विश्राम किया था।
सिद्धेश्वर प्रवरा संगम, अहमदनगर
सिद्धेश्वर प्रवरा संगम पर यह तीर्थ है। लोक प्रचलित मान्यताओं के अनुसार हरिण रूपी मारीच राम से डरकर यहां छुप गया था। इसके पास एक ठाण नाम के कई गांव हैं। इसके विषय में कहा जाता है कि हिरण रूपी मारीच जंगल में पेड़ों और झाड़ियों के पीछे जान बचाने के लिए छिपता रहा। जहां-जहां से राम ने खड़े होकर निशाना साधते थे उस जगह को ठाण कहा जाता है।
कोठरे नेफाड
यहां एक बाणेश्वर मंदिर है। इसके विषय में कहा जाता है कि यहां खड़े होकर राम ने मारीच को बाण मारा था।
मृग व्याधेश्वर, नासिक
यहां मारीच को बाण लगा था। बाण लगते ही उसके टुकडे़-टुकडे़ हो गए थे। यह स्थल नेफाड़ से करीब 12 किलोमीटर है। मारीच ने बाण लगने के बाद राम की आवाज की नकल करते हुए लक्ष्मण से सहायता की गुहार की थी। सीता की प्रेरणा से लक्ष्मण राम से मिलने गए। तब मध्यमेश्वर में राम और लक्ष्मण की भेंट हुई थी। रामेश्वर खाण्ड गांव के बारे में कहा जाता है कि जब राम ने मारीच को बाण मारा तो उसके टुकड़े-टुकडे़ हो गए और उसका धड़ काय गांव में गिरा और सिर टोक गाँव में गिरा। लोक मान्यता के अनुसार राम के बाण से मृत मारीच का धड़ (काया) रामेश्वर मंदिर में गिरा था।
सर्वतीर्थ घोटी ताकेद, नासिक
जब रावण सीता को ले जा रहा था। तब रावण का जटायु से युद्ध हुआ था। यहां राम को जटायु जमीन पर मिले थे और राम ने उनका अग्नि संस्कार किया और जलांजलि दी। इसके बाद राम और लक्ष्मण सीता को खोजते हुए मुंबई आए थे।
रामलिंग देव स्थानम शिरूर, पुणे
लोक कथा के अनुसार राम ने लंका अभियान के समय घोड़ नदी के किनारे रूर नामक राक्षस का वध किया था। राक्षस का सिर यहां गिरा था इसलिए यह स्थल सिररूर था जो शिरूर हो गया है। यहां राम द्वारा स्थापित भगवान शिव का एक बहुत विशाल मंदिर है।
श्रीराम वरदायिनी तुलजापुर, उस्मानाबाद
तुलजापुर में सती मां ने राम की परीक्षा लेने के बाद राम को सीतान्वेषण में सफल होने का वरदान दिया तभी नाम राम वरदायिनी हुआ है। इसके अतिरिक्त तुलजापुर में मां सती ने राम को एक शिला पर अपने वास्तविक स्वरूप के दर्शन दिए और दक्षिण दिशा में सीता को खोजने के लिए कहा था। जिस शिला पर उन्होंने राम को दर्शन दिए वह आज घाटशिला मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है।
अयोध्यापटटनम, सेलम
कर्नाटक में लंबा रास्ता तय करने के बाद राम वर्तमान तमिलनाडु होते हुए आगे बढ़े थे। ऐसा माना जाता है कि राम लंका जाते हुए यहां से होते हुए आगे बढ़े थे। विद्वानों के एक वर्ग के अनुसार राम जब लंका से अयोध्या वापस जा रहे थे तो स्थानीय नागरिकों ने यहां उनका पट्टाभिषेक किया था। एक स्थान है त्रिशिरापल्ली। यहां से राम सेना आगे बढ़ी थी। इस स्थान एक कहानी मिलती है कि यह नगर रावण के भाई त्रिशिरा बसाया था।
तंजावुर
यह रामलिंग अर्थात शिव मंदिर रामेश्वरम की तरह ही बनाया गया है। यहां कुल 108 शिवलिंग स्थापित किए गए हैं। ऐसा माना जाता है कि इसी तंजावुर में जब राम कावेरी की शाखा के किनारे चलते हुए यहां पहुँचे तो ऋषियों ने उन्हें वहीं रहने को कहा। राम ने उन्हें अपना एक विग्रह देकर ऋषियों से आगे जाने की अनुमति प्राप्त की और लंका की ओर चले गए।
कैकरई, तिरुवारुर
तिरूवारूर से लगभग 3 किलोमीटर दूर राम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। आज भी स्थानीय लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने यहां आते हैं। इसी के समीप है राम स्वामी मंदिर। यहां भी वानर सेना रुकी थी।
वेदारण्यम, नागपट्टनम
इस स्थान के विषय में कहा जाता है कि इस जंगल में भगवान शिव के डमरू से वेदों का उद्घोष हुआ था। इस नाते इस भूमि का भगवान शिव से विशेष संबंध है। अतः लंका अभियान पर जाते समय राम ने यहां भगवान शिव की पूजा की थी। वर्तमान में यहां भगवान शिव का एक अति प्राचीन मंदिर है।
करई, नागपट्टनम
लोक प्रचलित कथा के अनुसार राम ने कोड़ी करई से पुल बनाना शुरू किया था। किसी कारणवश स्थान बदलना पड़ा। वेदारण्यम से सात किलोमीटर दूर समुद्र के किनारे जंगल में राम के चरण चिह्न बनाये गए हैं।
तिल्लईविलायम, तिरुवारुर
यह ऐसा स्थान हैं जहां राम को रौद्र रूप में दिखाया गया है। ऐसा माना जाता है कि राम यहां से वानर सेना के साथ गुजर रहे थे। उस समय उनके मन में रावण के लिए काफी गुस्सा था और इस आक्रोश को यहां दिखाया गया है।
मुत्तुकुड़ा, पोदुकोटई
यहां से भी राम का काफिला गुजरा था और यहां शिवपूजा की थी।
तीरतांड धाणम, रामनाथपुरम
तीरताण्ड धाणम में ऋषि अगस्त्य के आदेश पर राम ने शिव पूजा की थी। इसी मार्ग में राम को अगस्त्य ऋषि मिले थे।
रामनाथपुरम
ऐसा माना जाता है कि लंका की ओर जाते वक्त सूर्य के ताप से थके राम और लक्ष्मण ने यहां स्नान किया और गणेश देव की पूजा की थी। भगवान गणेश ने यहां भावी युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया। इसी के समीप है
देवी पट्टनम
रामनाथ पुरम के समीप है देवी पट्टनम। इस स्थान पर राम ने शनिदेव को शांत करने के लिए नवग्रह की पूजा की थी। कहते हैं कि यहां राम ने विष्णु चक्र की पूजा की थी और उन्हें आशीर्वाद मिला कि वानर सेना को समुद्री लहरें परेशान नहीं करेंगी।
दर्भशयनम त्रिपुल्लाणी, रामनाथपुरम
माना जाता है कि त्रिपुल्लाणी समुद्र तट पर पहुंच कर राम समुद्र से रास्ता लेने के लिए तीन दिन तक तपस्यारत पृथ्वी पर लेटे रहे। इसी जगह राम ने शिवलिंग की स्थापना की थी और इसे आदि रामेश्वर माना जाता है। इसके बाद यहां ही समुद्र ने प्रकट होकर भगवान राम को पुल बनाने का तरीका बताया था।
छेदुकरई, रामनाथपुरम
ऐसा कहा जाता है कि यहां सेतु की आधार शिला रखी गई थी। स्थानीय लोग दावा है कि छेदुकरई से समुद्र में दो किलोमीटर अंदर जाने पर सेतु के अवशेष देखे जा सकते हैं। ये सेतु के स्तम्भ हो सकते हैं। ये सेतु समुद्र में 10-11 फुट गहराई में हैं।
विलुंडी तीर्थ, रामनाथपुरम
यहां राम ने सेना के लिए शुद्ध मीठे जल के लिए बाण मार कर जल स्त्रोत बनाया था। ऐसे में तंगचिमडम से लगभग दस किलोमीटर दूर समुद्र में स्थित इस कुएं से मीठा पानी निकलता है। यह भी कहा जाता है कि बैशाख और आषाढ़ के महीनों में यहां पानी विशेष रूप से मीठा होता है।
एकान्त राम मंदिर, रामनाथपुरम
रामेश्वरम धाम से कुछ दूरी पर जंगल में एकान्त स्थान पर एक मंदिर हैं। ऐसा कहा जाता है कि लंका जाने से पूर्व राम ने युद्ध नीति पर पहले स्वयं और बाद में मंत्रियों के साथ मंत्रणा की थी। इसके साथ ही रामनाथपुरम में ही समुद्र के किनारे एक छोटी पहाड़ी है, जिसे गन्दमादन कहते हैं। यहां खडे़ होकर राम ने समुद्र का दृश्य देखा था। इसे रामझरोखा कहा जाता है।
कोदंडराम मंदिर, रामनाथपुरम
ऐसा विश्वास किया जाता है कि इसी स्थान पर विभीषण राम की शरण में आए थे और यहीं उनका राज्याभिषेक किया था।
जटा तीर्थ, रामनाथपुरम
जटा तीर्थ रामेश्वरम मंदिर से धनुषकोटि के मार्ग में जटातीर्थ है। यहां राम ने अपनी जटाएं धोयी थीं। यहां स्नान करने से संतान की प्राप्ति होती है।
अग्नि तीर्थ रामेश्वरम धाम, रामनाथपुरम
अग्नि तीर्थ में राम ने स्नान कर मुख्य मंदिर के दर्शन किए जाते हैं।
रामनाथ मंदिर रामेश्वरम धाम, रामनाथपुरम
रामनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। राम ने इसकी स्थापना की थी। मंदिर परिसर में बने 22 कुण्डों में सभी के जल का स्वाद भिन्न-भिन्न है।
रामलिंग आलमेल, बीजापुर
राम दक्षिण दिशा में बढ़े। यह स्थान सिंडगी के उत्तर की ओर 20 किलोमीटर पर है और उन्होंने यहां भगवान शिव की पूजा की थी। अतः इसे राम लिंग भी कहा जाता है।
रामेश्वर रामतीर्थ, बेलगांव
रामतीर्थ अथणी तालुका में रामतीर्थ गांव में राम से पूजा करवाने के लिए खुद शिव सपरिवार यहां आए थे। राम के आग्रह पर शिवजी ने शिवलिंग का अलंकरण, नाम रामेश्वर, गर्मजल से जलाभिषेक और केतकी के फूलों से पूजा स्वीकार की। आज भी यहां ये चारों परम्पराएं हैं। इसके पास रामतीर्थ नाम की एक जगह है और वहां भी शिव जी की पूजा करने की बात कही जाती है।
अयोमुखी गुफा
यह स्थान रामदुर्ग से 16 किलोमीटर दूर है। जिसे राक्षसी की गुफा कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि उसने भोग विलास की कामना से लक्ष्मण को पकड़ लिया था। जिसके बाद लक्ष्मण ने उसके नाक, कान काट डाले थे।
शबरी आश्रम, सुरेबान
शबरी आश्रम सुरेबान रामदुर्ग से लगभग 14 किलोमीटर दूर गुन्नगा गांव के समीप सुरेबान नामक एक स्थान है। आश्रम के आस-पास बेरी वन है। यहां शबरी की पूजा वन शंकरी, आदि शक्ति और शाकम्भरी देवी के रूप में की जाती है। एक मान्यता के अनुसार यहां ही राम और शबरी की भेंट हुई थी। इसके बाद उन्होंने आगे की यात्रा कबंध के कहने के अनुसार पूरी की थी।
पम्पासर, हम्पी
हनुमान हल्ली में एक सरोवर है। जिसके किनारे मंदिरों की कतार है। यहां राम माता सीता को खोजने के लिए आए थे और शबरी से मिलने के बाद इसे राम का अगला पड़ाव माना जाता है।
हनुमान मंदिर, हम्पी
कबंध के बताए मार्ग पर चलते हुए राम की भेंट हनुमान से हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जहां राम, हनुमान जी से मिले थे वह यहीं गांव है। यहां हनुमान और राम का मिलन हुआ था। पास ही एक पर्वत पर हनुमान की मां अंजना देवी का मंदिर भी है। एक तरह से यहां से किष्किंधाकांड की शुरुआत मानी जाती है और इसके आगे राम की भेंट सुग्रीव आदि से होती है।
ऋष्यमूक पर्वत, हम्पी
सुग्रीव और राम, लक्ष्मण का मिलन हम्पी में ऋष्यमूक पर्वत पर हुआ था। तब सुग्रीव बाली के भय से यहीं रहते थे। यहां पहाड़ी में एक कंदरा को सुग्रीव गुफा कहा जाता है। इस पर्वत के लिए यह भी कहा जाता है कि यहां पहले सुग्रीव अपने सचिवों सहित रहते थे। ऐसा माना जाता है कि जब रावण सीता को वायु मार्ग से ले जा रहा था, तब माता सीता ने पांच वानरों को यहां बैठे देखकर अपने वस्त्र में कुछ आभूषण लपेट कर यहां डाल दिए थे।
चिन्तामणि, हम्पी
अनागुंडी तुंगभद्रा नदी यहां धनुषाकार घुमाव लेती है। ऐसा माना जाता है कि नदी के एक ओर बाली और सुग्रीव का युद्ध हुआ था और दूसरे किनारे पर वृक्षों की ओट से राम ने बाली को बाण मारा था।
किष्किंधा, हम्पी
यह रामायणकालीन अनागुन्डी गांव ही प्राचीन किष्किंधा है। यहां वाल्मीकि रामायण में वर्णित दृश्य मिलते हैं। यहां राजवंश स्वयं को अंगद का वंशज मानता है।
प्रस्रवण पर्वत
राम ने वर्षा ऋतु के चार माह प्रस्रवण चोटी पर बिताए थे और वहीं से सीता का पता पाकर लंका के लिए प्रस्थान किया था। हम्पी से 4 किलोमीटर दूर माल्यवंत पर्वत की चोटी का नाम प्रस्रवण चोटी है।
स्फटिक शीला
हनुमान ने राम को यहां सीता की खोज की सूचना दी थी। यह वह स्थान माना जाता है जहां वानरों की सभा हुई थी। वर्तमान में यह स्थान राम कचहरी के नाम से प्रसिद्ध है।
करसिद्धेश्वर मंदिर
यह होसदुर्ग से 25 किलोमीटर दूर है। इसे रामगिरि पहाड़ी कहते हैं। राम ने लंका जाते समय भगवान शिव की पूजा की थी। अतः पहाड़ी का नाम रामगिरि और मंदिर का नाम रामेश्वर रखा गया है। इसी के समीप एक हाल रामेश्वर नाम की एक स्थान है। जहां राम के शिव पूजा करने की बात कही जाती है।
बाणेश्वर मंदिर
कन्नड शब्द बाणहोरा का अर्थ है – बाण नहीं उठा सकता। इस संदर्भ में एक स्थानीय कहानी मिलती है कि लक्ष्मण ने राम को धनुष बाण ले कर चलने से मना कर दिया था। यहां भगवान शिव ने स्थानीय प्रभाव बता कर दोनों को शांत किया था। इस वजह से इस जगह का खास महत्व है।
रामेश्वर, रामनाथपुरा
लंका की तरफ जाते हुए राम ने किष्किंधा के बाद कावेरी नदी के साथ-साथ सेना सहित लंबी यात्रा की थी। उस वक्त उन्होंने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी।
कोदण्ड श्रीराम मंदिर
लोक प्रचलित मान्यता है कि कावेरी नदी के किनारे चुन्चा-चुन्ची नाम के राक्षस दम्पति को राम ने उचित शिक्षा देकर सात्विक बनाया था। उनसे ऋषियों की रक्षा की थी।
शिव मंदिर गावी रायन बेटटा
मैसूर जिले में तलकाड के पास कावेरी नदी के किनारे एक पहाड़ का नाम गावी रायन बेट्टा है। ऐसा कहा जाता है कि लंका पर चढ़ाई करते समय राम ने गावी दैत्य का वध किया था। फिर उन्होंने शिव पूजा की थी। यह भी माना जाता है कि यहां राम ने दशरथ जी का श्राद्ध किया था। आज भी लोग यहां पूर्वजों का श्राद्ध करने आते हैं।
लेपाक्षी, आंध्र प्रदेश
लेपाक्षी आंध्र प्रदेश का एक प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल है। महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में यही वह स्थान है जहां पर जटायु ने रावण से सीता को बचाने के लिए युद्ध किया था। युद्ध में घायल होकर जटायु नीचे गिर गया था। अनेक शोधकर्ताओं ने लेपाक्षी स्थान को चिन्हित किया है जहां ये घटना हुई थी।
किष्किंधा, कर्नाटक
किष्किंधा जो आज हम्पी के नाम से जाना जाता है। उस समय इस स्थान पर वानरों ने अपने राज्य की स्थापित थी। यह वह स्थान है जहां सुग्रीव बाली का प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। यही राम और लक्ष्मण हनुमान और सुग्रीव से मिले थे। यहां एक गुफा में सुग्रीव ने सीता के गहने छिपाए थे। चट्टानों पर निशान और धारियां हैं। कहते हैं यह निशान सीता के आभूषणों से बने हैं। हम्पी में विरुपाक्ष मंदिर और विट्ठल मंदिर के अतिरिक्त तुंगभद्रा नदी के तट पर एक गुफा है। संभवतः यह गुफा रामायणकालीन है। जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। आज हम्पी यूनेस्को की साइटों में से एक है।
रामेश्वरम, तमिलनाडु
सभी स्थानों में सबसे प्रसिद्ध स्थल है रामेश्वरम। मान्यताओं के अनुसार यही वह स्थान है, जहां राम की सेना द्वारा भारत और श्रीलंका के बीच पुल का निर्माण किया गया था। यह स्थान सुंदर विवेकानंद मंदिर और शिव मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। ऐसा भी माना जाता है कि सीता ने श्रीलंका से लौटते समय यहां एक शिवलिंग की स्थापना भी की थी।
तलाईमन्नार, श्रीलंका
तलाईमन्नार श्रीलंका में है। कहते हैं यह वही स्थान है, जहां राम ने रावण का वध किया था। राम के आदेश पर रावण के भाई विभीषण लंका का राजा घोषित किया गया था। इसके उपरान्त राम सीता और लक्ष्मण को लेकर अयोध्या के लिए रवाना हो गए थे। वर्तमान में यह स्थान मन्नार द्वीप के उत्तर-पश्चिमी तट पर स्थित है।
सिगिरिया
वर्तमान श्रीलंका में एक स्थान है सिगिरिया। ऐसा माना जाता है कि वहां रावण का महल हुआ करता था। रावण का महल जिस चट्टान पर था। यह अत्यंत दुर्गम स्थल है। ऐसा माना जाता है कि रावण का साम्राज्य मध्य श्रीलंका में बदुल्ला, अनुराधापुरा, केंडी, पोलोन्नुरुवा और नुवारा एलिया तक फैला हुआ था। यह महल भी कुबेर द्वारा निर्मित बताया जाता है। कुबेर रावण के भाई हैं। सिगरिया चट्टान पर एक प्राचीन महल का अवशेष है। यह किलेबंदी, सीढ़ीदार बगीचे, तालाब, नहर, गलियों और फव्वारों से घिरा हुआ है। यह भी कहा जाता है कि यहां कुछ ही दिन माता सीता को रखा था। इसके बाद सीता को दूसरे बगीचे में स्थानांतरित कर दिया था।
नुवासा एलिया
श्रीलंका में इस जगह ही सबसे ज्यादा दिन तक सीता को रखा गया था। यहां अब सीता माता का मंदिर बना हुआ है। इस स्थान को सीता एलिया कहा जाता है। यहीं पर अशोक वाटिका थी। बताया जाता है कि इस जगह से ही हनुमान ने लंका में आग लगाने का काम शुरू किया था। ऐसा माना जाता है कि लगभग एक साल तक सीता को यहां रखा गया था। हनुमान सीता से मिलने यहां आए थे। इसके समीप एक नदी है। इसे सीता नदी कहा जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जब राम ने लंका पर चढ़ाई शुरू की तो सीता जी को यहां से दूसरे स्थान पर भेज दिया गया था।
एल्ला
नउवाबाग एलिया से सीता को एल्ला नामक स्थान पर स्थानांतरित कर दिया था। यहां एक बहुत बड़ी और अनोखी गुफा है। यह गुफा काफी गहरी है। यह गुफा अनेक खंड हैं। इस रावण गुफा में विशेष सुरंगनुमा गुप्त मार्गों की व्यवस्था है। जिसे सुरंग का जाल कहा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि इसका प्रयोग रावण अनेक बार करता था। यह गुफा आज भी है। इसके पास एक नदी है। इस नदी के विषय में ऐसी मान्यता है कि यहां सीता इसी जलधारा में स्नान किया करती थी। यह भी लोक प्रचलित मान्यता है कि रावण यहां ही पर रावणहत्था वाद्ययंत्र बजाया करता था।
कुरुनेगाला
इस स्थान पर रावण के अंतरिक्ष यात्रा के प्रमाण मिलते हैं। ऐसा माना जाता है कि रावण के अनेक हवाई अड्डे थे। रावण अपने काल में काफी हवाई यात्रा करता था। इसके अलावा अनुराधापुर में एक रहस्यमयी चट्टान है, जहां एक खास यंत्र बना हुआ है। इससे जुड़ी अनेक कहानियां हैं कि यह पूरे ब्रह्मांड का मानचित्र है। अनेक विद्वानों का मत है कि यह अंतरिक्ष तक का मानचित्र है।
वानावतुना
यह श्रीलंका की सबसे अलग जगह मानी जाती है। यह एक उभरा हुआ क्षेत्र है। यहां की वनस्पति भी अन्य स्थानों से भिन्न है। यहां एक पहाड़ी है। इसके आसपास की वनस्पति भी अलग प्रकार की है। ऐसा कहा जाता है कि जब हनुमान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी के लिए पूरा पहाड़ ला रहे थे तो उसका एक भाग यहां गिर गया था। इस कारण से यहां की वनस्पति अलग है। विद्वानों और वैज्ञानिकों का मत है कि यहां पृथ्वी के अन्य क्षेत्रों के मुकाबले चुंबकीय शक्ति सर्वाधिक है। यह चुंबकीय शक्ति इतनी अधिक है अगर इसके ऊपर से कोई उपग्रह गुजरे तो वह भी अपना रास्ता भटक जाता है।
दिवरुमपोला
रामायण से जुड़ी अनेक कथाओं में विवरण मिलता है कि राम ने सीता की पवित्रता पर संदेह किया था और माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी। बताया जाता है कि जिस जगह पर अग्नि परीक्षा ली गई थी, वह स्थान दिवरुमपोला था। आज यहां एक मंदिर है। जिस तरह न्यायालय में भगवान की शपथ ली जाती है, वैसी ही यहां आकर लोग वादे की कसम खाते हैं।
लंका विजय उपरांत अयोध्या वापसी
रावण वध किया गया। लंका विजित हुई। कहते हैं कि रावण का वध करने के उपरांत अयोध्या पहुंचने राम को करीब 20 दिन का समय लगा था। रावण के अंतिम संस्कार के उपरांत उसके भाई विभीषण को लंकापति बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। विभीषण का राज्याभिषेक हुआ। इसके बाद किस तरह लंका से अयोध्या वापस आए थे राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान आदि? यह भी रोचक प्रसंग है। वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित है कि राम सभी को लेकर पुष्पक विमान से अयोध्या वापस आए थे।
राम ने विभीषण को संबोधित करते हुए कहा – “राक्षसराज! अब शीघ्र मेरे लिये पुष्पक विमान को यहाँ मँगाओ। जब मेरा यहाँ कार्य समाप्त हो गया, तब यहाँ ठहरना मेरे लिये कैसे ठीक हो सकता है?” राम के ऐसा कहने पर राक्षसराज विभीषण ने बड़ी उतावली के साथ उस सूर्यतुल्य तेजस्वी विमान का आवाहन किया। नवनियुक्त लंकापति विभीषण के आदेश का तुरंत पालन किया गया। जो पुष्पक विमान लाया गया उसका विवरण महर्षि वाल्मीकि ने इस प्रकार दिया है। उस विमान का एक-एक अङ्ग सोने से जड़ा हुआ था। जिससे उसकी विचित्र शोभा होती थी। उसके भीतर वैदूर्य मणि (नीलम) की वेदियाँ थीं। जहाँ-तहाँ गुप्त गृह बने हुए थे और वह सब ओर चाँदी के समान चमकीला था। महर्षि आगे उल्लेख करते हैं कि वह श्वेत-पीत वर्ण वाली पताकाओं तथा ध्वजों से अलंकृत था। उसमें सोने के कमलों से सुसज्जित स्वर्णमयी अट्टालिकाएँ थीं, जो उस विमानकी शोभा बढ़ाती थीं। इसके सौंदर्य को इस तरह से लिखा गया है। सारा विमान छोटी-छोटी घंटियों से युक्त झालरों से व्याप्त था। उसमें मोती और मणियों की खिड़कियाँ लगी थीं। सब ओर घंटे बंधे हुए थे। जिससे मधुर ध्वनि होती थी। वह विश्वकर्मा का बनाया हुआ विमान सुमेरु शिखर के समान ऊँचा तथा मोती और चाँदी से सुसज्जित बड़े-बड़े कमरों से विभूषित था। उसकी फर्श विचित्र स्फटिक मणि से जड़ी हुई थी। उसमें नीलम के बहुमूल्य सिंहासन थे। जिन पर मूल्यवान बिस्तर बिछे हुए थे। उसका मन के समान वेग था और उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह विमान सेवा में उपस्थित हुआ। विभीषण राम को उसके आने की सूचना देकर वहाँ खड़े हो गये।
पर्वत के समान ऊँचे और इच्छानुसार चलने वाले उस पुष्पक विमान को तत्काल उपस्थित देख लक्ष्मण सहित उदारचेता राम को बड़ा विस्मय हुआ।
त्रिन्कोमली
राम सीता को लेकर वापस अयोध्या जा रहे थे तब राम ने लंका में एक स्थान पर रूककर तपस्या की थी। रावण यानि एक महाविद्वान ब्राह्मण की ब्रह्महत्या के पाप का प्रायश्चित करने के उद्देश्य से यहां तपस्या की थी। अनेक विद्वान भारत में अनेक स्थानों को लेकर दावा करते जहां राम ने ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने को तपस्या की थी।
धनुषकोटि
राम इस रास्ते से होकर लंका में गए थे। राम वापस आते समय भी धनुषकोटि होकर ही अयोध्या की ओर वापस गए थे। ऐसा कहा जाता है कि राम जब अयोध्या जा रहे थे तो उन्होंने विभीषण के अनुरोध पर धनुष की नोक से पुल तोड़ दिया था। वह स्थान आज धनुषकोटि के नाम से प्रसिद्ध है। विद्वानों का मानना है कि विभीषण ने ऐसा इसलिए किया था ताकि कोई लंका पर पुनः आक्रमण नहीं कर सके। इसके अतिरिक्त समुद्र ने भी सेतु तोड़ने के लिए कहा था। जिससे कोई समुद्र पार नहीं कर सके।
चक्रतीर्थ अनागुंडी, हम्पी
धनुषकोटि से चलने के बाद राम, माता सीता तुंगभद्रा नदी पर ठहरे थे। यहां यह नदी धनुषाकार घुमाव लेती है। उसे चक्रतीर्थ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सीता के आग्रह पर विमान यहां उतारा था। विश्वास किया था। कालांतर में सुग्रीव ने यहां कोदण्ड राम मंदिर बनवाया था।
यहां से राम अयोध्या पहुंचे थे। अनेक लोक कथाओं के अनुसार राम इलाहाबाद के भारद्वाज आश्रम में महर्षि से मिले थे। यहां महर्षि ने राम को ब्राह्मण हत्या के पाप से मुक्त होने के अनेक उपाय बताए थे। जिसमें एक उपाय था कि राम अनेक स्थानों शिवलिंग बनवाएं।
भादर्शा, अयोध्या
राम विमान से अयोध्या पहुंचे तो सबसे पहले भादर्शा नामक बाजार में पहली बार अयोध्यावासियों ने राम को विमान में देखा। भादर्शा का शाब्दिक अर्थ है – भये दर्शन।
रामकुण्ड पुहपी
यही वह स्थान है जहां राम का पुष्पक विमान उतरा था। कालांतर में इस स्थान का नाम पुष्पकपुरी रखा गया। वर्तमान में यह स्थान पुहपी के नाम से जाना जाता है। इसके समीप नन्दी ग्राम में भरत राम के वापस अयोध्या आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी समय राम ने हनुमान को अपने समाचार देकर भरत से मिलने भेजा था। इस स्थल पर हनुमान व भरत की भावुक भेंट हुई थी।
भरत कुण्ड, नन्दीग्राम
राम और भरत का मिलन स्थल अयोध्या से लगभग दस किलोमीटर दूर है। इसके समीप एक जटा कुंड है। इसके विषय में कहा जाता है कि यहां राम ने पहले भरत और लक्ष्मण की जटाएं साफ करवायीं थी। फिर शोभा यात्रा के साथ मंदिर में प्रवेश किया। यहां एक सुग्रीव कुंड है। जिसमें सुग्रीव ने स्नान किया था।
वहीं एक हनुमान, सीता, राम कुंड हैं, जहां क्रमश: हनुमान, सीता, राम ने स्नान किया था। राम के अयोध्या में पहुंचने के बाद उस रात पूरी अयोध्या में घी के दिए जलाए। इसके साथ ही भगवान राम की वनवास यात्रा समाप्त हुई।
डॉ रामऔतार ने 14 वर्षों के वनवास के दौरान राम द्वारा देखे गए स्थानों पर शोध किया है। वे अयोध्या से शुरू होकर सीधे रामेश्वरम तक गए। उन्हें 189 से अधिक स्थान एवं कालांतर में पहचाने गए 60 स्थान चिन्हित किए गए। जो रामायण में दिए गए विवरण से भी मेल खाते हैं। यह विवरण उनकी पुस्तक ‘इन द फूटस्टेप्स ऑफ श्रीराम’ में संकलित है।
