महर्षि विश्वामित्र आश्रम की सुरक्षार्थ महाराज दशरथ से राम को लेने अयोध्या आए। उस समय जो वाद-विवाद हुआ उसकी व्याख्या यहां मुझे अनुचित लगती है क्योंकि वह सर्वविदित है। अनावश्यक विस्तार से बचने हेतु हम सीधे अयोध्या से महर्षि विश्वामित्र आश्रम मार्ग का अध्ययन करेंगे।
भैरव मंदिर, आजमगढ़
अपने गुरु महर्षि विश्वामित्र के साथ युवा राम और लक्ष्मण अयोध्या में अपने महल से निकलने के बाद वर्तमान आजमगढ़ जिला के उपनगर महाराजगंज में सरयू नदी तट पर पहुंचे। कालांतर में उस स्थान के समीप स्थित भैरव मंदिर की स्थापना की गई। विश्राम के बाद सभी यहां से आगे बढ़े थे।
सलोना ताल, आजमगढ़
वर्तमान आजमगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित ताल सलोना पहुंचे थे श्रीराम लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र आजमगढ़ के सरयू नदी तट से। स्थानीय लोग सलोना तालाब को सरयू का पेटा कहते हैं। इस स्थान पर राम वाटिका है। यहां श्रीराम व शिव जी के प्राचीन मंदिर हैं।
बारदुअरिया मंदिर, मऊ
आजमगढ़ से महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मण सरयू के किनारे मऊ होते हुए आगे बढ़े। यहां पुरानी सरयू तथा टोंस नदी का संगम है। यहां एक मंदिर भी है। लोक मान्यता के अनुसार महर्षि विश्वामित्र राम लक्ष्मण यहां आये थे। मऊ में राम ने सरयू नदी में जहां स्नान किया था। आज उसे आज रामघाट कहते हैं।
लखनेश्वर डीह, बलिया
ऐसा माना जाता है कि इस स्थान का नाम लक्ष्मण के नाम पर पड़ा। यह स्थान बलिया शहर में है। ऐसी मान्यता है कि सरयू के किनारे महर्षि विश्वामित्र के साथ जाते समय लक्ष्मण ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। आज इस जगह को लखनेश्वर डीह तीर्थ के रुप में जाना जाता है।
राम घाट, नगहर
राम महर्षि विश्वामित्र और लक्ष्मण के साथ अपनी यात्रा में जारी रखते हुए सरयू के साथ-साथ ही आगे बढ़ते गए। लखनेश्वर डीह के बाद वह कुछ ही दूरी पर नगहर पहुंचे। ऐसा माना जाता है कि यहां रात में तीनों ने विश्राम भी किया था। नदियों का मार्ग पहले से कुछ स्थानों में बदलाव संभव है।
कामेश्वरनाथ, बलिया
बलिया के कामेश्वरनाथ धाम होते हुए आगे बढ़े। लोक प्रचलित मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने कामदेव को यहां भस्म किया था और तपस्या की थी। राम शिव के भक्त थे। महर्षि विश्वामित्र दोनों भाईयों को अपने आश्रम ले जाते समय यहां विश्राम कर आगे बढ़ गए थे।
भरोली, बलिया
यह उत्तर प्रदेश के बलिया जिला में है। रामायण के अनुसार विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को भोर होने से पूर्व ही जगाया था ताकि आगे की यात्रा पर शीघ्र निकला जा सके। यही कारण है कि स्थानीय लोगों में यह मान्यता प्रचलित हो गई कि भोर में राम के उठने को लेकर इस गांव का नाम भरोली है।
परेव, पटना
भरोली से प्रस्थान करने के बाद राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र के साथ पटना के परेव पहुंचे। माना जाता है कि राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र ने यहां पड़ाव डाला था। अभी यहां मोहनेश्वर महादेव का मंदिर है। वर्तमान में यह बिहार राज्य की राजधानी पटना में है।
त्रिगना, पटना
परेव से थोड़ा आगे बढ़ने के बाद महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर पटना के त्रिगना घाट पहुंचे। स्थानीय लोगों के अनुसार त्रिगना के विषय में कहा जाता है कि राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र ने त्रिगना घाट से महानद सोनभद्र को पार किया था। यह स्थान कोइलवर पुल से लगभग 8 किलोमीटर दूर पड़ता है।
रामचौरा मंदिर, वैशाली
रामचौरा मंदिर बिहार के वैशाली में हाजीपुर नगर में है। ऐसा माना जाता है कि यहां राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र ने गंगा पार कर एक रात्रि विशाला नगरी में विश्राम किया था। आज यह स्थान रामचौरा के नाम से प्रसिद्ध है।
गौतम आश्रम, दरभंगा
वैशाली के बाद तीनों दरभंगा के अहियारी में पहुंचे। यह स्थान अब अहियारी के नाम से प्रसिद्ध है।
विश्वामित्र आश्रम, मधुबनी
मधुबनी के बिशौल में एक विश्वामित्र आश्रम हुआ करता था। महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को इसी आश्रम की सुरक्षा के लिए अयोध्या से लाए थे। वाल्मीकि रामायण के अनुसार महर्षि विश्वामित्र, राम और लक्ष्मण ने जनक के उपवन में डेरा डाला था।
महर्षि विश्वामित्र के निर्णय को सही सिद्ध करते हुए राम और लक्ष्मण ने अपने शौर्य, पराक्रम और वीरता से आश्रम को भयमुक्त किया। राक्षसों और आतंकवादी विचारधारा वाले लोगों से आश्रम को मुक्त देख महर्षि विश्वामित्र अत्यंत प्रसन्न हुए। राम और लक्ष्मण अपना कार्य संपन्न कर अयोध्या वापस लौटने की तैयारी कर रहे थे कि महर्षि विश्वामित्र ने दोनों को बताया कि राजा जनक ने अपनी पुत्री का स्वयंवर सुनिश्चित किया है। महर्षि दोनों भाईयों को लेकर जनकपुर को प्रस्थान कर गए।
विवाह संदर्भ यात्रा
महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर राजा जनक की राजधानी जनकपुर निम्नलिखित मार्ग से होकर गये थे। बिशौल स्थित अपने आश्रम से निकल कर महर्षि विश्वामित्र सबसे पहले फुलहर गांव पहुंचे।
फुलहर गांव
बिहार के मधुबनी जिले के फुलहर गांव में एक गिरिजा मंदिर है। स्थानीय मान्यता है कि राम और लक्ष्मण विश्वामित्र की पूजा के लिए पुष्प लेने तड़ाग नामक बाग गये थे। (मानस 1/227/1 से 4 तक)
जनकपुर, नेपाल
जनकपुर। राजा जनक की राजधानी। यहां से कुछ दूरी पर राजा जनक को खेत में हल चलाते समय सीता बांस की एक टोकरी में मिली थीं। लोक मान्यताओं के अनुसार जनकपुर और सीता से जुड़ी अनेक कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि राम और जानकी का परिणय धनुष भंग के पश्चात जनकपुर में हुआ था। यहां जानकी मंदिर के पास एक विशाल मैदान है। माना जाता है कि यहां ही पिनाक धनुष तोड़कर राम ने सीता से विवाह की शर्त पूर्ण की थी। रामचरित मानस में इसे रंगभूमि कहा गया है। ऐसा कहा जाता है कि जनकपुर धनुषा मंदिर में परशुराम और राम का मिलन हुआ था।
मणिमंडप, जनकपुर
जनकपुर में मणिमंडप नामक एक स्थान है। यहां राम सहित चारों भाइयों का विवाह हुआ। जिस स्थान पर जनकपुर में मणियों से सजी हुई वेदी और यज्ञ मंडप है। अब केवल नाम ही सीमित है। आज जनकपुर में अनेक ऐसे स्थान हैं जो सीता विवाह से जुड़े हैं। जब भी आस-पास के इलाके में विवाह का आयोजन होता है तो स्थानीय लोग इन स्थान से सामान खरीदने जाते हैं। इसके अलावा एक स्थान और है, जिसका नाम है रत्न सागर। जहां विवाह का दहेज रखा गया था और इसमें काफी रत्न या धन था। इसके अतिरिक्त एक स्थान-विशेष है जहां शादी के बाद चारों दूल्हा और दुल्हान जल-क्रीडा के लिए आए थे। आज इस जगह को विहार कुंड कहा जाता है।
सीता कुंड वेदीवन, पूर्वी चंपारण
विवाह उपरांत राम की बारात वापस लौट रही थी, तो मोतिहारी से कुछ किलोमीटर पर राम की बारात ने यहां रात्रि विश्राम किया था। मोतिहारी के प्राचीन कुण्ड में सीता का कंगन खुला था। इस कुण्ड में पानी नीचे से ही आता है तथा कभी सूखता नहीं। स्थानीय मान्यता है कि यहां बारातियों ने स्नान किया था। वहीं सीता-राम और गिरिजा नाथ जी का मंदिर है। जहां बारात ने शिव पूजा की थी।
डेरवां, गोरखपुर
जनकपुर से अयोध्या वापसी के समय राम की बारात का तीसरा विश्राम स्थल राम जानकी मार्ग पर स्थित डेरवा गांव है। राम की बारात का डेरा डलने के बाद इसका नाम डेरवा रखा गया।
दोहरी घाट, मऊ
ऐसा कहा जाता है कि सरयू नदी तट पर राम और परशुराम की भेंट हुई थी। यह स्थल दोहरी घाट नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि परशुराम से भेंट के बाद बारात अयोध्या पहुंची थी।
चारों पुत्र बधुओं का पारंपरिक रूप से हर्षोल्लास के साथ स्वागत एवं गृह-प्रवेश हुआ। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न अपनी-अपनी पत्नियों के साथ नगर भ्रमण को निकले तो अयोध्यावासियों ने पुष्प वर्षा कर सभी का अभिनंदन किया। अभिवादन किया। स्वागत किया।
