googlenews
परसा का फूल-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं मध्यप्रदेश: Lok Kathayen
Parsa ka Phool

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Lok Kathayen: बहुत पुराने समय की बात है। जुगनीजुड़ा नाम का एक गाँव था। वहाँ पेंगुस, भतरा और मुरिया जनजाति के लोग हिल-मिलकर रहते थे। उनमें रोटी-बेटी का संबंध भी होता था। गाँव में भतरा जाति का चौतू नाम का माँझी था जो नदी से मछली पकड़कर खाता-बेचता था। चौतू का एक बेटा और एक बेटी थी। उसने अपनी बेटी की शादी दूसरे गाँव में कर दी और बेटे की शादी कर बहू ले आया।

बहु के आने से घर में रौनक हो गई। दिन खुशी से बीतने लगे। कहते हैं सब दिन होत न एक सामान। बेटे की शादी के कुछ दिन बाद चौतू बीमार होकर चल बसा। उसका बेटा पिता की मौत का गम न सह सका। माँ बचपन में ही नहीं रही थी। अब पिता भी छोड़ गया। बेटा रो-रोकर उदास रहने लगा, उसका शरीर दुर्बल और आँखें कमजोर हो गई। उसकी बहू ने कुछ दिन इंतजार किया कि वह पहले की तरह खुश रहने लगे।

उनके घर में एक मुरिया युवक जो बेटे का दोस्त था, कभी-कभी आता था। धीरे-धीरे उसका आना बढ़ने लगा और वह बेटे के बाहर रहने पर भी आने लगा। माँझी की बहू उस मुरिया युवक के प्रेम जाल में फंस गई। पड़ोसियों को शक हुआ तो बात फैलने लगी। कहते हैं कि इश्क और मश्क छिपाए नहीं छिपते। बात परे गाँव में फैल गई तो किसी ने चौत के बेटे को बता दिया। बेटा बहुत गुस्सा और दुखी हुआ। गुस्सा इसलिए की जिस पर भरोसा कर घरवाली बनाया उसी ने धोखा दिया और दुःख इसलिए की दोस्त ने दगा की।

चैतू के बेटे ने बदला लेने और दोनों को रंगे हाथों पकड़कर सबक सिखाने के लिए एक योजना बनाई। एक दिन उसने अपनी घरवाली से कहा कि वह कुछ दिनों के लिए अपनी बहन के पास जा रहा है। घरवाली मन ही मन बहुत खुश हुई कि अब बिना रोक-टोक प्रेमी के साथ रंगरेली कर सकेगी लेकिन ऊपर से जाहिर नहीं किया। उसने साथ चलने की बात ऊपरी मन से कही। बेटे ने उसे मन कर दिया और चल पड़ा। कुछ दूर जाकर वह अपनी कुल्हाड़ी जिसे वह हमेशा साथ रखता, के साथ जंगल में छिप गया। धीरे-धीरे दिन बीता और शाम हो गई।

बहू ने अपने प्रेमी को संदेश भेज दिया था। अँधेरा हो गया तो प्रेमी छिपते-छिपाते आ पहुँचा। दोनों प्रेम लीला में डूब गए। इधर उसका पति जंगल से निकला और दबे पाँव अपने घर पहुंचा। उसने बिना आहट किए झोपड़ी में प्रवेश किया तो अपनी पत्नी और मित्र को प्रेम लीला करते पाया। अब तो उसने आव देखा न ताव, कुल्हाड़ी उठाकर पहले दगाबाज दोस्त की गर्दन काट दी। पत्नी ने यह देखा तो उसे काटो तो खून नहीं। उसने तुरंत पति के पैर पकड़े और रोने-गिड़गिड़ाने लगी कि उसका कोई कसूर नहीं है, दोस्त अचानक आया था और जबरदस्ती कर रहा था। पति असलियत जानता था, उसने एक न सुनी और पत्नी का गला काटकर उसे भी दगाबाजी की सजा दे दी।

बदला पूरा हो जाने पर पति ने दोनों की लाशों को एक के बाद एक उठाकर जंगल में गड्ढे में फेंक दी और घर लौट आया। दोनों प्रेमियों का खून मिलकर धरती में समाता रहा। मौसम बदला बरसात हुई। पति ने दूसरी शादी कर ली। उसकी नई पत्नी जंगल गई तो लौटने पर उसके टोकरी में लाल-काले रंग के फूल थे। युवक ने पहली बार वे फूल देखे थे जो बहुत खूबसूरत लेकिन बिना खुशबू के थे। उसके कहने पर पत्नी उसे लेकर जंगल गई वह जगह दिखाने जहाँ से उसने ये फूल तोड़े थे। युवक ने देखा जिस जगह उसने अपनी पहली पत्नी और उसके प्रेमी की लाशें फेंकी थीं, वहाँ एक वृक्ष ऊग आया था जिसमें ऐसे फूल खिले और जमीन पर बिखरे थे। उसने इस फूल को ‘परसा’ नाम दिया। घर आकर उसने गुस्सा और नफरत शांत करने के लिए फूलों को पानी में उबालकर उनका रंग सब पर बिखेर दिया।

टीप – परसा का फूल अब पलाश, टेसू, किंशुक, छोल, ढाक, केसु आदि नामों से जाना जाता है। यह लाल, पीले और सफेद रंगों में मिलता है। लाल रंग क्रोध, पीला दुःख और सफेद शांति के प्रतीक हैं। इसका वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा’ है। डाक-तार विभाग ने इस फूल पर एक डाक टिकिट भी जारी किया है। इसके पत्ते दौने, पत्तल और बीड़ी बनाने के काम आते हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

Leave a comment