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grehlakshmi ki kahaniyan - पागल की हवेली

Grehlakshmi kahaaniyaa ‘Paagal ki Haveli’

अपनी जाति, बिरादरी का, डॉक्टर, जमीदार  खानदान का, ऐसा वर तो वे दिया लेकर भी ढूंढ़ते तो न मिलता क्योंकि चिराग तले अंधेरा होता है और  मनोज तो कानपुर में, उसके पड़ोस में अपने चार अन्य मेडिकल सहपाठी के साथ, किराए पर घर लेकर रहता था।  गोल मुख की, काली कजरारी आंखों वाली समिधा जब भी दो चोटी बांध कर बालकनी में जाती, मनोज उसे अपलक देखता रहता। 

समिधा को अपने स्ट्रेट बाल को दो चोटियो में बांधना पसंद नहीं था पर मनोज की जिद से वह कभी-कभी दो चोटी बांध लेती। 

मनोज के मुख से, लाखोरी ईंट से बनी विशाल हवेली, पांच छह आंगन, दोमंजिले को जाती छह, सात जगह से बनी सीढ़ियां,  

बड़ी-बड़ी खिड़कियों से आरपार जाती हवा, बड़े बरामदे और लकड़ी का विशाल प्रवेश द्वार की नक्काशी का विवरण सुन वह स्वप्न लोक में विचरण करती।  मनोज ने उसे बताया था कि जल्द ही इस हवेली को तुड़वा कर फ्लैट्स बनाए जायेंगे क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी, इसके वारिसों की संख्या बढ़ गई है। नवजवान पीढ़ी विदेशों में बस गई है।

हवेली को मरम्मत की जरूरत है, जिसमें कोई भी शामिल नहीं होना चाहता, मगर हिस्सा तो सभी को चाहिए। यह हवेली उसके परदादा को, जायदाद के एक हिस्से के रूप में मिली थी। उनके तीन बेटे थे, जिसमें से दो बेटे विदेश पढ़ने गए और अपनी पसंद से वहीं शादी कर बस गए। 

मनोज के दादा जी के भी दो बेटे थे, जिसमें से एक अपना मानसिक संतुलन खो बैठे थे और फिर उनकी हरकतों की  

वजह से, हवेली, पागल की हवेली, के नाम से मशहूर हो गई। बड़ा बेटा महेंद्र सिंह तो 

लाड-प्यार में इतना बिगड़े कि किसी भी व्यवसाय में उनका मन न लगा। बस बैठे-बैठे पुस्तैनी जेवर, जमीन बेच कर खाते रहे।  मनोज की मां माधुरी, उसे आठ बरस की उम्र में सड़क दुर्घटना ग्रस्त हो उसे अकेला छोड़ गई थी। उसे रमा काकी ने पाला है, जो आज भी बाहरी कोठरी में रहती हैं, वे नि:संतान हैं। मनोज के पिताजी, उसके अहसानमंद हैं, हमेशा कहते हैं कि रमा न होती तो आज मनोज इस लायक न बनता।

मनोज अपनी मां के गुजरने के बाद से ही, लखनऊ में बाल विद्या मन्दिर के होस्टल में चला गया। वह केवल छुट्टियों में ही घर आता।  अगर वह जिद करता तो सप्ताहांत में घर आ सकता था। लखनऊ में ही स्कूल था, मगर उसे घर, रास नहीं आया। उसे हर जगह मां ही दिखती। महेंद्र सिंह ने परेशान होकर, अपने बेडरूम में ताला डाल दिया और घर के निचले हिस्से के एकांत कमरे में रहने लगे। जब मनोज को मां की चीजें छूने को न मिलती तो बैचेन हो कर वह अक्सर हवेली की छत पर डोलता रहता। रघु काका उसे उस विशाल छत पर घुमाते रहते। काकी उसका मनपसंद खाना बना कर प्यार से खिलाती फिर भी उसे मां का आंचल याद आ जाता।

कानपुर मेडिकल कालेज में एम.बी.बी.एस. करने के दौरान मनोज को अपनी पड़ोसन समिधा से प्यार हो गया।  मां के जाने के बाद बरसों तक जिस कमी को वह महसूस करता रहा, समिधा से मिलकर मानों वह पूरी हो गई। अक्सर वह समिधा को साड़ी पहन कर, दो चोटी की पिक, भेजने को कहता तो वह चिढ़ जाती और नेकर, टॉप की पिक भेज देती फिर मनोज रोती हुई शक्ल बना कर भेजता तो समिधा द्रवित हो, उसकी पसंद की लाल साड़ी की पिक भेज देती। मनोज नाचने की स्माइली भेज देता। कभी समिधा उसे छेड़-छेड़ कर कहती, ‘पुराना फैशन, पुरानी चीज़ें बहुत पसंद हैं, पूर्वजन्म में कबाड़ी थे क्या?’

और मुंह फट मनोज कहता, ‘हां तभी तो तुम्हें पसन्द किया है।’

शादी फाइव स्टार होटल में धूमधाम से बीस मार्च को हुई। जब फूलों से सजी, पुस्तैनी विंटेज कार में विदा हुई तो समिधा, अपने को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझ रही थी।  हवेली को बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। मुख्य सड़क  से जुड़ी हवेली का चबूतरा सड़क से पन्द्रह फीट की ऊंचाई से शुरू होता था। लम्बे-चौड़े चबूतरे के किनारों से दोनों तरफ से नीचे उतरने को विशाल सीढ़ियां बनी हुई हैं। चबूतरे के निचले भाग में पूर्व में बगीचा रहा होगा, जो वर्तमान में सड़क में परिवर्तित हो चुका है। बगीचा अब हवेली के पिछले हिस्से में ही बचा है। जहां एक छोटा संगमरमर पत्थर का फौवारा भी मौजूद है। बरामदे से जुड़े लकड़ी के विशाल प्रवेशद्वार के दोनों तरफ के हिस्से, हवेली के कामगारों के लिए निर्धारित हैं। उसके बाद विशाल आंगन की दाहिनी ओर से शयन कक्ष, बैठक, पुस्तकालय बने हुए थे। इन्हीं में से एक कक्ष को आधुनिक रसोई घर में परिवर्तित किया गया था। समिधा का बेडरूम लंबे से गलियारे के अंतिम सिरे में आधुनिक सुख-सुविधाओं से सुसज्जित था। अटैच बाथरूम भी बाथ टब की सुविधा के साथ मौजूद था। वह समझ गई कि हवेली में पुनर्निर्माण का जो कार्य चल रहा है, उसमें इस हिस्से को सबसे पहले तैयार किया गया है।

मनोज ने विदेशों में कोरोना संक्रमण फैलने की वजह से अपना हनीमून कशमीर की  

वादियों में मनाने की संपूर्ण बुकिंग कर रखी थी, जो लॉक डाउन के चलते रद्द हो गई।  अब वह सोच रहा था कि समिधा जब कल सुबह उठकर पूरी हवेली का मुआयना करेगी तो इसके बाकी हिस्से की खस्ता हालत देखकर न जाने क्या प्रतिक्रिया देगी। 

उसने अपने कमरे में जाने से पहले अपने पिताजी का हाल चाल लेना उचित समझा। महेंद्र प्रताप हृदय रोग, मधुमेह व उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं।  इधर शादी की तैयारियों की व्यस्तता में उनका स्वास्थ्य गड़बड़ा गया है। मेहमान सभी होटल से ही विदा कर दिए गए थे। हवेली में समिधा को मिलाकर, पांच प्राणी ही रह गए।

‘कैसी तबियत है अब आपकी?’ मनोज ने जब कमरे में प्रवेश किया तो वे अपनी तिजोरी खोल कर खड़े थे। 

‘अच्छा हुआ तुम आ गए, तुम्हारी मां ने, ये कड़े अपनी बहू को देने के लिए मुझे सौंपे थे।’ यह कहकर उन्होंने कड़े मनोज के हाथों में रख दिए। 

‘पिताजी, मैं जानता हूं कि हमारे पास बहुत धन नहीं बचा है फिर भी न जाने क्यों, मेरे मन में यह विचार कौंधता रहता है कि बैंक से लोन लेकर, 

इसका पुनरुद्धार करूं और अपना क्लीनिक भी एक हिस्से में खोल लूं।’

‘मुझसे ज्यादा घरेलू विषयों पर, तुम्हें बहू की राय लेनी चाहिए, इस समय बहू के, पास जाओ।  कल सुबह उसे कुछ मीठा बनाने को कहना, यह भी रस्म पूरी हो जाएगी।’

मनोज ने जब, अपनी मां के कंगन, समिधा के हाथ में रखे तो वह कंगन की खूबसूरत नक्काशी की कायल हो गई। 

तीसरे दिन से ही लॉक डाउन शुरू हो गया। मनोज और समिधा को एक दूसरे को समझने के लिए पर्याप्त समय मिल गया। 

एक सप्ताह कब बीत गया, कुछ पता ही न चला। रमा काकी और रघु काका ने पूरे घर की व्यवस्था इस प्रकार चलाई कि उन्हें किसी वस्तु का अभाव ही न लगा। आज मनोज, रघू काका के साथ घरेलू सामान लेने को गया तो समिधा ने रमा काकी को साथ ले कर, हवेली का भ्रमण करने का मन बनाया।  

‘यह देखो यह मेरे कमरे के बगल से एक सीढ़ी, सीधी नीचे को जाती है तो दूसरी पुरानी रसोई और भंडार घर के पास जा कर मिलती है।  अब तो नीचे के भाग को सुधार कर वहीं नई रसोई और आपका शयन कक्ष बना दिया गया वर्ना…। चलो बहू, निचली मंजिल के आधे कमरे तो बन्द पड़े हैं उन्हें खोल कर क्या देखना, तुम्हें तुम्हारी 

सास का कमरा खोलकर दिखाते हैं। महीने में एक दिन खोल कर, हम ही साफ-सफाई कर देते हैं। 

‘वर्ना क्या काकी, तुमने बात पूरी नहीं की?’ 

‘पहले अपने डॉ. मुन्ना ने नीचे के हिस्से को सुधार कर क्लीनिक बनाने की तैयारी कर ली थी, मगर उनके बाकी विदेश में बसे भाई लोग, इसके लिए तैयार नहीं हुए। वे हवेली बेचकर अपना हिस्सा चाह रहे थे। मुन्ना ने दु:खी होकर उसे रसोई और आपके लिए नया स्नान गृह और शयन कक्ष तैयार करवा दिया।  चलो बहू, तुम अपनी सास का कमरा देखो।’ यह कहते हुए रमा ने शयन कक्ष के दरवाजे पर लगा 

ताला खोल दिया।

‘हां यह ठीक रहेगा।’ समिधा का मन अपनी सास के कमरे की 

साज-सज्जा देखने को उत्सुक हो उठा।

‘महाराजा पलंग, मसहरी, साटन सिल्क की बिछी चादर, बड़ी खिड़कियों पर सजे रेशमी पर्दे, पीतल का नक्काशीदार फूलदान, दीवारों में सजे फोटो फ्रेम,   खूबसूरत झाड़फानूस। समिधा, मनोज के बचपन का एल्बम निकाल कर देखने लगी। उसे व्यस्त देख रमा काकी साफ-सफाई में जुट गई। एल्बम के ढेर लगे थे, एक फोटो में साल भर का मनोज अपनी मां की गोद में बैठकर, उनकी दो चोटियों को खीचता दिखा। समिधा की आंख भर आई। वह समझ गई कि मनोज के अवचेतन में यह फोटो बसी है तभी वह उसे दो चोटी करने की जिद करता है। एल्बम सम्भाल कर रखने लगी तो अचानक उसका ढेर भरभरा कर गिर गया। अलमारी के खाली हिस्से में, लाल रंग की पुरानी डायरी दिखाई देने लगी। समिधा ने डायरी के पन्ने पलटे तो उसे समझ में आ गया कि यह डायरी माधुरी यानी उसकी सास की है। उसने डायरी उठा ली और एल्बम को व्यवस्थित तरीके से रख दिया।

रमा काकी ने उसे मकान के हर हिस्से के विषय में विस्तार से बताया और ऊपर छत से 

नीचे की ओर उतरने के कई रास्तों व सीढ़ियों को भी दिखाया। अंधेरा हो चला था, नीचे उतरते समय तो उसे कई बार लगा वऌह किसी हवेली में नहीं बल्कि लखनऊ के बड़े इमामबाड़े की भूल भुलैया में घूम रही है।  हवेली की जर्जर हालत के सम्मुख प्रवेश द्वार के हिस्से, टाट में रेशमी पैबंद की तरह दिखने लगे थे। समिधा का हवेली से मोहभंग हो उठा। वह सोचने लगी कि इसकी मरम्मत करने की बजाय वह मनोज को इसे बेच कर, सभी वारिसों को हिस्सा देने को राज़ी कर लेगी। इसी प्रकार के विचारों से उलझती जब वह अपने कक्ष में पहुंची तो मनोज उसे विचारमग्न मिला।

grehlakshmi ki kahaniyan - पागल की हवेली
पागल की हवेली - गृहलक्ष्मी कहानियां 3

‘किस सोच-विचार में डूबे हो?’ कहते हुए उसने अपने हाथ में पकड़ी डायरी चुपके से अपनी अलमारी के हवाले कर दी।’ 

‘कोविड-19 के मरीजों से किस प्रकार से एहतियात बरतनी है और पीपीई को धारण करने और  

निस्तारण करने की प्रक्रिया क्या है, इसी की ट्रेनिंग दी जा रही है। मुझे के.जी.एम.सी. से कॉल आया है छुट्टियां निरस्त हो गई हैं।’ 

‘डॉक्टर का धर्म तो मरीज सेवा ही है। तुम अपना धर्म निभाओ। मैं तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगी।’

‘हां यह सही कहा, मगर तुम्हें भी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाना चाहिए। मेरी ड्यूटी जब कोविड वार्ड में लगेगी तो लगातार पन्द्रह दिन की होगी। पीपीई किट पहन कर, हर चार घंटे के बाद ही मुझे कुछ खाने पीने और वाश रूम जाने का एक घंटा मिलेगा।  एक घंटे के बाद अगले चार घंटों के लिए फिर से नए पीपीई किट में कैद हो जाऊंगा। आठ घंटे की ड्यूटी के बाद, दूसरे डॉक्टर्स की ड्यूटी लगेगी। ज्यादा जटिल स्थिति हो जाएगी तो आठ घंटे भी लगातार पीपीई किट में कैद रहना पड़ 

सकता है। मुझे इस दौरान घर आने को नहीं मिलेगा। पन्द्रह दिन के बाद मुझे पन्द्रह दिन के लिए गेस्ट हाउस या किसी होटल में एकांत वास के लिए रखा जाएगा।  उसके बाद ही एक ह$फ्ते के लिए घर आने को मिलेगा। बोलो, तैयार हो?’ मनोज ने उसकी खिचाई की।

‘मैं तो यही मनाऊंगी कि यहां कोई इस महामारी से पीड़ित न निकले जब ज्यादा मरीज ही नहीं होंगे तो फिर तुम्हारी ड्यूटी भी न लगेगी।’ समिधा ने अपनी आवाज़ की कपकपाहट को छुपाते हुए कहा। 

‘तो चलो हम, आज की रात को यादगार बनाते हैं। मुझे वह गाना याद आ रहा है- दो पल… कल हो न हो।’  

‘शुभ-शुभ बोलो, मैंने हनीमून के लिए जो ड्रेस ली थी। तुम्हें रैंप वॉक कर दिखाती हूं।’ 

‘तब तो मैं रूम को मोमबत्ती और फूलों से डेकोरेट कर देता हूं। आज हम कैंडल लाइट डिनर करेंगे रोमांटिक संगीत के साथ।’ कहते हुए मनोज कमरे से बाहर चला गया। 

समिधा डिनर के लिए रमा काकी का हाथ बंटाने लगी। जब कमरे में लौटी तो गुलाब और गेंदे से की गई सजावट को देखकर खिल उठी।

‘पूरा बगीचा ही उखाड़ दिया क्या?’

‘तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं मगर इस लॉक डाउन में मोमबत्ती न ला सका। अब जो घर में पड़ी हुई थी, छोटी- बड़ी मोमबत्तियां, उन्हीं से काम चलाना पड़ेगा, माय डियर।’ 

‘मैंने भी ससुर जी को भोजन करा दिया और काकी से भी रसोई समेटने को कह दिया है।  ये रहा हमारा डिनर।’ समिधा ने साइड टेबल पर कैसरोल और प्लेट्स सजाते हुए कहा।

रात के बारह बज गए मगर दोनों एक दूसरे की बाहों में थिरकते रहे। 

सुबह आठ बजे दरवाजे से रमा काकी की आवाज सुन समिधा की नींद टूटी। समिधा ने एक नजर ड्रेसिंग टेबल पर डाली।  अपने बिखरे बालों का जल्दबाजी में जूड़ा बना कर, जल्दी से दरवाजा खोला।

‘आज बड़े साहब की तबियत ठीक नहीं लग रही है। मुन्ना को बुला रहे हैं।’ रमा, मनोज को अभी भी मुन्ना ही पुकारती है।  

मनोज उठकर अपने पिताजी को देखने चला गया। समिधा को दलिया बनाने के लिए बता दिया।

‘हाई ब्लड प्रेशर हो गया है, शाम तक इस दवा से फर्क नहीं पड़ा तो चेंज कर दूंगा, मुझे अब कॉलेज निकलना है।  शाम को फिर देखता हूं अगर एडमिट करने की जरूरत होगी तो फिर वही करूंगा, वरना हॉस्पिटल में कोविड संक्रमण का खतरा अधिक है।’ मनोज की बात सुनकर समिधा ने कहा। यह तो अच्छा है कि तुम एम.डी. लखनऊ से कर रहे हो वर्ना तुम्हें अभी कानपुर ज्वाइन करना होता फिर पिताजी का क्या होता?’

शाम को मनोज एक घंटे के लिए ही घर आया और अपनी जरूरत का सामान एक बैग में  

पैक कर लिया। महेंद्र प्रताप की स्थिति कुछ सुधर गई थी। मनोज ने राहत की सांस ली। 

‘समिधा मेरी ड्यूटी, आज शाम आठ बजे से, कोविड वार्ड में लग गई है। अब महीने भर तुमसे संपर्क बस फोन से रहेगा, वह भी जब मुझे फुर्सत होगी। कोई भी परेशानी हो तो डॉ. विनय को फोन करना, वह पिताजी को देख लेंगे।’

समिधा जानती थी कि विनय, मनोज का बचपन का प्रिय साथी और पड़ोसी है। उसने इसी इलाके में अपने निवास स्थल में ही क्लीनिक खोला हुआ है।  उसी को देखकर मनोज भी अपनी हवेली के एक हिस्से को हॉस्पिटल का रूप देना चाहता है। मगर अकेले मनोज के चाहने से क्या होगा? विदेशों में बैठे उसके चचेरे भाइयों की भी सहमति चाहिए।

मनोज को मेडिकल कॉलेज गए, दस दिन गुज़र गए। ससुर जी की तबियत भी थोड़ी सुधरने लगी थी।  वे अपनी नियमित दिनचर्या में वापस लौट गए तो समिधा ने राहत की सांस ली।

इस दौरान समिधा को व्हाट्स एप देखने की भी फुर्सत नहीं मिली थी। उसने आज फुर्सत पाकर मोबाइल थामा।  सिंह परिवार के ग्रुप में उसके लिए ढेरों शुभकामनाएं थीं। उसने जैसे ही रिप्लाई किया, सभी मनोज के हाल-चाल पूछने लगे।

समिधा फोन रखकर सोचने लगी, इनमें से कोई भी उसकी शादी में विदेश से नहीं आया, सभी का दिसंबर में आने का प्रोग्राम था।  मनोज को तब तक हवेली का ग्राहक ढूंढ़ कर रखने के निर्देश दिए गए थे। आखिरी बार सब साथ में नया साल 2021 का स्वागत कर विक्रय पेपर पर हस्ताक्षर करने वाले थे। अभी सबने इस विषय पर मौन साध लिया है।

समिधा का मन खट्टा हो गया। उसे अपनी सास की डायरी याद आ गई।  उसने तुरन्त उसे अलमारी से निकाल कर, जब पढ़ना शुरू किया तो फिर उसकी उत्सुकता चरम पर पहुंच गई। वह हर दिन समय निकाल कर डायरी जरूर पढ़ती।

डायरी के आधे से ज्यादा पन्नों में, माधुरी के बचपन की यादें लिखी थीं। समिधा ने पन्ने तेजी से पलटे, वह अपनी सास का ससुराल का अनुभव कैसा रहा? यह जानने को उत्सुक हो उठी। 

‘सफेद रंग से रंगी यह हवेली अपनी खूबसूरत मेहराब, नक्काशीदार दरवाजे, बड़ी हवादार खिड़कियों से, हर किसी का ध्यान आकर्षित कर लेती है, मगर मैं अपने साहिब का ध्यान आकर्षित कर पाने में असमर्थ हूं। वे मुझसे खुश नहीं हैं।  अभी हमारी शादी को मुश्किल से बीस दिन ही हुए हैं सास, ससुर सभी ने मुझे पलकों पर रखा है, मगर यह मुझसे सीधे मुंह बात नहीं करते। देवर जी बड़े अच्छे हैं। विशाल नाम के अनुरूप ही उनका व्यक्तित्व हैं। रजनी अक्सर उनके कमरे में किसी न किसी बहाने से जरूर जाती है।’

‘मुन्ना छह महीने का हो गया है। सभी साहिब को समझाते हैं कि लकड़ी की टाल का काम ही मन लगा कर कर लो, मगर यह तो नशे में ही डूबे रहना चाहते हैं। आजकल मुन्ने की देखभाल को, रमा गांव से बुलाई गई है। मुझसे दो बरस छोटी है, शायद सत्रह वर्ष की होगी। बहुत सुंदर है। मेरा सारा काम हंस- हंस कर करती हैं। उसके आने से कुछ मन हलका हो गया है। ऐसा लगता है कमरे में टंगी ऑयल पेंटिंग्स की तरह मैं भी इस कक्ष की शोभा बढ़ाने के 

लिए ही आई हूं। मेरा खुद का वजूद क्या है…’

‘रघु गांव गया है। उसकी शादी है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह परिवार इनकी बेगारी करता आ रहा है, न जाने ऐसा कौन सा कर्जा इस परिवार के सिर है कि पिछली पांच पीढ़ियों से एक न एक संतान, हवेली में सेवा-टहल करती आ रही है। एक पीढ़ी के बुढ़ाने पर, अगली पीढ़ी का जवान आ जायेगा। पता नहीं यह सिलसिला कब खतम होगा।  कभी सोचती हूं रमा से पूछूं कि उसके परिवार को रुपया भेजते हैं या वह भी किसी कर्जे को उतारने आई है?’

‘रजनी की शादी हो गई, देवर जी ने अपने को, कमरे में बन्द कर लिया है। बाहर कम निकलते हैं।  आजकल साहिब देवर जी का बहुत ख्याल रख रहे हैं, शायद दोनों साथ बैठ कर पीने लगे हैं। मुझे सुकून तो बस  हवेली के पुस्तकालय में रखी देशी- विदेशी प्रख्यात साहित्यकारों की पुस्तकों के बीच ही मिलता है…’

देवर जी को हस्पताल में भरती किया गया है। वे नशे में ऊपरी मंजिल से नीचे आंगन में कूद गए हैं, शायद दिमाग का ऑपरेशन करना होगा।  आजकल पीछे बगीचे के $फौवारे का चलना बन्द हो गया है। किसी की भी दिलचस्पी इस हवेली की मरम्मत करवाने में नहीं है। जगह-जगह से प्लास्टर झरने लगा है, नीचे से लाल रंग की चौकोर पतली लाखौरी ईंट से बनी, दीवार झांकने लगी है। हवेली की खस्ता हालत की तरह ही मेरे हृदय की हालत भी साहिब की नित्य नई बुरी 

आदतों की जानकारी होने पर हो रही हैं…’

‘रजनी अपनी शादी की सालगिरह में मायके आई है। आज अपने भतीजे नवीन को लेकर, मुझसे  मिलने आई थी।  मैं जानती हूं कि वह विशाल की तबियत का हाल जानना चाहती हैं, मगर विशाल शायद अगले ह$फ्ते घर आए…’

साल भर हो गया विशाल की दिमागी हालत ठीक नहीं, वह अक्सर घर से बाहर भाग जाता है। रघु की ड्यूटी तो उसी को संभालने में लगी है।  रमा अब गम्भीर हो गई है। उसकी चंचलता मानो खो गई है।’

‘नवीन और मुन्ना हमउम्र हैं। रजनी जब भी मायके आती है, मेरे पास बैठने जरूर आती है। उसका दो साल का बेटा बहुत चंचल है।  उसे विशाल के पास जाने से रोकना मुश्किल है। सब विशाल को, पगला कहने लग गए है। वह मुख्य दरवाजे पर ही, अपनी चटाई बिछा कर पड़ा रहता हैं। हमेशा बडबड   करता रहता है। बीच-बीच में अपने हाथों को चबाते रहता है। किसी को नु$कसान नहीं पहुंचाता मगर अपने हाथों में नील बना लिए हैं। अक्सर  मौका पाकर बाहर भी भाग जाता है।’

‘मुझे लगा साहिब बदल गए हैं, भाई के गम  में और अब सुधरने लगे हैं। मेरा भ्रम जल्द ही टूट गया।’ 

‘रमा और साहिब को मैंने रंगे हाथों पकड़ लिया। उस समय तो रमा चुप रही मगर आज साल भर बाद, उसने अपना मुंह खोला है।  मेरे मन में अब साहिब के प्रति कोई लगाव नहीं है बल्कि घृणा हो रही है कि मेरा पति 

कितना कुकर्मी है। अपने आश्रितों के प्रति उसका व्यवहार कितना निर्मम है। आज रमा चौथी बार अबार्शन करा कर आई तो उसका सब्र का बांध टूट गया।  

रो-रो कर बता रही थी कि डॉक्टर ने बता दिया है कि वह अब कभी मां नहीं बन सकती।  मैं क्या कहूं? बस मुन्ना को उसकी गोद में बैठा दिया कि इसे वो अपना ही पुत्र माने।’

‘रमा अब मुझे भी अपनी जैसी ही, पिंजरे में बन्द जानकर खुलने लगी है। तभी तो आज बता गई कि छोटे साहब ने भी, आपकी तरह हमें बड़े साहब के साथ देख लिया था।  उस दिन उन्होंने अपने पिताजी को सब बता देने की धमकी दी, दोनों में हाथापाई हुई और बड़े साहब ने छोटे साहब को छत से नीचे फेंक दिया। इतना ही नहीं, साहब ने छोटे साहब को कभी ठीक न होने दिया। नशे की गोली की आदत लगवा दी। विशाल, वहीं खाकर शांत पड़े रहते हैं। जब नशा नहीं मिलता तो तोड़-फोड़ करने लगते हैं। बड़े साहब तुरन्त उसे नशीली दवा खिला देते हैं।’

‘मुझे डर लगता है साहिब से, वह कभी भी मुझे भी उल्टा सीधा खिला सकते हैं। उन्हें पता चल गया होगा कि अब मुझे भी सारे राज, पता चल गए हैं।  इसी साल के भीतर ही सास और ससुर की मृत्यु हो चुकी है। अब मुझे हरपल अपने सिर पर अपनी मृत्यु की तलवार लटकती दिखाई देती है।’

रजनी आई थी। पूरे समय पगले के इर्द-गिर्द सफाई करवाती रही। मुझे भी हिदायत दे गई कि मैं पगले का समय से फल-फूल का प्रबन्ध कर के रखूं।  मैं उससे कह न पाई कि पागल सिर्फ विशाल ही नहीं बल्कि कई और भी हैं इस हवेली में, शायद इसीलिए विशाल ने रजनी को विवाह प्रस्ताव न दिया हो।’

‘विशाल भी नहीं रहा। निचले तल में जो पुस्तकालय बना है, उस कमरे के पिछले दरवाजे से सीढ़ियां रमा के कमरे की गैलरी में खुलती है और गैलरी के अंतिम सिरे से आंगन साफ दिखाई देता है। पहले तो मैं कभी समय निकालकर पुस्तकालय में बैठ जाती थी मगर अब मेरा मन नहीं करता। लगता है जैसे वह अय्याशी का अड्डा है। 

आज दस दिन हो गए थे, समिधा पूरी डायरी $खतम कर चुकी थी। इस हवेली के चौंकाने वाले रहस्यों को जानकर उसका नज़रिया अब बदल रहा था।  उसने लायब्रेरी की पड़ताल करने की सोची। उसे तो किसी ने लायब्रेरी नहीं दिखाई। मनोज के हालचाल फोन से पता चल रहे थे।

‘काकी, तुमने पूरी हवेली दिखाई, मगर लाइब्रेरी नहीं दिखाई कभी?’ 

‘उसी को तो बड़े साहब ने अपना बेडरूम बना लिया। मुन्ना अपनी मम्मी के सामान को देखकर घंटों रोता रहता था तो उन्होंने वह कमरा  

सामान समेत वैसे ही बन्द कर दिया था। आपको दिखाया तो था हमने।’

‘किताबों को क्या किया?’

‘एक कोठरी में बन्द हैं। कभी रघु चाचा उसमें दवा छिड़क देते हैं। आपको किताब पढ़ने का शौक है न, आप रघु चाचा से कहना, वह  

निकाल देंगे।’

‘ठीक है, अब लॉक डाउन में टाइम पास के लिए कुछ तो चाहिए।’

मनोज को गेस्ट हाउस में एकांतवास को आए, दस दिन हो गए थे। आज उसे सुबह उठते समय बुखार भी महसूस हुआ। उसने अपनी कोविड जांच करवा ली। शाम तक उसकी रिपोर्ट आनी थी वह बेचैनी से अपने कमरे में टहल रहा था तभी समिधा का फोन आ गया और मनोज ने उसे पूरी बात बता दी, 

समिधा फोन पर ही रोने लगी।

‘पागल अभी टेस्ट रिपोर्ट आनी बाकी है। मेरे में अन्य लक्षण नहीं हैं, मगर सावधानी बरतने को टेस्ट जरूरी है।  हम तो सीधे संक्रमित मरीजों के साथ, पन्द्रह दिनों से संपर्क में थे इसलिए तो हमें कोरेनटाइन किया गया है।’

‘ओके, नहीं रोऊंगी, तुम्हारे विदेशी भाइयों के बहुत मैसेज और कॉल आते हैं आजकल, सभी तुम्हारे लिए शुभ कामनाएं दे रहे थे।  मैंने उन्हें बता दिया है कि महामारी के चलते, अब हवेली के दाम ज्यादा न मिल पाएंगे। बाज़ार बहुत डाउन है।’

‘पहले जिंदा बच जाएं फिर रुपयों की सोचेंगे।’

‘ऐसी ही बात करोगे तो मै बात नहीं करूंगी।’ कहकर उसने फोन रख दिया।

शाम को मनोज की टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आ गयी, मगर एक और टेस्ट होना अभी बाकी है। समिधा जब भी ससुर को देखती उसे वे हत्यारे ही लगते। बहुत सोच- विचार कर समिधा ने मौका पाकर डायरी आग के हवाले कर दी। मनोज भी यह सच जानकर क्या करेगा। अपने कर्मों की सजा महेंद्र प्रताप भोग ही रहे हैं। उन्हें पारकिंसन रोग भी लगा हुआ है। हर क्षण, उनके हाथ कांपते रहते हैं। वे दवाइयों और पथ्य पर निर्भर हैं। रमा काकी की भी उम्र हो गई है। मनोज उन्हें अपनी मां की तरह ही मानते हैं। यह काकी के लिए अच्छी बात है। उनका बुढ़ापा आसानी से कट जाएगा। रघु काका अपने परिवार से दूर यहां ससुर जी की तीमारदारी में लगे हैं। अब लॉक डाउन खुले तो उन्हें कुछ रकम के साथ, उनके गांव भेज देगी हमेशा के लिए। उनके परिवार को भी बेगारी से आजाद कर देगी। इसी उधेड़ बुन में बैठी समिधा, का जब फोन बजा तो वह वर्तमान में लौट आई।

मनोज आज घर आ रहा है। समिधा पकवान बनाने में व्यस्त है। वह आज पूरे सवा महीने की कसर निकाल देना चाहती है।  उसके पास एक बहुत बड़ी खुश खबरी भी है मनोज के लिए। 

‘वेलकम होम, माय डियर’ समिधा, मनोज के स्नान  कर बाहर निकलते ही गले लग गई। 

‘वैसे मुझे पता है कि खुशखबरी क्या है, दाई से भी भला पेट छुपा है कभी।’ 

‘गलत डॉक्टर साहिब, तुम्हारे भाइयों ने विदेशों में बैठ कर जो महामारी का तांडव झेला है, उसकी वजह से, उन्होंने यह निर्णय लिया है कि वे हवेली  बेचने के ब जाय, इसे हॉस्पिटल में बदलने में तुम्हारी आर्थिक मदद करेंगे।’

‘क्या सच में?’ मनोज को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। 

‘हां सच में, तुम खुद बात कर लो, लेकिन एक शर्त भी है कि बी.पी.एल. मरीजों का नि:शुल्क इलाज करना होगा।’ 

‘अरे वाह, यह भी कोई कहने की बात है।’ मनोज ने ख़ुशी से झूमते हुए कहा। 

‘चलो पुराने कलंक को धोकर यह हवेली, पागल की हवेली नहीं बल्कि डॉक्टर की हवेली कहलाएगी।’ 

‘कलंक कौन सा समिधा?’ कहकर मनोज पलटा। 

‘जाने-अनजाने, कितने सपने टूटे कितनी दबी चीखे, हवा में गूंजी होगी, जिसके ऊपर अत्याचार हुए यह तो वही जानता है, मगर जब तुम गरीब, बेसहारा 

लोगों का निशुल्क इलाज करोगे तो उनके दिल से निकला आशीर्वाद, इस कलंक को एक दिन जरूर मिटा देगा और हवेली भी एक नए नाम से जानी जाएगी।’ 

समिधा की बात सुनकर, मनोज सोच में पड़ गया।

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