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नो अब्जेक्शन सर्टिफिकेट: Hindi Story
No Objection Certificate Story

Hindi Story: मां की अंतिम विदाई हो गई थी। सभी रिश्तेदार भैया-भाभी को सांत्वना देकर एक-एक करके जा रहे थे। मैं एक तरफ चुपचाप बैठी मां की तस्वीर को अपलक निहार रही थी। आंखें भी चुपचाप बहकर मेरा साथ दे रही थीं। तस्वीर में भी मां की बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें मुझसे जैसे हिम्मत और हौंसला रखने को कह रही हों। चेहरे पर उनकी सदाबहार मुस्कान जैसे मुझ पर अपना असीम प्रेम न्योछावर कर रहीं हों। कितनी खूबसूरत थी मां की तस्वीर, एकदम निश्छल और मासूम।
पापा की असमय मृत्यु के बाद भी अपनी समझदारी, हिम्मत और हौंसले से मां ने हम दोनों भाई-बहन की परवरिश की थी। अपने अथाह ममता और प्रेम के आंचल से हमें ढक कर, सभी मुसीबतों से बचाए रखा। कभी भी पापा की कमी का एहसास नहीं होने दिया था हम दोनों को। मैं तो सिर्फ दस साल की थी जब पापा चले गए थे, बस कुछ धुंधली यादें थीं उनकी मेरे मानस-पटल पर। समीर भैया मुझसे पांच साल बड़े थे। अकसर वे मेरे लिए पापा की पदवी सम्भाल लेते थे। भैया के स्नेह रूपी सुरक्षा चक्र में मैं अपने आपको पूर्णत: सुरक्षित महसूस करती थी। बहुत प्रगाढ़ रिश्ता था हम दोनों भाई-बहन का और मां, मां ने तो अपना सर्वस्व हम दोनों पर न्योछावर कर दिया, अपने सारे सपने, अपनी इच्छाएं और अपना जीवन, सब कुछ। उनकी दुनिया तो बस हमारे इर्द-गिर्द सिमट गई थी।
अद्वितीय सुंदरता की स्वामिनी थी मां। जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया, जिंदादिली और संयम की अद्भुत मिसाल थी वे। ये तीनों गुण मुझे मां से विरासत में मिले थे। मैं उनके कमरे में, उनकी आराम कुर्सी पर चुपचाप आंखे मूंद कर बैठी, उनकी यादों में खोई थी। मां के बिना जीवन जीने की कल्पना मेरे रोंगटे खड़ी कर देती थी। मेरी मां मेरा संबल थी, मेरी प्रेरणा थीं। अगर मैं अपने आपको उनकी परछाई कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उस समय मैं सिर्फ मां के एहसास, उनकी खुशबू के साथ रहना चाहती थी। मेरे बचपन से लेकर आज तक की, तमाम यादें मेरे दिलों-दिमाग पर चलचित्र जैसी चल रही थीं। उनकी बातें सोच कर कभी होंठों पर मुस्कान आ जाती तो कभी आंखे नम हो जातीं। मां-बेटी से भी कहीं ज्यादा प्रगाढ़ था हमारा रिश्ता और ऐसे में उनका यूं अचानक चले जाना…।
पिछले कुछ दिनों से मां का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं चल रहा था, किंतु इतना भी खराब नहीं थी कि वे अचानक यूं ही चली जाएं। मां हमेशा अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहती। समय पर वॉक करना, योगा करना और पौष्टिक आहार लेना उनकी दिनचर्या में शामिल था। ऐसे में हार्ट अटैक आना मुझे नि:शब्द और बेचैन कर रहा था। बार-बार मन-मस्तिष्क पर यही अनसुलझा प्रश्न घूम रहा था कि अचानक ऐसा क्या हुआ? किसी के पास मेरे इन प्रश्नों का उत्तर नहीं था। अपने विचारों के सागर में डुबकियां लगाती मैं, भाभी की आवाज ‘सांची बाहर आ जाओ। खाना खा लोÓ से बाहर आई।
डाइनिंग टेबल पर खाना परोसा हुआ था। भैया-भाभी और मैं चुपचाप खाना खा रहे थे। पता नहीं क्यूं इस बार भैया का व्यवहार बदला-बदला सा लग रहा था। स्नेह और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति थे भैया, पर इस बार न कोई स्नेह, न कोई बातचीत और तो और मां के यूं अचानक चले जाने पर नहीं कोई स्नेह रूपी सांत्वना और भाभी भी बिलकुल खामोशी से अपना खाना खा रहीं थीं।
अजीब सी रहस्यमयी खामोशी थी कमरे में। मुझे ये सब बहुत अजीब लग रहा था, घुटन हो रही थी।
‘भैया, मां को अचानक हार्ट अटैक कैसे आ गया, क्या उनकी तबियत अचानक इतनी खराब हो गई थी? मैंने ही अपना जिज्ञासा भरा प्रश्न पूछ कर खामोशी को तोड़ना चाहा।
भैया-भाभी ने मुझे इस प्रश्न का उत्तर देना शायद मुनासिब नहीं समझा। खामोशी ने पुन: कमरे को अपने आगोश में लपेट लिया। मेरे भीतर की खलबली और प्रबल होती जा रही थी। खाना खाने के बाद हम तीनों हॉल में बैठे थे।
‘सांची, तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है इतनी देर बाद भैया बोले, वो भी कुछ संक्षिप्त सा।

‘बोलिए भैया।
‘सांची, मैंने अपने जीवन में आगे बढ़ने का फैसला किया है। एक स्टार्ट-अप करना चाहता हूं।
‘दैटज ग्रेट भैया। आल द बेस्ट।
‘थैंक्स, पर उसके लिए इन्वेस्टमेंट की जरूरत है। तुम तो जानती हो की जमा-पूंजी के नाम पर हमारे पास सिर्फ ये घर है और दो-चार गहने हैं। अगर मैं सिर्फ गहने बेचूंगा तो भी रुपयों की जरूरत पूरी नहीं होगी। इसलिए… कहते-कहते भैया चुप हो गए।
‘हां भैया बोलिए, मैं सुन रही हूं।
‘देखो सांची, मुझे गलत मत समझना। तुम एक अच्छे घर बिहाई हो, जहां तुम्हें रुपये-पैसों की कोई कमी नहीं है इसलिए शायद तुम्हें मेरी बात अनुचित लगे। जीवन में आगे बढ़ना, सपने देखना कोई गुनाह तो नहीं है। इन्वेस्टमेंट पूरी करने के लिए मेरे पास मात्र एक ही विकल्प है, घर को बेचना। मैंने मां को भी ये सारी बात बताई थी।
‘तो मां ने क्या कहा भैया, घर तो उनके नाम है ना।
‘कहेंगी क्या, वही जो हर बुजुर्ग मा-बाप बोलते हैं। वही अपने घिसे-पिटे डायलॉग्स कि ये घर तुम्हारे पापा ने बड़े प्यार से, तिनका-तिनका जोड़ कर बनाया था। इस घर के हर कोने में, हर ईंट में तुम्हारे पापा की यादें बसी हुई हैं। मेरी इच्छा है कि मेरी अर्थी इसी घर की देहलीज के उठे। मां जिद पर अड़ गई थीं। उन्हें सिर्फ अपना स्वार्थ नजर आ रहा था। बेटा किस तकलीफ से गुजर रहा था वो उन्हें नजर नहीं आ रहा था और फिर मैंने सबकी सुविधानुसार एक टू रूम फ्लैट भी देख लिया था ताकि हम सभी उसमें शिफ्ट हो सकें। मां थीं कि मानने को तैयार ही नहीं हुई। आखिर बहुत अनुनय-विनय के बाद मां ने घर के पेपर्स साइन कर दिए थे।
भैया बोलते जा रहे थे और मैं कर्तव्यविमूढ उनकी बात सुन रही थी। मुझे धीरे-धीरे मां की तबियत और उनके हार्ट अटैक का राज समझ आ रहा था। टू-रूम फ्लैट अर्थात एक कमरा भैया-भाभी का और एक उनके बच्चों का और मां के लिए कोई कमरा नहीं। यही सुविधानुसार फ्लैट था भैया का और स्वार्थी मां हो गईं। क्या मां नहीं समझ रही होंगी कि उनका स्थान कहां होगा या तो घर के किसी कोने में या फिर वृद्धाश्रम में। क्या उन्हें अपना अनिश्चित भविष्य नजर नहीं आया होगा? उनकी दूरदर्शी सोच और अनुभव ने सब कुछ समझ लिया होगा। मेरी समझ में आ रहा था कि भैया की बात में कितनी सत्यता है और वास्तविकता क्या रही होगी। वर्ना अपने बच्चों की खुशी के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाली मां, भैया के लिए घर बेचने के लिए तैयार नहीं होंगी, मां बहुत सुलझी हुई थी, एकदम प्रैक्टिकल। मुझे पक्का यकीन है कि मां घर बेचने को तैयार हो गई होंगी। अगर भैया अपने जीवन में आगे बढ़ने के विषय में सोच रहे थे तो यकीनन ये मां की नजर में गर्व की बात रही होगी। वे कभी भी उनके बीच बाधा नहीं बनी होंगी। बस, ये टू रूम वाला फ्लैट ही उनकी बदली सोच का कारण होगा। अपनी अनुभवी, पारखी सोच और दृष्टि से अपना भविष्य उन्हें नजर आ गया होगा इसलिए उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया होगा। अत्यंत पीड़ा होती है जब संतान की सोच स्वार्थ की दिशा में चलने लगे। हम तीनों मैं, मां और भैया के रिश्ते की मजबूत नींव ही हमारी आपसी समझ और नि:स्वार्थ प्रेम था। पर क्या यही जीवन का यथार्थ है? मां की नि:स्वार्थ तपस्या और त्याग का क्या यही फल है? मेरे भीतर के सभी प्रश्नों की धुंध छट रही थी। सबकुछ साफ-साफ नजर आ रहा था। मैं मां को बहुत अच्छी तरह से जानती और समझती थी। मुझे सब समझ आ गया था उनका यूं हार्ट अटैक आना और अचानक चले जाना और भैया का अपने रचे हुए सत्य से मुझे आवगत करवाना, सबकुछ।
‘सांची, सांची क्या सोचने लगी? भैया की आवाज से मैं अपने विचारों से बाहर आ गई।
‘कुछ बोलोगी नहीं सांची।
‘आप बड़े हैं भैया, जैसा आप ठीक समझें।
इसके अतिरिक्त मेरे पास कुछ भी बोलने को नहीं था। आंसू आंखों से बाहर आने को बेचैन हो रहे थे। हृदय में अपनो के आघात की पीड़ा भयंकर हो रही थी।
‘सांची…भैया की आवाज लड़खाड़ने लगी।
‘जी भैया।

‘सांची, एक बात और बोलनी थी।
थोड़ा रुक कर, हिचकिचाते हुए वे बोले, ‘तुम इस ‘एन.ओ.सी. यानी नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट पर साइन कर दो।
‘नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट, मतलब.. भैया।
‘कानूनन पिता की प्रॉपर्टी में बेटी का भी बराबर का हिस्सा और हक  होता है। ये इसलिए ताकि भविष्य में किसी भी तरह की कोई भी अड़चन न आए। वैसे ये नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट तो बस एक फॉर्मैलिटी के लिए है। आई होप यू आर अनडरस्टैंडिंग मी सांची कह कर भैया ने नजरें झुका ली।
उनकी झुकी नजरें सब कुछ बयान कर रही थीं। वो सब भी जो वो कहना चाहते थे और वो सब भी जो वो नहीं कहना चाहते थे। आंखों में जो आंसू अब तक रुके हुए थे, वो आखिर बाहर आ ही गए । पिता तुल्य मेरे भैया, कैसे इतना बदल गए। जो भाई बिना सोचे-समझे, बिना किसी स्वार्थ के बचपन से ही अपनी सभी चीजें एक पल में मुझे दे देते थे, आज वो मुझसे प्रॉपर्टी के लिए नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट साइन करवा रहे हैं, उन्हें मुझ पर, इस भाई-बहन के रिश्ते पर इतना भी भरोसा नहीं रहा। ये अचानक ही आई बदलाव की आंधी में मेरा भाई, मेरा मायका, सब छूट गया। मेरे भीतर जो चल रहा था, इसे शब्दों में परिभाषित करना नामुमकिन था। आंसुओं के आवेगों में भैया मुझे धुंधले-धुंधले नजर आ रहे थे।
मेरी तरह हृदय में पीड़ा तो उन्हें भी हो रही थी, किंतु एक कुशल अभिनेता की तरह उन्होंने अपने सभी भावों को कुशलतापूर्वक सम्भाल लिया था।
‘भैया मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए और ना ही प्रॉपर्टी में कुछ चाहिए। मुझे सिर्फ आप, मेरा मायका चाहिए।
‘थैंक्स सांची।
‘भैया, मैं ये नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट साइन कर दूंगी, पर मुझे भी आप एक नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट दे दीजिए मैंने भी अपनी सभी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए, दृढ़ होते हुए कहा, ‘मतलब पल भर में ही ढेर सारे अचरज भरे, अप्रत्याशित भरे भाव उनके चेहरे पर छा गए।
‘मतलब ये भैया कि अगर आपको ऐतराज न हो तो मैं ये घर खरीदना चाहती हूं। आपको तो ये घर बेचना ही है ना, आप मुझे बेच दीजिए। इस घर के हर कोने में, हर हिस्से में मेरी मां की यादें बसी हैं, उनकी हंसी खिलखिलाती है, उनका हम दोनों के लिए ममत्व और त्याग झलकता है। इस घर में हमारे रिश्ते की आत्मा बस्ती है भैया, प्लीज मना मत कीजिए। आप अपना नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट ले लीजिए और मुझे मेरा दे दीजिए। मेरी बात सुन कर भैया एकदम क्रोधित हो गए।
‘तुम पागल तो नहीं गई सांची, तुम्हें पता भी है कि तुम क्या कह रही हो, अगर तुम ये घर खरीदोगे तो दुनिया क्या कहेगी, लोग मुझे स्वार्थी समझेंगे।
‘दुनिया की मुझे फिक्र नहीं है भैया और ना ही कोई कुछ कहेगा। उन्हें कुछ पता चलेगा तभी तो कुछ बोलेंगे। भैया, जिसको बोलना होगा वो तब भी बोलेंगे जब आप इसे बेचेंगे। ये तो दुनिया है भैया, जिन्हें हर परिस्थिति में बोलना होता है, चाहे तो सच हो या झूठ, सही हो या गलत। हम बोलने वालों के शब्द तो नहीं पकड़ सकते ना। अभी कम से कम मां की यादें, उनका ये घर हमारा तो रहेगा। उससे क्या फर्क पड़ता है कि वो आपके पास हो या मेरे पास, रहेगा तो उनके अंश के पास ही। कम से कम किसी बाहर वाले के पास तो नहीं होगा। मैं जानती हूं भैया की इस घर से आपको भी उतना ही प्रेम है जितना की मुझे। अपना अस्तित्त्व, अपना आशियाना किसी तीसरे के हाथों में जाने से आपको भी उतनी ही तकलीफ होगी जितनी मुझे। आखिर हैं तो एक ही मां के अंश। भरोसा रखिए भैया, आपके नाम पर रत्ती भर भी आंच नहीं आने दूंगी और ना ही आपके मान-सम्मान को कोई ठेस पहुंचाऊंगी। मुझे अपने रिश्ते की लाज रखनी आती है भैया, एकबार अपनी सांची पर भरोसा करके तो देखिए। मुझे ये नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट दे दीजिए भैया प्लीज, मुझे मेरी मां की यादों से जुदा मत कीजिए। मेरे आंसू अब सभी सब्र का बांध तोड़ चुके थे। भैया मेरे जज्बातों की नदी के बहाव को अच्छी तरह समझ रहे थे। मैं जानती थी कि वक्त के थपेड़ों ने भैया के भीतर थोड़ा परिवर्तन जरूर ला दिया है किंतु निष्ठुर नहीं बनाया है।
‘तुम करोगी क्या इस घर का, यादें सहेजने के लिए हृदय होता है ना कि घर। घर तो एक निर्जीव वस्तु है, जिसमें न कोई भावना है और ना ही संवेदना।
‘ये तो अपने-अपने नजरिये की बात है भैया।

आपके लिए ये घर निर्जीव, भावनारहित है और मेरे लिए सजीव और भावनासहित। मैं इस घर में मां का एक अनकहा सपना, एक अनकही इच्छा पूरी करूंगी। ट्रस्ट मी भैया, मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगी जिससे लोगों को कुछ भी बोलने का मौका मिले या फिर आपके मान-सम्मान को ठेस पहुंचे।Ó
‘ठीक है सांची, ले ले अपना भी नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट बहुत सोच-विचार करने के बाद बस इतना कह कर भैया भीतर कमरे में चले गए किंतु मुझे मेरा सब कुछ दे गए।
मैं जानती हूं आज भले ही भैया मेरे इस नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट वाली बात से सहमत नहीं हो और मुझसे नाराज भी हो पर मुझे यकीन है कि बदलते वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। आज भले की परिस्थितियां हमारे अनुकूल नहीं हैं, पर हैं तो परिस्थितियां ही, जिनका स्वभाव निरंतर बदलते रहना होता है। कई बार हमारे जीवन में ऐसे मोड़ आ जाते हैं जिन पर न चाहते हुए भी हमें चलना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हम दोनों भाई-बहन के जीवन में मोड़ आ गया था।
पर मेरे हृदय को कितना सुकून मिल गया था ये सोच कर कि मां की आत्मा कितनी खुश और तृप्त होगी जब अपने घर को ‘आसरा’ में परिवर्तित होते देखेगी, अपना अनकहा सपना पूरा होते देखेंगी। मां के इस घर में, इस आसरे में ना जाने कितने बेसहारा बुजुर्ग इस घर में आसरा पाएंगे।
‘इस नो अब्जेक्शन सॢटफिकेट के लिए वन्स अगेन थैंक यू सो मच भैया’ मन ही मन पुलकित होते हुए मैं अपने भैया का शुक्र कर रही थी।

अपनी अनुभवी, पारखी सोच और दृष्टि से अपना भविष्य उन्हें नजर आ गया होगा इसलिए उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया होगा। अत्यंत पीड़ा होती है जब संतान की सोच स्वार्थ की दिशा में चलने लगे। हम तीनों मैं, मां और भैया के रिश्ते की मजबूत नींव ही हमारी आपसी समझ और नि:स्वार्थ प्रेम था।

‘मतलब ये भैया कि अगर आपको ऐतराज न हो तो मैं ये घर खरीदना चाहती हूं। आपको तो ये घर बेचना ही है ना, आप मुझे बेच दीजिए। इस घर के हर कोने में, हर हिस्से में मेरी मां की यादें बसी हैं, उनकी हंसी खिलखिलाती है, उनका हम दोनों के लिए ममत्व और त्याग झलकता है। इस घर में हमारे रिश्ते की आत्मा बस्ती है भैया, प्लीज मना मत कीजिए।

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