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एक सुख-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Mother and child story
Ek Sukh

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Mother and Child Story: “हाय! बड़ी सुन्दर लग रही हो आज!”

भीड़ से निकलते हुए जब मैंने निगाहें उठा कर सामने देखा तो उसने हंसते हुए आंख दबा दी। अंदर मैं अपनी प्रशंसा सुन कर खुश थी परन्तु मैंने तेवर चढ़ा कर उसकी ओर देखा।

“मरजाणा, मोया…आज सुन्दर लग रही हूं, वैसे मुझे क्या कीड़े पड़े हैं।”

मैंने उससे कुछ न कहा लेकिन मुझे मालूम है, भगवान ने सुन्दरता देने में कमी नहीं की। मेरे द्वारा घूर कर देखने पर दोनों मोटरसाइकिल सवार खिलखिला कर हंस दिए।

“हाय मार डाला, उफ! यह गुस्सा!”

मैं नजरें झुकाए चलती रही। बाजार में बहुत भीड़ थी। दुकानों का सामान बाहर लगे होने के कारण भी आने-जाने में बहुत दिक्कत हो रही थी। मैं संभल-संभल कर चल रही थी।

मोटरसाइकिल वाला लड़का अत्यन्त सुन्दर, बहुत प्यारा, स्टाइलिश दाढ़ी, गोरी ठोड़ी पर तीन काली लाईनें। सुन्दर नैन-नक्श।

मेरे अंदर अजीब-सी गुदगुदी हुई। पता नहीं, अपनी तारीफ सुन कर या उसकी सुन्दरता देख कर। आस-पास किसी ने सुन न लिया हो, एक अनजाना भय भी लगा। वह लड़का जितना प्यारा लगा, उसकी दबाई आंख उतनी ही बुरी लगी।

उसके पीछे बैठा लड़का भी गेहुएं रंग का सुन्दर था परन्तु उनकी खिलखिलाहट मुझे बहुत बुरी लगी। वे घटिया ढंग से हंसते हुए आगे बढ़ गए।

काफी आगे जा कर मैंने पीछे मुड़ कर देखा। वे मुझे कहीं नजर नहीं आए। मैंने मन ही मन कहा, “बेवकूफ कहीं के…।”

ऐसा मेरे साथ पहली बार नहीं हआ था। जब से मैंने होश संभाला था. ऐसे बोल-कबोल सनते ही मैं जवान हई थी। पहले-पहल बहत बरा लगता। कई तरह की शंकाए मन को घेरे रखती। अपनी और मां-बाप की इज्जत का ख्याल। चारों ओर से घूरती नजरें। बड़े भाइयों की डांट का डर। असुरक्षा की भावना और बहुत कुछ।

धीरे-धीरे मैं इन सब बातों की आदी हो गई। इनमें से कोई बातें अर्थहीन हो गईं। पास से गुजरते हुए कोई ‘हाय सोहनी’ कहता तो दिल में फुलझड़ियां अवश्य खिलने लगतीं। जी चाहता, पंख होने पर मैं बिना किसी रोक-टोक के ऊंचे गगन में उड़ान भरती। लेकिन अफसोस! ना ऐसा हुआ, ना कभी ऐसा होने की संभावना थी।

हैरानी मुझे इस बात की थी कि मैं पैंतीस से ऊपर की थी और मेरी सुन्दरता की प्रशंसा करने वाले मुश्किल से बाईस-तेईस के होते।

मुझे बहुत तसल्ली महसूस होती कि इस उम्र में भी मैं काफी सुन्दर लगती हूं। सुन्दर दिखना और तारीफ सुनना सभी को भाता है। हर बात का सभ्य तरीका होता है। यूं ही आते-जाते लड़कियों-बूढियों पर छींटाकशी करना असभ्य होने की निशानी है।

कई दिनों तक मुझे उन लड़कों का स्वर व दृश्य याद रहा।

उस दिन भी मैं घर आकर बहुत देर तक स्वयं को शीशे में निहारती रही। सुन्दर कोमल बदन, गोल चेहरा, मोटी आंखें, तीखा नाक और लंबे काले बाल।

मेरा बेटा लक्की कई बार मुझसे कहता, “मम्मा, यू आर वैरी स्मार्ट। वैरी ब्यूटीफुल।”

लक्की जब मेरे साथ लेटे हुए मुझे प्यार से सहलाता तो मन को बहुत राहत मिलती। कितनी खुशनसीब होती हैं वे औरतें, जिन्हें मां बनने का सौभाग्य मिलता है।

गर्भ से ही उसे देखने की बेसब्री से प्रतीक्षा करना। दूध पिलाना, उसकी पालना में स्वयं को भूल जाना। उसे देख कर ही खुश और उदास होना।

बच्चे की खुमारी में पत्नी का पति की ओर से लापरवाह हो जाना भी स्वाभाविक है। कितना नाजुक समय होता है, औरत के लिए, एक ही समय में पत्नी, मां, बहु-बेटी, हर रिश्ते को खुश रखना। पति अक्सर मुझसे कहते, “जब तुम्हें पहली बार देखा तो मन में एक ही तरंग उठी, “जगजीत, यही तुम्हारी जीवन-संगिनी है।”

इस प्रकार कहते हए वह हंस देते। “पहले भी एक-दो लडकियां देखी थी। मम्मी को पसंद होती। वह मेरी स्वीकृति चाहते। मैं मना कर देता, वह नाराज हो जाती। “क्या कमी थी लड़की में? पता नहीं कैसी हूर-परी चाहिए इसे?” मां नाराज होकर कहती।

मुझे गले से लगा लेते या बांहों में उठा लेते, “यह है मेरी हूर-परी। लव यू वैरी मच।” ऐसा अक्सर वह हमारे कमरे में ही करते।

एक बार ऐसे समय में मेरी मौसी-सास आ गईं। दरवाजा खुला होने पर वह सीधा हमारे कमरे में आ घुसी। देखते ही धिक्कराने लगी, “लगता है, एक तुम्हारा ही विवाह हुआ है। उसे कंधे पर उठाए घूम रहा है। ज्यादा सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए औरतों को। कैसा कलयुग आ गया है। ना लड़के को शर्म ना औरत को।”

हम एकदम पानी-पानी हो गए। इन्होंने मौसी के पांव छुएं। आशीर्वाद देते हुए भी कहने लगी, “ऐसा अच्छा नहीं लगता। ध्यान रखा करो।” फिर मेरी ओर टटोलती नजर से देख कर पूछने लगी, “बहू…कुछ है क्या…?”

फिर मुझे सहलाते हुए बोली, “ऐसे समय में शरीर को ढीला रखना चाहिए।”

उनकी यह बात मुझे भीतर तक चुभ गई। मेरी आंखें छलक आईं। मेरे पति ने बात बदलते हुए कहा, “मां से कहो, मौसी आई हैं।”

दरअसल उन्हें भम्र हुआ था। ऐसी कोई बात नहीं थी। हम दोनों उदासी में डूब गए। हमारे ब्याह को छः साल और दो महीने हो गए थे। मौसी की बेटी की शादी हम से एक महीना पहले हुई थी। दसवें महीने ही उसके घर लड़का हो गया। मुझे अभी तक यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। मौसी जब अपनी बेटी के गर्भवती होने का जिक्र खुशी से कर रही थी, मुझे लगा जैसे वह जानबूझ कर मुझे सुना रही है। मुझे लगता, मैं मर जाऊंगी। लेकिन आज तक मैं जिन्दा हूं।

लाख भटकने पर भी कई बार कोई सफलता नहीं मिलती। मेरे साथ भी ऐसा ही हो रहा था। फिर भी मैं खुश थी। मेरे पति और सुसराल दोनों ही बहुत अच्छे थे। मैं खुद को सौभाग्यशाली समझती।

मौसी जी मेरे साथ ही चल दी। मम्मी मौसी की आवाज सुन कर उठ बैठी। दोनों बहनें गले मिलीं। मौसी के लिए शिकंजी बनाते समय मैं सोचने लगी, “हमारा दरवाजा खुला कैसे रह गया, चिटकनी ढीली हो गई या लगाई ही नहीं थी!”

मैं अभी तक शर्मिन्दगी महसूस कर रही थी, भले प्रत्यक्ष कुछ प्रकट नहीं कर रही थी।

बाद में मैंने कई बार सोचा, इसमें इतने बड़े अनर्थ की बात क्या थी। पति-पत्नी अपने कमरे में एक साथ नहीं बैठेंगे तो कहां बैठेंगे।

वो दिन और आज का दिन, उसके बाद हमने अपने दरवाजे की चिटकनी का हमेशा ध्यान रखा। हमारी पड़ोसन प्रीति की सास दरवाजा बंद करने पर बहुत शोर मचाती और कहती, “हमें अकेले में डर लगता है।”

प्रीति के सास-ससुर बरामदे में सोते और वे दोनों पति-पत्नी सामने वाली बैठक में। सुबह साढ़े चार बजे के समय उसकी सास अपने पुत्र को आवाजें देने लगतीं। किसी के द्वारा जवाब ना देने पर और भी शोर मचाने लगती। भिड़े हुए दरवाजे को ठोकर मारने लगती और दरवाजा खोल कर अंदर घुस जाती। ‘वाहेगुरू, वाहेगुरू, करते हुए बाहर का दरवाजा खोल देती। प्रीति की सुहागरात के समय भी ऐसा ही कुछ घटा।

प्रीति ने बताया, “शुक्र है, हम उस समय अलग-अलग सो रहे थे। मुझे शुरू से ही चादर ऊपर ले कर सोने की आदत है। बुढ़िया को रत्ती भर भी शर्म नहीं। सुबह-सुबह ही तो नींद आने लगी थी। बड़ी अजीब-सी स्थिति बन गई। हार कर उसके पति ने मां को गुस्से से दरवाजा भिड़ा देने को कहा। तब वह कहने लगी, “उठ जाओ, सुबह हो गई है।”

पति ने कहा, “अच्छा, तुम जाकर पापा को उठाओ।”

मां के जाने के बाद पति ने गुस्से से प्रीति से कहा, “तुमने दरवाजा बंद नहीं किया था अच्छे से।”

मैंने सहमते हुए कहा, “आपने ही तो कहा, मां ने कहा है, दरवाजा बंद नहीं करना।”

मैंने कहा, तुम ने मान लिया, तुम्हारा अपना दिमाग काम नहीं करता। देर रात को लगा देती।”

प्रीति कहती, “मुझे इतना गुस्सा आया, अक्ल का कच्चा आदमी। मेरा इस घर में पहला दिन। भला मुझे तुम्हारे घर के बारे में क्या मालूम होगा। तुम ही अपनी अक्ल भिड़ाते। कितना चाव था मन में ब्याह को लेकर। मेरा पति प्यार से बातें करेगा। क्या सोचा था, क्या हो गया। हब्शी ने ना कोई बात की ना प्रेम दिखाया, बस भूखे की तरह मुझ पर टूट पड़ा। बुढ़िया पहले ही दिन मेरे मन से उतर गई। सोचा, पुत्र अच्छा होगा लेकिन वो भी आज तक मेरे दिल में अपनी जगह नहीं बना पाया।”

प्रीति जब भी मेरे पास बैठती, इस बात का गिला अवश्य करती। बच्चे दो पैदा हो गए लेकिन दोनों में आपसी प्रेम. विश्वास व मोह पैदा नहीं हो पाया। गुरदीप ने कभी उसका मन टटोलने की कोशिश नहीं की। कभी उसके मन की इच्छा का ख्याल नहीं किया। बस हर वक्त हक्म देने की आदत है। उसे बस उपभोग की वस्तु समझता।

पति की हरकतों से वह सदा जली-भुनी रहती, “बस अपनी आग बुझाता है। आज हाथ लगा कर देखे तो मुझे…”

कमजोर प्रीति समय के साथ मजबूत हो गई। पति की मनमर्जी का सामना करने लगी। कई बार रात में प्रीति द्वारा इन्कार करने पर गुरदीप क्रोध में आ जाता। गंदी गालियां देने लगता।

प्रीति उसे ऐसा करने से कई बार मना करती, “मैं गालियां नहीं सुन सकती। घर में ऐसे अच्छा नहीं लगता।”

वह कई बार उससे पूरा मुकाबला करती। गुस्से में आकर गुरदीप आंगन में चारपाई पर जाकर लेट जाता। उसे गालियां देता रहता। सास बुदबुदाती, “तेरा खसम है। लड़के को लात मारती है। औरतें क्या ऐसा करती हैं।”

प्रीति भी भड़क उठती, “अपने साथ लिटा लो, तुम भी तो हरदम अंदर झांकने आती हो।”

घर में ऐसी स्थिति आने पर प्रीति का ससुर तमाशा देखता। मम्मी बताती, “यह आदमी जवानी में ही अपनी बीवी के आगे बोलने की हिम्मत गवां बैठा है। इसे कभी बोलते सुना ही नहीं।”

कभी-कभी रात को प्रीति बैठक के दरवाजे को बंद कर, रोते-कलपते अपने कर्मों को कोसते हुए, बच्चों के साथ सोने का प्रयास करती। बच्चे छोटे-छोटे सवाल पूछते, “मम्मी, डैडी आपके साथ ऐसा क्यों करते हैं? गालियां क्यों देते हैं? दादी क्यों गुस्सा करती है?”

“पता नहीं। सिर फट रहा है। सो जाओ तुम लोग। सुबह स्कूल जाना हैं।”

प्रीति जब भी मेरे पास आती, कहती, “भाई साहब! बहुत सज्जन आदमी है। तुम्हारी सास भी बहुत अच्छी है। तुम्हें तंग नहीं करते। तुम्हारे मन की बात समझते हैं। मैं तुम जैसी होती तो इनका मुकाबला कहां कर पाती। बहनजी, फिर भी तुम भाग्यशाली हो। भगवान तुम पर जरूर कृपा करेंगे। घर में क्लेश होने से बच्चे सहम जाते हैं। इनके बाप को कछ समझ ही नहीं।”

प्रीति मुझे सौभाग्यशाली मानती। मैं अपनी ओर देखती, क्या मैं सचमुच सौभग्यशाली हूं? मुझ जैसी अभागिन कोई नहीं। घर के लोग मुझे इतना प्यार करते कि मैं रो भी न पाती। अपने आंसू दिल में ही दफन कर लेती। पति तो हर समय मुझ पर प्यार लुटाते। मेरे प्रत्येक सुख-दुख का ख्याल रखते। कभी सोचती, मेरी सख्त सास होती। वो मुझे ताने देती और उस बहाने ही मैं रो लेती। उनकी खशी के लिए मैं हरदम खश रहने का प्रयास करती जबकि मेरा दिल बहत दखी रहता। मैं यह बात घरवालों को बता कर उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी।

कई बार मैं देखती, मेरे पति और मम्मी भी चिन्ता में डूबे रहते। तभी मम्मी कई जगहों पर सुखना मांगती। कभी गुरुद्वारे में अरदास करती। मैं खुद भी अनेक बार अरदास करती।

हमने अपने पारिवारिक डॉक्टर अरोड़ा से बात की। सारा चैकअप करवाया। सारी रिपोर्टस ठीक थी। हम दवा के साथ-साथ दुआ करके भी हार गए थे। अब तो मेरी ननद घर आने पर, इस बारे में कोई बात नहीं करती। पहले-पहल पूछा करती थी, “कोई खुशखबरी है तो मुंह मीठा करवाओ।”

पास बैठी मम्मी कहती, “इतनी जल्दबाजी ना करो, दे देंगे खुशखबरी भी। अभी बच्चे हैं।”

दीदी मुंह बिचका कर कहती, “अरे, ये अभी बच्चे हैं। सत्ताईस का होने वाला है। मैं तो जब पच्चीस की थी, तभी मेरे तीन बच्चे हो गए थे। बच्चे पहले ही हो जाएं तो ठीक है, वरना उम्र पक्की हो जाने पर और भी मुश्किल हो जाती है। तुमसे कुछ होता नहीं है।” जब उसने भाई से कहा, तब निकट बैठे मेरे ननदोई ने बीवी को डपटते हुए कहा, “बूढी हो गई हो, अक्ल अभी भी नहीं आई, बात करने की।”

मेरी सास ने भी डांटते हुए कहा, “बस कर लड़की…हद होती है हर बात की।”

मां की डांट सुन कर दीदी रोने लगी। पति उठ कर बाहर चले गए। सास ने मुझे इशारे से अपने पास बुला कर कहा, “जाओ, तुम रात के खाने का प्रबंध करो।”

रसोई में पीछे ही आकर मम्मी कहने लगी, “तुम दीदी की बात का बुरा मत मानना, दिल की बुरी नहीं, बस जुबान कुछ ज्यादा चलाती है। मेरे ज्यादा लाड ने उसे सिर पर चढ़ा दिया है। इतने साल अकेली ही थी। जगजीत दस साल छोटा है इससे।”

मम्मी के प्रेम का यह केवल एक उदाहरण है। ऐसी अनेक घटनाएं हैं। जब भी ऐसी कोई बात होती, मम्मी मेरा पक्ष लेती। मैं उनका बहुत ध्यान रखती हूं। उनकी किसी भी बात को मैं टालती नहीं। उन्होंने ब्याह के बाद से ही मेरे साथ हमेशा लाड-प्यार किया। दीदी भी ठीक है, बस मौसी जैसा स्वभाव है, कभी-कभी कुछ ज्यादा बोल जाती हैं।

दीदी अपनी सुसराल में मेरी सुन्दरता और स्वभाव की अत्याधिक प्रशंसा करती। एक बार उनकी जेठानी जब हमारे यहां आई तो कहने लगी, “तुम ठीक कहती हो शरनजीत, तुम्हारी भाभी सच में बहुत सुन्दर है। मुझे बहुत अच्छी लगी।”

अब दीदी बहुत कम आती है। उनके बच्चे पढ़ रहे हैं।

मेरे ब्याह को भी तेरह साल हो गए। लक्की भी छः साल का हो गया। हमने भगवान की मर्जी को स्वीकार कर लिया। लक्की मुझे बहुत प्यार करता है। मैं अपनी पूरी ममता इस पर न्योछावर करती हूं। फिर भी पता नहीं, दिल के किसी कोने में एक किरच चुभती है। कभी-कभी टीसने लगती। मीठा-मीठा सा दर्द देती है। इस बात का पता लक्की को कैसे हो जाता है।

वह जहां भी हो, मेरे पास भागते हुए आकर कहता है, “आपने बुलाया मम्मा!”

“नहीं बेटा!” मुझसे कुछ और कहा नहीं जाता।

“आज मेरी मैडम ने मालूम है, क्या कहा?”

“क्या?”

“यूअर मम्मा इज वैरी लक्की । शो नाईश, ब्यूटीफुल।”

वह बार-बार मेरा मुंह चूमते हुए लाड करता और मैं भी ‘मेरा बच्चा…’ कहते न थकती।”

मैं लक्की को अपने साथ लिपटा लेती। रोने लगती। मुझे उदास देख पूछता, “मम्मा क्या हुआ? पापा ने मारा?”

उसका तुशीं सुन कर मैं हंस देती। वह रोने-सा मुंह बनाता। फिर हंस देता। मेरे पल्ले से आंसू पोंछता। “मम्मी, चॉकलेट खानी है?”

मैं लक्की को और भी लाड़ करती।

पैदा होते ही हमने लक्की को गोद ले लिया। वास्तव में उसे गोद लेने की प्लानिंग से ही लक्की का जन्म हुआ। मेरे पति के मामाजी की बहू तीसरी बार गर्भवती हुई तो उन्होंने एबॉर्शन करवाने के बारे में सोचा। वे हमारे पास आ गए। अपने डॉक्टर के पास एबॉर्शन करवाने के लिए जाना चाहते थे।

मम्मी को पता नहीं क्या सूझा। सभी के साथ सलाह कर, उन्होंने अपने भतीजे से कह दिया, “गुरजंट बेटा, तुम्हारा बच्चा लड़का हो या लड़की, वो हमारा हुआ। आज से यह बच्चा तुम्हारे पास हमारी अमानत है।”

भतीजे ने बुआ के चरण स्पर्श कर, अपनी स्वीकृति दे दी। मम्मी ने कई बार परमात्मा को धन्यवाद दिया। सभी का मुंह मीठा करवाया।

लक्की के होने तक हमने पम्मी भाभी का बहुत ध्यान रखा। हम चार महीने तक एक साथ रही। लक्की के जन्म के बाद इसे मेरी गोदी में दे दिया गया। सभी बधाई देने लगे। मुझे कछ समझ में ना आया. बस आंखें बहती रहीं।

मम्मी ने मेरा माथा चूम कर कहा, “लगा ले अपने बच्चे को गले से।”

लक्की के दो महीने हो जाने पर भाभी अपने घर वापस गई। लक्की को सीने से लगाते हुए, मेरा जी चाहता, मेरी छाती से दूध उतरे। पम्मी भाभी की छाती में दूध उतरते देख मेरे सीने में टीस उठती।

भाभी जबर्दस्ती लक्की को उठा कर, छाती से लगा लेती। मैं डर जाती, कहीं भाभी का दिल बदल ना जाए। लक्की दूध पी कर शांत होकर सो जाता। भाभी धीमे-धीमे बच्चे के हाथ-पैर सहलाती। उन दोनों को संतुष्ट, सहज और शांत देख कर, मेरी तड़प बढ़ जाती। शरीर से लपटें निकलने लगती। सोचती, यदि मैं इस तरह बच्चे को लाड़ करूंगी तो कहीं लोग मुझे पागल ना कहने लगें। मैं मुश्किल से खुद को संभाल पाती।

कई बार मुझे प्रतीत होता, मेरा दुख कोई नहीं समझता। औरत का बांझ होना, उसके लिए सबसे बड़ा दुख है। मुझे परमात्मा पर भी गिला रहता, उसने मुझे हर प्रकार का सुख दिया। बस एकमात्र सुख से महरूम रखा। पता नहीं, किन पापों की सजा मुझे मिली है।

अब तो हम दोनों में अत्याधिक प्रेम है। उसका रंग-रूप, शक्ल एकदम मेरे जैसा। एक दिन वह सीढ़ी के पैर से फिसल गया। जरा-सी रगड़ लगी लेकिन मेरी तो जान ही निकल गई। मम्मी बाजार गई थी। मैं इसे लेकर डॉ. अरोड़ा के अस्पताल जा पहुंची। डॉक्टर हंस दिए, “बेटा, मामूली-सी रगड़ है, अभी डिटोल से साफ कर देते।”

उसने मल्हम लगा कर हमें घर भेज दिया। बाजार से आने पर मम्मी को मालूम हुआ तो कहने लगी, “यह होता है, मां का दिल। चोट बच्चे को लगती है, दर्द मां को होता है। बच्चे इसी प्रकार गिरते-पड़ते ही बड़े होते हैं। तुम ऐसे घबरा गईं।”

जिस दिन हम लक्की को अस्पताल से घर लाए। उससे एक शाम पहले, मैं पति से लिपट कर बहुत रोई, “मुझे कुछ नहीं चाहिए, मेरा हर सुख ले लो। बस मुझे एक सुख दे दो। मैं मां बनना चाहती हूं, अपने बच्चे की मां।”

“इंदू, तुम इस घर की रानी हो। पागल मत बनो। खुद को संभालो। दिल छोटा ना करो। मैं जो कह रहा हूं, उसे समझो।”

“क्या। जल्दी बोलो। मेरे दिल को कुछ हो रहा है।”

“डॉक्टर का कहना है” पति कुछ कहते हुए रुक गए। मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा, “क्या कहते हैं डॉक्टर, बताओ भई।”

“हम नहीं बन सकते”, कहते हुए पति ने मुझे सीने से लिपटा लिया।

“क्या नहीं बन सकते?”

“मम्मी-डैडी”, इतना कह कर वह धम्म् से कुर्सी पर बैठ गए। मैं पति की जांघों पर सिर रख कर फट-फट कर रोने लगी।

मुझे आज भी वह समय याद है। दिल में आता, मैं कैसे बच गई। मर क्यों ना गई, उसी समय। फिर सोचती, जीना मरना किसी इंसान के वश में नहीं है। सृष्टि की डोर ऊपर वाले के हाथ में है, हम केवल कठपुतलियां हैं।

उस समय मम्मी पाठ कर रही थी। मेरा रोना सुन कर उठ कर पास आ गई। उन्हें सब मालूम था। कहने लगे, “तुमसे किसी ने कुछ कहा है?”

“नहीं मम्मी, मैं बांझ हूं। मेरी कोख हरी नहीं हुई। मैं मां बनना चाहती हूं।”

मैं मम्मी के गले लग कर दहाड़े मार कर रोने लगी। वह मुझे बहलाने लगे, “पागल मत बनो। परमात्मा ने तुम्हें इतना सुन्दर लाल दिया है। शुक्र करो उसका। वह मां-मां करते हुए, तुम्हारी गोदी से नहीं उतरेगा। तब तुम मुझे आवाज दोगी कि देखो मम्मी, कितना शरारती हो गया है, आप संभाले इसे। तंग करता है मुझे।”

मम्मी ने बात टालते हुए, मुझे बहला लिया। मम्मी दीवान पर लेट गई। मैं उनका हाथ पकड़ कर बैठी रही।

“देखो अंधेरा हो गया। उठो इस समय पाठ कर लो। मन बहल जाएगा। जैसे परमात्मा रखे, वैसे ही रहना पड़ता है। गुरु महाराज ने तुम्हें कितना सुन्दर लाल दिया है। कल देखना, इस समय घर में बच्चे की किलकारी गूंज रही होगी।”

मां ना बनने की कमी मेरे ही अंदर थी। सुबह उठते ही मम्मी ने कहा, “तैयार हो जाओ, आज हमें काके को लेने जाना है। तुम्हारे बापू जिन्दा होते तो बहुत खुश होते। कहते थे, जब मेरा पोता होगा, मैं खूब पार्टी करूंगा। परमात्मा की माया, उसे कुछ और ही मंजूर था। आदमी के वश में कुछ नहीं।”

मम्मी स्टोररूम में चली गई। परछत्ती से कुछ निकालने लगी। मेरे पति ने देखा तो मम्मी को टोका, “आप ऊपर चढ़ कर क्या कर रही हैं?”

“तुम यह पालना उतार दो, हमारा खानदानी पालना…।”

मम्मी ने पालना बहुत अच्छे से पैक कर के रख छोड़ा था। बताने लगी, “तुम दोनों भाई-बहन ही नहीं, शायद तुम्हारे बापू या दादा जी भी इसी.. .. में। मेरी सास कहती थी, इसे खराब मत करना। मेरे जगजीत का बेटा झूलेगा इसमें। बहुत भाग्यशाली होगा वो। कर्मों वाला। इंदू, तुम अपनी मम्मी को फोन कर देती, वह भी आ जाते।”

“मम्मी जी, आप करें फोन।” मैंने खुमारी से कहा।

अपने सुसराल आकर, मैं जैसे मायके को भूल ही गई थी। अभी भी मुझे मायके गए, छः महीने हो गए थे जबकि केवल एक घंटे का रास्ता था। मेरी भाभियां मुझे रोकती, भतीजे-भतीजी टांगों से लिपट जाते। मुझे रोकते। मैं अगली बार रहने का बहाना कर देती।

मैं सोचती, लड़कियां कैसे महीना भर अपने मायके रह लेती हैं। मेरा अपने पति और सास के बिना दिल ही नहीं लगता। मेरी अपनी सास से बहुत बनती थी। सावन के महीने में सास-बहू को अलग रहने का रिवाज था। मैं मम्मी से कह देती, आप भले अपने मायके चले जाए मगर मैं नहीं जाऊंगी। नहीं तो हम दोनों एक-दूसरे से चूंघट कर लेंगी।

मुझे सुसराल में कोई कमी नहीं थी। बस मेरी कोख हरी नहीं हुई थी। वह मौका भी भगवान ने घर बैठे ही दे दिया था। लक्की मेरी गोदी में दे दिया। हम कानूनी तौर पर लक्की के मां-बाप हैं। फिर भी मन में कहीं कसक उठती, “अगर इसकी मां की ममता जाग उठी, फिर।”

अब लक्की हम में पूरी तरह से घुल-मिल गया है। देख कर कोई कह नहीं सकता, मैं इसकी मां नहीं। अभी भी दिल में कभी टीस उठने लगती, अगर किसी ने लक्की को हमारे खिलाफ भड़का दिया।

बधाई देने आई कुछ औरतें शब्दजाल फेंकने लगीं, “वक्त बताएगा, बेगाने बरगद की छाया नसीब में होती है कि नहीं।”

उनकी बात सुन कर मम्मी ने मुझे समझाया, “कोई बात दिल को मत लगाना। यह बेगाना नहीं, हमारा अपना है। हमने अपने हाथों से इसे आंगन में लगाया है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। हम सारी उम्र अपने प्यार के पानी से इसे सीचेंगे। इसकी छाया का भी आनंद लेंगे। लोगों के पेट में ऐसे ही दर्द उठता है।”

मम्मी की तीखी बातें सुन कर पड़ोसनें खीसें निपोरने लगी। औरतें चली गई। मम्मी ने बच्चे की नजर उतारी।

लक्की अब बड़ा हो गया है। मम्मी कई बार पालना उठा कर संभालने के लिए कह चुकी हैं। लेकिन मेरा मन नहीं मानता। अभी भी पीरियड में एक सप्ताह ऊपर हो जाने पर मन में चाव उमड़ आता है। आठवें-नवें दिन आशा, निराशा में बदल जाती है।

सोचती हैं इस उम्र में लोग आजकल ब्याह करते हैं। अभी मेरी उम्र है। कोई बाहरी आदमी इसके कान में जहर ना भर दे। इसके थोड़ा-सा बड़ा होते ही हम स्वयं इसे सारी सच्चाई से अवगत करवा देंगे।

“लक्की…लक्की …। मेरे भीतर से आवाज उभरती। दिल बेचैन होने लगता। हाथ अपने आप परमात्मा के आगे जुड़ जाते, भगवान मेरी तरह किसी औरत को बांझ ना रखना। हरेक की गोद भरना। आंखों से पानी बहने लगता। उसी समय लक्की भागते हुए आता, “मम्मी जी, मम्मी जी।” आंखें पोंछ कर लक्की को बाहों में भर लेती हूं, मेरा बच्चा!”

मैं परमात्मा के आगे प्रार्थना करती, इसकी रक्षा करना। इसे कुछ ना हो। मेरा प्यारा, दुलारा बच्चा। मेरी जान लक्की! मेरी जिन्दगी लक्की!”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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