मेरा सब कुछ ले लो
grandfather holding his grandson from command

Hindi Short Story: रेवती को सामान बाँधते हुए देख,पाँच वर्षीय पोता श्रेष्ठ बोला ,ग्रेनी(दादी) क्या आप इंडिया वापिस जा रहे हो?
हाँ बेटा जाना तो होगा!
लेकिन क्यों?
क्या आपको यू एस ए में अच्छा नही लगा?
नहीं बेटा, ऐसा नहीं है,हमें तो तुम्हारा साथ बहुत अच्छा लगता है,हम तो तुम्हारे साथ खेलते-खेलते अपना बचपन जी रहे हैं,जिस समय हम अपने छोटे बच्चों के माता-पिता थे तब हमारे पास अपने बच्चों की मासूमियत देखने का समय नहीं था।यह सुखद अनुभव तो दादा-दादी बनकर हम महसूस कर रहे हैं। हम भी कहाँ जाना चाहते हैं,लेकिन बाबा का ऑफिस है ना बेटा…,छुट्टियाँ खत्म हो गईं।
किस डेट में जा रहे हो?
पास में ही एक कलैन्डर टंगा था, तारीख को दिखाकर रेवती ने कहा..,इस डेट में।
श्रेष्ठ पहले तो कलैन्डर देखता रहा, फिर भाग कर एक पेन्सिल लाया और उस तारीख को अच्छे से काट दिया और कहा, “अब कैसे जाओगे? वह तारीख तो इस कलैन्डर में है ही नहीं!!
उसके इस मासूम सवाल पर रेवती की आँखे भर आई।
दु:खी मन से श्रेष्ठ को समझाते हुए कहा,”बेटा, जाना तो पडेगा,बाबा अभी सर्विस में है..ना!
नहीं! नहीं ! अब आप नहीं जाओगे!
उसकी कोमल भावनाओ और कभी ना खत्म होने वाला स्नेह का खजाना भागा -भागा गया और अपनी गुल्लक ले आया और बाबा को देकर कहा,”बाबा आप ये गुल्लक रख लो, इसमें बहुत सारे डाॅलर हैं…,अब आपको नौकरी करने की कोई जरूरत नहीं..,इतना कह बाबा से लिपट कर रोने लगा।बाबा ने समझाया लेकिन उसकी कोमल भावनाएं समझीं नहीं और वह रोते -रोते बाबा की गोद में सो गया।
रेवती अभिषेक का मर्म समझ रही थी, सोच रही थी,बच्चों के लिए बड़े-बुजुर्ग से अच्छा कोई साथी नहीं होता,ये रिश्ते पीढ़ियों का संवाद नहीं,एक कोमल अहसास है,ये प्रेम के धागे हैं।माता-पिता के व्यस्त होने के कारण,”डे केयर” मे बच्चे घर के प्यार से वंचित रह जाते हैं…इसलिए ऐसा है।
संध्या का समय था।रेवती का बेटा मयंक ऑफिस से आ गया था। श्रेष्ठ ने अपने पापा से कहा,”पापा…,”रियली आई एम वैरी हर्ट!!
व्हाय?(क्यों)
हम एक फैमली हैं..पापा,जैसे आप और मम्मी मेरे पेरेंट्स हैं वैसे ही ग्रेनी बाबा आपके पेरेंट्स है,जब मैं और आप साथ रह सकते हैं तो ग्रेनी बाबा क्यों नहीं?
बोलो पापा!
एक 5साल के बच्चे के मुख से ऐसी बात सुनकर रेवती शाक्ड रह गई।
श्रेष्ठ से मयंक ने कहा …,आई एग्री..,अगर आप रोक सकते हैं तो रोको,हमें भी अच्छा लगेगा,हम ने तो बहुत कोशिश की थी…,बेटा!!
मैं अभी रिजर्ववेशन कैंसिल करवा देता हूँ।बेटे ने हमारी ओर मुखातिब हो कहा..क्यों पापा ठीक है ना?
रेवती श्रेष्ठ के प्यार को देख कर समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?जाना जरूरी था,सोचा श्रेष्ठ धीरे-धीरे समझ जाएगा।
वह दिन भी नजदीक आ गया,दु:खी मन से हम सब एयरपोर्ट पहुंच गए।”चैक इन” भी हो गया था,हम आगे बढ़े ही थे कि श्रेष्ठ ने झटके से अपने पापा(मयंक)से हाथ छुड़ाया और भाग कर हमारे पास आया..।
सिक्योरिटी ने देखा और श्रेष्ठ को रोकने की कोशिश भी की,लेकिन नहीं,वह हमसे लिपट कर रोता-रोता बोला.., ग्रेनी -बाबा मत जाओ..,मैं तुम्हे खिलाऊँगा..,मेरा घर भी ले लो,मेरा सब कुछ ले लो..,लेकिन यहीं रहो मेरे साथ..,मत जाओ “ग्रेनी”!
श्रेष्ठ ने रेवती के साड़ी के पल्लू में अपने आप को लपेट लिया।
सिक्योरिटी ने श्रेष्ठ को हम से अलग किया और बाहर ले गए ,”हम खड़े के खडे रह गए,”उस समय हम कुछ नहीं कर सके।
रेवती के हृदय को बहुत कष्ट हुआ।काम-काजी माता -पिता के कारण बच्चों को डे-केयर में रहना पड़ता है।सच में बच्चो की दुनियां “डे केयर” नहीं है,उसे घर वालो का प्यार चाहिए।
मेरी डायरी से…।

मैं मधु गोयल हूं, मेरठ से हूं और बीते 30 वर्षों से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हूं। मैंने स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है और हिंदी पत्रिकाओं व डिजिटल मीडिया में लंबे समय से स्वतंत्र लेखिका (Freelance Writer) के रूप में कार्य कर रही हूं। मेरा लेखन बच्चों,...