Manto story in Hindi: बूढ़े बरगद की घनी छांव के नीचे ढीलोढाली चारपाई पर बड़े इत्मीनान से बैठा चौधरी मौजू हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। धुएं की हल्की-हल्की बदलियां उसके मुंह से निकलती थीं और दोपहर को ठहरी हुई हवा में हौले-हौले गुम हो जाती थीं।
अपने छोटे से खेत में सुबह से हल चलाते-चलाते वह थक गया था और अब आराम कर रहा था। धूप इतनी तेज थी कि चील भी अपना अंडा छोड़ दे।
मौजू का पसीना खुश्क हो गया था, इसलिए ठहरी हुई हवा उसे ठंडक नहीं पहुंचा रही थी। लेकिन हुक्के का ठंडा-ठंडा स्वादिष्ट धुआं उसके दिल और दिमाग में अनूठे नशे की लहरें पैदा कर रहा था।
उसकी इकलौती लड़की जीनां घर से उसके लिए रोटी-लस्सी लेकर किसी भी समय आ सकती थी। जीनां की मां को दो साल हुए मौजू ने लंबे झगड़े के बाद सख्त गुस्से में तलाक दे दिया था।
जीनां बड़ी आज्ञाकारी लड़की थी। वह अपने बाप का बहुत ख्याल रखती थी। घर पर कामकाज चटपट निबटाती थी। हालांकि घर में कोई खास ज्यादा काम नहीं होता था, उसे रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं था, फिर भी जीनां इस फिराक में रहती थी कि काम में ज्यादा समय लगाने की जगह जल्दी काम समेटे और बचा हुआ समय चरखा चलाने, पूनियां कातने या अपनी गिनी-चुनी सहेलियों के साथ इधर-उधर की गप्पों में गुजारे।
चौधरी मौजू के पास यों तो जमीन कम ही थी, लेकिन उसके गुजारे के लिए पर्याप्त थी। गांव बहुत छोटा था। ऐसे वीरान इलाके में जहां से रेल तक नहीं गुजरती थी। एक कच्ची सड़क थी जो उसे दूर एक बड़े गांव के साथ मिलाती थी।
चौधरी मौजू हर महीने दो बार अपनी घोड़ी पर सवार होकर गांव में जाता था जिसमें दो तीन दुकानें थीं। उन्हीं दुकानों से वह जरूरत की चीजें ले आया करता था।
पहले वह बहुत खुश रहता था, उसे कोई गम नहीं था। दो तीन साल उसे इस ख्याल ने अलबत्ता जरूर सताया था कि उसके कोई बेटा होता लेकिन फिर उसने यह सोच कर अपने आप को तसल्ली दे दी थी कि जो अल्लाह को मंजूर होता है वही होता है। अब जिस दिन से उसने अपनी बीवी को तलाक देकर उसके मायके भेज दिया था, उसकी जिंदगी सूखा हुआ चमन-सी बन कर रह गई थी। सारी ताजगी जैसे उसकी बीवी अपने साथ ले गई थी।
चौधरी मौजू मजहबी आदमी था, हालांकि उसे अपने मजहब के बारे में सिर्फ दो-तीन चीजों का ही पता था कि खुदा एक है जिसकी बंदगी लाजिमी है। मुहम्मद उसके रसूल हैं जिनके हुक्मों का पालन करना फर्ज है। और कुरान-पाक खुदा का कलाम है जो मुहम्मद पर उतरा, और बस।
नमाज-रोजे के बारे में उसे मालूम था। गांव बहुत छोटा था जिसमें कोई मस्जिद नहीं थी, सिर्फ दस-पंद्रह घर थे। वे भी एक दूसरे से दूर-दूर। लोगबाग बात बात पर अल्लाह की दुहाई दिया करते थे, उसके दिल में उस पाक जात का खौफ था मगर उससे ज्यादा और कुछ नहीं था। करीब-करीब हर घर में कुरान मौजूद थी, मगर पढ़ना कोई भी नहीं जानता था। सबने उसे धार्मिक आस्था के तौर पर जुजदान लपेट कर किसी ऊंचे ताक में रख छोड़ा था। उसकी ज़रूरत सिर्फ उसी वक्त पेश आती थी जब किसी से कोई सच्ची बात कहलवानी होती थी, या किसी काम के लिए कुरान उठवाना होता था।
गांव में मौलवी की शक्ल तब ही दिखाई देती थी जब किसी लड़के या लड़की की शादी होती थी। मौत पर जनाजे की नमाज वगैरह वे खुद ही अपनी जबान में पढ़ लेते थे। चौधरी मौजू ऐसे मौकों पर ज्यादा काम आता था, उसकी जबान में असर था। जिस अंदाज से वह मरने वाले की खूबियां बयान करता था और उसकी मुक्ति (मोक्ष) के लिए दुआ करता था, वह कुछ उसी का हिस्सा था।
पिछले बरस जब उसके दोस्त दीनू का जवान लड़का मर गया तो उसकी कब्र में उतर कर मौजू ने बड़े प्रभावी ढंग से यह कहा था, ‘हाय, क्या हसीन जवान लड़का था। थूक फेंकता था तो बीस गज दूर जाकर गिरता था। उसकी पेशाब की धार का तो आसपास क्या गांव-खेड़े में भी कोई मुकाबला करने वाला मौजूद नहीं था और बेनी पकड़ने में तो जवाब नहीं था उसका। यों घिसनी का नारा मारता और दो उंगलियों से यों बेनी खोलता जैसे कुरते का बटन खोलते हैं। दीनू यार, तुझ पर आज कयामत का दिन है …. तू कभी यह सदमा बर्दाश्त नहीं करेगा। यारो, इसे मर जाना चाहिए था। ऐसा हसीन जवान लड़का, ऐसा खूबसूरत गबरू जवान! सलोनी-सुंदर और हटीली नार उसको काबू में करने के लिए तावीज-धागे कराती रही मगर जमाना गवाह है दीनू। तेरा लड़का लंगोट का पक्का रहा। खुदा करे उसको जन्नत में सबसे खूबसूरत हूर मिले और वहां भी लंगोट का पक्का रहे। अल्लाह मियां खुश हो कर उस पर और रहमतें उतारेगा-आमीन!’
यह छोटा-सा भाषण सुनकर दस-बीस आदमी, जिसमें दीनू भी शामिल था, दहाड़े मार कर रो पड़े थे। खुद चौधरी मौजू की आंखों से आंसू बह रहे थे।
मौजू ने जब अपनी बीवी फातां को तलाक देना चाहा था तो उसने मौलवी बुलाने की जरूरत नहीं समझी थी। उसने बड़े-बूढ़ों से सुना था कि तीन बार तलाक, तलाक तलाक कह दो तो किस्सा खत्म हो जाता है। चुनांचे उसने वह किस्सा इसी तरह खत्म किया था। मगर दूसरे ही दिन उसे बहुत अफसोस हुआ था, पश्चाताप हुआ था कि यह कैसी गलती हो गई। मियां-बीवी में झगड़े होते ही रहते हैं, मगर तलाक तक नौबत नहीं आती। उसे ध्यान ही नहीं देना चाहिए था। फातां उसे पसंद थी। गो वह अब जवान नहीं थी, लेकिन फिर भी मौजू को उसका जिस्म पसंद था, उसको भी मौजू को जिस्म पसंद था, उसकी बातें पसंद थीं ओर फिर वह उसकी जीनां की मां थी। मगर अब तीर कमान से निकल चुका था जो वापस नहीं आ सकता था। चौधरी मौजू जब भी उसके बारे में सोचता तो उसके चहेते हुक्के का धुआं उसके हलक में कड़वे घूंट बन-बन कर जाने लगता। जीनां खूबसूरत थी, अपनी मां की तरह। उन दो बरसों में उसने एकदम बढ़ना शुरू कर दिया था देखते-देखते जवान मुटियार बन गई थी, जिसके अंग-अंग से जवानी फूट-फूट कर निकल रही थी। चौधरी मौजू को उसके हाथ पीले करने की फिक्र थी। यह ख्याल जब भी उसे सताता तब फातां बेहद याद आती। यह काम वह कितनी आसानी से कर सकती थी।
खाट पर बैठे बैठे चौधरी मौजू ने अपनी तहमद दुरुस्त करते हुए हुक्के से एक लंबा कश लिया और खांसने लगा। खांसने के दौरान किसी की आवाज आई।
चौधारी मौजू ने पलट कर देखा तो उसे सफेद कपड़ों में एक लंबी दाढ़ी वाले बुजुर्ग नजर आए। उसे देखते ही मौजू सोचने लगा कि यह शख्स कहां से आ गया? उस लंबी दाढ़ी वाले बुजुर्ग की आंखें बड़ी-बड़ी और रोबदार थीं जिसमें सुरमा लगा हुआ था। लंबे-लंबे पटे थे उनके और दाढ़ी के बाल खिचड़ी थे-सफेद ज्यादा और काले कम। सिर पर सफेद मुंडासा और कंधे पर रेशम का काढ़ा हुआ बसंती रुमाल। हाथ में चांदी की मूठ वाला मोटा डंडा था, पांव में लाल खाल का नर्म व नाजुक जूता।
चौधरी मौजूं ने जब उस बुजुर्ग को सिर से पैर तक गौर से देखा तो दिल में फौरन ही उसके प्रति श्रद्धा पैदा हो गई। चारपाई पर से जल्दी-जल्दी उठ कर वह उससे फौरन बोला, ‘आप कहां से आए, कब आए?’
बुजुर्ग की कतरी हुई शरई लबों से मुस्कराहट पैदा हुई, ‘फकीर कहां से आएंगे? उनका कोई घर नहीं होता, उनके आने का कोई वक्त मुकर्रर नहीं, उनके जाने का कोई वक्त मुकर्रर नहीं। अल्लाह ताला ने जिधर हुक्म दिया चल पड़े, जहां ठहरने का हुक्म दिया वहीं ठहर गए।’
चौधरी मौजू पर इन शब्दों का बहुत असर हुआ। उसने आगे बढ़ कर उस बुजुर्ग का हाथ बड़े आदर से अपने हाथों में लिया, चूमा, आंखों से लगाया और कहा, ‘चौधरी मौज का घर आपका अपना घर है।’ बुजुर्ग मुस्कराता हुआ खाट पर बैठ गया और अपने चांदी के मूठ वाले डंडे को दोनों हाथों में थाम कर उस पर अपना सर झुका दिया।
‘अल्लाह को जाने तेरी कौन सी अदा पसंद आ गई कि अपने इस हकीर और आरजी बंदे को तेरे पास भेज दिया।’
चौधरी मौजू ने खुश होकर पूछा, ‘तो मौलवी साहब, आप उसके हुक्म से आए हैं?’ मौलवी साहब ने अपना झुका हुआ सिर उठाया और कुपित हो गया, तो क्या हम तेरे हुक्म से आए हैं? हम तेरे बंदे हैं या उसके जिसकी इबादत में हमने पूरे चालीस बरस गुजार कर यह थोड़ा-बहुत रुतबा हासिल किया है?’
चौधरी मौजू कांप गया अपने खास गंवारू लेकिन खुलूस-भरे अंदाज में उसने मौलवी साहब से अपना गुनाह माफ करवाया और कहा, ‘मौलवी साहब, हम जैसे इंसानों से जिनको नमाज पढ़ना भी नहीं आती, ऐसी गलतियां हो जाती हैं। हम गुनहगार हैं, हमें बख्शवाना और बख्शना आपका काम है।’
मौलवी साहब ने अपनी बड़ी-बड़ी सुरमा लगी आंखें बंद की और कहा, ‘हम इसीलिए आए हैं।’
चौधरी मौजू जमीन पर बैठ गया और मौलवी साहब के पांव दबाने लगा। इतने में उसकी लड़की जीनां आ गई। उसने मौलवी साहब को देखा तो घूंघट ओड़ लिया। मौलवी साहब ने मुंदी आंखों से पूछा, ‘कौन है, चौधरी मौजू?’
‘मेरी बेटी, मौलवी साहब, जीनां।’
मौलवी साहब ने अधखुली आंखों से जीनां को देखा और मौजू से कहा, ‘हम फकीरों से क्या पर्दा है, इससे पूछो।’
‘कोई पर्दा नहीं मौलवी साहब, पर्दा कैसा हेगा?’ फिर मौजू जीनां की ओर मुड़ा और उससे बोला, ‘मौलवी साहब हैं जीनां, अल्लाह के खाल बंदे। इनसे पर्दा कैसा? उठा ले अपना घूंघट।’
जीनां ने अपना घूंघट उठा लिया। मौलवी साहब ने अपनी सुरमा लगी आंखें उठा कर भर नजर उसे देखा और मौजू से कहा, ‘तेरी बेटी खूबसूरत है, चौधरी मौजू!’
जीनां शरमा गई। मौजू ने कहा, अपनी मां पर है, मौलवी साहब।’
‘कहां है इसकी मां।’ मौलवी साहब ने एक बार फिर जीनां की जवानी की तरफ देखा।
चौधरी मौजू सिटपिटा गया कि क्या जवाब दें।
मौलवी साहब ने फिर पूछा, ‘इसकी मां कहां है चौधरी मौजू?’
मौजू ने जल्दी से कहा, ‘मर चुकी है।’
मौलवी साहब की नजरें जीनां पर गड़ी थी। उसके प्रतिक्रिया भांप कर उन्होंने मौजू से कड़क कर कहा, ‘तू झूठ बोलता है।’
मौजू ने मौलवी साहब के पांव पकड़ लिए और शर्मिंदगी भरे अंदाज में बोला, ‘जी हां…. जी हां… मैंने झूठ बोला था। मुझे माफ कर दीजिए। मैं बड़ा झूठा आदमी हूं। मैंने उसे तलाक दे दिया था, मौलवी साहब।’
मौलवी साहब ने एक लंबी हूं की और नजरें जीनां की चदरिया से हटाते हुए मौजू को संबोधित किया, ‘तू बहुत बड़ा गुनाहगार है। क्या कसूर था उस बेजबान का?’
मौजू शर्म में डूबा हुआ सा बोला, ‘कुछ नहीं मौलवी साहब। मामूली-सी बात थी जो बढ़ते-बढ़ते तलाक तक पहुंच गई। मैं वाकई गुनहगार हूं। तलाक देने के दूसरे दिन ही मैंने सोचा था कि मौजू तूने यह क्या झक मारी। पर तब तक कुछ भी नहीं हो सकता था, चिड़िया खेत चुग चुकी थीं।’
मौलवी साहब ने चांदी की मूठ वाला असा मौजू के कंधे पर रख दिया, ‘अलह तबारक ताला की जात बहुत बड़ी है।वह रहीम है, वह करीम है। वह चाहे तो हर बिगड़ी बना सकता है। उसका हुक्म हुआ तो यह हकीर-फकीर तेरी निजात के लिए कोई रास्ता ढूंढ निकालेगा।’
एहसान में दबा चौधरी मौजू मौलवी साहब की टांगों के साथ लिपट गया और रोने लगा। मौलवी साहब ने जीनां की तरफ देखा। उसकी आंखों से भी आंसू बह रहे थे।
‘इधर आ लड़की।’ मौलवी साहब के स्वर में ऐसा आदेश था जिसकी रद्द करना जीनां के लिए नामुमकिन था। रोटी और लस्सी एक तरफ रख कर वह खाट के पास चली गई। मौलवी साहब ने उसे बाजू से पकड़ा और कहा, ‘बैठ जा।’
जीनां जमीन पर बैठने लगी तो मौलवी साहब ने उसका बाजू ऊपर खींचा, ‘इधर मेरे पास बैठ।’
जीनां सिमट कर मौलवी साहब के पास बैठ गई। मौलवी साहब ने उसकी कमर में हाथ देकर उसे अपने करीब कर लिया और जरा दबा कर पूछा, ‘क्या लाई है तू हमारे खाने के लिए?’
जीनां ने एक तरफ हटना चाहा, मगर गिरफ्त मजबूत थी। उसको जवाब देना पड़ा ‘जी ….. जी रोटियां, साग और लस्सी।’
मौलवी साहब ने जीनां की पतली मजबूत कमर अपने हाथ में एक बार फिर दबाई। जीनां उठ कर चलने को हुई तो मौलवी साहब ने मौजूद के कंधे से अपना चांदी का मूठ वाला असा नन्हीं-सी थपक के बाद उठा लिया।
‘उठ मौजू, हमारे हाथ धुला।’
मौजू फौरन उठा। पास ही कुआं था, पानी लाया और मौलवी साहब के हाथ एक मुरीद की तरह धुलाए। जीनां ने चारपाई पर खाना रख दिया।
मौलवी साहब सब का सब खा गए और जीनां को हुक्म दिया कि वह उनके हाथ धुलाए। जीनां हुक्म-उदूली नहीं कर सकती थी, क्योंकि मौलवी साहब की शक्ल-सूरत और उनकी बातचीत का अंदाज ही कुछ ऐसा आदेशपूर्ण था।
मौलवी साहब ने डकार लेकर बड़े जोर से ‘अलहम्दोल्लिहा’ कहा और दाढ़ी पर गीला-गीला हाथ फेरा। एक और डकार ली और चारपाई पर लेट गए। एक आंख बंद करके दूसरी आंख से जीनां की ढलकी हुई चुनरिया की तरफ देखते रहे। उसने जल्दी-जल्दी बर्तन समेटे और चली गई। मौलवी साहब ने आंखें बंद की और मौजू से कहा, ‘चौधरी, अब हम सोएंगे।’
चौधरी कुछ देर तक उनके पांव दबाता रहा। जब उसने देखा कि वह सो गए हैं तो एक तरफ जाकर उसने उपले सुलगाए और चिलम में तंबाकू भर कर भूखे पेट हुक्का पीना शुरू कर दिया।
मौजू खुश था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी जिंदगी का कोई बहुत बड़ा बोझ दूर हो गया है। उसने दिल ही दिल में अपने खास गंवारू किंतु निष्ठापूर्ण स्वर में अल्लाहताला का शुक्र अदा किया जिसने अपनी तरफ से मौलवी साहब की शक्ल में रहमत का फरिश्ता भेज दिया।
पहले उसने सोचा कि मौलवी साहब के पास ही बैठा रहे, क्योंकि शायद उनको किसी खिदमत की जरूरत हो। मगर जब देर हो गई और वह सोते रहे तो वह उठ कर अपने खेत में चला गया और अपने काम में जुट गया।
उसे इस बात का बिलकुल ख्याल नहीं था कि वह भूखा है। उसे तो बल्कि इस बात की बेहद खुशी हुई थी कि उसका खाना मौलवी साहब ने खाया और उसे इतना बड़ा सौभाग्य प्राप्त हुआ।
शाम से पहले-पहले जब वह खेत से वापस आया तो उसे यह देखकर बड़ा दुख हुआ कि मौलवी साहब मौजूद नहीं। उसने अपने आपको बहुत धिक्कारा कि वह क्यों चला गया। उनके हुजूर में बैठा रहता। शायद वह नाराज होकर चले गए हों और कोई बद्दुआ भी दे गए हो।। जब चौधरी मौजू ने यह सोचा तो उसकी रूह कांप गई, आंखों में आंसू आ गए।
उसने इधर-उधर मौलवी साहब को तलाश किया, मगर वह न मिले। गहरी शाम हो गई। फिर भी उसका कोई सुराग न मिला। थक-हार कर अपने ही दिल ही दिल कोसता और लानत-मलामत करता, वह गर्दन झुकाए घर की तरफ जा रहा था कि उसे दो जवान लड़के घबराए हुए मिलें।
चौधरी मौजू ने उसे घबराहट की वजह पूछी तो पहले तो टालना चाहा मगर फिर असल बात बता दी कि वे घूरे में दबा हुआ शराब का घड़ा निकाल कर पीने वाले थे कि एक नूरानी सूरत वाले बुजुर्ग एकदम वहां प्रकट हुए और बड़ी गजबनाक निगाहों से उनको देख कर पूछा कि वे यह क्या हरामकारी कर रहे हैं? जिस काम को अल्लाह तबारक ताला ने हराम करार दिया है वे उसे पी कर इतना बड़ा गुनाह कर रहे हैं जिसका कोई प्रायश्चित नहीं। उन लोगों को इतनी जुर्रत न हुई कि कुछ बोलें, बस सिर पर पांव रख कर भागे और यहां आकर दम लिया। चौधरी मौजू ने उन दोनों को बताया कि वह नूरानी सूरत वाले वाकई अल्लाह के पहुंचे हुए बुजुर्ग थे। फिर उसने अंदेशा जाहिर किया कि अब जाने उस गांव पर क्या कहर नाजिल होगा। एक उसने उनको छोड़ कर चले जाने की बुरी हरकत की, एक उन्होंने कि हराम चीज निकाल कर पी रहे थे।
‘अब अल्लाह ही बचाए! अब अल्लाह ही बचाए मेरे बच्चो!’ यह बड़बड़ता चौधरी मौजू घर की आरे रवाना हुआ। जीनां मौजूद थी, पर उसने उससे कोई बात न की और खाट पर बैठ कर खामोश हो हुक्का पीने लगा। उसके दिल व दिमाग में एक तूफान बरपा था। उसको यकीन था कि उस पर और गांव पर जरूर खुदा की कोई आफत आएगी।
शाम का खाना तैयार था। जीनां ने मौलवी साहब के लिए भी पका रखा था। जब उसने अपने बाप से पूछा कि मौलवी साहब कहां हैं तो उसने बड़े दुख-भरे स्वर में कहा, ‘गए, चले गए। उनका हम गुनहगारों के यहां क्या काम?’
जीनां को अफसोस हुआ, क्योंकि मौलवी साहब ने कहा था कि कोई ऐसा रास्ता ढूंढ निकालेंगे जिससे उसकी मां वापस आ जाएगी। पर वह जा चुके थे। अब रास्ता ढूंढ़ने वाला कौन था? जीनां खामोशी से पीढ़ी पर बैठ गई। खाना ठंडा होता रहा। थोड़ी देर के बाद ड्योढ़ी में आहट हुई। बाप-बेटी दोनों चौंके। मौजू उठ कर बाहर गया और कुछ क्षण में वह और मौलवी साहब दोनों अंदर आंगन में थे। दीये की धुंधलीरोशनी में जीनां ने देखा कि मौलवी साहब लड़खड़ा रहे हैं। उसके हाथ में एक छोटा-सा मटका है।
मौजू ने उनको सहारा देकर चारपाई पर बिठाया। मौलवी साहब ने घड़ा मौजू को दिया और लड़खड़ाते स्वर में कहा, ‘आज खुदा ने हमारा बहुत बड़ा इम्तहान लिया। तुम्हारे गांव के दो लड़के शराब का घड़ा निकाल कर पीने वाले थे कि हम पहुंच गए। वे हमें देखते ही भाग गए। हमको बहुत सदमा हुआ कि इतनी छोटी उम्र और इतना बड़ा गुनाह! लेकिन हमने सोचा कि इसी उम्र में तो इंसान रास्ते से भटकता है। चुनांचे हमने उनके लिए अल्लाह ताला के हुजूर में गिड़गिड़ा कर दुआ मांगी कि उनका गुनाह माफ किया जाए। जानते हो क्या जवाब मिला?’
‘मौजी ने कांपते हुए कहा, ‘जी नहीं।’
‘जवाब मिला, क्या तू उनका गुनाह अपने सर लेता है?’ मैंने अर्ज की ‘हां, बारी ताला!’ आवाज आई, तो जा, यह सारा घड़ा शराब का तू पी। हमने उन लड़कों को बख्शा।’
मौजू एक ऐसी दुनिया में चला गया जो उसकी अपनी कल्पना की उपज थी। उसके रोंगटे खड़े हो गए, ‘तो आपने पी?’
मौलवी साहब का स्वर और अधिक लड़खड़ाने लगा, ‘हां पी। पी, उनका गुनाह अपने सिर लेने के लिए पी। रब्बुल इज्जत की आंखों में कामयाब होने के लिए पी। घड़े में और भी पड़ी है। यह भी हमें पीनी है। रख दे इसे संभाल कर और देख उसकी एक बूंद इधर-उधर न हो।’ मौजू ने घड़ा उठा कर अंदर कोठरी में रख दिया और उसके मुंहपर कपड़ा बांध दिया। वापस सहन में आया तो मौलवी साहब जीनां से अपना सर दबवा रहे थे और उससे कह रहे थे, जो आदमी दूसरों के लिए कुछ करता है, अल्लाह उससे बहुत खुश होता। वह इस वक्त तुझ से भी खुश है। हम भी तुझ से खुश हैं।’
और इसी खुशी में मौलवी साहब ने जीनां को अपने पास बिठा कर उसकी पेशानी चूम ली। उसने उठना चाहा, मगर उनकी पकड़ मजबूत थी। मौलवी साहब ने उसे अपने गले से लगा लिया और मौजू से कहा, ‘चौधरी, तेरी बेटी का नसीब जाग उठा है।’
चौधरी सर से पैर तक उनका आभारी था।
‘यह सब आपकी दुआ है, आपकी मेहरबानी है।’
मौलवी साहब ने जीनां को एक बार फिर अपने सीने के साथ भींचा, ‘अल्लाह मेहरबान, सो कुल मेहरबान। जीनां, हम तुझे एक वजीफा (मंत्र) बताएंगे, वह पढ़ा करना। अल्ला हमेशा मेहरबान रहेगा।’ दूसरे दिन मौलबी साहब बहुत देर से उठे। मौजू डर के मारे खेत पर न गया। सहन में उनकी चारपाई के पास बैठा रहा। जब वह उठे तो उनको दातून करवाई, नहलाया-धुलाया और उनके आदेशानुसार शराब का घड़ा लाकर उसने पास रख दिया। मौलवी साहब ने कुछ पढ़ा, घड़े का मुंह खोल कर उसमें तीन बार फूंका और दो-तीन कटोरे चढ़ा गए। ऊपर आसमान की तरफ देखा, कुछ पढ़ा और बुलंद आवाज में कहा, ‘हम तेरे हर इम्तहान में पूरे उतरेंगे मौला!’
फिर वह चौधरी से बोले, ‘मौजू, जा हुक्म मिला है अभी जाकर अपनी बीवी को ले आ। रास्ता मिल गया है हमें।’
मौजू बहुत खुश हुआ। जल्दी-जल्दी उसने घोड़ी पर जीन कसी और कहा कि वह दूसरे रोज सुबह-सवेरे पहुंच जाएगा। फिर उसने जीनां से कहा कि वह मौलवी साहब की हर ख्वाइश का खयाल करे और खिदमतगुजारी में कसर उठा न रखे। जीनां बर्तन मांजने में व्यस्त हो गई। मौलवी साहब चारपाई पर बैठे उसे घूरते और शराब के कटोरे पीते रहे। उसके बाद उन्होंने जेब से मोटे-मोटे दानों वाली तस्बीह निकाली और फेरनी शुरू कर दी। जब जीनां काम से निपटी तो उन्होंने उससे कहा, ‘जीनां, आओ वजू करो।’
जीनां ने बड़े भोलेपन से जवाब दिया, ‘मुझे नहीं आता, मौलवी जी।’
मौलवी साहब ने बड़े प्यार से उसे झिड़ी दी, ‘वजू करना नहीं आता, क्या जवाब देगी अल्लाह को?’ यह कहकर वह उठे और उसे वजू कराया और साथ-साथ इस ढंग से समझाते रहे कि वह उसके बदन के एक-एक कोने-अंतरे को झांक-झांककर कर देख सकें।
वजू कराने के बाद मौलवी साहब ने जानमाज मांगी। वह न मिली तो फिर डांटा। मगर उसी अंदाज में एक गिलास मंगवाया, फिर जीनां से कहा कि बाहर की कुंडी लगा दे। जब कुंडी लग गई तो उससे कहा कि घड़ा और कटोरा उठा कर अंदर ले आ। वह ले आई।
मौलवी साहब ने आधा कटोरा जीनां को दिया और आधा अपने सामने रख लिया और तस्बीह फेरनी शुरू कर दी। जीनां उनके पास खामोश बैठी रही।
बहुत देर तक मौलवी साहब आंखें बंद किए उसी तरह वजीफा यानी मंत्र पढ़ते रहे। फिर उन्होंने आंखें खोली, कटोरा जो आधा भरा था उसमें तीन फूंकें मारी और जीनां की तरफ बढ़ा दिया, ‘पी जाओ इसे।’
जीनां ने कटोरा पकड़ लिया, मगर उसके हाथ कांपने लगे। मौलवी साहब ने बड़े जलाल भरे अंदाज में उसकी तरफ देखा, ‘हम कहते हैं, पी जाओ। तुम्हारे सारे दलिद्दर दूर हो जाएंगे।’
जीनां पी गई। मौलवी साहब अपने पतले होंठों में मुस्कराए और उससे बोले, ‘हम फिर अपना वजीफा शुरू करते हैं, जब शहादत की उंगली (तर्जनी) से इशारा करें तो आधा कटोरा घड़े में से निकाल कर फौरन पी जाना। समझ गई?’
मौलवी साहब ने उसे जवाब का मौका ही नहीं दिया और आंखें बंद करके खुदा के ध्यान में लीन हो गए।
जीनां के मुंह का जायका बेहद खराब हो गया था, ऐसा लगता था कि सीने में आग सी लग गई है। वह चाहती थी कि उठ कर ठंडा-ठंडा पानी पी जाए, पर वह कैसे उठ सकती थी, जलन को हलक और सीने में लिए देर तक बैठी रही।
जैसे ही मौलवी साहब की शहादत की उंगली यकायक उठी, जीनां को जैसे किसी ने सम्मोहित कर दिया हो, वह फौरन आधा कटोरा भर कर पी गई। थूकना चाहा मगर उठ न सकी।
मौलवी साहब उसी तरह आंखें बंद किए तस्वीह के दाने खटाखट फेरते रहे। जीनां ने महसूस किया कि उसका सर चकरा रहा है और जैसे उसको नींद आ रही है। या फिर उसने नीम बेहोशी की स्थिति में यों महसूस किया कि वह किसी बिना दाढ़ी-मूंछ वाले जवान मर्द की गोद में है और वह उसे जन्नत दिखाने ले जा रहा है।
मौलवी साहब ने मौजू को उठाया और उसके कंधे पर हाथ रखा, लेकिन हमने खुदा के हुजूर में गिड़गिड़ा कर दुआ मांगी कि ऐसी कड़ी सजा न दी जाए गरीब को। उससे भूल हो गई है। आवाज आई-हम हर रोज तेरी सिफारिशें कब तक सुनेंगे? तू अपने लिए चाहे जो भी मांग हम देने को तैयार हैं। मैंने अर्ज की, मेरे शहंशाह, मैं अपने लिए कुछ नहीं मांगता। तेरा दिया मेरे पास बहुत कुछ है। मौजू चौधरी को अपनी बीवी से मुहब्बत है। हुक्म मिला, तो हम उसकी मुहब्बत और तेरे ईमान का इम्तहान लेना चाहते है, एक दिन के लिए तू उससे निकाह कर ले, दूसरे दिन तलाक देकर मौजू के हवाले कर दे। हम तेरे लिए बस यही कर सकते हैं। चूंकि तूने चालीस बरस दिल से मेरी इबादत की है।
मौजू खुश हुआ, ‘मुझे मंजूर है, मौलवी साहब! मुझे मंजूर है।’ और फातां की तरफ उसने तमन्नाई आंखों से देखा, ‘क्यों फाता!’ मगर उसने फातां के जवाब का इंतजार न किया, हम दोनों को मंजूर है।’
मौलवी साहब ने आंखें बंद कीं, कुछ पढ़ा, दोनों ने फूंक मारी और आसमान की तरफ नजरें उठाई, ‘अल्लाह हम सबको इस इम्तहान में पूरा उतारे।’ फिर वह मौजू से मुखातिब हुए, ‘अच्छा मौजू, मैं अब चलता हूं। तुम और जीनां आज की रात कहीं चले जाना। सुबह-सवेरे आ जाना।’
जब शाम को मौलवी साहब वापस आए तो उन्होंने जीनां और मौजू से बहुत थोड़ी-सी बातें की। वह कुछ पढ़ रहे थे। आखिर में उन्होंने इशारा किया। जीनां और मौजू फौरन बाहर चले गए।
मौलवी साहब ने कुंडी बंद कर दी। और फातां से कहा, ‘तुम आज की रात मेरी बीवी हो जाओ। जाओ, अंदर से बिस्तर लाओ और मेरी चारपाई बिछाओ। हम सोएंगे।’
फातां ने अंदर कोठरी से बिस्तर लाकर बड़े सलीके से लगा दिया। मौलवी साहब ने कहा, ‘बीवी, तुम बैठो हम अभी आते हैं।’
यह कह कर वह कोठरी में चले गए। अंदर दीया जल रहा था। कोने में बर्तनों के पास उनका घड़ा रखा था। उन्होंने उसे हिला कर देखा, थोड़ी सी बाकी थी। घड़े के साथ ही मुंह लगाकर उन्होंने कई बड़े-बड़े घूंट लगाए। कंधे से रेशमी फूलों वाला बसंती रुमाल उतार कर मूंछ और होंठ साफ किए और दरवाजा भेड़ दिया। फातां चारपाई पर बैठी थी। काफी देर के बाद मौलवी साहब निकले। उनके हाथ में कटोरा था। उसमें तीन दफा फूंक कर उन्होंने फातां को पेश किया, ‘लो इसे पी जाओ।’
फातां पी गई। कै आने लगी तो मौलवी साहब ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा, ‘ठीक हो जाओ फौरन।’
फातां ने कोशिश की और किसी कद्र ठीक हो गई। मौलवी साहब लेट गए।
सुबह-सवेरे जीनां और मौजू आए तो उन्होंने देखा कि सहन में फातां सो रही है, मगर मौलवी साहब मौजूद नहीं। मौजू ने सोचा, बाहर गए होंगे खेतों में। उसने फातां को जगाया। फातां ने गूं-गूं करके आहिस्ता-आहिस्ता आंखें खोलीं फिर बड़बड़ाई, ‘जन्नत-जन्नत!’ लेकिन जब उसने मौजू को देखा तो पूरी आंखें खोल कर बिस्तर पर बैठ गई।
मौजू ने पूछा, ‘मौलबी साहब कहां हैं?’
फातां अभी तक पूरे होश में नहीं थी, ‘मौलवी साहब? कौन मौलवी साहब? …. वह तो … पता नहीं कहां गए? यहां नहीं हैं?’
‘नहीं,’ मौजू ने कहा, मैं देखता हूं, उन्हें बाहर।’
वह जा रहा था कि उसे फातां की हल्की-सी चीख सुनाई दी। पलट कर उसने देखा तकिए के नीचे से वह कोई काली-काली चीज निकाल रही है। जब पूरी निकल आई तो उसने कहा, ‘यह क्या है?’
मौजू ने कहा, ‘बाल।’
फातां ने बालों का वह गुच्छा फर्श पर फेंक दिया। मौजू ने उसे उठा लिया और गौर से देखा, ‘दाढ़ी और पटे।’
जीनां पास ही खड़ी थी, वह बोली, मौलवी साहब की दाढ़ी और पटे।’
फातां ने वहीं चारपाई से कहा, ‘हां मौलवी साहब की दाढ़ी और पटे।’
मौजू अजीब चक्कर में पड़ गया, और मौलवी साहब कहां है?’ लेकिन फौरन ही उनके सरल और नि:स्वार्थ मस्तिष्क में एक ख्याल आया, ‘जीनां, फातां, तुम नहीं समझीं। वह कोई करामाती बुजुर्ग थे, हमारा काम कर गए और यह निशानी छोड़ गए।’
उसने उन बालों को चूमा, आंखों से लगाया और उनको जीनां के हवाले करके कहा, ‘जाओ, इनको किसी साफ कपड़े में लपेट कर संदूक में रख दो। खुदा के हुक्म से घर में बरकत ही बरकत रहेगी।’
जीनां अंदर कोठरी में गई तो वह फाता के पास बैठ गया और बड़े प्यार से कहने लगा, ‘मैं अब नमाज पढ़ना सीखूंगा और बुजुर्ग के लिए दुआ किया करूंगा जिसने हम दोनों को फिर से मिला दिया।’
फातां खामोश रही।
