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चुमनू उरांव-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं झारखण्ड: Elephant Story
Chumnu Urav

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Elephant Story: जमशेदपुर शहर में बहकर दो नदियां खरकाई और सुवर्णरेखा आती हैं और वे मिलकर एक हो जाती हैं। एक बड़ा सा पहाड़ है दलमा और उसकी तराई में बड़ा-सा अभयारण्य है, जहां बड़ी संख्या में हाथियों का निवास है। जंगल रोज-रोज कट और उजड़ रहे हैं। जंगली हाथी अक्सर भटक कर गांवों की तरफ निकल आते हैं और ग्रामीणों की जान के दुश्मन बन जाते हैं। कहते हैं हाथियों का उत्पात जंगल का एक चर्चित व्यक्ति चुमनू उरांव के मरने के बाद शुरू हुआ है। जब तक वह रहा जंगल को उजड़ने से बचाता रहा। उसके तीर-धनष का निशाना अचक था। मजाल नहीं कि उसके रहते कोई जंगल में शिकार कर ले या किसी पेड़ की टहनी काट ले। हाथी या हिरण उसके बुलाने पर दौड़े चले आते थे और उसे सूंघने-चाटने लगते थे। चुमनू उरांव 100 साल की उम्र जीकर परलोक सिधार गया। वह दलमा की चोटी पर एक झोपड़ी बनाकर रहता था। वहां एक मंदिर भी बन गया है और एक बाबा सहित उनके कई चेले-चपाटी और उनकी पाली हुई गायें रहने लगी हैं। कंपनी ने वहां एक हिल स्टेशन भी बना लिया है। सप्ताहांत मनाने या पिकनिक करने लोग वहां अक्सर जाने लगे हैं।

चुमनू कहा करता था कि कारखाने की अधिकांश जमीनें उसी की हैं। जहां ब्लास्ट फर्नस नं. 1 बैठा है वहां एक पीपल के नीचे उसके कुलदेवता का निवास था और उसी के पार्श्व में स्थित अपने मिट्टी के घर में उसका जन्म हुआ था। चुमनू को कई लोगों ने देखा था कि रात में वह कंपनी की चिमनियों की ओर मुंह करके कुछ बड़बड़ाया करता है। कहते हैं कुलदेवता कारखाने की चिमनी के शीर्ष पर उसे नजर आते थे और उन्हीं से वह बातें करता था। लोग जब पूछते थे कि वह क्या बातें करता है तो चुमनू कहता था कि वह नहीं दलमा पहाड़ बातें करता है खरकाई नदी से। वह एक अर्से से घोषित करता रहा था कि दलमा खरकाई से बेइंतहा मोहब्बत करता है। लोगों को सुनकर ताज्जुब नहीं होता था। एक किंवदंती में ढल चुके चुमनू उरांव को जानने वाले यकीन करने लगे थे कि वह आदमियों से ज्यादा पशु-पक्षियों, पेड़-पहाड़ों और नदी-नालों की भाषा ज्यादा सुनने-गुनने और जानने-समझने लगा है।

कंपनी के अधिकारी शहर में एक अच्छा घर देकर चुमनू को बसाने के लिए वर्षों मनाते रहे, लेकिन वह राजी नहीं हुआ। जब उसके छोटे-छोटे तीन बेटे बड़े हो गये तो वे अपने बाप को छोड़कर कंपनी के दिये घर में शिफ्ट हो गये और कारखाने में बहाली ले ली। चुमनू के साथ उसकी बूढी पत्नी रह गयी, जिसके गुजर जाने के बाद वह अकेला होकर भी उसी जगह पर कायम रहा।

कहते हैं जब चुमनू उरांव मरा तो कारखाने का सायरन जोर-जोर से बज उठा। पूरा इलाका यह आकस्मिक सायरन सुनकर किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत हो उठा। सायरन कैसे बजा, किसी को पता नहीं चल सका। इन्क्वायरी करायी गयी फिर भी कोई सुराग नहीं मिल पाया।

सुबह खबर आयी कि चुमनू उरांव स्वर्ग सिधार गया। कंपनी प्रबंधन ने एक बड़ी तैयारी के साथ उसका अंतिम संस्कार करवाया। हजारों लोग उसकी शवयात्रा में उमड़ पड़े। लोक-जीवन में उससे जुड़े इतने किस्से प्रचलित हो चुके थे कि हर कोई एक बार उसकी झलक पा लेना चाहता था।

पहाड़ की तलहटी में बसे कुछ गाँवों के लोग आज भी बताते हैं कि किसी-किसी रात ऊपर से बड़बड़ाने की आवाजें उभरने लगती हैं। यह बताना मुश्किल है कि चुमनू अपने कुलदेवता से बातें करता है या फिर दलमा पहाड़ खरकाई नदी से प्रेमालाप करता है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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