Dora
Dora

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक घना जंगल था। चिड़ियों की किलकारियों से गूंज रहा था पूरा जंगल। मानो जैसे शोर मचा हुआ है। उसी बीच भी सुनाई दे रही थी एक और आवाज, किसी की रोने की आवाज। झरने के पास एक टोकरी में सोता हुआ एक नवजात शिशु रो रहा था।

उसी झरने के पास वाले इलाकों में चिम्पांजियों का एक झुंड रह रहा था। उनके साथ कुछ हाथी और हिरण भी रह रहे थे। सारे चिम्पांजी पेड़ की डालियों में खेल-कूद कर बड़े मजे से रह रहे थे। रोज पानी पीने उसी झरने पर जाते थे। उस झरने का पानी बहुत ही ठंडा और मीठा था। ये चिम्पांजी खाली पानी नहीं पीते थे, उसके साथ उसके फव्वारे में नहाते और खेलते भी थे।

उसी दिन एक चिम्पांजी उसी झरने का पानी पीने गया था। जब वो वहां पहुंचा तो उसे एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वह हड़बड़ा गया और चारों और देखने लगा। मगर कुछ नजर नहीं आया। अब जब बार-बार उसे रोने की आवाज सुनाई दी तो वो बडी सतर्कता के साथ ढूंढने लगा। अंतिम में उसको मिला कि वह जहाँ खडा है, झरने के उस पार एक टोकरी में एक नवजात शिशु लेटे हुए बड़े जोर से रो रहा है। उस बच्चे को देखकर चिम्पांजी की ममता जाग उठी और उसके प्यारे-से चेहरे को देखकर वह पिघल गया।

उसने टोकरी में से बच्चे को उठाया, पर चिम्पांजी को देखकर बच्चा डर गया और जोर-जोर से रोने लगा। उसने बहुत कोशिश की बच्चे को चुप करवाने की, पर वो चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। फिर उसने उस झरने से कुछ पानी लाकर उसे पिलाया। पानी पीते ही बच्चा पूरी तरह चुप हो गया। फिर चिम्पांजी उसे अपने साथ घर ले गई। वहाँ अन्य चिम्पांजी इस मानव शिशु को देखकर आश्चर्यचकित रह गये। मगर उस नन्हीं-सी जान के प्यारे-से चेहरे ने सबको खुश कर दिया। उस बच्चे को चिम्पांजी अपने बच्चे की तरह पालने लगी। दूसरे चिम्पांजी ने भी उसकी मदद की। हर वक्त उसके पास रह कर उसकी देखभाल करने लगे। सबने उस बच्चे का नाम रखा “डोरा”। उसी जंगल के आंगन में डोरा पलने और बढ़ने लगा।

देखते-देखते बीत गये पूरे दस साल। एक दिन कुछ लोग जंगल में आये। घूमने के बहाने कुछ और उद्देश्य के लिए ये लोग जंगल में आते हैं। ये सब एक सर्कस दल के सदस्य थे। जंगल में जाल बिछाकर जानवरों को फंसाते हैं और उन्हें प्रशिक्षण करा के उनसे सर्कस दिखाते हैं।

उस दिन भी इसी उद्देश्य से जंगल में जाल बिछाये गये थे। तब डोरा जंगल में घूम रहा था। वह अनजाने में उनके जाल में फंस गया। और रस्सी से उसके पैर बंधे हुए एक पेड़ पर उल्टा लटक गया। दर्द से वह चिल्लाता रहा, पर अपने इलाके से बहुत दूर आ गया था इसलिए उसकी चीख चिम्पांजियों तक नहीं पहुंच पाई। इस बार कोई नया जानवर फंसा है उनके जाल में, ये सोचकर वो लोग भी मन ही मन बहुत खुश हो गये। पर जब उन्होंने डोरा को देखा तो चकित हो गए, इस तरह के अजीब लड़के को देखकर। डोरा भी उन लोगों को देखकर आश्चर्यचकित हो रहा था। बड़ी-बड़ी आंखों से बस देख रहा था। जब उसको पेड़ से उतारा तो उसने लोगों पर आक्रमण करने का प्रयत्न किया। तभी बड़ी चालाकी से सबने मिलकर डोरा को काबू में ले लिया और उसे कैद कर शहर ले गये।

इधर बहुत देर तक डोरा वापस न लौटने पर चिंतित चिम्पांजी उसे इधर-उधर ढूंढने लगा। पर कहीं नहीं मिला। दूसरे चिम्पांजी भी डोरा को चारों तरफ ढूंढने लगे। ढूंढते-ढूंढते वे सब वहां पहुंचे, जहां डोरा फंसा हुआ था। वहां पर टूटी रस्सी को देखकर उन चिम्पांजियों को समझने में कोई गलती नहीं रही। और निराश हो कर चिम्पांजी वहां बैठ गया। दर्द से उसकी आंखों से दो बूंद गिर गये। वे जानवर इनसान उसके डोरा को ले गये, ये सोच-सोच कर बहुत रोने लगी। दर्द से वह चिल्लाने लगी। इतनी जोर से चिल्लाने लगी कि दूसरे चिम्पांजी भी वहां इकट्ठा हो गए। सब मिलकर उसे गले लगाकर दिलासा देने लगे। सब कछ जानते हए भी वे सब लाचार थे। ना कुछ कर पाते थे और डोरा को वापस लाना मुश्किल भी लग रहा था।

यहां ये लोग डोरा को तरह-तरह के दर्द देकर अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश में लगे हुए थे। उसके बाद उसका प्रशिक्षण शुरू हो गया। जैसे ही वक्त गुजरने लगा, डोरा का प्रशिक्षण और भी कठिन होता गया। लेकिन डोरा अपनी चिम्पांजी मां को मन ही मन बहुत याद करता था। इधर चिम्पांजी मां भी डोरा को बहुत याद करती है और उस जगह पर रोज जाती हैं, जहाँ से इनसान डोरा को ले गये थे। वहां थोड़ा बैठती और डोरा को याद करके बहुत रोती। जब उसका मन थोड़ा हल्का हो जाता है, तब वापस चली आती।

इन्हीं बीच डोरा पूरी तरह से एक संपूर्ण प्रशिक्षित “जोकर” बन चुका होता है। अब वह एक के बाद एक सर्कस मे जाकर अपने चमत्कार प्रदर्शन से लोगों का दिल बहलाने लगा। लोग उसे और उसकी कला कौशल को खूब अपनाने लगे। इतनी मात्रा से लोग पसंद करने लगे कि उस सर्कस दल की मांग दिन-प्रतिदिन बहुत बढ़ने लगी और उसके साथ उनका व्यापार भी ऐसे ही दिन-ब-दिन गुजरने लगे।

श्री निशिकांत चौधरी नामक एक बहुत बड़े व्यापारी थे। एक दिन वह इसी सर्कस दल की एक कला देख रहे थे। जिसमें डोरा ही प्रदर्शन कर रहा होता है। उसके प्रदर्शन में वह इतने प्रभावित हो गये कि वह भी बह गये। फिर उन्होंने उस सर्कस के मालिक से मिलकर डोरा को अपने साथ अपने घर ले जाने का प्रस्ताव दिया। मगर वह मालिक इतनी आसानी से चौधरी जी की बात नहीं माना। इसके बाद चौधरी जी ने डोरा के बदले में एक मोटी रकम देने की वादा किया। फिर भी वह लालची सर्कस का मालिक नहीं माना। बड़ी मुश्किल से उसने एक शर्त पर डोरा को ले जाने दिया। वह शर्त यह थी कि डोरा को हर हफ्ते सर्कस दिखाने के लिए आना होगा और डोरा को ले जाने के बदले उन्हें नगद 10 लाख रुपये देने होंगे। अंतिम में चौधरी जी ने सारे समझौते-पत्र पर हस्ताक्षर करके डोरा को अपने साथ अपने घर ले गये।

जब चौधरी बाबू डोरा को लेकर घर पहुंचे, उनकी पत्नी सुनंदा डोरा को देखकर चकित हो गई। और पूछने लगी, ये कौन है? ये किस को तुम अपने साथ ले आये हो? चौधरी जी ने जवाब दिया, तुम्हारा बेटा। बस यही सुनकर उनकी पत्नी ने खुशी से डोरा को गले लगा लिया। पहली बार एक नि:सन्तान मां बच्चे के स्पर्श से ही खुशी के आंसुओं से भर गई। बहुत प्यार से डोरा को सारे सुख देकर उसको पालने लगी। बचपन से जंगल में बड़ा हुआ डोरा कभी कुछ बोल नहीं सकता था, पर कभी-कभी अजीब-अजीब आवाज करता था। इतनी सारी खुशियां मिलकर भी डोरा खुश नहीं था। रोज वह रात को अपनी चिम्पांजी मां को बहुत याद करता था और उसके जीवन में घट रही घटनाओं को सोच-सोच कर बहुत व्यथित भी हो रहा था।

डोरा हर दिन मुंह लटका कर बैठा रहता था। जितना भी कोशिश करो, वो लोग डोरा को खुश नहीं कर पाते थे। फिर उन्होंने सोचा कि अगर डोरा को कहीं बाहर घुमा ले आए तो उसका मन बदल सकता है। एक दिन चौधरी बाबू और उनकी पत्नी डोरा को लेकर एक जंगल घूमने गये। और वे उसी जंगल जा रहे थे जहाँ डोरा रहता था। सब लोग एक जीप में बैठ कर जंगल के अन्दर गये। जीप की गड़गड़ाहट आवाज से पूरे जंगल में हलचल मच गयी।

रोज की तरह डोरा की चिम्पांजी मां उसी जगह पर बैठ कर उसे याद कर रही थी। अचानक उसे एक जीप के आने की आवाज सुनाई दी। वह विचलित हो उठी। फिर से कोई इनसान आ कर उनके सुख संसार को उजाड़ ना दे इसलिए चिल्ला कर उसने सारे चिम्पांजी दोस्तों को इकट्ठा कर दिया। और सब मिलकर उस जीप पर आक्रमण करने निकले। वो लोग उस जीप पे जब हमला करने बढ़े तो उन चिम्पांजियों ने डोरा को देखा। डोरा को देखते ही सब दंग रह गये। डोरा भी अपने सामने अपनी चिम्पांजी मां को देखकर बहुत खुश हो गया और जीप से उतर कर उसकी तरफ भागने लगा। खुशी से गले लगा लिया अपनी चिम्पांजी मां को। मां चिम्पांजी भी खुशी के मारे बहुत रोने लगी। वहां खडे सारे चिम्पांजी भी खुशी के आंसू रोने लगे। वहां हो रही सारी घटनाओं को देख रहे थे चौधरी बाबू और उनकी पत्नी। ये सब क्या हो रहा है देखकर आश्चर्यचकित थे। सुनंदा जी ये सब देखकर और सह नहीं पाई। डोरा को वापस ले जाने के लिए जब जीप से उतरने की कोशिश की तब चौधरी जी ने उनको रोक दिया। सुनंदा जी को बोले, तुम ये क्या कर रही हो, सुनंदा? जरा गौर से देखो सुनंदा, यही तो है अपने डोरा की असली खुशी! और सामने था सिर्फ न खत्म होने वाला एक खुशी का माहौल।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’