Social Story: एक प्रतिष्ठित पत्रिका में अपना नाम विजेता में देखकर नेहा खुशी से खिल उठी। वह उसने अपने पति नितिन के गले लग गई “थैंक यू नितिन मुझे फिर से जिंदा करने के लिए, मैं तो मर ही चुकी थी। तुमने मुझे जिंदा कर दिया फिर से।”
“कैसी बातें कर रही हो नेहा। मैं तुम्हें मरने कैसे दे सकता था। वह एक हादसा था उसे भूलने की कोशिश करो । अब जो मिला है उसे अचीव करना सीखो।”
“हम्म…!, एक दीर्घ श्वास लेकर नेहा ने कहा, तुम्हें पता है ना मुझे क्रोशिया किसने सिखाया था मेरे मकान मालकिन आंटी ने। पहले हम लोग जहां रहते थे ना।
वहां ऊपर मकान हम लोग रहते थे और नीचे हमारे घर के मकान मालकिन मालविका आंटी। उनके तीन बेटे ही थे। तीनों ही बड़े अच्छे।सभी पढ़ाई में बहुत ही अच्छे थे, फिर पापा का ट्रांसफर हो गया और हम लोग वहां से चले गए।
तब जब बहुत मैं नादानियां करती थी ना तो आंटी मुझे नीचे बुला लिया करती थी और कहती थी “नेहा लड़कियों में लड़कियों वाले गुण अच्छे लगते हैं ।तू सिलाई, कटाई, बुनाई सब सीख।”
“ मैं उनसे छेड़कर कहती, आंटी इनकी क्या जरूरत है?ये सब क्यों सीखना?”
“नहीं रे इनकी ही जरूरत है लड़कियों को सारे गुण आने ही चाहिए ।
उन्होंने ही मुझे उंगलियां पकड़कर बुनाई सिखाया करती थी।उन्होंने क्रोशिया चलाना भी सिखाया। उन्होंने मुझे शौल, स्वेटर बनाना सब कुछ सिखाया। जब पापा का ट्रांसफर वहां से होने लगा तो उन्होंने मुझे अपने हाथों से बुनकर यह क्रोशिए का बैग दिया था। कितनी खुशी से उन्होंने इसमें 101 रुपया रख कर दिया था।
और कहा था नेहा तू इसे मेरा प्यार समझ कर अपने पास रखना ।
उनकी अपनी बेटी नहीं थी ना तो वह मुझ में अपनी बेटी देखा करती थी!”
नेहा कहती जा रही थी और उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
नितिन उसकी ओर देख रहा था।
कई महीनो के बाद नेहा इतनी खुश थी!
लगभग आठ महीने पहले की बात थी। ऐसा लग रहा था मानो कल की ही बात हो!
नितिन और नेहा, नेहा के माता-पिता के साथ कहीं घूमने जा रहे थे।
रास्ते में एक सड़क दुर्घटना में नेहा के माता-पिता दोनों की ही दोनों की मृत्यु हो गई थी।
पीछे से आ रही एक तेज रफ्तार से चल रही कार की चपेट में उनकी कार आ गई थी।
एक झटके में ही नेहा के माता-पिता दोनों की ही घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई।
उनकी मृत्यु से नेहा को ऐसा सदमा लगा कि उसने अपने पेट के बच्चे को भी खो दिया। इस हादसे में उसे तोड़ कर रख दिया था।
वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई थी। कई दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद अस्पताल ने उसे एक रिहैब सेंटर में रेफर कर दिया था। वहां उसका इलाज भी चला।
इसके साथ ही योगा, मेडिटेशन के कोर्स भी चले मगर कोई फायदा नहीं हुआ।
वह गुमसुम पड़ी रहती, कभी जोर जोर से रोने लगती।
वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी और फिर वह पहली बार मां बनने वाली थी। उसे अपने आने वाले बच्चे का बहुत ही ज्यादा इंतजार था मगर उसने अपने बच्चे को भी खो दिया था।
इन दोनों दुख ने उसे तोड़ कर रख दिया था।
वह अपने डिप्रेशन से बाहर ही नहीं निकलना चाहती थी। नितिन उसकी हालत को देखकर परेशान हो गया था।
नितिन के पिता और नेहा के पिता दोनों बचपन के दोस्त थे।
एक ही गांव से पढ़ लिखकर नेहा के पिता ने एक कॉम्पिटिटिव परीक्षा पास कर लिया था और शहर में अच्छी नौकरी कर रहे थे, वहीं नितिन के पिता अपनी वकालत की पढ़ाई कर अपने पैतृक गांव में ही वकालत कर रहे थे।
स्वभाव से बहुत ही अच्छे विनम्र और मिलनसार नितिन के पिता का एक ही कहना था कि हम बड़े होकर अपने दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल देंगे।
नेहा के माता-पिता को भी इस बात पर कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन अपना प्रण पूरा करने से पहले ही नितिन के माता-पिता दोनों का ही स्वर्गवास हो गया था।
नितिन उस समय स्कूल में ही था। अचानक पड़ी इस आपदा से नितिन टूट कर बिखर गया था और इस मुसीबत की घड़ी में उसके साथ कोई भी नहीं खड़ा था। ना उसके चाचा-चाची ,ताऊ ना मामा मामी।
इस मुसीबत की घड़ी में नेहा के माता-पिता ने ही उसे अपने पास शरण दिया और उसे पढ़ा लिखा कर एक योग्य इंसान बनाया।
उन्होंने अपने दोस्त को जो वचन दिया था उस वचन को पूरा भी किया। अपनी इकलौती बेटी के साथ नितिन की शादी करा कर उन्होंने अपने दोस्ती को पूरा कर लिया था ।
अपने माता-पिता को खोने के बाद नितिन पूरी तरह से नेहा के माता-पिता पर ही निर्भर था। वह उन्हें अपना ही माता-पिता समझता था।
कहने को तो कई रिश्तेदार थे मगर जरूरत पड़ने पर सभी कन्नी काट निकल गए थे।
नेहा अपनी माता-पिता की इकलौती बेटी थी वह जितना प्यार अपने माता-पिता से करती थी उससे कई गुना ज्यादा नितिन उनसे प्यार करता था।
एक सड़क दुर्घटना में जब उन दोनों की मृत्यु हो गई तो नितिन के दुख का पारावार ना रहा था लेकिन नेहा की हालत इतनी बुरी थी कि उसने अपने दुख को दरकिनार कर नेहा को ही संभालते लगा था मगर नेहा की हालत सुधरने का नाम ही नहीं ले रही थी ।
डॉक्टर पर डॉक्टर! यहां वहां भटकने के बाद एक डॉक्टर ने नितिन से कहा
“नेहा को मानसिक रूप से स्वस्थ करने के लिए उसे किसी ऐसे काम में उलझा दीजिए जिससे वह बहुत ज्यादा पसंद करती हो।”
नेहा को गार्डनिंग का शौक था, घूमने फिरने का भी शौक था। नितिन उसे गार्डनिंग के लिए प्रोत्साहित करता था और छुट्टियों में उसे अक्सर इधर-उधर घुमाने भी ले जाता था लेकिन नेहा की हालत में कोई परिवर्तन नहीं आ रहा था ।
एक दिन अपनी अलमारी तलाश करते हुए नितिन की हाथ क्रोशिए का बैग आ गया, इसके बारे में नेहा उसे कई बार बता चुकी थी।
उसे मालविका आंटी ने दिया था। मालविका आंटी से वह भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई थी ।
एक बार नितिन का मन किया कि वह मालविका आंटी को तलाशे लेकिन वह कई साल पहले की बात थी और किसी दूसरे शहर की थी आप वह कहां होगी कुछ पता नहीं।
संयोग से एक महिला पत्रिका में एक बुनाई प्रतियोगिता शुरू हुई थी। नितिन को मौका मिल गया।
उसने खूब सारे रंग बिरंगे धागे और क्रोशिया लाकर नेहा के हाथ में थमा दिया और कहा” देखो नेहा, कितनी बढ़िया प्रतियोगिता शुरू हुई है। तुम्हारे लिए यह एक बढ़िया मौका है मालविका आंटी को याद करने का।”
“आप बिल्कुल ठीक कहते हैं नितिन।”
“बिल्कुल इसी बैग की तरह तुम एक बैग बनाओ जिसमें तुम्हारा प्यार छुपा हो। तुम इस तरह से मालविका आंटी के प्रति एक कृतज्ञता व्यक्त कर पाओगी।”
नेहा की आंखों में आंसू आ गए। उसने बड़ी मेहनत से फूल पत्ते बुनने लगीं।
नेहा ने उसी बैग के अनुरूप एक और बैग बनाया था।
क्रोशिए से रंग बिरंगे धागों से फूल और पत्तियां बनाकर उन्हें जोड़ कर एक बैग की शक्ल दे दिया था।
यह बैग भी बिल्कुल उसी की तरह का था जैसा मालविका आंटी ने नेहा को बुनकर दिया था। बस अंतर यह था कि वह बैग सिंपल और सादे ऊन से बुना हुआ था।
लेकिन नेहा ने अपने बैग में रंग-बिरंगे धागे का प्रयोग किया था। जिसके कारण यह बैग और भी खिलता हुआ नजर आ रहा था।
बुनाई प्रतियोगिता में नेहा को फर्स्ट प्राइज मिला था।इसी क्रोशिए के बैग ने उसे विनर बना दिया था।
वह अपने आप को प्रथम स्थान पर देखकर बहुत ही ज्यादा खुश थी। आज उसे मालविका आंटी की याद आ रही थी।
“ अगर आंटी यह देख लेती तो कितनी खुश होती!”
“ तुम उनसे मिलने की कोशिश करो ।” नितिन उसे समझाते हुए बोला।
आज कितने दिनों बाद नेहा के चेहरे पर खिलती हंसी आई थी ,यह देखकर नितिन बहुत ही ज्यादा खुश था।
“नहीं नितिन उनके तीन बेटे थे और तीनों बहुत ही अच्छे थे पढ़ाई में। बड़े वाले तो शायद विदेश भी चले गए थे। मालविका आंटी भी उनके साथ इधर-उधर चली गई होंगी ।हो सकता है वे लोग विदेश में भी सेटल कर गए होंगे ।”
“हम्म!, शायद तुम ठीक ही रहती हो!नितिन ने लंबी सांस लेते हुए कहा ।
“मैं यह सोच रही हूं अपने माता-पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए मैं वृद्धाश्रम चलती हूं। वहां जाकर बुजुर्ग लोगों को प्रतियोगिता के पैसे से कुछ खाना खिलाकर आ जाते हैं।”
“ बिल्कुल सही, बहुत अच्छे ख्यालात हैं तुम्हारे ।”
कुछ दिनों बाद जब नेहा को प्रतियोगिता से मिली हुई राशि मिल गई तब उसने बढ़िया खाना बनाया।राजमा चावल, रोटी छोले, मिठाई।
सब पैक कर दोनों वृद्धाश्रम के लिए चले गए।
वहां बेसहारा लोगों को देखकर अपने हाथों से खाने का डिब्बा पकड़ाते हुए नेहा बहुत ही खुश हो रही थी ।
तभी उसकी नजर एक बुजुर्ग औरत पर पड़ी जिसके बाल पूरी तरह से सफेद थे। आंखों के नीचे काले घेरे बन गए थे। शक्ल से ही वह बहुत ही दुखियारी लग रही थी।
नेहा उसकी तरह ध्यान से देखने लगी। फिर उसे याद आया “आप मालविका आंटी है ना?”
वह बुजुर्ग औरत घबरा गई।” तुम कौन हो बेटी? एक अरसा बीत गया यह सुने हुए।”
जब सारा खाना बंट गया। उसके बाद मालविका आंटी के पास जाकर वह बैठ गई।
उसने उनसे पूछा “आंटी आप यहां कैसे?”
“ क्या कहूं नेहा बिटिया जिनके तीन-तीन बेटे हों उसकी क्या गति हो सकती है? तीनों बेटों ने मिलकर मुझे यहां पहुंचा दिया। हर महीने कुछ पैसे भेज देते हैं ।”
“नहीं आंटी ,मैं आपके यहां नहीं रहने दूंगी। आप मेरे साथ चलेंगी।”वह उनके गले से लिपट गई।
वृद्धाश्रम के मैनेजमेंट से बात करने के बाद मालविका जी को नितिन और नेहा के साथ रहने का परमिशन मिल गया ।
नितिन ने उन लोगों और मालविका जी से कहा “नेहा अपने माता-पिता को खो चुकी है और इस दुख से उबर नहीं पा रही है। मालविका जी नेहा के साथ रहेंगी तो वह खुश हो जाएगी फिर से जी उठेगी।”
इस बात पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी ।मालविका जी भी खुशी खुशी नेहा और नितिन के साथ उनके घर चली आईं ।
उनके चेहरे से तनाव खत्म होने लगे थे। “आंटी मां पापा वह समय भूल ही नहीं पाए थे जब हम लोग आपके यहां किराए में रहते थे ।मरते दम तक पापा के मुंह पर आप ही का नाम रहता था।”
“ हां बेटा मैं भी तुम लोगों को कहां भूल पाई। तुम लोगों के जाने के बाद जैसे मैं जिंदगी से ही जुदा हो गई थी मगर आज जिंदगी फिर से वापस मिल गई। मुझे बेटी दामाद नहीं, बेटा बेटी सब कुछ मिल गया।”
मालविका जी के आंखों से कृतज्ञता साफ झलक रही थी और नेहा और नितिन की आंखों से वही कृतज्ञता बह रही थी ।
माहौल बहुत ही ज्यादा भावुक हो चुका था लेकिन एक शुभ समय ने दस्तक दे दिया था।
