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करमजली-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Girl Story
Karamjali

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Girl Story: आज सातवां दिन हो गया उसे गए हुए। न कोई फोन न कोई संदेश। मुझे ही मालूम है, मेरी क्या हालत हो गई है। उसने एक बार भी न सोचा। मालूम होता, इतना पढ़ा-लिखा कर, यह परिणाम निकलेगा तो क्यों उसे पढ़ाती? उसे किसी बात से रोका-टोका नहीं। लोग बहुत कहते, लड़की बसों में घूमती-फिरती है। सिर पर न बाप न भाई। मैंने कभी किसी की नहीं सुनी। लोगों की कभी परवाह नहीं की। मेरे मन में बस एक ही बात थी, इस लड़की की जिन्दगी बन जाए। फिर बसों में तो क्या? भला सुनसान सड़कों पर से भी जाना पड़े तो परवाह नहीं। लेकिन मुझे मालूम नहीं था, यह क्या कर जाएगी। किसी से कुछ पूछ भी नहीं सकती, बता भी नहीं सकती। लोग तो सूह लेने की बहुत कोशिश कर रहे हैं। क्या मालूम भेड़ियों में जा फंसी हो। मैंने अभी तक भाप नहीं निकलने दी। पता नहीं कहां मर-खप गई। मैं न तो जिन्दा हूं और न मर चुकी हूं। भगवान ने पहले ही मुझसे बहुत बदला लिया। अब इस लड़की ने मुझे और भी नर्क की ओर धकेल दिया।

मैं उसकी तारीफ के पुल बांधती रहती। सभी कहते, “लड़की बहुत लायक है। देखना, तुम्हारे सारे दुखों पर मल्हम लग जाएगी। बडी होकर तेरा सहारा बनेगी।” इसलिए मैं लोगों में बैठ कर बढ़-चढ़ कर बातें करती। उसने बसों में आने-जाने को ले कर कभी कोई परेशानी जाहिर नहीं की। समय से कॉलेज आती-जाती। घर आने में कभी एक मिनट की भी देरी नहीं की। इसलिए कभी मन में ऐसा कोई ख्याल आया ही नहीं। मैं लोगों को नसीहत करती रहती। क्या मालूम था, अपने पर ही मुसीबत आ गिरेगी। अपनी कोख की जाई, अपने बाप पर ही पड़ेगी। मैंने सारी जवानी उस शराबी के पीछे गवां दी। जो बीत गया, उसका पछतावा करना छोड दिया मैंने। बस इसी के द्वारा दुनिया देखने की कोशिश करने लगी।

अब पुराने जख्म फिर से टीसने लगे। इसका बाप जब नशे में धुत्त घर में घुसता, यह पीछे के कमरे में जा कर छिप जाती। पति के सो जाने पर, मैं इसे संभालती, प्यार करती। इसे हमेशा अपने सीने से लगाए रखा। और इसने मेरी क्या कद्र रखी। कम से कम मुझे तो बता देती कि कहां जा रही है?

एक बार मेरी मां की पकी मोटी-मोटी रोटियां देख, इसने मुंह सिकोड़ा। मां ने भी गुस्से से कहा, ‘बेटी भी तो उसी शराबी की है। जैसे वह पका-पकाया खाना जोर से फेंकता रहा है।’ मुझे मां की बात बहुत बुरी लगी। ‘क्या हुआ, अगर बच्ची कुछ कह बैठी। तुम तो उसके पीछे ही पड़ गई।’

मुझे याद आया, विवाह के बाद जब दूसरी बार मुझे लेने आया। बस से उतर कर पहले ठेके से बोतल ले, वहीं बैठ कर पीने लगा। घर आ कर फिर से इसने शराब की मांग रख दी। खाना खाने के लिए कहा तो परोसी थाली आंगन में जोर से पटक दी। मेरी मां के सामने वही बातें घूमती रही। इसलिए उसे लड़की में से भी हरमेल ही दिखाई देता रहा। वह मुझे समझाती रहती, “बेटी से अधिक लाड़ मत लड़ाया कर, यह तो पराया धन है। कभी-कभी रौब भी दिखाया कर।” परंतु मैं मां की बात अधिकतर अनसुनी कर देती। सोचती, मां के मन में अभी भी पुराने ही विचार पकड़ बनाए बैठे हैं। लड़के-लड़कियां सब बराबर हैं। मुझे मां से नाराजगी थी, वह इस बच्ची से हरदम चिढ़ती रहती। अब अगर इसका बाप बुरा है तो इसमें इस बच्ची का क्या कसूर। परन्तु आज मां की बातें बहुत याद आ रही है। यह सच में अपने बाप पर गई है। कभी किसी की परवाह नहीं की। जो मन में आया, बस वही करके दिखाया। इसने मुझे जीते-जी मार डाला। मैंने इससे कभी कुछ नहीं छिपाया। मेरे दुखों की साक्षी रही है यह।

यह सब जानती है, कैसे वो औरत मुझसे अधिक इसके बाप पर अपना अधिकार दिखाती रही। एक बार घर में आकर मेरे हाथ से पति की तनख्वाह छीन कर ले गई। इसका बाप पास खड़ा कुछ न बोला। इसके पुलिस विभाग के काम भी ऐसे उल्टे-सीधे ही होते हैं। हर कोई डंडे से डरता है और पुलिस के पास डंडा है। इस औरत का पति मर गया। देवर-जेठ के साथ जमीन का झगड़ा था। मेरे पति ने पटवारी, कानूनगो से मिल कर सारा काम करवा दिया। उसके बाद तो वो इसी के घर में जा टिका। इस औरत की मौज बन गई, जमीन पर कब्जा हो गया, साथ में मर्द मिल गया। सारा गांव कहने लगा, इस औरत ने हवलदार को पक्का ही अपने घर में रख लिया है। लोग आ कर मुझे बताते। मैं बहुत रोई-पीटी, मगर पति ने एक न सुनी। जब इसकी ड्यूटी हरियाणा के बैरियर पर होती, खूब कमाई करता। सारी कमाई इस औरत के पेट में जाती। घर में एक पैसा न देता, कहने पर मुझे हरदम आंखें दिखाता। एक बार शराबी हो कर नोटों की गड्डियों से खेलने लगा। मैंने जल-भुन कर कहा, “मुझे यह हराम की कमाई मत दिखा। जा कर उसे ही दिखा, जिसके साथ रहता है।” मेरे कहने भर की देर, यह आगबबूला होकर कहने लगा, “यह लड़की मेरी नहीं। पता नहीं किसकी है। तुझे तो छोडूंगा नहीं, इसे भी जिन्दा नहीं छोडूंगा। मैंने उसके साथ कोर्ट-मैरिज करवाई है। तू निकल इस घर से अभी….।”

मैंने भी हिम्मत करके कहा, “यह मत समझना, मैं एकदम ही मर गई हूं। मेरे भी मायके वाले हैं।” बच्ची को उठा कर मैंने सीने से लगा लिया, “हाथ लगा कर दिखा इसे। ‘गर लड़की को कुछ हो गया, मैं छोडूंगी नहीं तुझे।”

बात-बात पर यह मुझे मारता-पीटता रहा। मां-बाप की इज्जत खातिर मैं यहां से गई नहीं। मैंने इस कमजात को मुश्किल से पाला-पोसा। वह तो अपने बुरे कामों के कारण मर गया तो मैं क्या करूं। लेकिन अपनी कोख की जनी ने मेरी एक आह न सुनी। मैं इसे सहेलियों के संग खेलते हुए कभी न टोकती, कहती, “जाकर खेल।” आगे से कुछ न कहती, बस कंधे उचका कर नजर झुका लेती। मुझे लगता, बच्ची के मन में कितना सहम भर गया है। हो सकता है, बाहर बच्चे इसे चिढ़ाते हो। भगवान ऐसे लोगों को भी बाप बना देता है, जो बच्चों का हंसना-खेलना भी खो लेते है। अब तो यह मेरे साथ ही खेल-खेल गई।

सामने शौ-केस में इसकी फोटो देख कर याद आया, कॉलेज की ओर से हिमाचल में कैंप था। बहुत खुश होकर इसने मुझे बताया, ‘सात दिन लगेंगे, हमें पहाड़ों में। बर्फ पर चलना सिखाएंगे। पहाड़ों के ऊंचे-नीचे रास्तों पर कैसे चलते हैं, इसकी ट्रेनिंग देंगे। कॉलेज से हम बस तीन ही लड़कियां हैं। कॉलेज के सर भी साथ जाएंगे। दूसरे कॉलेज से भी लड़कियां होंगी।’ मैंने बस यही कहा, “जा बेटा, मगर अपना ख्याल रखना।”

अगले दिन इसने आ कर बताया, ‘उन दोनों लड़कियों को उनके मां-बाप ने रोक दिया कि कोई लेडी टीचर साथ नहीं जा रही। मैं अकेली रह गई हूं। अब बताओ मम्मी?”

मैंने तब भी यही कहा, “बेटा, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। तुम्हें खुद पर भरोसा है तो जरूर जाओ।”

“इस मामले में हमारे सर बहुत सख्त है मम्मी। मजाल है, कोई भी लड़की चूं तक करे।”

मैं दूसरी दोनों लड़कियों के घर भी गई लेकिन उनके परिवार वाले भेजने के लिए तैयार न हुए।

इसे मायूस बैठे देख, मैंने इसे हौंसला दिया, “तुझे कोई रुकावट नहीं, तू जा। कुछ सीख कर ही आएगी।” मैंने खुद इसे बाहर भेजा।

एक सप्ताह बाद वापस लौटी। ढेर सारी तस्वीरों के साथ। दूसरे कॉलेज की लड़कियों के साथ बर्फ पर बैठ कर हंसते हुए, कहीं पीठ पर पिटु उठाए। एक फोटो में सुबह झंडे तले प्रार्थना करते हुए। वो फोटो देख कर मेरा सीना चौड़ा हो गया, जब यह माईक से बोल रही थी और बाकी लड़कियां नीचे इसके सामने बैठी थी। प्रोफेसर कुर्सियों पर बैठे थे। अब यही फोटो देख कर रो रही हूं। आखिर मैंने तुम्हें कभी रोका-टोका नहीं। फिर किसके लिए मुझ से बात छिपा गई। पता नहीं इसके अंदर की आंधी इसे कहां उड़ा कर ले गई। मेरा जी जल रहा है। कुछ समझ में नहीं आ रहा।

यूं तो पूरी खुद्दार थी। एक बार इसके चाचा के घर अखंड पाठ साहिब रखा था। भोग (समाप्ति) पर मैं इसे अपने साथ ले गई। यह भी खुशी से साथ चल दी। बहुत सारे सगे-संबंधी जमा थे। मेरी देवरानी के भतीजे ने गुसलखाने से बाहर आते हुए इसकी पीठ पर हाथ फिरा कर भद्दा मजाक किया। इसने उसके मुंह पर पांचों उगुलियां छाप दी और बोली, “पता लगा, हम कैसी लगती हैं।” एकदम शोर मच गया। पूरा समारोह तनाव में बदल गया। मेरी देवरानी इसे कोसने लगी, “तुमने जवान लड़के पर हाथ उठाया। अपने भतीजे के लिए शाम तक, तुम जैसी मैं सौ लड़कियां इकट्ठी कर दूं। इतने नम्र लड़के के साथ इस लड़की ने बदतमीजी की। बाहर घूमती-फिरती है, इसकी क्या गारंटी? हमारा फंक्शन खराब कर दिया। इतनी शरीफ बनती हो, बाप की ओर देखती, वो क्या हरकतें करता फिरता था। अब लड़के पर तोहमत लगा रही है।”

मुझे ले कर उसी समय घर लौट आई। उसके बाद कभी उसकी देहरी नहीं चढ़ी। अब सोचती हूं, लोग तो मजाक करते होंगे। उस दिन औलाद के स्वाभिमान पर मेरा सीना चौड़ा हुआ था। आज इन संबंधियों से कैसे बात करू?

इसके बी.एड. करने के बाद मैंने विवाह के लिए जोर दिया। सुन कर चुप हो गई। मैंने इसकी मौसी से इसके रिश्ते की बात की। उसने रिश्ता इसकी पसंद का लाने की बात कही। कुछ दिनों बाद बहन आई और मेरे हाथ में लिफाफा थमाते हुए हंसते हुए बोली, “लो देख लो, पूरे पच्चीस लड़के तैयार बैठे हैं, हमारी बेटी से विवाह करवाने के लिए।” बहन सुखन ने मुझे बताए बिना, अखबार में इसका ब्यौरा देकर, विज्ञापन दे दिया। उस पर एड्रेस अपने घर का दिया था। अखबार की ओर से यह लिफाफा भेजा गया था। मैं लिफाफा खोल कर फोटो देखने लगी। तरह-तरह के लड़के…. पढ़े-लिखे। कोई इंजीनियर, कोई एम.ए…। दो-तीन बाहर के लड़के भी थे। उन लड़कों में एक तलाकशुदा की फोटो देख कर, मैं हैरान हो गई। भला, मैं अपनी लड़की किसी दहाजू से ब्याह दूंगी। मुझे बहुत गुस्सा आया। ऐसे लोग बिगड़े हुए होते हैं। यह अपने रेलवे पार्क के पास वाले धालीवालों के लड़के को ही देख लो। वैसे भी कहां के धालीवाल है तो जट्टों के मवेशियों को संभालने वाले। बाप पता नहीं कैसे, गिरते-पड़ते अफसर बन बैठा। लोगों से पैसे हथिया कर जमीन बना ली और खुद को धालीवाल कहलवाने लगा। रहेंगे तो वही, जात नहीं बदलती। हरकतें भी वैसी ही। पांच-छः साल हो गए ब्याह हुए। दो बरस की एक लड़की है। अब कहता है, ‘मुझे वो पसंद नहीं।” तलाक का केस डाल रखा है। शोर तो शादी के दो बरस बाद ही पड़ गया था। पहले पंचायतों ने निपटारा करवाना चाहा। लड़की वाले कहने लगे, दस लाख शादी पर लगाया है, लड़की को वापस कैसे ले जाएं? मां-बाप चुप रहे। लड़का बोला, “मैं बारह लाख लौटाने को तैयार हूं, मगर इसे रखूगा नहीं।” आखिर लोगों ने बैठ कर फैसला करवा दिया। फिर पता नहीं मन में क्या आया, कहने लगा, अदालत से तलाक लूंगा। यह है तलाकशुदा लोगों की बातें।”

बात सुन कर समाधि कहने लगी, “उसकी घरवाली ठीक नहीं। पीछे से ही ऐसा बताते हैं।”

“अरी लड़कियों का क्या बुरा होता है। किसी की बेटी का घर उजाड़ कर, किसी दूसरी को लाएगा, वो ज्यादा अच्छी होगी। अब बस किसी का डर नहीं रह गया। चलो हमें क्या लेना-देना। वैसे भी बात कहां की कहां चली गई।” हम आपस में बतियाते हुए हंसती रही। समाधि से कहा, “देख ले, तुझे इनमें से कोई पसंद है तो?”

“मम्मी, तुम चिन्ता क्यों करती हो। मेरा अभी कम से कम दो साल तक ब्याह करवाने का इरादा नहीं। बेकार में माथा-पच्ची मत करो। जब मेरी नौकरी लग जाएगी. मैं खद तम्हें बता दंगी।” लिफाफा मेरे हाथ से ले कर बिना देखे ही अलमारी में फेंक दिया।

सुखन कहने लगी, “तुम यूं ही जल्दी कर रही हो। इसने अभी ब्याह के बारे में सोचा ही नहीं। इसकी बात भी ठीक है। सुन्दर, पढ़ी-लिखी और नौकरी करती लडकी का रिश्ता लोग खुद मांगते हैं। तुम चिन्ता मत करो बहन। फिर समाधि के हिस्से दस किल्ले जमीन भी आती है।”

बहन की बात सुन कर मैंने सोचा, ठीक है, जो इसकी मर्जी, वही करें। बाद में इसके बाप की जगह पर नौकरी की पेशकश हुई। इसने पुलिस की बजाए स्कूल में नौकरी के लिए अर्जी दे दी। नौकरी के बाद भी जब मैं विवाह की बात छेड़ती, यह मुझे टोक देती, “मम्मी, आप रोज-रोज एक ही बात के पीछे मत पड़ो।” मैं सोचती, चलो, जैसे जी चाहेगा, मैं उसी में तैयार हूं।”

अभी पन्द्रह दिन पहले इसके स्कूल से मास्टर बचन सिंह कोई कागज देने घर आया। यह चाय बनाने लगी। मैंने बातों ही बातों में इसकी शादी का जिक्र छेड़ दिया। मास्टर कहने लगा, “बहन जी, आप चिन्ता न करें। आपकी बेटी बहुत समझदार है। कोई फालतू बात नहीं करती। अपने काम में मस्त रहती है। जो लड़कियां मां-बाप के मशवरे के बिना अपने फैसले खुद करती है, वह बाद में परेशान होती है। ….मैं आप को एक बात बताऊं…। अभी हमारे स्कूल में एक रिटायर्ड अध्यापक के पेंशन का केस था। हेडमास्टर की ओर से कुछ कागजात अदालत में सरकारी वकील को देने थे। यह पास बैठी थी, तुरन्त कहने लगी, लाइए, मैं यह कागजात पहुंचा दूंगी। वैसे भी मुझे अपनी मम्मी की पेंशन के बारे में मालूम करना है, इस महीने कितनी बढ़ी है। इसने वो कागजात आते-जाते पहुंचा दिए। वरना लेडीज की तो ऐसे काम देख कर वैसे ही जान सूखने लगती है। बहुत हौसले वाली लड़की है।”

मास्टर की बात सुन कर मैं खुश हो गई। मैंने सोचा, पेंशन तो मैं खुद लेकर आती हूं। इसके साथ तो कभी बात नहीं हुई। अगर वहां गई भी थी, तो इसने मुझे आकर कुछ नहीं बताया। यह अदालत क्या करने गई थी? इतने में चाय आ गई और हम दूसरी बातों में लग गए।

अब याद करते हुए यही सोच रही हूं, मैं इसकी खुशी चाहती थी। मगर इसने क्या किया। मालूम नहीं, इसके बाद कोई हादसा ही न हो गया हो। आजकल सड़क पर चलती लड़कियों को उठा ले जाते हैं। कई-कई दिनों बाद उनकी लाश मिलती है। जंगली भेड़िए उनकी देह को नोंच खाते हैं। यह सोच कर मैं बार-बार परमात्मा के आगे प्रार्थना करने लगती……हे भगवान! ऐसा कुछ न घटा हो।”

मन बेचैन है। मेरे भाई ने थाने में सूचना दे दी। पुलिस ने कहा, “जब भी पता लगेगा, सूचित कर देंगे। पड़ताल जारी है।” पुलिस थानेदार तो यहां तक पूछने लगा, “किसी से पुरानी रंजिश या लड़ाई-झगड़े की बात हो तो बता दें। पुलिस को कार्रवाई करने में आसानी होगी।

भाई की बात सुन कर ध्यान देवरानी के भतीजे की ओर गया। फिर याद आया, उसका ब्याह तो विदेश की किसी लड़की के साथ तभी हो गया था।

“बहन…यहां तो कुछ और ही घट गया है।” देखा भाई गुरबंस खड़ा है।

“कुछ मालूम हुआ भाई?” मन में अभी भी बुरे ख्याल ही मंडरा रहे हैं।

“हां, उसने वो किया, जो नहीं करना था। थाने से कागज आ गए। वो तो चंडीगढ़ बैठी है, ब्याह करवा कर। अदालत ने पुलिस को उनकी सुरक्षा करने के लिए आदेश दिया है। यहां की पुलिस से कहा है, रिश्तेदार और परिवार वाले इन्हें कुछ न कहे। मुझे थाने बुला कर बताया थानेदार ने।”

“ब्याह किस संग रचा लिया?”

“अरे वही पार्क के पास वाले धालीवाल के लड़के के साथ। जिसका दस दिन पहले ही तलाक हुआ है।”

भाई की बात सुन कर सिर एकदम से चकरा गया। लगता है, जो कसर बाकी रह गई थी, वो भी भगवान ने पूरी कर ली।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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