एक राजा किसी गाँव में घूम रहा था। वहाँ उसे एक जगह बहुत पसंद आई और उसने वहाँ पर अपने लिए एक आलीशान महल बनवाने का निश्चय किया। कुछ ही माह में एक बहुत सुंदर महल बनकर तैयार हो गया। राजा और उसके परिवार ने उस महल में आकर रहना शुरू कर दिया।
उसी महल के सामने एक पुरानी सी झोपड़ी थी, जिसमें एक बूढ़ी स्त्री रहती थी। सुबह-सुबह जब राजा-रानी और उनके बच्चे उठते तो उन्हें सबसे पहले बुढ़िया और उसकी झोपड़ी नजर आती, जिसे देखकर उनका मन खिन्न हो जाता। कुछ दिन बाद राजा ने अपने सिपाहियों को बुलाकर कहा कि बुढ़िया को कुछ धन देकर कहो कि वह अपनी झोपड़ी यहाँ से हटा ले। सिपाही बूढ़ी के पास गए तो उसने किसी भी कीमत पर वहाँ से जाने से इनकार कर दिया। वे उसे पकड़कर राजा के पास ले आए।
राजा ने उसे समझाया कि उसे राजा की इच्छा का पालन करना चाहिए। वह चाहे तो उसकी झोपड़ी जबर्दस्ती भी वहाँ से हटवा सकता है। इस पर बुढ़िया बोली कि आप समर्थ हैं, जो चाहे कर सकते हैं। लेकिन, इतना तो सोचिए कि जब मैं आपका इतना विशाल महल, बाग-बगीचे सब देख सकती हूँ तो मेरी छोटी-सी झोपड़ी आपकी आंखों में क्यों खटकती है? आपके पास ताकत है, लेकिन उसे एक कमजोर पर प्रयोग करने से क्या आपको अपयश नहीं लगेगा? यह सुनकर राजा बहुत लज्जित हुआ और उसने क्षमायाचना कर उसे ससम्मान वहाँ से विदा किया।
सारः शक्तिशाली को सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी शक्ति अन्याय का कारण न बने।
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