सुदामा गरीब ब्राह्मण थे। अपने बच्चों का पेट भर सके सुदामा के पास इतने पैसे भी नहीं थे। एक दिन सुदामा की पत्नी ने कहा, ‘हम भले ही भूखे रहें, लेकिन बच्चों का पेट तो भरना होगा’। यह कहते-कहते उसकी आंखों में आंसू आ गए। सुदामा को बहुत दु:ख हुआ। उन्होंने कहा, ‘क्या कर सकते हैं? किसी के पास मांगने थोड़े ही जा सकते हैं।’ पत्नी ने सुदामा से कहा, ‘आप कई बार कृष्ण की बात करते हैं। आप कहते हैं कि आपकी उनके साथ बहुत गहरी मित्रता है। वे तो द्वारका के राजा हैं। वहां क्यों नहीं जाते? जाइए न! वहां कुछ भी मांगना नहीं पड़ेगा!’

सुदामा को पत्नी की बात सही लगी। सुदामा ने द्वारका जाने का निश्चय किया। पत्नी से कहा, ‘ठीक है, मैं कृष्ण के पास जाऊंगा। लेकिन उसके बच्चों के लिए क्या लेकर जाऊं?’ सुदामा की पत्नी पड़ोस में से भुने हुए चार मुट्ठी चावल ले आई। उसे फटे हुए कपड़े में बांधकर उसकी पोटली बनाई। सुदामा उस पोटली को लेकर द्वारका जाने के लिए निकल पड़े।

द्वारका देखकर सुदामा दंग रह गए। पूरी नगरी सोने की थी। लोग बहुत सुखी थे। सुदामा पूछते-पूछते कृष्ण के महल तक पहुंचे। द्वारपाल ने साधु जैसे लगनेवाले सुदामा से पूछा, यहां क्या काम है?’

सुदामा ने जवाब दिया, ‘मुझे कृष्ण से मिलना है। वह मेरा मित्र है। अंदर जाकर कहिए कि सुदामा आपसे मिलने आया है।’ द्वारपाल को सुदामा के फटे-चिटे वस्त्र देखकर हंसी आई। उसने जाकर कृष्ण को बताया। सुदामा का नाम सुनते ही कृष्ण खड़े हो गए और सुदामा से मिलने दौड़े। सभी आश्चर्य से देख रहे थे, यहां तक कि उनकी रानियां भी। कहां राजा और कहां ये साधु!

कृष्ण सुदामा को महल में ले गए। सांदीपनी ऋषि के गुरुकुल के दिनों की यादें ताजा की। उन्हें अपने सिंहासन पर बिठाया और उनके चरण धोए। सुदामा कृष्ण की समृद्धि और अपनी निर्धनता देखकर लज्जित हो गए। सुदामा अपनी पोटली छुपाने लगे, लेकिन कृष्ण ने देख लिया और पोटली खींच ली। कृष्ण ने उसमें से भुने चावल निकाले और खाते हुए बोले, ‘ऐसा अमृत जैसा स्वाद मुझे और किसी में नहीं मिला।’

बाद में दोनों भोजन करने बैठे। सोने की थाली में अच्छा भोजन परोसा गया। सुदामा का दिल भर आया। उन्हें याद आया कि घर पर बच्चों को पेट भर खाना भी नहीं मिलता है। सुदामा वहां दो दिन रहे। लेकिन वे कृष्ण से संकोचवश कुछ मांग न सके। तीसरे दिन वापस घर जाने के लिए निकले। कृष्ण सुदामा के गले लगे और थोड़ी दूर तक छोड़ने गए।

घर जाते हुए सुदामा को विचार आया, ‘घर पर पत्नी पूछेगी कि क्या लाए तो क्या जवाब दूंगा?’

सुदामा घर पहुंचे तो वहां उन्हें अपनी झोपड़ी नजर ही नहीं आई। झोपड़ी की जगह एक सुंदर घर खड़ा था। तभी उस घर में से उनकी पत्नी बाहर आई। उसने सुंदर वस्त्र पहने थे। पत्नी ने सुदामा से कहा, ‘देखा, कृष्ण का प्रताप! हमारी गरीबी चली गई। कृष्ण ने हमारे सारे दु:ख दूर कर दिए।’ सुदामा को कृष्ण का प्रेम याद आया। उनकी आंखों में खूशी के आंसू आ गए।

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