Jataka Story in Hindi : एक हंस था, जिसके पंख सुनहरे थे। वह एक तालाब में रहता था। उस तालाब के पास ही एक बूढ़ी औरत अपनी दो बेटियों के साथ रहती थी। परिवार पड़ोसियों की दया पर पल रहा था। हंस न े देखा कि बुढ़िया का जीवन कितनी कठिनाई से बीत रहा था।
हंस ने सोचा – ‘‘अगर मैं इसे एक-एक पंख देता हूँ, तो वह उसे बाजार में बेच कर धन कमा सकती है। इस तरह वे सुख से जीएँगे।’’ एक दिन हंस उड़ा व उनके घर की टूटी-फूटी छप्पर वाली छत पर आ बैठा। उसे देख बुढ़िया बोली- ‘‘यहाँ क्या लेने आए हो? हमारे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।’’

हंस ने कहा- ‘‘मैं तुम्हें सुनहरे पंख देने आया हूँ। तुम इसे बेच कर धन कमा सकती हो। मुझसे तुम्हारी खराब हालत देखी नहीं जाती।’’ यह कह कर हंस ने एक सुनहरा पंख झाड़ा और वहाँ से उड़ गया। वह हर सप्ताह उस बुढ़िया के लिए एक सुनहरे पंख छोड़ जाता।

जल्दी वह गरीब औरत अमीर हो गई। वह अपनी दो बेटियों के साथ सुख-चैन से रहने लगी लेकिन वह बुढ़िया काफी लालची हो गई थी। वह जल्दी से जल्दी सारे सुनहरे पंख पाना चाहती थी। एक दिन उसने बेटियों से कहा, ‘‘हम नहीं जानते कि पक्षी हमारी मदद के लिए कब तक आता रहेगा। अगली बार जब वह आएगा तो मैं उसके सारे पंख नोच लूँगी।’’
मायूस लड़कियों ने माँ को सलाह दी- ‘‘कृपया ऐसा मत करना, इससे तो हंस को चोट पहुंचेगी।’’ लेकिन बुढ़िया ने तो पंख नोचने का पक्का फैसला कर लिया था।

अगली बार हंस आया तो बुढ़िया ने उसे पकड़ लिया व सारे पंख नोचने शुरू कर दिए। उसने यह भी नहीं सोचा कि हंस को कितनी तकलीफ हो रही होगी। तभी उसे यह देख कर झटका लगा कि नोचे गए सुनहरे पंख, सादे पंखों में बदल गए थे।

सुनहरे हंस ने कहा- ‘‘मैं तुम्हारी मदद करता था पर तुमने मुझे मारना चाहा। अब मेरे पंख साधारण पंखों से ज्यादा कुछ नहीं है। मैं यहाँ से जा रहा हूँ और कभी नहीं लौटूंगा।
बुढ़िया ने अपने किए की माफी माँगी, पर बहुत देर हो चुकी थी। सुनहरे पंख वाले हंस ने कहा-‘‘कभी लालच मत करना’’ और उड़ गया।
शिक्षा:- लालच से हमेशा दुख ही मिलता है, इसलिए कभी लालच मत करना।

