House Wife
House Wife

House Wife Kahani: “सुमेधा जी टेबल पर बैठ सब्जी काट रही थी, और रसोई में प्रेशर कुकर में दाल भी चढ़ा दिया था।….दोपहर में अरविंद जी खाना खाने आते थे…. तो सुमेधा जी को सुबह से दोपहर तक काम से फुर्सत नहीं मिलती थी।”
तभी मोबाइल की घंटी बजी। सुमेधा जी सब्जी रख मोबाइल उठाने गई … तब तक फोन कट गया।फिर से सब्जी काटने लगी।…फिर से मोबाइल की घंटी बजी।
इस बार फोन उठाई … तो फोन नंबर पहचाना नहीं लगा।।
फिर सोची देखूं कौन फोन कर रहा है।…फोन उठा बोली “हैलो …!”
दूसरे तरह से फोन पर आवाज आई “पहचानो…!”
सुमेधाजी ..”नहीं पहचान पा रही ?? आप कौन??”
“मैं डॉक्टर अविनाश !”
“ओ माई गॉड अविनाश तुम !….आज इतने सालो बाद …!!”
“हां,…. मैं तो तुम्हे याद भी किया …तुम तो भूल ही गई।”
“नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है …! तुम भी तो पच्चीस साल बाद फोन कर रहे हो।…..कैसे याद किया ??”
“मैं तो हमेशा याद करता हूं तुम्हें ??… तुम्हें देखने का बहुत मन है।…..चलो किसी दिन वीडियो कॉल कर देख लेंगे।”
“अरे रहने दो।….वैसे याद कैसे किया ??”
“लाइफ से बोर हो गया हूं ..अब लडकी ढूंढ रहा हूं अपने लिए …अविनाश ने हंसते हुए कहा।”
“क्यों ??? डॉक्टर अलका .. से शादी कर खुश नहीं हो क्या ??”
छोड़ो ….तुम बताओ??
“तुम क्या कर रही हो अभी ??.”
“मैं .., मैं हाउस वाइफ हूं …अभी खाना बना रही हूं। सुमेधाजी हंसते हुए बोली।”
“ये तो तुम्हारी चॉइस थी ना ..!…हाउस वाइफ बनने की।…तो भुगतो ! …बनाओ खाना।”
“नौकरी करती तो …आपने पास रख लेता तुमको जाने नहीं देता ।”
सुमेधा जी सकपका गई। ये कैसी बाते अविनाश कर रहा है??।……पहले तो कभी ऐसी बाते करता नही था।और आज …शादी के पच्चीस साल बाद …!??
सुमेधा जी “..क्यों तुम तो लव मैरेज किए। तुम्हें तो खुश होना चाहिए मन पसंद वाइफ मिली।….वो भी वर्किंग।”
“डॉक्टर बीबी मिली और क्या चाहिए ???और हां, खुशी खुद अपने भीतर होती है बाहर ढूंढने से नहीं मिलती।”
“तुम तो सिर्फ खाना बनाओ ..”अविनाश ने थोड़ा चिढ़ कर बोला।”
सुमेधा जी हंसते हुए बोली …….”हाउस वाइफ हूं … हां …..बिल्कुल सही कहा तुमने ……ये मेरी खुद की चॉइस थी तभी तो मेरे पति अरविंद जी खुश है। वो तुम्हारी तरह …कोई और लड़की नहीं ढूंढ रहे ??”
“अरे रहने दो …सभी ढूंढते है ..कोई कहता है कोई नहीं कहता।फर्क सिर्फ इतना है।”
“ऐसी बात नहीं है अविनाश … !….अरविंदजी दिल के बहुत खुले है। उनका स्वभाव मैं जानती हूं।”….सुमेधा जी बोली।
“सुनो अविनाश ….!..अभी फोन रखती हूं खाना बनाने में देर हो जायेगी।”
अविनाश…. “…जाओ ठीक है खाना बनाओ।”…..बोल फोन रख दिया।
सुमेधा जी रसोई में गई ….दाल बन चुके थे …फटाफट एक चूल्हे पर सब्जी और दूसरे पर चावल बना दिया।
अरविंद जी के आने से पहले टेबल पर सलाद कट कर सजा दिया और खीरे का रायता भी लगा दी।
अरविंद जी ऑफिस से आए।… तो सुमेधाजी अपनी बेटी आकांक्षा बेटा आलोक और अरविंद जी के साथ बैठ कर खाना खाई।
“अरविंद जी खा कर एक घंटा घर पर आराम किए।… फिर तीन बजे वापस ऑफिस चले गए।”
अरविंद जी का ऑफिस घर के पास होने की वजह से रोज खाना खाने दोपहर में घर आते थे।
सुमेधा जी की बेटी आकांक्षा और बेटा आलोक दोनो इंजीनियरिंग कर रहे थे। अभी कॉलेज की छुट्टी की वजह से घर में आए हुए थे।
“सुमेधा जी अरविंद जी के ऑफिस जाने के बाद सारे घर को ठीक से व्यवस्थित की और बिस्तर पर लेट गई।…..दोपहर में थोड़ी देर रोज सोती थी लेकिन आज नींद नहीं आ रही थी।”
दोनों बच्चे खाना खा कर अपने कमरे में आराम करने चले गए। सुमेधा जी अपने कमरे में बिस्तर पर लेट .. डॉक्टर अविनाश के बारे में सोचते सोचते अपने अतीत की याद में खो गई।
अविनाश और सुमेधा जी का घर आस पास था। फैमिली फ्रेंडशिप थी। एक दूसरे के घर आना जाना अक्सर होता था। अविनाश सुमेधा से एक साल सीनियर था। मेडिकल की तैयारी कर रहा था। काफी परेशान था कि उसके सभी दोस्त का सलेक्शन पिछले साल मेडिकल में हो गया सिर्फ अविनाश रह गया था।
उन दिनों अविनाश का सुमेधा के घर आना जाना बढ़ गया था। सुमेधा जी पढ़ने में अच्छी थी लेकिन आर्ट्स की स्टूडेंट थी।।अपनी स्नातक की पढ़ाई के बाद बैंक एग्जाम भी दिए थे।लेकिन सलेक्शन नही हो पाया था।
अविनाश शुरू से महत्वकांक्षी था। बड़े आदमी बनने के सपने बुनना उसकी आदत थी।
एक दिन अविनाश सुमेधा के घर आया था उसी दिन मेडिकल का रिजल्ट निकला था और सुमेधा ने ही अखबार में अविनाश का नाम खोज के बताया था कि… तुम मेडिकल एग्जाम में पास हो गए हो।
“अविनाश बहुत खुश हुआ था उस दिन उसके पैर जमीन पर टिक नही रहे थे।”
जल्द ही उसका एडमिशन सबसे अच्छे मेडिकल कॉलेज में हो गया।
“सुमेधा और अविनाश दोनो अच्छे दोस्त थे।दोनो के दिमाग में सिर्फ एक दूसरे के लिए दोस्ती थी… प्यार नहीं।….या कभी अविनाश में मन में सुमेधा के लिए प्यार जागा भी हो तो ….जाहिर कभी नही किया था।”
अविनाश मेडिकल कॉलेज गया। …..वहां अपनी कॉलेज में साथ पढ़ने वाली डॉक्टर अलका से प्यार हो गया।…दोनो की जाति अलग थी।…. दोनो मेडिकल पढ़ाई साथ साथ पूरी की फिर नौकरी लगते ही … अपने—अपने माता पिता को इस विवाह के लिए राजी कर लिया था….।और एक दूसरे से शादी कर ली थी।

सुमेधा जी पढ़ाई पूरी की और उनकी शादी अरविंद जी से हुई।सुमेधा के पति अरविंद इंजीनियर थे।सुमेधा अपनी शादी शुदा जिंदगी में बहुत खुश थी।दो बच्चे थे दोनो इंजीनियरिंग कर रहे थे।
“सुमेधा जी को अपनी खुशहाल जिंदगी में कोई मलाल नहीं था कि… मैं नौकरी क्यों नही की ??”
“सुमेधा अपने को हाउसवाइफ कहलाने में बड़ा गर्व महसूस करती थी।”
शादी के बाद मायके गई तो अविनाश से मिलना नहीं हो पाया क्योंकि उसके पापा रिटायर होकर अपने गांव में मकान बना गांव में शिफ्ट हो गए थे।
लेकिन अविनाश उसी शहर में था और उसी शहर के सरकारी अस्पताल में नौकरी कर रहा था।
अविनाश के पास पैसे और पद दोनो थे। पति पत्नी दोनों डॉक्टर थे और शहर में मान प्रतिष्ठा भी थी।
अभिमान …आना स्वाभाविक था। क्योंकि अविनाश शुरू से महत्वकांक्षी था।….आमदनी अच्छी थी …. डॉक्टर अलका का खुद का नर्सिंग होम था।
अविनाश ने कभी मुड़ कर सुमेधा के घर नहीं देखा।…ना उसके बारे में जानें की कोशिश की।
एक दूसरे के घर आना जाना कम हो गया था।
शादी के बाद एक बार सुमेधा जी को अविनाश से मुलाकात भी हुई।…..सुमेधाजी को अविनाश …वो अविनाश नहीं लगा था ।….. बड़ा डॉक्टर जो बन गया था।…उसके बात करने के तरीके से अभिमान झलक रहा था।……क्योंकि उसकी नजर में नौकरी करने वाली औरते ज्यादा अच्छी थी। ……पढ़ के हाउस वाइफ बनाना मतलब समय बर्बाद करना होता था…..।पढ़ाई करके नौकरी नही किया ….तो पढ़ने का क्या फायदा ?? अविनाश अक्सर कहा करता था।
…….और सुमेधा कहां हाउस वाइफ।
सुमेधा समझ गई थी। अविनाश …उगते सूरज को पूजने वाला है ….नाम शौहरत के पीछे पागल रहता था।
डॉक्टर अविनाश के भी दो बच्चे थे।…. उसकी बड़ी बेटी मेडिकल पढ़ रही थी और बेटा बारहवीं में था।
तभी मोबाइल की घंटी बजी। सुमेधाजी मोबाइल की आवाज से चौंक गई और अपने अतीत की यादों से वापस लौट आई।
मोबाइल उठाई ….देखा डॉक्टर अविनाश का फोन।
सुमेधाजी “हैलो…, !”
“फुर्सत मिल गई खाना बनाने से …”अविनाश ने तंज कसा।
“हा…, फुर्सत मिल गई।”..सुमेधा जी ने शांति से बोला।
अविनाश बोला ….”हां ..अरविंद जी को अच्छा है खाना गरम खाने को मिलता है साथ में तुम बैठ कर प्यार से खिलाती हो ! ….मेरा क्या ??खुद खाना बनाओ और खुद निकल कर खाओ।”
सुमेधाजी से अब रहा नहीं गया।

सुमेधा जी बोली ………”क्यों ?? ये तो तुम्हारी चॉइस थी ना !!….. वर्किंग बीबी चाहिए।…..तो मिल गई।अब तो खुश होना चाहिए तुम्हें।….और हां अविनाश …तुम्हे कमाने वाली वाइफ भी चाहिए और खाना भी गरम गरम बना मिलना चाहिए तो … दोनों एक साथ कैसे मिलेगा ?? थोड़ा समझौता तो जिंदगी में करना ही पड़ता है।…..।

“जो जिंदगी में मिला है उसी में खुश रहना सिखो …!”

अविनाश “क्या सुमेधा तुम खुश हो अपनी जिंदगी से ??”

“बहुत खुश हूं …मेरे चाहत तुम्हारी तरह नहीं थी।अपनी जिंदगी में बहुत खुश हूं क्योंकि मेरे पति बहुत केयरिंग है दोनो बच्चों के साथ मैं फ्रेंडली हूं।मैं घर में …..घर के काम में इतनी व्यस्त रहती हूं की मुझे फालतू बातें सोचने का समय भी नही मिलता।”
“मेरे अपने शौक है… उसे पूरा करती हूं .!…दोस्तों के साथ भी मिलना होता है …..।तुम्हारा तो कुछ पता ही नहीं चला।?? तुम इतने दिन थे कहां ?? …. और आज इतने सालों बाद याद किए ??
तुम्हारे घर से तुम्हारा फोन नंबर मिला तो पुरानी बाते याद आ गई।
..”…खास कर तुम !….तुमसे मिलने का बहुत मन कर रहा है।”
“….ठीक है इस बार मायके आऊंगी तो खबर कर दूंगी आकर मिल लेना।”
अविनाश “जरूर …हाउस वाइफ !. … बहुत कुछ सीखना है तुमसे जिंदगी जीने के बारे में।”
सुमेधा जी हंसते हंसते बोली …”ज्ञान बांटना मुझे बहुत पसंद है …!एक ज्ञान …दे रही हूं …”हाउस वाइफ हमेशा अपने घर और घर वालों से प्यार करती है।और बहुत खुश रहती है अपनी दुनिया में।”……तुम कोई लड़की अपने लिए मत ढूंढो !…..इस उम्र में तुम्हे कोई नहीं मिलेगी।
हां,अपनी वर्किंग वाइफ को ही प्यार करो और समय दो …उसको समझो।”
“अविनाश समझ गया सुमेधा जी के इशारों को।”….बोला ठीक है फोन रखता हूं|

सुमेधा जी आज  बहुत खुश  थी  एक दोस्त को सही सलाह दे कर।