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Grehlakshmi story

Hindi Story: आज तकरीबन तीन वर्ष बाद श्याम ने शुभ्रा को गांव के पुराने मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए देखा तो उसके दिल को एक सदमा सा लगा क्योंकि वह जिस शुभ्रा को मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए देख रहा था, यह उसकी वह पुरानी शुभ्रा तो कतई नही लग रही थी, जिसे कभी श्याम अपनी जान से भी ज्यादा  चाहता और प्यार करता था.आज वही शुभ्रा सफेद साड़ी में लिपटी और बिना मांग में सिंदूर लगाए हुए बिल्कुल उसके सामने मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी. ये देख श्याम की आंखे भर आई और उसकी होठ से ना चाहते हुए भी निकल पड़ा की हे! भगवान आखिर ये मेरी शुभ्रा के साथ क्या हुआ?

ये दिन देखने से अच्छा होता कि मुझे मौत आ जाती! कितनी मासूम और खूबसूरत थी मेरी शुभ्रा. अगर वे हल्के से हंस भी देती थी तो ऐसा लगता था कि जैसे आस–पास के सभी पेड़ पौधों को एक नई जिंदगी मिल गई हो. तभी मेरी तंद्रा भंग हुई और मैं खुद को शुभ्रा के पास जाने से नही रोक पाया और जैसे ही शुभ्रा की नजर मुझ पर पड़ी तो उसने कहा अरे! श्याम तुम यहां? लेकिन मानो श्याम ने कुछ सुना ही ना हो लेकिन जब दुबारा शुभ्रा ने यही पूछा तो श्याम की भरी आंखों से टप–टप आंसू बहने लगे.

वे बोला कि क्या मैं तुमसे थोड़ी देर कहीं बैठकर बात कर सकता हूं शुभ्रा ? मुझसे आखिर क्या बात करोगे श्याम अब आखिर मेरे पास तुमसे बात करने के लिए बचा ही क्या है? तुम ऐसा क्यों कह रही हो शुभ्रा ?क्या मुझे इतना भी अधिकार नही कि मैं तुम्हारे साथ बैठकर थोड़ी देर तुमसे कुछ बात कर सके.तभी शुभ्रा ने अचकचा कर कहा, नही-नही! श्याम मेरा उद्देश्य तुम्हारा दिल दुखाना नही था दरअसल कहीं लोग मुझे तुम्हारे साथ बात करते हुए देखकर कहीं तिल का ताड़ ना बना दे और कहे! कि देख तो अभी विधवा हुई नही की गैर मर्द से बात भी करने लगी?

वैसे भी मुझे विधवा हुए अभी ज्यादा समय भी तो नही हुआ है श्याम. श्याम ने साफ महसूस किया की खुद को विधवा कहते समय शुभ्रा का गला थोड़ा सा भर आया था लेकिन वे श्याम से जैसे इस दर्द को छिपा लेना चाहती थी लेकिन भला श्याम जिसकी आंखों में आज भी शुभ्रा के सिवा कोई और नही कैसे छिपा पाती. खैर फिर श्याम ने कहा प्लीज शुभ्रा आखिरी बार मुझसे बात कर लो फिर मैं कभी भी तुमसे बात करने की गुजारिश नही करूंगा और ना ही तुम्हारे सामने कभी पड़ने की कोशिश करूंगा.

फिर थोड़ी देर बाद शुभ्रा ने एक लंबी और गहरी सांस छोड़ते हुए कहा ठीक है श्याम आओ ! चलो उस पेड़ के पास बैठते है. शुभ्रा ने जिस पेड़ के पास श्याम से बैठने के लिए कहा था दरअसल वे पेड़ अब आधा सुख गया था और आधा हरा था. इसी पेड़ तले कभी श्याम और शुभ्रा घंटो बैठे प्यार की बातें किया करते थे. एक तरह से ये पेड़ शुभ्रा और श्याम के प्यार का मूक गवाह भी था. आखिर शुभ्रा ने इसी पेड़ के नीचे ही तो श्याम से ये कहा था कि हो सके तो तुम अपनी इस शुभ्रा को माफ कर देना श्याम क्योंकि आज के बाद फिर तुम्हारी यह शुभ्रा कभी भी तुमसे दोबारा मिलने इस पेड़ के नीचे कभी नही आएंगी. आज केवल इसलिए यह शुभ्रा आई हैं कि वे श्याम को यह बता सके कि मेरी शादी कही और तय हो गई है? अगर हो सके तो तुम भी कोई अच्छी सी लड़की देखकर अपना घर बसा लेना.

इतनी बात शुभ्रा के मुंह से सुनते ही जैसे श्याम के सिर पर गड़गड़ा के पूरा आसमान ही गिर पड़ा हो, फिर किसी तरह खुद को सामान्य करने के बाद श्याम ने शुभ्रा से पूछा, क्या इतनी बड़ी सजा देने से पहले मैं तुमसे यह पूछ सकता हूं शुभ्रा कि आखिर मेरी गलती क्या है? शुभ्रा रोते हुए बोली, मुझे दुःख तो इसी बात का है श्याम की तुम्हारी कोई गलती नही बल्कि ये मेरी किस्मत की गलती है. मैंने अपने घर के सारे लोगों से तुम्हारे और अपने प्यार के बारे में सब कुछ बता दिया था लेकिन मेरी मां और पिताजी ने कहा कि, शुभ्रा तु अपनी तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी है अगर लोगों को यह पता चल गया कि मेरी बेटी ने किसी गैर जाती के लड़के से शादी कर ली है तो फिर इस पूरे गांव में ना सिर्फ तुम्हारी जवान बहनों का घर से निकलना दूभर हो जाएगा बल्कि लोगों के सामने मैं खुद अपना मुंह दिखाने लायक नही रह जाऊंगा. इसके अलावा उन दोनो की शादी भी किसी अच्छे घर में नही हो पाएगी?

क्या तुम चाहती कि हो कि, तुम्हारे बहनों के साथ ऐसा हो शुभ्रा ?अगर हां! तो फिर मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा. जाओ! लेकिन हां! जब श्याम से मिलकर आना तो आज रात के खाने में शुभ्रा तुम अपने इस मजबूर मां-बाप दोनों छोटी बहनों और अपने छोटे और मासूम भाई के खाने में जहर देके हम सभी को मार देना इतना कहकर शुभ्रा के पिताजी ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए. फिर शुभ्रा ने कहा, नही! पिताजी मैं इतनी खुदगर्ज नही हो सकती. आप जहा चाहे और जिससे भी चाहें मेरी शादी तय कर दे. इतना कहकर रोती हुई शुभ्रा घर से निकली और यहां श्याम के पास आखिरी बार मिलने आ गई जब श्याम से मिल कर शुभ्रा लौटने लगी तो श्याम पेड़ के नीचे खड़ा जाती हुई शुभ्रा को तब तक देखता रहा जब तक की शुभ्रा श्याम को दिखाई पड़ती रही आखिर श्याम अपनी शुभ्रा को आखिरी बार जो देख रहा था.

फिर पेड़ के पास पहुंचने के बाद शुभ्रा ने एक तरफ पूजा की थाली रखने के बाद श्याम से कुछ दूर बैठने के बाद बोली देख रहे हो श्याम कि जिस पेड़ के नीचे हम तुम कभी घंटो बैठकर बात किया करते थे अब वह पेड़ आधा बिल्कुल मेरी जिंदगी की तरह सुख गया है. हां!शुभ्रा मैं भी इस पेड़ के नीचे तुम्हारे जाने के बाद फिर कभी दोबारा नही आया.अच्छा! छोड़ो श्याम तुम तो यह जान ही चुके हो कि, मैं विधवा हो चुकी हूं. मेरे पास इसके अलावा कोई और ऐसी बात नही जिसे कि मैं तुम्हें बता सकूं. हां!तुम्हारा दिल तोड़ने और दुखाने का जो पाप मैने किया था, ये शायद उसी की सजा मुझे भगवान ने दी है.

वैसे भी अब मेरे पिताजी भी काफी बीमार हैं. मां तो पहले ही चल बसी थी उनकी हालत यूं समझ लो कि अब तब की है. हालांकि उन्होंने मेरी दोनो बहनों और छोटे भाई की शादी भी कर दी. भाई भी शादी करने के बाद भाभी को लेकर शहर में ही कही रह रहा और अपनी सुनाओ श्याम! तुमने भी तो शादी करके अपना घर बसा लिया होगा. अब तक तो एकाध बच्चे भी हो गए होंगे. श्याम की आंखो से लगातार आंसू बहते देख शुभ्रा चौक गई और बोली तुम रो क्यों रहे हो श्याम? क्या बात है? कोई बात नही शुभ्रा बस! आज आंसू नही रुक रहे.शुभ्रा बोली क्यों? तुम क्या सोचती हो शुभ्रा कि तुम्हारे जाने के बाद मैंने शादी कर ली होगी. नही पगली ! मैं तो एक शादी बहुत पहले ही कर चुका था तुम्हारे प्यार और तुम्हारी यादों से. हां! ये और बात है कि मेरी शादी तुम्हारे मांग के सिंदूर की शादी नही थी.

तुम क्या सोच रही हो शुभ्रा कि तुम इस सफेद साड़ी में लिपटी हुई मेरे सामने बैठी एक विधवा हो?नही पगली! तुम मेरी चाहत की आंखों के सामने मेरी जिंदगी की आखरी सांस तक कभी विधवा नही हो सकती. मेरी चाहत की आंखों में तुम आज भी मेरी वही पुरानी शुभ्रा हो जिसे मैं प्यार करता था. हां! शुभ्रा अगर तुम मुझे एक भीख मांगने का अधिकार दे सकती हो तो दे दो. तो शुभ्रा के मुंह से निकल गया, मांगों श्याम! तो प्लीज शुभ्रा तुम इस पेड़ के नीचे से कभी जिस मेरी शुभ्रा को लेकर गई थी आज उसी पेड़ के नीचे तुम  मेरी उस पुरानी शुभ्रा को मुझे वापस कर दो प्लीज शुभ्रा.अब शुभ्रा भी रोने लगी श्याम इस शुभ्रा का शरीर गया था आत्मा यही थी .आज मैं फिर अपने श्याम को खोना नही चाहती .श्याम लो ! जहा और जिस पेड़ के नीचे तुम्हें ये तुम्हारी शुभ्रा छोड़ के गई थी आज उसी तुम्हारी शुभ्रा को तुम्हें फिर से इस पेड़ के नीचे लौटा रही हैं .फिर दोनो एक दुसरे के गले से लग गए.

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