लाखों में एक-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Shaadi Story
Lakho me Ek

Shaadi Story: श्यामा अपने इकलौते बेटे रौनक की शादी को लेकर परेशान रहती हैं। उसके लिये बिरादरी से बहुत से रिश्ते आ रहे हैं, लेकिन वह बार-बार कुछ ना कुछ नुक्स निकाल शादी से मना कर देता है । अब नौकरी में उसका प्रमोशन हो गया तो श्यामा अड़ गई कि वह शादी करे। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अगर उसकी किसी से दोस्ती है तो उसी से कर ले।

रौनक की परवरिश उन्हें अकेले करनी पड़ी। उसके पिता की मौत बहुत पहले हो गई थी, जब वह पाँच वर्ष का ही था। फिर तो श्यामा ने अपने बलबूते उसे पाला- पोसा और इस लायक बनाया कि आज रौनक बैंक में अफसर है। वह चाहती हैं कि उसका शादी -ब्याह कर वे निश्चिंत हो जाएँ।
रौनक भी माँ की बहुत इज्जत करता है और आज्ञाकारी है। अपनी शादी को लेकर वह मां को बताना चाहता था,लेकिन अपने प्रमोशन के इंतजार में था। अब उसने मां को बताया कि वह शैलजा के साथ शादी करना चाहता है। दोनों स्कूल से ही साथ पढ़े हैं और अब नौकरी भी साथ करते हैं । उसने कहा कि वह उससे और उसके परिवार से मिलवा देगा। शैलजा उसे जरूर पसंद आएगी।

श्यामा तो बेटे की खुशी ही चाहती है । शैलजा और उसके परिवार वालों से मिली। वे दो बहनें हैं और माता पिता,छोटा सा परिवार। शादी को लेकर सभी की सहमति भी है। फिर रौनक ने बिना तिलक- दहेज लिए मंदिर में शादी करने का निश्चय किया। नियत तिथि को दिन में ही मंदिर में शादी हुई, और शाम को सगे संबंधियों और परिचितों को पार्टी दी गई । अब घर में सुंदर सी बहू आ गई, जिसकी कई वर्षों से श्यामा ने रट लगा रखी थी । बहु सुशील और काम में निपुण भी है । आते ही उसने ऑफिस के साथ- साथ घर के कामों को भी खुशी- खुशी अपने हाथों में ले लिया । उसकी कोशिश रहती कि उसकी सासू मां को आराम हो,ज्यादा काम न करना पड़े।

लेकिन श्यामा को घर में आई बहू अपनी प्रतिद्वंद्वी लगने लगी। वह नहीं चाहतीं कि बहू उससे बीस हो। हरेक बात में उसके साथ अपनी तुलना करती जैसे वह उनकी हमउम्र हो। उनको हमेशा यह भय लगा रहता कि बहू कहीं रौनक को उनसे दूर ना कर दे। रौनक उसका गुलाम न बन जाए। वह बहू में कुछ ना कुछ नुक्स निकालने की कोशिश करती। लोग बाग अगर बहू की बड़ाई के चार शब्द कह देते तो श्यामा के तन बदन में आग लग जाती । वह कहने लगती,
“अरे हमारे समय में तो पूरा घर भरा रहता था, सास- ससुर ,नन्द- देवर। सबकी खुशामद और सुबह से शाम काम करो,फिर भी हम मस्त रहते।”

खैर,शैलजा को ये सब सुनने की फुर्सत न थी । वैसे भी उसका ज्यादा समय तो आफिस में ही बीतता। वह तो रविवार को भी जल्दी घर का काम खत्म करके नियत समय पर दो घंटे के लिए निकल जाती। श्यामा के मन में तो चोर था ,उसने रौनक से शिकायत करनी शुरू की।
रौनक ने एक रविवार को मां को कहा कि वह तैयार होकर साथ चले, कुछ जरूरी काम है । रौनक उनको अपनी स्कूटी पर बैठा कर ले गया । श्यामा अपने को गरीबों की झुग्गी- झोपड़ी वाली बस्ती में देख, सोचने लगी कि यहां रौनक को क्या काम आ पड़ी? वह यहां किसलिए लेकर आया है?

वह पूछना चाह ही रही थी कि तभी उसकी नज़र मैदान में पेड़ के नीचे बच्चों के साथ बैठी बहू दिखी। जमीन पर दरी बिछी हुई थी, बच्चे सामने तीन चार लाईन में बैठे थे। वह सामने बैठे बच्चों को समझा रही थी। अचानक शैलजा की आंखें श्यामा से मिली। शैलजा को घबड़ाहट हुई,वह तुरंत उठ खड़ी हुई और उनके पास जाकर उसने पूछा,
“क्या कुछ खास बात है? “
रौनक कुछ जवाब देता, उससे पहले ही श्यामा बोल पड़ीं,
“माफ करना बहू, मैं नहीं जानती थी कि तुम इतना नेक काम करती हो। मैं हरेक रविवार को रौनक से शिकायत करती थी। अच्छा हुआ मैंने अपनी आंखों से देख लिया। सचमुच मेरी बहू तो लाखों में एक है।”

“मेरी भी ग़लती है, आपको बताकर आना चाहिए था,तो आप क्यों शक और शिकायत करतीं?”
पास खड़ा गौरव सास-बहू की बातें सुन मुस्कुरा रहा था।

” मैं आपको बता सकती थी मांजी, लेकिन मुझको लगा आप आपत्ति न करें। मैं कालेज में पढ़ती थी,तभी से यहां के बच्चों की पढ़ाई- लिखाई में सहायता करती हूं। सबसे पहले तो घर पर काम करने वाली महरी के बेटे को पढ़ाने से शुरू हुई। आप देख ही रही हैं,कितने बच्चे हो गये हैं। ये सब छठी से लेकर दसवीं में पढ़ने वाले हैं।”
शैलजा ने अच्छे से समझाया ताकि उसकी सासू मां के मन में कोई भ्रम न रहे।

इधर श्यामा को अपनी सोच पर ग्लानि हो रही है, पर अपने बेटे रौनक पर गर्व हुआ कि उसने इतनी समझदार लड़की को अपना जीवन साथी चुना है। श्यामा के चेहरे पर एक संतुष्टि और खुशी देखते ही बन रही है।