Hello Cousin
Hello Cousin

Hindi Kahani: हेलो, कौन बोल रहा है,” ये तो सुबोध का पर्सनल नम्बर है रागिनी ने कहा?
  “मैम ,सर  मीटिंग में हैं,आप   कौन बोल रहीं हैं,”असिस्टेंट ने बदले में सवाल कर दिया?
मैं उसकी बड़ी बहन रागिनी मिश्रा बात कर रही हूँ, नेहरूनगर ब्रान्च से ,मुझे अपने ट्रान्सफर के बारे में बात करनी थी,उसने अधिकार मिश्रित गर्व से कहा।
“ओके मैम ,मैं सर को बता दूँगी कि आपके पर्सनल नम्बर पर आपकी दीदी का फोन आया था।”
ठीक है ,इस संक्षिप्त से उत्तर के साथ रागिनी ने ,इत्मिनान से फ़ोन रख दिया,और निश्चिंत हो गयी ,आख़िर सुबोध उसका सहकर्मी होने के साथ   चचेरा भाई जो था।
उसे उम्मीद थी कि फुर्सत मिलते ही सुबोध उसे फ़ोन जरूर करेगा।पर ऐसा कुछ भी न होना था और न ही हुआ।
मोबाइल पर आने वाली हर कॉल पर एक बार उसका दिल तेज़ी से ,धड़क उठता था।
पर सुबोध की कॉल ,उसका नम्बर उसके लिये आकाश कुसुम ही रहा।
धीरे धीरे इस बात पर धूल पड़ने लगी और रागिनी भी और  व्यस्त होने लगी ,उस दिन वह और उसकी सहकर्मी लता साथ ही लंच कर रही थीं ,तब तक चपरासी विकास खबर लाया कि लता का ट्रांसफर हेड ऑफिस में होगया है पदोन्नति के साथ।
यह ख़बर रागिनी को दोहरी ख़ुशी दे गयी,उसे दोगुने जोश से कहा,
 लता तुम किसी बात की चिंता मत करना,वहाँ मेरा छोटा भाई सुबोध ही चीफ़ मैंनेजर हैं ,जिसके बारे में  ,मैं अक्सर जिक्र करती हूँ।कोई परेशानी हो तो मेरा नाम ले लेना।
उसके लिये जैसे मैं वैसे तुम ,
वो तुम्हारा सगा भाई है रागिनी,लता ने हिचकिचाते हुए पूछा।
पहली बार रागिनी का उत्साह मन्द पड़ा,उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा,नहीं बड़े चाचाजी का बेटा है,पर यह कहते हुए उसका स्वर धीमा और आवाज काँप रही थी मानों कोई अपराध किया है जैसे।
ख़ैर उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है ,अब तो तू जा रही है न उधर ,मेरी सबसे प्यारी सहेली इसमें तो कोई सगा चचेरा नहीं है,उसने गम्भीर माहौल को हल्का बनाने की कोशिश करते हुए कहा।
तो लता भी मुस्कुरा उठी,दो दिन के बाद लता की फेयरवेल पार्टी हो गयी और रागिनी उस ऑफिस में फिर से अकेली पड़ गयी।
सुबोध का नम्बर आँखों के आगे पड़ता तो भी उँगलियों में जान न होती कि उस नम्बर पर ठहरें।वह अपने प्रार्थनापत्र मेल ही कर दिया करती।
उम्र के पचासवें दशक में अब उससे भागदौड़ नहीं होती थी।
उसे अचानक से अम्मा की याद आने लगी,जो अपने भाइयों के साथ साथ ताऊ चाचा के बच्चों को भी सगा बतातीं थीं।
जब कभी वह चाचियों के अपने बच्चों और उसके साथ व्यवहार में फ़र्क़ की शिकायत करती ,तो अम्मा उसे मीठी झिड़की देते हुए कहतीं,
अगर तेरी आँख में एक आँसू आया ,तो तेरे हाथ आठ कलाइयाँ पोंछेंगी ,सगा खून है बुरा नहीं मानते बिटिया।
तबसे वह बदस्तूर आठ राखियाँ खरीदती व डाक से भेजती चली आ रही थी।भाइयों से राखी मिलने की सूचना न मिलती पर न मिलने की झिड़की अवश्य पड़ जाती ।
वो कभी कभी सोचती ,कि सारा फ़र्ज़ बहन का ही होता है,जो नौकरी के साथ नाते भी वफादारी से निभाती चली जाये।
 ऐसा नहीं था कि सुबोध रागिनी का ट्रांसफर करवाने में सक्षम न था,पर उसकी उदासीनता अब उसे मजबूर कर रही थी कि वह अपना काम स्वयँ ही कर ले।
 घर के पास की  शाखा में ट्रांसफर की बात चल रही थी,उसी के सिलसिले में इसबार उसे हेडऑफिस जाना ही पड़ा।

पर जब वह वहाँ गयी तो पहली बार सुबोध से न मिलकर सीधे लता से ही मिली।लता ने उसे ट्रांसफर की बधाई दी और बोली।
छुट्टी में पन्द्रह मिनट हैं,पहले कैंटीन में चलकर चाय के साथ कुछ खायेंगे फिर साथ में राखी की खरीददारी करेंगे।
दोनों सहेलियाँ एक दुकान में घुस गयीं,लता ने जहाँ दो राखियाँ खरीदीं ,वहीं रागिनी ने पूरी आठ..
बस कर रागिनी आठ राखियाँ किसके लिये तेरे तो पाँच ही भाई हैं न जहाँ तक मुझे याद है
हाँ हाँ दो चाची के लड़कों की और एक सुबोध की ,इसलिए आठ खरीद रही हूँ।
लता का स्वर थोड़ा कसैला हो उठा गम्भीरता के साथ बोली ,
बुरा मत मानना रागिनी,जिस सुबोध को तू गर्व से अपना छोटा भाई कहती है,उससे जब मैंने तेरा ज़िक्र किया,तो उसने बड़े मामूली अंदाज़ में कहा,वो मेरी कज़िन हैं।
 बहन तो कहा ही नहीं ,उसके कहने में अपनाइयत का ओर छोर भी नहीं था।इंसान बदलता है पर इतना नहीं।
ख़ामोश रागिनी का चेहरा थोड़ा स्याह हो गया,उसने बड़े बड़े दुःख सह लिये थे,तो यह झटका भी छोटा ही लगा।
बोली आठ की आदत पड़ी है,बचपन से गयी हैं,जायेगी भी नहीं और दोनों अपने अपने रास्ते चली गईं।
रागिनी की आँखों के  आगे सुबोध का बचपन नाचता रहा, चाची की बीमारी,अम्मा के कहने पर सुबोध की मालिश ।
कमर पर उसे लटका कर घुमाना,अपने भाइयों का हिस्सा काटकर सुबोध को संतुष्ट करना।
उसे याद आया कि उसकी  ससुराल से भी अम्मा ने सुबोध के लिये साले के कपड़े मंगवाये थे और पहले उसे ही पसन्द करवाकर दिये थे।
शायद लड़कियों की स्मृतियाँ भी मायके के अनचाहे रिश्तों  में साड़ी की फॉल की तरह  अटक जाती हैं।
खींचने पर धागा टूटता है,मगर तिनका अटक जाता है और बहुत चुभता भी है।आँख की कोरों से खारा पानी निकला पर इस बार  मन थोड़ा निर्मल हो गया।
जैसे बादलों के बरसने से आकाश स्वच्छ हो जाता है,मन के हरे पौधे पर जमी धूल  तबियत से साफ़ हो गयी थी।
उसने  दूर रहने वाले सभी भाइयों की राखियाँ पोस्ट कर दीं,एक दो को छोड़कर।
एक  भाई उसी शहर में रहता था उसके जाकर बाँध आती थी,रक्षाबन्धन की शाम जब वह भाई के घर पहुँची तो वहाँ सुबोध को भी पाया।
वह अपने भाई राजीव के तिलक लगाकर ,मिठाई खिला रही थी थी,सुबोध भी पास में ही कुर्सी डालकर बैठ गया।
रागिनी पानी लेने के बहाने रसोईघर में चली गयी।
काफ़ी देर इन्तज़ार करने के बाद सुबोध ने अपनी भारी आवाज़ में पुकारा.
” जिज्जी मुझे राखी नहीं बाँधेगी,इसबार आपकी मिली नहीं तो हम यहाँ बंधवाने  गये’
वह राखी बान्धकर, उसके  सौ रुपये के नोट को उसकी जेब में रखते हुए  बोली
 जिज्जी नहीं कज़िन,सुबोध की आँखे शर्मिंदगी से झुक गयीं।