हजरत इब्राहीम उन दिनों बलाख के बादशाह थे। अरब की गुलाम प्रथा के अंतर्गत उन्होंने एक गुलाम खरीदा और उससे नाम पूछा तो गुलाम ने कहा, “हुजूर! आप जिस भी नाम से चाहे मुझे पुकारें, वही मेरा नाम होगा।”
“तुम क्या खाओगे?”
“जो आप खाने को देंगे।”
“तुम्हें कपड़े कैसे पसंद हैं?”
“जैसे आप पहनने को देंगे।”
“काम क्या करोगे?”
“जो आप कहेंगे हुजूर।”
“आखिर तू चाहता क्या है? इब्राहीम ने मुस्वफ़ुरा कर पूछा।” “हुजूर! गुलाम की अपनी चाह ही क्या होती है?” यह कहकर वह शांत ही खड़ा रहा।
बादशाह अपनी गद्दी से उठे और उस गुलाम को गले लगाकर बोले- “तुम मेर गुरु हो। तुमने आज मुझे यह सिखाया है कि परमात्मा के सेवक को कैसा होना चाहिए।” कालांतर में बादशाह इब्राहीम संत इब्राहीम के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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