Grehlakshmi Ki Kahani: ‘शिवानी’, पीछे से किसी ने आवाज दी। आवाज कुछ जानी-पहचानी सी लगी। मुड़कर देखा, ‘प्रशांत!’ अकस्मात् मेरे मुख से निकला। मैंने पहचानने में देर न लगाई। मेरी दोनों बेटियां रागिनी और बंदिनी पास के ही आईसक्रीम पार्लर में गयी थी और मैं पेड़ की छांव में खड़ी दोनों का इंतजार कर रही थी, तभी प्रशांत का आगमन हुआ। वर्षों बाद प्रशांत को देखकर मैं क्षणांश भावविभोर हो गयी। अनायास अतीत चलचित्र की भांति मेरे आंखों के सामने तैरने लगे।
प्रशांत और मैं एक निजी स्कूल में पढ़ाते थे। शुरू-शुरू में मुझे प्रशांत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह मुझे एक सामान्य युवक लगा। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता मैंने महसूस किया कि मेरे दिल में प्रशांत ने जगह बनानी शुरू कर दी है। इसकी वजह थी उसका हंसमुख स्वभाव व निश्छल नजरिया था।
वह मुझे अन्य युवकों से अलग लगा। उसकी यही छवि मेरे दिल में बस गयी, जैसे ही स्कूल की दहलीज में मेरे कदम पड़ते सबसे पहले मेरी नजर प्रशांत को खोजती। ऐसी ही स्थिति प्रशांत की भी थी। जब कभी वह नहीं आता मेरा मन पढ़ाने में बिल्कुल नहीं लगता। फिर पूरी रात उसकी बाट जोहती मैं अगली सुबह का इंतजार करती। अगली सुबह की पहली रोशनी जैसे ही मेरे बारामदे में पड़ती मेरा मन प्रशांत से मिलने के लिए अधीर हो जाता। राहत तब मिलती जब वह मुझे प्रार्थना की लाइन में सबसे पीछे खड़ा दिख जाता। मेरा मन हर्ष से भर जाता। यह सिलसिला करीब एक साल तक चला। एक दिन अचानक प्रशांत ने यह कह कर चौका दिया की अब शीघ्र नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी जॉइन करने जा रहा है। सुनकर मेरा मन उदास हो गया। मुझे लगा प्रशांत के दिल में मेरे लिए उतनी जगह नहीं थी, जितनी की मुझमें थी। अगर रहता तो भी क्या कोई अपना करियर बनाने बेहतर जगह नहीं जाता? एक छोटे से स्कूल में पढ़ाकर प्रशांत को क्या मिलता? जाहिर है प्रशांत ने जो फैसला लिया था वह उसके बेहतर भविष्य के लिए था। इसलिए मेरा यह सोचना कि उसके दिल में मेरे लिए प्यार नहीं था। खुदगर्जी होगी। स्कूल छोड़ने के दूसरे दिन मैंने प्रशांत को अपने घर बुलाया। हालाकि, यह ठीक नहीं था तो भी उसका इस तरह से मेरी जिंदगी से चले जाना मेरे मन के खालीपन को गहरा गया। एक अजीब-सी रिक्तता आ गयी मुझमें। जो मेरे लिए असहय थी। मन तो यही कर रहा था कि उसे इस कदर जकड़ कर रख लूं कि वह सिर्फ मेरा और मेरा बन कर रह जाए पर ऐसा संभव नहीं था। सोची आखिरी बार मिलकर अपने दिल की बात खुलकर कह दूं उसके बाद उसकी जो मर्जी। प्रशांत ने सहमते हुए मेरे घर में दाखिला लिया। उस रोज मेरे घर में कोई नहीं था। कमरे में प्रवेश करते ही उसने पूछा, ‘तुम्हें डर नहीं लग रहा है?’ मैं हंसते हुए बोली, ‘किसका?’
‘परिवारवालों का’ प्रशांत बोला। ‘किसी ने उल्टा अर्थ लगा लिया तो…’ प्रशांत ने आगे कहा।
‘लगाने दीजिए। मुझे किसी का डर नहीं है’ मेरे बेबाक टिप्पणी पर वह क्षणांश विचलित हुआ मगर उसके बाद संभल गया। जैसे खोया आत्मविश्वास लौट आया हो।
‘यह मेरे ताउजी का घर है।’ मैंने खुलासा किया।
‘तुम यहां की रहने वाली नहीं हो’ प्रशांत ने सवाल किया।
‘नहीं’ मैंने जवाब दिया।
‘फिर?’
‘प्रतापगढ की हूं। दो साल से यहां रह रही हूं।’
‘यहां आने की वजह?’ प्रशांत के सवाल पर पलांश मेरा मन उदास हो गया परंतु अगले ही पल खुद को संयत किया। मुस्कुराते हुए बोली, ‘ऐसे ही।’ प्रशांत ने उसके आगे जानने का प्रयास नहीं किया। मुझे जब भरोसा हो गया कि प्रशांत मुझे लेकर संजीदा है तो मुझे बेहद सुकून मिला। एक तरह से मन पर से एक बड़ा बोझ उतर गया। मैंने फ्रिज में से कुछ मिठाइयां लाकर प्रशांत के सामने रख दी। एक उठाने के बाद बोला, ‘कल खाली हो?’
‘क्यों?’ मैंने सवाल किया।
‘कहीं घूमने निकलते हैं।’ यह एक यक्ष प्रश्न था मेरे लिए, जिसका जवाब देना आसान नहीं था। प्रशांत ने मुझे असमंजस में डाल दिया। न मैं इनकार करने की स्थिति में थी और न ही स्वीकार करने के। बस इतना ही कहा जहां भी ले चलो मगर अभी नहीं। अभी नहीं ने प्रशांत को संशय में डाल दिया। बहरहाल उसने जिद नहीं की। यही बात मुझे प्रशांत की अच्छी लगती थी। वह औरों से अलग सुलझा हुआ इंसान था। प्रशांत के जाने के बाद दिल उसी के ख्वाबोख्याल में डूब गया। कल स्कूल में खाली-खाली सा लगा। महीनों बाद ऐसा लगा जैसे कोई दिल का टुकड़ा अपने से दूर चला गया। पढ़ाने में मन नहीं लगा। घर आते ही मैंने प्रशांत को फोन लगाकर उसका हाल लिया। दो घंटे तक बात ही होती रही। मोबाइल बंद करने का मन ही नहीं किया। एक दिन तो हद हो गयी जब बातों-बातों में मेरे आंखो से अश्रुधार फूट पड़े।
‘प्रशांत, तुम मुझे छोड़कर तो नहीं चले जाओगे?’ रूंधे कंठ से बोली।
‘ऐसा क्यों सेाचती हो? समय का इंतजार करो। तुम सिर्फ मेरे लिए बनी हो।’ प्रशांत के बोल जेठ की दुपहरी में सावन की फुहार सरीखे लगे। मैं भावविभोर हो गयी, जैसे ही प्रशांत का फोन कटता दिल फिर से डूबने लगता। एक अजीब सी असुरक्षा की भावना जेहन में भर जाती। पता नहीं प्रशांत अपनी बात पर कायम रहेगा भी नहीं। दो महीने बाद अचानक से मैने प्रशांत से बात करना बंद कर दिया। प्रशांत ने कई बार कोशिश की मगर मैंने फिर कभी उसके काल को रिसीव नहीं किया। बाद में हमेशा हमेशा के लिए उसके नंबर को ब्लॉक कर दिया। आज बरसों बाद मिली तो जाहिर है पुरानी यादें ताजा होगी। ऐसे में अगर प्रशांत ने उससे उसके दूर होने की वजह पूछी तो क्या जवाब दूंगी? जवाब बेहद सरल था। जब सरल था तो तभी दे दिया होता। कम से कम प्रशांत के मन में कोई मलाल तो नहीं रह जाता। पता नहीं वह मेरे बारे में क्या-क्या सोच लिया होगा। जो भी हो अब उन बातों का कोई मतलब नहीं रहा। हम मिले यह क्या कम था। मैं तो सोचती थी प्रशांत से शायद ही कभी भेंट हो? आज हुई है तो क्यों ने इन पलों का तबीयत से जी लिया जाए। तभी मेरी दोनों बेटियां हंसते खिलखिलाते हुए आईं। ‘मम्मी, इसे चखो। बहुत टेस्टी है।’ एक ने आईसक्रीम का कोन मेरे होठों तक बढ़ा दिया। मैंने उसे हाथों से रोक दिया।
‘तुम लोग खाओ।’ मैं बोली। प्रशांत की तरफ मुखातिब हुई, ‘इनसे मिलो यह है मेरे दोस्त प्रशांत। हमदोनों कभी एक साथ स्कूल में पढ़ाया करते थे।’ दोनों ने प्रशांत को प्रणाम किया। फिर एक शरारत भरी नजरें मेरी तरफ फेंक कर मुस्कुरा दी? आजकल के बच्चे बहुत समझदार है। यहां मुझे यह बताने की जरूरत नहीं कि मेरी दोनों बेटियों ने क्या सोचकर ऐसी प्रतिक्रिया दी। शाम गहराने लगी थी, मैंने प्रशांत को अपने घर का पता और मोबाइल नंबर दिया। इस वादे के साथ कि मौका पाकर वह मेरे घर अवश्य आएगा। जाते-जाते प्रशांत यह कहना नहीं भूला कि मुझे तुम्हारा बसा परिवार देखकर बेहद खुशी मिली। एक फीकी मुस्कान उसके चेहरे पर तीर गयी। मैंने उसकी आंखों में उदासी का समुंदर देखा। न मौका था न दस्तूर। लिहाजा मैं बिदा लेकर आगे बढ़ गयी। रास्ते भर एक शब्द मेरे सीने में शूल की भांति चुभती रही। वह था परिवार। जिसका उल्लेख करके प्रशांत ने मेरे जख्म को फिर से हरा कर दिया। इसमें प्रशांत का क्या दोष। वह जितना जानता है उतना ही तो समझेगा। मैंने कभी उससे अपनी पिछली जिदंगी के बारें में नहीं बताया। तब प्रशांत के साथ गुजारे पल को मैं भरपूर जी लेना चाहती थी। लंबे अरसे बाद मेरी वीरान जिंदगी में प्रशांत बहार बन कर आया था। पता नहीं कल जिंदगी किस करवट ले। हुआ भी ऐसा। मेरे ताई जी को पता चल गया था कि मेरा प्रशांत के साथ अफेयर चल रहा है। इसकी खबर उन्होने मेरी मम्मी पापा को दे दी। मम्मी ने मुझे इस सबंध को तोड़ने की चेतावनी दे डाली। उन्होने मुझे वापस प्रतापगढ़ बुला लिया। भरे मन से मैंने प्रशांत से हमेशा-हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया। मुझे हमेशा इस बात की पीड़ा थी कि हमारा प्यार अधूरा था।
आज रविवार था। मैंने प्रशांत को फोन लगाया। प्रशांत की हिचक आज भी वैसे की वैसे ही थी। बोला, ‘आना चाहता था मगर यह सोचकर कदम रूक जाते कि पता नहीं तुम्हारे पति क्या सोचे?’
‘प्रशांत, तुम्हारी कमजोरी गई नहीं?’ मुझे हंसी सूझी। ‘जरा सोचो मैं तुम्हारे घर आती तब भी तुम्हारी पत्नी मेरे बारें में ऐसा ही सोचती? छोड़ो भी। अब हम दोनों उम्र के उस पायदान पर हैं जहां प्यार-मोहब्बत बचकानी हरकत के कुछ नहीं लगेगी।’
‘बचकानी हरकत?’ प्रशांत को अच्छा नहीं लगा। ‘तुमने कितनी आसानी से कह दिया। कभी मेरे बारे में सोचा होता तो शायद ऐसा कहने के पहले दस बार सोचती।’ मैंने दिल्लगी की, ‘लड़ने के लिए ही बुला रही हूं। आकर जितनी भड़ास निकालनी हो निकाल लेना।’
‘बडी निडर हो तुम?’
‘अच्छा पहचाना तुमने। याद है जब पहली बार मैंने तुम्हें अपने ताऊ के घर बुलाया था। तुम तो डर से ऐसे सहमे जा रहे थे मानों शेर की मांद में जा रहे हो।’ प्रशांत को सब याद था। इतनी निडर शिवानी ने कैसे पलायन का रास्ता अख्तियार कर लिया यही जानने के लिए उसने शिवानी का दावत कुबूल कर लिया। प्रशांत को देखते ही शिवानी की खुशी के पारावार न रहा। सोफे पर बैठते हुए मैंने चारों तरफ नजरें फेंकी।
‘क्या देख रहे हो?’ शिवानी पूछी।
‘तुम्हारा घर। बडे सलीके से सजा कर रखी हो। तुम्हारे पति तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकते होंगे।’ प्रशांत मुस्कुराया। पति के नाम से क्षणांश मेरा तिक्त हो गया। मगर जाहिर न होने दिया। मुझे लगा शायद मेरे मनेाभावों को प्रशांत ने पढ़ लिया।
‘पति महोदय से नहीं मिलवाना चाहोगी?’ पति का बार-बार नाम लेकर आखिर प्रशांत क्या साबित करना चाहता था। यह मेरी समझ से परे था। कहीं वह मेरे मन को टटोलना तो नहीं चाहता था। ऐसा ही है तो उससे क्या छुपाना। साफ-साफ बता ही देती हूं कि मैं अकेली हूं।
‘प्रशांत, मैंने आजतक शादी नहीं की।’ प्रशांत अवाक् रह गया यह सुनकर।
‘क्या कह रही हो। ये दोनों लड़कियां?’
‘गोद ली हुई हैं।’ मैं आगे कहती रही, ‘मैं जानती हूं कि तुम्हारे मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे होंगे। जब एकाएक मैनें तुमसे संबंध खत्म कर लिया था।’
‘जाहिर सी बात थी। आखिर हमदोनों काफी करीब आ चुके थे। मैंने तो मन भी बना लिया था कि तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपनी अंकशायिनी बनाऊंगा। मगर ऐसा क्या हुआ जो मुझसे नाता तोड़ लिया?’
‘मेरी शादी समीर से हुई थी। समीर बैंक में काम करता था। मात्र दो महीने चली होगी हमारी शादी जब एक दिन समीर ने साफ-साफ कह दिया कि उसे बच्चा चाहिए। और मैं बच्चा जनने में असमर्थ थी।’
‘ऐसा कैसे हो सकता है?’
‘ऐसा था।’ मैंने ऐसा पर जोर दिया। ‘प्रकृति ने मेरे साथ बडी नाइंसाफी की। मुझे जन्मजात बांझ बनाया। सबको पता था। इसके बावजूद मेरे पिता ने लोकलाज के भय से मेरी शादी समीर से कर दी।’
‘क्या इसका कोई इलाज नहीं था?’
‘नहीं।’ घुटा हुआ स्वर था मेरा। सुनकर प्रशांत का मन खराब होना स्वभाविक था।
‘बच्चे गोद भी तो लिये जा सकते थे।’ प्रशांत बोला।
‘सब तुम्हारी तरह नहीं होते।’ मैंने कहा। अब यह बात प्रशांत पर कितनी लागू होती है मैं कह नहीं सकती क्योंकि प्रशांत भी तो एक पुरुष था। हो सकता हो उस वक्त वह भी वही रूख अपनाता जो समीर ने अपनाया।
‘तलाक के लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं थी। मेरे लिए यह मौत से भी बदतर था। इससे अच्छा ईश्वर मुझे पैदा ही न करता। कम से कम बांझ के लांछन से तो बच जाती।’ कहते-कहते मेरी आंखें नम हो गयी। तभी मेरी दोनों बेटियां आकर मुझे ढांढस बंधाने लगी। कहने लगी, ‘मम्मी पुरानी बातें याद करके अक्सर गमगीन हो जाती हैं। हम दोनों भरसक कोशिश करती हैं कि पुरानी बातें भूल जाएं।
‘क्या कभी मेरी भी चर्चा करती है?’ प्रशांत ने पूछा। इस सवाल पर दोनों मुस्कुराने लगीं। प्रशांत को समझते देर न लगी कि मैंने उसे कभी नहीं भुलाया। मैंने दोनों को वापस अपने कमरे में जाने को कहा। ‘पापा को भले ही तसल्ली मिल गयी कि उन्होने कन्यादान करके बाप का फर्ज निभा दिया अब मेरे तकदीर में तलाक लिखा है तो मैं क्या कर सकती हूं?’ मैं कही।
मैंने कहना जारी रखा, ‘तलाक के बाद मुझे बनारस भेज दिया गया ताकि किसी स्कूल में अध्यापन करके तलाक की त्रासदी भूल सकूं। भूल ही गयी थी जब तुम मिले। तुमने ही मुझे जीने की इच्छा पैदा की। याद है उस रोज मैं कितनी खुश थी जब पहली बार तुमने मेरे सामने अपने प्यार का इजहार किया था।’ प्रशांत को सब याद था। उस रोज स्कूल की तरफ से एक नाटक का आयोजन एक थियेटर में हुआ था। नाटक खत्म होने के बाद शाम नौ बजे मैं और प्रशांत एक रिक्शे से वापस घर की तरफ लौट रहे थे। प्रशांत कुछ कहना चाहता था मगर संकोचवश कह नहीं पा रहा था। चेहरा दिल की जुबान होती है। मैं समझ गयी। प्रशांत से बोली, ‘क्या सोच रहे हो?’
‘कुछ नहीं।’ उसने टाला।
‘सोच रहा हूं यह मौका दोबारा मिलने से रहा।’
‘तो?’ मेरी भोंहें आकुंचित हो गयी। एकाएक मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर बोला, ‘आई लव यू शिवानी।’ मानो मैं भाग रही हूं। मुझे जोर की हंसी सूझी मगर संयत रही।
‘बस इतना कहने के लिए इतने टेंशन में थे?’
‘तुम इसे मजाक में ले रही हो। मैं तुमको लेकर वाकई सीरियस हूं।’ प्रशांत को मैं और दुखी नहीं करना चाहती थी।
‘ओके?’ प्रशांत को राहत मिली। मेरा घर आ गया। मैं उतर कर जाने लगी। मैंने मुड़कर देखा प्रशांत की नजर अब भी मेरा पीछा कर रही थी।
‘ये तो तुमने अपनी कह ली मगर ये नहीं बताया कि अचानक मुझसे संबंध क्यों तोड़ लिया। मेरा क्या दोष था?’ प्रशांत ने पूछा।
‘तुम्हें अच्छा नहीं लगा होगा जब मैंने तुम्हारा फोन ब्लॉक कर दिया।’
‘स्वभाविक है। बिना वजह बताये मेरी जिंदगी से तुम्हारा यूं चला जाना। मुझे कितना अकेला कर गया, क्या इसका एहसास था तुम्हें।’ मैंने नजरें नीची कर ली। मुझे अपराध बोध हो रहा था। बड़ी मुश्किल से प्रशांत से नजरें मिला सकी।
‘सबको पता चल गया कि मेरा तुमसे अफेयर चल रहा था। मेरी ताई ने इसकी सूचना मेरे मम्मी-पापा तक पहुंचा दी। पापा एक बार मेरे तलाक का दंश झेल चुके थे सो वे नहीं चाहते थे कि दोबारा मैं किसी से संबंध रखकर फिर से जलालत झेलूं। वे जानते थे कि शायद ही कोई मेरी असलियत जानकर शादी करेगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि मैं किसी अच्छी नौकरी करके सम्मानित जीवन गुजारूं। उन्होंने ने मुझे बनारस सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए ही भेजा था। वह तो मैं समय काटने के लिए निजी स्कूल को जॉइन कर लिया। मुझे भी यही मुनासिब लगा। मैं तुम्हें धोखे में नहीं रखना चाहती थी।’ मेरे गालों पर आसुंओं की बूंदें ढुलक आईं। कुछ देर के लिए एक सन्नाटा पसर गया हम दोनों के बीच। प्रशांत के मन में मेरे प्रति जो गिले-शिकवे थे वह एक पल में रेत के मानिंद बिखर गये। उसके चेहरे से पश्चाताप की रेखाएं साफ दिख रही थी।
‘शिवानी, मुझे माफ कर दो। इतने वर्षों तक अपने दिल में तुम्हारे प्रति गलतफहमी पाले रहा।’
‘खैर छोड़ो। ये बताओ तुम अकेले क्यों आये हो। तुम्हारी पत्नी बच्चे कहां हैं?’ मैंने प्रसंग बदला। पत्नी के सवाल पर प्रशांत संतोषवश बोला, ‘तुमने तो अपनी कहकर खुद को महान बना लिया।’
‘नहीं प्रशांत ऐसा न कहो। कुछ महीनों के लिए ही सही तुमने मुझे प्यार का मतलब समझाया। मैं लगभग टूट चुकी थी। तलाक के हादसे ने मुझे निराशा के दलदल में धकेल दिया था। तुमने मुझे उबारा। यह क्या कम महानता थी जो तुमने मुझे जीने का अर्थ दिया।’ प्रशांत के गमगीन चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तिर गयी। मुझे लगा अब हम दोनों के बीच कहने-सुनने के लिए कुछ नहीं बचा। गलतफहमी के बादल बरस कर निकल चुके थे। नीले आसमान की तरह हम दोनों के मन साफ हो चुके थे। इस बीच प्रशांत कुछ कहना चाहता था। मगर कह नहीं पा रहा था। फिर वही संकोच। पता नहीं प्रशांत कब सुधरेगा?
‘क्या हम फिर से एक नहीं हो सकते?’ प्रशांत के पहल पर मैं हतप्रभ थी।
‘अच्छा मजाक कर रहे हो प्रशांत तुम मुझसे।’
‘मजाक नहीं। मैं सीरियस हूं।’
‘तुम्हारे परिवार को मैं धोखा दूं। यह न तुम्हें शोभा देता है न मुझे। वैसे भी मेरे जीने का सहारा मेरी दोनों बेटियां है। मुझे शादी में कोई दिलचस्पी नहीं है।’
‘परिवार होगा तब न धोखे की बात उठेगी।’
‘मतलब?’
‘मैंने आज तक शादी नहीं की। तुम्हारे जाने के बाद मुझे तुम्हारी जैसी कोई मिली ही नहीं। सोचा बाकी जिंदगी तुम्हारी यादों के सहारे गुजार दूंगा। परंतु भगवान को कुछ और ही मंजूर था।’
‘मुझ बांझ से तुम्हें क्या मिलता?’ मेरा स्वर डूबा हुआ था।
‘तुम मिल जाती तो समझता सबकुछ मिल गया। काश तुमने एक बार भी बताया होता तब भी मैं तुमसे शादी के लिए मना नहीं करता। बच्चे तो गोद भी लिए जा सकते हैं मगर सच्चा साथी बार-बार नहीं मिलता।’ मुझे अपने आप पर लज्जा महसूस होने लगी। सोचने लगी प्रशांत के त्याग की कीमत मैं कई जन्म लेने के बाद भी नहीं उतार पाउंगी। शायद कभी नहीं।
