दोनों बच्चे पढ़ रहे थे, सास-ससुर ड्राइंग रूम में टीवी देख रहे थे, वह किचन में खाना बना रही थी पर हाथों के कम्पन से आज सारे काम ही गलत हुए जा रहे थे । मां का चेहरा और बातें ज़ेहन से हट हीं नहीं रही थी … विचारों की कश्मकश और रसोईघर के धुएं में उसका दम घुटने लगा … पसीने में तरबतर वह हांफती हुई किचन से निकलकर आंगन में आ गयी । ग्रीष्म का ताप पूरे आंगन में पसरा हुआ था … कुछ देर आंगन में ठहरकर जीने की ओर बढ़ी और कांपते पैरों को बमुश्किल सीढ़ियों पर ज़माते हुए वह ऊपर छत पर आ गई।

उत्तर की आकाश से सुरमई बादलों का झुंड घनीभूत होते हुए आगे बढ़ रहा था, मतवाले सांवले बादलों की यह सघनता कभी उसे सम्मोहित कर लिया करती थी पर आज इन्होंने मन की बेचैनी और बढ़ा दी।माधवी रेलिंग से सटकर खड़ी हो गई … निगाहें अपने आप हरे रंग के दोमंज़िले मकान की ओर मुड़ गई, कलात्मक ढंग से बनी बालकनी में गहराते धुंधलके के बीच भी नर्म सी परछाईं को अपनी तरफ ताकते हुए उसने महसूस किया … माधवी ने आंखें फेर ली।

अंधेरा धीरे-धीरे साम्राज्य बढ़ाने लगा था … उसका खुद का जीवन भी तो एक गहराते अंधेरे का अकथ दुःस्वप्न हीं बन कर रह गया था .. दीर्घ निःश्वास के संग अतीत की स्मृतियों में माधवी भटकने लगी। पिता का प्रभावशाली चेहरा, शान्त स्निग्ध आंखों से बेटी के लिए निरन्तर झरता स्नेह, मां की लाड-भरी बोली, भाईयों संग नोंक झोंक …. सब चलचित्र की भांति विचारों में जीवन्त हो उठे ।

दो भाइयों की इकलौती बहन पूरे दिन घर में चिड़िया की तरह चहचहाती रहती ।पिता के प्राण बसते थे बेटी में … बचा खुचा स्नेह हीं दोनों भाईयों को मिल पाता था । दोनों भाई जहां गेहुएं रंग और सामान्य शक्ल सूरत के थे वहीँ माधवी के ऊपर विधाता ने जैसे दोनों हाथों से खुलकर सौन्दर्य का पारितोषिक लुटाया था … स्वच्छ धुले स्वर्णचम्पा-सा गौर वर्ण, तीखे नयन नक्श और सबसे गज़ब तिलस्मी बादामी आंखें जो हर किसी की निगाहों को बांध लेते थे … अनुपम सौन्दर्यशालिनी , नटखट बिटिया की एक-एक चपलता पर पिता सौ-सौ लाड़ जताते … जब बेटी को स्कूल भेजने की बात आई तो पिता ने शहर के मंहगे कॉन्वेंटो की फीस पता करनी शुरू की, काफी दौड़ धूप के बाद आखिरकार शहर के एक ढेरों चोंचले वाले मंहगें कॉन्वेंट में माधवी को दाखिल कराया गया, जबकि दोनों भाई सामान्य स्कूलों में पढाई के लिए भेजे गए।

बढे हुए खर्च को पूरा करने के लिए माधवी के पिता को अब दिन-रात मेहनत करनी पड़ती थी। खेती के काम के अलावा अब वह ठेकेदारी के काम भी देखने लगे थे। काम की व्यस्तता के बीच भी सुबह 4.30 पर बेटी को स्कूल की बस तक छोड़ने के बाद दोपहर को बाईक से लेने आते … घर से स्कूल की बस तक पहुंचने में आधा घन्टा लग जाता था । 9वीं कक्षा तक आते-आते माधवी खुद भी कभी-कभी घर आ जाती ।

वायु में एक अमंगल-सी सनसनाहट थी उस दिन जब ऐसे हीं अकेली माधवी अपनी धुन में स्कूल से घर की ओर जा रही थी, एकाएक एक बाईक सर्राटे से उसकी बगल से गुज़री … बाईक इतने करीब से गुज़री थी कि माधवी गिरते-गिरते बची … सहमकर वह सड़क के किनारे से होकर जल्दी-जल्दी चलने लगी, तभी पीछे से कुछ आवाजें आने पर उसने मुड़कर देखा … बाईक नीचे गिरी हुई थी और उस अभद्र बाईक सवार को कॉलर से पकड़ कर कोई धकिया रहा था … यह नीलेश था जो पहले माधवी के स्कूल में हीं पढ़ता था पर पिता की अकस्मात् अस्वस्थता के कारण उसे अपने स्कूल की पढाई बीच में हीं छोड़कर पिता के कारोबार का काम संभालना पड़ा था । इस घटना के बाद से माधवी ने गौर किया कि अब वह जब भी अकेली घर जा रही होती तो नीलेश बाईक से चक्कर लगाते हुए उसके पीछे-पीछे आता और जब वह घर पहुंच जाती तो वापस लौट जाता।

दो-एक महीने बाद माधवी ने महसूस किया कि सामने वाले घर की खिड़कियों से दो आँखें निरन्तर उसे हीं देख रहीं हैं … पता नहीं कब और क्यों नीलेश ने सामने वाले घर में एक कमरा ले लिया था। माधवी के मन में एक अज़ीब असुविधा की सी स्थिति उत्पन्न हुई। नीलेश अच्छी कद काठी का एक आकर्षक युवक था, गिटार बजाने के अलावा वह शब्दों की बाज़ीगरी में भी माहिर था। दिलकश शब्दों को पुर्जों पर लिखकर मौका देखकर माधवी को समर्पित किए जाते … धीरे-धीरे मासूम सुनयना को भी यह सब अच्छा लगने लगा। माधवी का ध्यान अब पढने लिखने में कम लगता, निगाहें नीलेश को ही ढूंढती … इधर चार-पांच दिनों से नीलेश का कहीं अता-पता नहीं था, माधवी को चिन्ता हुई … छठे दिन नीलेश दिखा, उसका चेहरा उतरा हुआ था, उसने जो कुछ बताया उसे सुनकर माधवी परेशान हो उठी।

अब हर हफ्ते माँ चुपचाप आकर माधवी से मिल लेती, कभी-कभी ज़िद करके कुछ पैसे भी दे जाती । माँ से दुःख-दर्द साझा करके ह्रदय का बोझ कुछ हल्का हो जाता … ऐसे हीं दिन बीतते रहे एक दिन मंजू बेटी से मिलकर जब घर जाने के लिए उठी तो चक्कर-सा आ गया माधवी ने लपककर माँ को सम्भाला और थोड़ी देर घर चलकर आराम करने को कहा पर मंजू ने टाल दिया – नहीं बेटी थोड़ी देर में शाम हो जायेगी … तुम्हारे पापा और भाई घर लौट आएँगे … माँ ने लाचार आँखों से बेटी की तरफ देखा और आगे बढ़ गई द्य माधवी ने अपने भीतर एक गहरी तड़प महसूस की, केवल एक भूल ने कितना पराया बना दिया था उसे … कि अपनी बीमार माँ को अपने हीं घर तक पहुँचाने नहीं जा सकती । माँ के साथ चलते हुए माधवी ने जैसे खुशामद करते हुए कहा – मैं घर के बाहर से हीं लौट आऊँगी … मुझे कोई नहीं देख पाएगा, अगर किसी की नज़र पड़ती भी है तो पहचान न सकेगा मैं अपने इस लांछित चेहरे को पल्लू से ढक कर रखूँगी माँ … प्लीज ! और माँ-बेटी की निगाहों की मूक भाषा के संवाद हुए … जैसे गाय अपनी बछिया को देखती है … माँ को सहमति देनी पड़ी, माधवी पल्लू से चेहरा ढँककर ऑटो में माँ के साथ बैठ गई … ऑटो चला, बगैर कोई संवाद के दोनों बैठी रही … थोड़ी देर बाद ऑटो मुड़ा और माधवी जैसे एक करख्त युग के बाद अपनी भीगी-भीगी सुकूनदेह जड़ों में लौट आई थी … सड़क के किनारे चारदीवारियों में खड़े आम, लीची और नारियल के पेड़, चाय वाली छोटी-सी दुकान, जहाँ वह छुटपन में बाबा से चॉकलेट दिलवाने के जिद करती थी, कुछ और आगे बरगद और उससे थोड़ी हीं दूरी पर खड़ा अश्वस्थ का विशालकाय पेड़ लाल गुलाबी साड़ियों और चटख ओढ़नी में सजी औरतें हाथों में प्रसाद और फूलों की डलिया लिए हुए … एक छोटे से झुण्ड में बैठी कुछ औरतें गीत गा रही हैं 

मोर प्रियतम सखी गईल दूर देस, जीवन । गेल साल सनेस 

मास आषाढ़ उनत नव मेघ, पिया बिसलेखे रहओ निरधेघ 

कौन पुरबख कउनोन से देस, धारब तहाँ मएँ जोगिनी भेष …

मोराह्यह्यह्यह्य प्रियतम …..

घने सायादार वृक्षों में पति के से सुरक्षा भाव को तलाशकर स्त्रियाँ कच्चे धागे से सात गाँठें लगाकर उसे मन हीं मन सात जन्मों के बन्धन में बाँध लेती हैं … पुरानी पहचान वाले पेड़-पौधों, मकानों को पीछे छोड़ते जनम-जनम के परिचित रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अब ऑटो रूक गया था … घर आ गया … पापा ने नया गेट लगवा लिया है माधवी उतरकर खड़ी हो गई … एक अजीब विह्वल से अहसास के साथ … आम का पेड़ कितना बड़ा हो गया है, घना भी … माधवी को पहचान कर जैसे पेड़ के पत्तों ने हाथ हिलाए … हवा से फड़फड़ाकर मानो हौले-हौले हँसकर कुछ कह रहा था पेड़ …. कुछ सूखे पत्ते उसके पैरों के पास गिर पड़े … माधवी ने उन्हें झुक कर उठा लिया और आगे बढ़कर पेड़ के तने से लिपट गई पलकें खुद-बा-खुद मुंद गईं, हवा में पत्ते एक बार ज़ोर से फड़फड़ाकर शान्त हो गए … माँ का कलेज़ा फटने को हुआ .. खुद को संभालकर बोली – अब लौट जा बेटी बच्चे घबड़ा रहे होंगे … माधवी ने अपने बचपन के आशियाने को एक बार भर आँख देखा और वापस ऑटो में बैठ गई द्य कब की मर चुकी माधवी के अन्दर जिन्दा होने की लालसा  सर उठाने लगी  … दिलो दिमाग में प्रश्नावलियों की झड़ी लग गई .. वह जो फ़क़त एक भूल उसके जीवन का नासूर बन गया … उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर भारी पड़ गया … अगर यही भूल मेरे भईयों से हो गई होती तो क्या तब भी समाज़ ने उसका यूँ हीं बहिष्कार कर दिया होता .. क्या तब भी पापा ने उनसे अपने सारे सम्बन्ध तोड़ लिए होते … क्या तब उनकी भी ऐसे हीं कोई खोज़-ख़बर नहीं ली जाती कि वे जिन्दा हैं अथवा मर गए … अगर वह एक स्त्री न होकर पुरुष होती क्या तब भी उसका अपराध अक्षम्य हीं होता या तब का सामाजिक न्याय-गणित कुछ और होता … इस बीच घर में कितने उत्सव हुए, भाईयों की शादियाँ हुईं पर उसे कभी किसी समारोह में नहीं बुलाया गया … घर, परिजनों और समाज के लिए वह मर चुकी थी … हाँ भूल की सजा देनी चाहिए थी .. दी भी गई पर नादानी में की गई भूल के लिए अगर कुछ समय की नाराज़गी के बाद परिजनों ने उसे स्वीकार कर लिया होता तो उस नीच पुरुष की भी आज इतनी हिम्मत न होती कि वह उसे और उसके बच्चों को यूँ लावारिस छोड़कर खुद मौज़ करता फिरे … नारी को नाँथ कर नियंत्रण में रखने के लिए कैसे-कैसे पाखण्ड पलते हैं इस पितृसत्तात्मक सामाजिक नियमों की आड़ में  … माधवी का दम घुटने लगा आह ! गहरा कुआँ … जहाँ से निकलने का कोई मार्ग नहीं … अँधेरा हीं अँधेरा .. चेतना जैसे डूबने लगी … नारी के गले में परम्परा की भारी गठरी जन्म से हीं बाँध दी जाती है, वह उसे ढोती चले तो भी मरती है उतार कर फेंक दे तो भी मरती है । 

पर वह जिएगी .. उसे जीना हीं होगा … अन्तरिक्ष के तारे मुस्कुराकर इशारों में ढाढस बँधाते रहे … रात करवटों में हीं गुज़री पर अगली सुबह साफ़ और बहुत हद तक स्पष्ट भी थी । सवेरे का नाश्ता पाँच लोगों के लिए बना, दूध फल और सूखे मेवों के भी उसने पाँच हिस्से लगाये । बच्चों को स्कूल पहुँचाकर सीधा डॉक्टर की क्लिनिक पर पहुँची, पुर्जे कटवाए, चेकअप्स करवाए । दो दिन में सारे रिपोर्ट्स आ गए, सब कुछ सामान्य था … बस हीमोग्लोबिन लो था, इसी की वजह से सारे कॉम्प्लीकेशन्स, कमजोरी और चक्कर आते थे । मेडिकल स्टोर से दवाइयाँ और टॉनिक लेकर घर वापस जाते हुए माधवी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया और खुद से एक वादा किया – अपने आप को हमेशा स्वस्थ और खुश रखने का । दोपहर में मंदिर पर पहुँची माँ अपने साथ एक आदमी को लेकर आई थी । उसने बताया पहली पत्नी के जीवित रहते अगर कोई आदमी दूसरा विवाह करता है तो यह गैरकानूनी है । हिन्दू लॉ में ऐसे विवाह की मान्यता खुद-ब-खुद शून्य हो जाती है । उस घर में माधवी और उसके बच्चों के सारे अधिकार यथावत रहेंगे कानून इनकी तरफ है । माधवी ने चैन की साँस ली … घर आकर सीधा सास-ससुर के कमरे में जा बैठी और बिना किसी हिचकिचाहट के पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात कहनी शुरू की – माँ से मिलने गयी थी … अपने और अपने बच्चों की जान की हिफाज़त से सम्बन्धित पत्र लिखकर माँ को दे दिया है, वह थाने में जमा करवा देंगी । मैं सब कुछ जान चुकी हूँ, अब मुझे अपने और अपने बच्चों का हक चाहिए । आगे क्या करना है, इस बात का फैसला आपलोग और समाज वाले कर लें । बात घर से निकल कर समाज और थाने तक पहुँचती देख बुजुर्गों के चेहरे फ़क पड़ गए । ससुर ने गम्भीर आवाज में कहा – तुम हमारे घर की बहू हो और ये बच्चे इस घर के चिराग, तुम यह थाने वाने का चक्कर छोड़ दे मधु, इससे बात बढ़ जायेगी और हो सकता है इन सबसे भड़ककर लड़का कोई और गलत कदम उठा ले … बदनामी होगी सो अलग … हम पर भरोसा रखो बेटी हम कुछ न कुछ करते हैं । रात तक नीलेश भी घर आ चुका था … फोन पर उसे सारी इत्तला कर दी गयी थी, तमककर माधवी के कमरे में पहुँचा पर नज़र मिलते हीं ठंडा पड़ गया … यह तो वही पुरानी वाली माधवी थी साक्षात् चंडी रूप में । उन नज़रों से नज़र मिलाने की त़ाब न ला सका । कुछ देर सोचकर, ज़ेब से नोटों की मोटी गड्डी निकाली और धीरे से मेज़ पर रख दिया – घर खर्च के पैसे … फिर आवाज में नरमाई घोलकर धीमे स्वर में बोला – कुछ और पैसे रख लो अपने लिए अलग से कुछ दूध और सूखे मेवे खरीद लेना, कितनी कमज़ोर हो गई हो … माधवी का मन घृणा से भर उठा, इधर कुछेक महीनों से माँ से मिलने के बाद से तो उसने रात को भी खाना खाना शुरू कर दिया था । दवाइयाँ और दूध-फल लेकर अब तो उसकी सेहत पहले से काफी हद तक दुरुस्त हो चुकी थी । जब सचमुच उसका स्वास्थ्य बेहद हीं बुरे हाल में पहुँच चुका था चेहरा मृतकों-सा निर्जीव हो चुका था तब तो इस स्वार्थी आदमी ने कभी उसे अलग से पैसे देकर अपना ध्यान रखने के लिए नहीं कहा ! आता और माँ बाप से मिलकर बाहर-बाहर से हीं निकल जाया करता । नीलेश ने गौर से माधवी के चेहरे पर आते जाते भावों को देखा और एक कदम आगे लेकर धीरे-से अपना हाथ बढाया पर माधवी ठंढी आँखों से उसे घूरकर दो कदम पीछे हट गई । नीलेश ने कुछ सोचकर सर झुका लिया, पीछे मुड़ा और तेज़-तेज़ क़दमों से बाहर निकल गया । माधवी लड़खड़ा कर बिस्तर पर बैठ गई दोनों हाथों से चेहरा ढांककर फफ़क पड़ी पर फिर झटके से उठी बेसिन पर जाकर चेहरा धोया, किचन में जाकर अपने लिए कॉफ़ी बनायीं और कॉफ़ी पीते-पीते एक फैसला किया । एक महीने पहले जब बच्चों को स्कूल पहुँचा कर लौट रही थी तो सामने किंशुक मिल गया था … सस्ती मानसिकताओं के बीच एक सभ्य और सुलझा व्यक्तित्व .. औपचारिक अभिवादन के बाद उसने कहा कि, बच्चों के लिए एक छोटा-सा स्कूल शुरू करने जा रहा है, माधवी अगर चाहे तो वहाँ पढ़ाने आ सकती है । कहकर वह प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा में माधवी की ओर देखने लगा .. बड़ी-बड़ी स्निग्ध बुद्धिदीप्त आँखों में सहानुभूति थी, माधवी ने चेहरा झुका लिया । विषाद भरे होंठो से फुसफुसाहट-सी निकली … घर के कामों से फुर्सत हीं नहीं मिलती … नर्म और गम्भीर आवाज माधवी के कानों से टकराई किंशुक ने इतना हीं कहा – बच्चों में व्यस्त रहोगी तो दिल भी लगा रहेगा और कुछ पैसे भी आ जायेंगे .. खैर आप सोच समझ कर निर्णय लीजिये कोई जल्दी नहीं है । माधवी ने फैसला कर लिया था, उसने बाल सँवारे, पर्स उठाया और सास से जाकर कहा – आज से मैं एक स्कूल में पढ़ाने जा रही हूँ । खाना बनाकर रख दिया है, आपलोग दोपहर का खाना खुद से निकालकर खा लीजियेगा और उसने एक नवीन संकल्प के साथ अपने पाँव घर से बाहर की ओर बढ़ा दिए ।

माधवी के दोनों भाईयों ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर हॉकी स्टिक से नीलेश की पिटाई की थी, साथ हीं उसे उस कमरे भी निकलवा दिया था, जिसे कितने जुगाड़ लगाकर छह महीने के एडवांस पैसे जमा कराने के बाद वह हासिल कर पाया था। घर में माता-पिता नीलेश की हालत देख कर बहुत परेशान हैं, यह सब कहते हुए नीलेश की आंखों में आंसू आ गए । उसने माधवी को अपने चोटों के निशान दिखाए और कहा कि उन्होंने मुझे धमकी दी है कि अगर मैं आईन्दा तुम्हारे आस-पास भी फटका तो वे मुझे जान से मार देंगे। माधवी भाइयों की करतूत सुनकर लज्जित हो गयी … नीलेश क्षणभर के लिए चुप रहा फिर सर झुका कर बोला – तुम्हें देखने के बाद से मैंने दिन-रात बस एक ही सपना देखा था कि तुमसे ब्याह करके तुम्हें जीवन के सारे सुख दूंगा पर मैं यह भूल गया था कि कहां तुम ब्राह्मणों की बेटी और मैं छोटी जातियों का लड़का …

आह ! मेरी जाति मेरे प्रेम के लिए बेड़ी बन गई … पर अगर मैं दलित का लड़का हूं तो इसमें मेरा क्या कुसूर है मधु .. लाचार आंखों से माधवी की तरफ ताक कर वह बोला – अब शायद जीवन में कभी मुलाक़ात न हो और लंगड़ाते हुए मुड़कर जाने लगा, माधवी तड़प उठी … नीलेश वापस मुड़ा, तुम्हारे बगैर जीने से तो मौत बेहतर है, पर मैं जीना चाहता हूं … अगर तुम चाहो तो इस मृतप्राय इंसान को जीवनदान दे सकती हो .. क्या तुम मेरे साथ चलोगी मधु ? मैं वादा करता हूं उस घर में तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं होगी … अपनी जान से भी ज्यादा हिफाज़त से तुम्हें रखूंगा। आंखों में भृत्य की सी याचना लिए वह माधवी की ओर देखने लगा … हम आज हीं शादी कर लेंगे … पता नहीं क्या हुआ माधवी एक पल में पिता का प्यार मां की ममता और भाईयों का दुलार भूल गई … जन्म के सारे बन्धनों को तोड़ कर वह उसी क्षण नीलेश के साथ चल पड़ी।

माधवी के इस कृत्य से घर पर जो कोहराम मचा वह विवरण से परे है। मैया सर पकड़कर बैठ गईं, दोनों भाईयों ने कहा – हम अभी जाकर उस दुर्जन लड़के के हाथ-पैर तोड़कर और माधवी को खींचकर लेकर आते हैं, पर आघात से पीले पड़े पिता ने हाथ ऊपर कर लड़कों को जाने से रोक दिया, कहा – इस घर का कोई भी सदस्य कभी भी उस लड़की से मिलने नहीं जाएगा। उस लड़की ने मेरे भरोसे को छला है आज से वह हमारे लिए मर गई … मैंने उसका श्राद्ध कर दिया कहकर आहत ब्राह्मण पिता ने अपना जनेऊ तोड़कर फेंक दिया। घर की प्रेम-सींची दीवारें थर्रा कर कराह उठी, मां के गले में एक सिसकी टूट कर रह गई … उस दिन के बाद से दुबारा किसी ने उस घर में माधवी का नाम नहीं लिया।

समय साल दर साल गुज़रता चला गया, माधवी एक बेटी और एक बेटे की मां बन गई। परिवार बढ़ा तो आमदनी बढ़ाने के लिए नीलेश ने कारोबार बढ़ाना शुरू किया … बिजनेस बढ़ने के बाद अब उसे काम के सिलसिले में दूसरे शहरों में भी जाना पड़ता और कभीकभार दो-चार दिन उधर ही रुकना भी पड़ता था। दूसरी तरफ बेटे के जन्म के बाद से माधवी का स्वास्थ्य ख़राब चल रहा था और उसे नीलेश की बहुत ज़रूरत महसूस होती थी। उसने कितनी बार लगभग गिड़गिड़ाते हुए नीलेश से कहा कि, कुछ दिन की छुट्टी कर लो, दो-चार दिन साथ में रहो, किसी अच्छे डॉक्टर से दिखवा दो।

लेकिन नीलेश यह सब सुनकर चिढ़ जाता, नीलेश के बदलते व्यवहार से माधवी क्षुब्ध थी । माधवी ने गौर किया कि वह बदल गया है … पैसे कमाकर ला देने भर को हीं अपने कर्तव्य की इतिश्री समझने लगा है । उसका चिढ़ा हुआ रुख़ और रूखा व्यवहार देखकर माधवी अपना-सा मुंह लेकर रह जाती। इधर से माधवी का मन बहुत घबड़ाने लगा था पर कहती किससे … मां बाप ने पहले हीं सारे सम्बन्ध तोड़ लिए थे, सास-ससुर को केवल उस से कामभर मतलब था, अड़ोस-पड़ोस में किसी से भी सुख दुःख साझा करने का रिश्ता नहीं बन सका था। अड़ोस-पड़ोस के पुरुष उसकी ओर अर्थपूर्ण दबी मुस्कान से देखते तो स्त्रियां उसके रूप से ईष्या करती और चरित्र पर संदेह। छोटे शहर के सारे मोहल्ले वाले उसके घर से भाग कर विजातीय लड़के के साथ शादी करने की बात जानते थे और माधवी के चाल-चलन को अच्छा नहीं समझते थे।

शुरुआत में तो सास ने बेटे की ख़ुशी के लिए कुछ दिन बहू से लाड़ जताया था पर बाद में बीमार और अपाहिज ससुर की सेवा-टहल समेत गृहस्थी के सारे ही कामकाज माधवी के कमजोर कन्धों पर डालकर वह भी हुक्म चलाने और टीवी देखने तक ही अपना कर्तव्य समझने लगी थी। सभी अपनी-अपनी दुनिया में मग्न थे, धीरे-धीरे करके अब तो नीलेश पूरे महीने घर नहीं आता। उसे माधवी की शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक ज़रूरतों की जैसे कोई परवाह हीं नहीं थी। काम के अत्यधिक बोझ, बीमारी और निरन्तर चलते अन्तर्द्वंद की वजह से माधवी का परियों-सा रूप कुम्भलाकर ढल गया था तो उधर नीलेश जो कि देखने में शुरू से ही अच्छा था, अब बढ़ती कमाई से उसके चेहरे पर लालिमा भी बढ़ने लगी थी। घर पर माधवी के हाथों का बना शाकाहारी खाना अब एक दिन के लिए भी उसके गले के नीचे नहीं उतरता था।

पहले पीने का केवल शौक था पर अब आदत हो गई थी … यहां तक भी गनीमत थी पर इस दूसरे शहर में नीलेश जब काम पर निकलता, उसी वक़्त पड़ोस की लड़की भी ऑफिस के लिए निकलती थी, धीरे-धीरे औपचारिक दुआ-सलाम के बाद एक दिन नीलेश ने उसे अपनी कार में ऑफिस तक छोड़ने का प्रस्ताव रखा, जिसे थोड़े ना-नुकुर के बाद लड़की ने स्वीकार कर लिया। लड़की का नाम सुषमा था और उसके परिवार में मां के अतिरिक्त कोई नहीं था । सुषमा की कमाई और मां के रिटायर्मेंट के पैसों से ही घर चलता था। पता नहीं कब पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर सुषमा को ऑफिस ले जाना और फिर ऑफिस से घर लाना नीलेश की पहली प्राथमिकता बन गई।

उसने एक बार फिर से वही दांव खेला और अपने लफ्फाजीभरे शब्दों के अभेद्य वाण चलाकर सुषमा का ह्रदय भी कब्ज़े में कर लिया। एक दिन मां और एक अन्य परिजन की उपस्थिति में सुषमा और नीलेश ने मंदिर में विवाह कर लिया।

घर के कामों में कोल्हू के बैल-सी पिसती माधवी को इन सब बातों की भनक तक न पड़ी पर माधवी की मां तक कहीं से उड़ते-उड़ते इस बात की खबर जा पहुंची। बेटी के कृत्य ने माँ के ह्रदय को गहरी पीड़ा ज़रूर पहुंचाई थी, पर इस खबर को जानकार मंजू का मन व्याकुल हो उठा। माधवी के पिता और भाई उसका नाम तक सुनना नहीं चाहते थे, सो मां ने चुपचाप अकेले हीं बेटी से मिलने का फैसला किया। किसी तरह नीलेश के घर का पता करके वह बेटी से मिलने पहुंची। दरवाज़ा माधवी ने हीं खोला, इतने बरसों में जीवन के इतने उतार-चढ़ाव गिनने के बाद अब वह वो माधवी नहीं रह गयी थी। मुरझाया मलिन-सा रूप और डार्क सर्कल से घिरी बुझी हुई बादामी आंखें तन-मन की अतृप्त व्यथा कथा को अपनी मूक भाषा में बयान कर रहे थे।

मां का कलेज़ा तड़प उठा, बेटी का हाथ पकड़कर बगल के मंदिर पर ले गई … निरन्तर बहते आंसुओं की धाराओं के बीच बातचीत होती रही, सबकुछ कह सुनकर मंजू के होंठ घृणा और वितृष्णा से उस दुराचारी को श्राप देने के लिए खुले, पर कुछ अस्फुट सा मुंह में हीं घुटकर रह गया।

आह ! उसकी पुत्री ने कच्ची उम्र की भावनाओं में बहकर स्वयं ही अपने लिए कुपात्र का चयन करके अपना और अपने निर्दोष बच्चों का जीवन भी बरबाद कर लिया था। मंजू को याद आया पहले जब नन्हीं-सी माधवी को लेकर मायके जाती तो सहेलियां कहती, आहा ! कितनी सुन्दर है री मंजू तुम्हारी बिटिया इसे मैं अभी हीं अपने बिटवा के लिए छेक ले रही हूं, बाद में मुकर मत जाना और मंजू गर्व से बेटी की ओर देखकर हंस देती … इसका ब्याह ऐसे थोड़े न करेंगे, इसका बाबा इसे पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाना चाहता है … एक गहरी निःश्वास गले से निकली … मां के जाने के बाद मंदिर से लौटकर घर आई तो पैर सौ-सौ मन के हो रहे थे, किसी तरह आधा-अधूरा खाना बनाकर रख दिया और छत पर चली आई … आंखों के आंसुओं के संग बादल भी बूंद-बूंद बरसने लगे थे। अभी सास खाना मांगेगी, देरी के लिए ताने मारेंगी … माधवी नीचे आ गई हमेशा की तरह सास-ससुर और बच्चों के लिए खाना निकाला और अपने लिए प्लेट नहीं लगाई न जाने कब से उसने रात में खाना ही छोड़ दिया था।

जूठे बर्तन एक तरफ रखते हुए मां का चेहरा याद आया वह बात याद आई – ये क्या हाल कर लिया है तूने अपना … अपनी गलतियों की सजा इन बच्चों को देगी ? जीवन में जो कुछ घट जाता है उसे पलटा नहीं जा सकता बेटी, पर उन गलतियों से आगे के जीवन के लिए सीख ज़रूर ली जा सकती है। हमें ठोकरों से टूटना नहीं चाहिए बस उनका सबक बनाकर पहाड़े की तरह रट लेना चाहिए।

माधवी ने गहरी सांस ली और स्वतः संवाद किया – तुमने सही कहा मां, मुझसे जो गलती हो गयी वह अब वापस सुधर तो नहीं सकती पर उस गलती की आंच में इन मासूमों का जीवन मैं नहीं झुलसने दूंगी। अगर कहीं मैं मर गई तो इन बच्चों का क्या होगा … नहीं अपनी रक्त-मज्जा से बने इन अबोधों को अनाथ करने का उसे कोई हक़ नहीं … अपने अन्दर की शक्ति को जागना होगा … जाग पगली … संभल … माधवी ने अपने लिए भी खाने का प्लेट लगाया, पर कौर गले से न उतरा किसी तरह पानी के साथ कौर निगलकर सोने चली गयी ।

अब हर हफ्ते मां चुपचाप आकर माधवी से मिल लेती, कभी-कभी ज़िद करके कुछ पैसे भी दे जाती। मां से दुःख-दर्द साझा करके हृदय का बोझ कुछ हल्का हो जाता … ऐसे हीं दिन बीतते रहे एक दिन मंजू बेटी से मिलकर जब घर जाने के लिए उठी तो चक्कर-सा आ गया। माधवी ने लपककर मां को सम्भाला और थोड़ी देर घर चलकर आराम करने को कहा पर मंजू ने टाल दिया – नहीं बेटी थोड़ी देर में शाम हो जायेगी … तुम्हारे पापा और भाई घर लौट आएंगे … मां ने लाचार आंखों से बेटी की तरफ देखा और आगे बढ़ गई । माधवी ने अपने भीतर एक गहरी तड़प महसूस की, केवल एक भूल ने कितना पराया बना दिया था उसे … कि अपनी बीमार मां को अपने ही घर तक पहुंचाने नहीं जा सकती।

मां के साथ चलते हुए माधवी ने जैसे खुशामद करते हुए कहा – मैं घर के बाहर से हीं लौट आऊंगी … मुझे कोई नहीं देख पाएगा, अगर किसी की नज़र पड़ती भी है तो पहचान न सकेगा, मैं अपने इस लांछित चेहरे को पल्लू से ढक कर रखूंगी मां … प्लीज ! और मां-बेटी की निगाहों की मूक भाषा के संवाद हुए … जैसे गाय अपनी बछिया को देखती है … माँ को सहमति देनी पड़ी, माधवी पल्लू से चेहरा ढककर ऑटो में मां के साथ बैठ गई … ऑटो चला, बगैर कोई संवाद के दोनों बैठी रही … थोड़ी देर बाद ऑटो मुड़ा और माधवी जैसे एक करख्त युग के बाद अपनी भीगी-भीगी सुकूनदेह जड़ों में लौट आई थी …सड़क के किनारे चारदीवारियों में खड़े आम, लीची और नारियल के पेड़, चाय वाली छोटी-सी दुकान, जहाँ वह छुटपन में बाबा से चॉकलेट दिलवाने के जिद करती थी, कुछ और आगे बरगद और उससे थोड़ी हीं दूरी पर खड़ा अस्वस्थ सा विशालकाय पेड़ लाल गुलाबी साड़ियों और चटख ओढ़नी में सजी औरतें हाथों में प्रसाद और फूलों की डलिया लिए हुए … एक छोटे से झुण्ड में बैठी कुछ औरतें गीत गा रही हैं – 

मोर प्रियतम सखी गईल दूर देस, जीवन । गेल साल सनेस 

मास आषाढ़ उनत नव मेघ, पिया बिसलेखे रहओ निरधेघ 

कौन पुरबख कउनोन से देस, धारब तहाँ मएँ जोगिनी भेष …

मोराssss प्रियतम …..

घने सायादार वृक्षों में पति के से सुरक्षा भाव को तलाशकर स्त्रियां कच्चे धागे से सात गांठें लगाकर उसे मन हीं मन सात जन्मों के बन्धन में बांध लेती हैं … पुरानी पहचान वाले पेड़-पौधों, मकानों को पीछे छोड़ते जन्म-जन्म के परिचित रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अब ऑटो रुक गया था … घर आ गया … पापा ने नया गेट लगवा लिया है माधवी उतरकर खड़ी हो गई … एक अजीब विह्वल से अहसास के साथ … आम का पेड़ कितना बड़ा हो गया है, घना भी … माधवी को पहचान कर जैसे पेड़ के पत्तों ने हाथ हिलाए … हवा से फड़फड़ाकर मानो हौले-हौले हंसकर कुछ कह रहा था पेड़ …. कुछ सूखे पत्ते उसके पैरों के पास गिर पड़े … माधवी ने उन्हें झुक कर उठा लिया और आगे बढ़कर पेड़ के तने से लिपट गई पलकें खुद-बा-खुद मुंद गईं, हवा में पत्ते एक बार ज़ोर से फड़फड़ाकर शान्त हो गए … मां का कलेज़ा फटने को हुआ .. खुद को संभालकर बोली – अब लौट जा बेटी बच्चे घबरा रहे होंगे … माधवी ने अपने बचपन के आशियाने को एक बार भर आंख देखा और वापस ऑटो में बैठ गई।

कब की मर चुकी माधवी के अन्दर जिन्दा होने की लालसा  सर उठाने लगी  … दिलो दिमाग में प्रश्नावलियों की झड़ी लग गई .. वह जो फ़क़त एक भूल उसके जीवन का नासूर बन गया … उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर भारी पड़ गया … अगर यही भूल मेरे भईयों से हो गई होती तो क्या तब भी समाज़ ने उसका यूं ही बहिष्कार कर दिया होता .. क्या तब भी पापा ने उनसे अपने सारे सम्बन्ध तोड़ लिए होते … क्या तब उनकी भी ऐसे ही कोई खोज़-ख़बर नहीं ली जाती कि वे जिन्दा हैं अथवा मर गए … अगर वह एक स्त्री न होकर पुरुष होती क्या तब भी उसका अपराध अक्षम्य ही होता या तब का सामाजिक न्याय-गणित कुछ और होता … इस बीच घर में कितने उत्सव हुए, भाईयों की शादियां हुईं पर उसे कभी किसी समारोह में नहीं बुलाया गया … घर, परिजनों और समाज के लिए वह मर चुकी थी … हां भूल की सजा देनी चाहिए थी .. दी भी गई पर नादानी में की गई भूल के लिए अगर कुछ समय की नाराज़गी के बाद परिजनों ने उसे स्वीकार कर लिया होता तो उस नीच पुरुष की भी आज इतनी हिम्मत न होती कि वह उसे और उसके बच्चों को यूं लावारिस छोड़कर खुद मौज़ करता फिरे … नारी को नांथ कर नियंत्रण में रखने के लिए कैसे-कैसे पाखण्ड पलते हैं इस पितृसत्तात्मक सामाजिक नियमों की आड़ में  …

माधवी का दम घुटने लगा आह ! गहरा कुआं … जहां से निकलने का कोई मार्ग नहीं … अंधेरा हीं अंधेरा .. चेतना जैसे डूबने लगी … नारी के गले में परम्परा की भारी गठरी जन्म से हीं बांध दी जाती है, वह उसे ढोती चले तो भी मरती है उतार कर फेंक दे तो भी मरती है। पर वह जिएगी .. उसे जीना ही होगा … अन्तरिक्ष के तारे मुस्कुराकर इशारों में ढाढस बंधाते रहे … रात करवटों में ही गुज़री पर अगली सुबह साफ़ और बहुत हद तक स्पष्ट भी थी। सवेरे का नाश्ता पांच लोगों के लिए बना, दूध फल और सूखे मेवों के भी उसने पांच हिस्से लगाये। बच्चों को स्कूल पहुँचाकर सीधा डॉक्टर की क्लिनिक पर पहुंची, पुर्जे कटवाए, चेकअप्स करवाए। 

दो दिन में सारी रिपोर्ट्स आ गईं, सब कुछ सामान्य था … बस हीमोग्लोबिन लो था, इसी की वजह से सारे कॉम्प्लीकेशन्स, कमजोरी और चक्कर आते थे। मेडिकल स्टोर से दवाइयां और टॉनिक लेकर घर वापस जाते हुए माधवी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया और खुद से एक वादा किया – अपने आप को हमेशा स्वस्थ और खुश रखने का। 

दोपहर में मंदिर पर पहुंची मां अपने साथ एक आदमी को लेकर आई थी। उसने बताया पहली पत्नी के जीवित रहते अगर कोई आदमी दूसरा विवाह करता है तो यह गैरकानूनी है। हिन्दू लॉ में ऐसे विवाह की मान्यता खुद-ब-खुद शून्य हो जाती है। उस घर में माधवी और उसके बच्चों के सारे अधिकार यथावत रहेंगे कानून इनकी तरफ है। माधवी ने चैन की सांस ली … घर आकर सीधा सास-ससुर के कमरे में जा बैठी और बिना किसी हिचकिचाहट के पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात कहनी शुरू की – मां से मिलने गयी थी … अपने और अपने बच्चों की जान की हिफाज़त से सम्बन्धित पत्र लिखकर मां को दे दिया है, वह थाने में जमा करवा देंगी । मैं सब कुछ जान चुकी हूं, अब मुझे अपने और अपने बच्चों का हक चाहिए। आगे क्या करना है, इस बात का फैसला आपलोग और समाज वाले कर लें। बात घर से निकल कर समाज और थाने तक पहुंचती देख बुजुर्गों के चेहरे फ़क पड़ गए । ससुर ने गम्भीर आवाज में कहा – तुम हमारे घर की बहू हो और ये बच्चे इस घर के चिराग, तुम यह थाने वाने का चक्कर छोड़ दे मधु, इससे बात बढ़ जाएगी। हो सकता है इन सबसे भड़ककर लड़का कोई और गलत कदम उठा ले … बदनामी होगी सो अलग … हम पर भरोसा रखो बेटी हम कुछ न कुछ करते हैं।रात तक नीलेश भी घर आ चुका था … फोन पर उसे सारी इत्तला कर दी गयी थी, तमककर माधवी के कमरे में पहुंचा पर नज़र मिलते ही ठंडा पड़ गया … यह तो वही पुरानी वाली माधवी थी साक्षात् चंडी रूप में। उन नज़रों से नज़र मिलाने की त़ाब न ला सका। कुछ देर सोचकर, ज़ेब से नोटों की मोटी गड्डी निकाली और धीरे से मेज़ पर रख दी – घर खर्च के पैसे … फिर आवाज में नरमाई घोलकर धीमे स्वर में बोला – कुछ और पैसे रख लो अपने लिए अलग से कुछ दूध और सूखे मेवे खरीद लेना, कितनी कमज़ोर हो गई हो …

माधवी का मन घृणा से भर उठा, इधर कुछेक महीनों से मां से मिलने के बाद से तो उसने रात को भी खाना खाना शुरू कर दिया था। दवाइयां और दूध-फल लेकर अब तो उसकी सेहत पहले से काफी हद तक दुरुस्त हो चुकी थी। जब सचमुच उसका स्वास्थ्य बेहद बुरे हाल में पहुंच चुका था चेहरा मृतकों-सा निर्जीव हो चुका था, तब तो इस स्वार्थी आदमी ने कभी उसे अलग से पैसे देकर अपना ध्यान रखने के लिए नहीं कहा ! आता और मां बाप से मिलकर बाहर-बाहर से ही निकल जाया करता। नीलेश ने गौर से माधवी के चेहरे पर आते जाते भावों को देखा और एक कदम आगे लेकर धीरे-से अपना हाथ बढाया पर माधवी ठंडी आंखों से उसे घूरकर दो कदम पीछे हट गई। नीलेश ने कुछ सोचकर सर झुका लिया, पीछे मुड़ा और तेज़-तेज़ क़दमों से बाहर निकल गया। माधवी लड़खड़ा कर बिस्तर पर बैठ गई दोनों हाथों से चेहरा ढांककर फफ़क पड़ी पर फिर झटके से उठी बेसिन पर जाकर चेहरा धोया, किचन में जाकर अपने लिए कॉफ़ी बनायीं और कॉफ़ी पीते-पीते एक फैसला किया। 

एक महीने पहले जब बच्चों को स्कूल पहुंचा कर लौट रही थी तो सामने किंशुक मिल गया था … सस्ती मानसिकताओं के बीच एक सभ्य और सुलझा व्यक्तित्व .. औपचारिक अभिवादन के बाद उसने कहा कि, बच्चों के लिए एक छोटा-सा स्कूल शुरू करने जा रहा है, माधवी अगर चाहे तो वहां पढ़ाने आ सकती है । कहकर वह प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा में माधवी की ओर देखने लगा .. बड़ी-बड़ी स्निग्ध बुद्धिदीप्त आंखों में सहानुभूति थी, माधवी ने चेहरा झुका लिया। विषाद भरे होंठो से फुसफुसाहट-सी निकली … घर के कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती … नर्म और गम्भीर आवाज माधवी के कानों से टकराई… किंशुक ने इतना हीं कहा – बच्चों में व्यस्त रहोगी तो दिल भी लगा रहेगा और कुछ पैसे भी आ जाएंगे .. खैर आप सोच समझ कर निर्णय लीजिये, कोई जल्दी नहीं है। माधवी ने फैसला कर लिया था, उसने बाल संवारे, पर्स उठाया और सास से जाकर कहा – आज से मैं एक स्कूल में पढ़ाने जा रही हूं। खाना बनाकर रख दिया है, आपलोग दोपहर का खाना खुद से निकालकर खा लीजियेगा और उसने एक नवीन संकल्प के साथ अपने पांव घर से बाहर की ओर बढ़ा दिए।

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