साँस लेना मुश्किल हो रहा है। कबरी बड़ी थी, बोली-अब क्या कहूँ। कुछ साल पहले मुझे याद है, ऐसी कोई बात नहीं थी। मैं और मेरी बहनें अम्मा के साथ चिपक कर खूब धूप सेंकते थे। हड्डियों में घुसी ठंढ धीरे-धीरे पिघलने लगती थी। खाने-पीने को भी कुछ मिल ही जाता था। ये जो बगल वाला मकान है न, उसके लोग अच्छे थे, वो दूध रख दिया करते थे, हमारे लिए छोटी-छोटी कटोरियाँ थीं। फिर इन बगीचों में चूहे भी मिल जाया करते थे। अब तो कभी-कभार गिलहरियों के बच्चे मिल जाएं तो बड़ी बात। झबरी से रहा नहीं गया, बोली-तब तो आनंद ही आनंद रहा होगा। धूप भी और खाना भी। लंबी साँस लेते हुए कबरी बोली-चल, पुरानी बातें छोड़, धूप और दूध-दोनों की खोज करें।

कुछ कदम चलने पर थोड़ी रोशनी दिखी। लगा सूरज के दर्शन हो जाएंगे। हाँ, गेट पर जो गमले रखें हैं, वहाँ ऊपर से धूप की किरणें छन-छन कर आ रहीं थीं। दोनों कूद कर चढ़ गईं। धूप खा कर जान में जान आई। पत्तों की हल्की झुरमुट औरों की नज़र से बचा रही थी। तब तक नज़र गई दाहिनी तरफ़-अरे, ये तो दीपा दिख रही है, बड़े दिन बाद आई है, कितना ध्यान रखती है हम बिल्लियों-कुत्तों का, खाना देती है, बीमारी में दवा देती है, हालांकि सूईयां बड़ी तकलीफदेह होती हैं और जाड़ों में स्वेटर पहनाती है। लॉकडाउन में फँसी रही होगी। खाने को तो देगी ही। बस, इन कुत्तों से बचना-बचाना है, नहीं तो ये पहले ही सफ़ाचट्ट कर जायेंगे। दोनों ने फुर्ती दिखाई, झट कूदीं और जब तक कुत्ते इधर देखते सटा-सट्ट दूध-रोटी का भोग लगा लिया। गेट पर चढ़ते देर नहीं लगी। छुपना आसान था।

झबरी से नहीं रहा गया। खाने की हड़बड़ी में वो पूरी बात समझ नहीं पाई थी। ये धुँध क्या है, क्यों है, ये लॉकडाउन क्या बला है। अब इतमीनान है, मूँछों से दूध झाड़ते हुए वे आराम से बैठीं हुई हैं, सारी बातें समझी जा सकती हैं। वह कबरी के पीछे पड़ गई। कबरी को आ रही थी नींद। लेकिन वो ये भी जानती है कि झबरी के दिमाग में अगर कुछ घुस गया तो चैन से सोने नहीं देगी। कबरी ने कहा, अच्छा चल, अब मुझे जितना मालूम है उतना तो बता ही सकती हूँ।

ये जो धुआँ सा सारे आसमान पर छाया हुआ है, मुझे लगता है कि ये इन ढेरों गाड़ियों-मोटरों और कारखानों से निकलता हुआ धुआँ है। साथ में ये आदमी लोग कितना कचरा फेंकते हैं। उसके ढेर से तरह-तरह के जहर निकलते हैं। उसमें होते हैं रसायन, पुरानी दवाइयाँ, प्लास्टिक की चीजें, डिब्बे और बहुत सी चीजें जिनका नाम भी नहीं मालूम। बहुत पहले मैं अम्मा के साथ बड़ी दूर गई थी। वहाँ देखा था एक पहाड़। ये दिल्ली में पहाड़ कहाँ से आ गया? अम्मा ने बताया ये पहाड़ नहीं है, कचरे का ढेर है। अरे, झबरी बोली-कचरा और पहाड़—ऐसा भी होता है। अब इन आदमियों को कौन समझाए। अगर शहर में कचरे के पहाड़ बन जायेंगे तो लोग कहाँ रहेंगे, साँस कैसे लेंगे, सब तरफ तो धुआँ है। कचरे के ढेर से जगह-जगह, बराबर धुआँ निकलता रहता है। धुआँ और भी वजहों से बढ़ता रहता है, खास कर जाड़ों में। फसल कटने के बाद खेतों में पौधों की ठूंठ बची रह जाती है। उन्हें जलाना पड़ता है। और देखती ही हो, रात को ये गार्ड लोग ठंढ से बचने के लिए लकड़ी जला कर आग तापते हैं। हम-तुम और ये कुत्ता लोग उसकी राख में अक्सर लिपट कर गरमातें हैं कि नहीं। ये सारा धुआँ इक_ा हो कर आसमान से चिपक जाता है, अब सूरज भगवान भला क्या करें? सोचो, ये उनके बस का भी नहीं है। अच्छा, अब आज के लिए इतना ही काफी है। मुझे सोने दे। बाकी बातें कल करेंगे।

रात को वे सूखी नाली में सोने चली गयीं, वहाँ अच्छा गरम रहता है। सुबह उठते ही झबरी ने कबरी को याद दिलाया कि उसे और बातें पूरी करनी है। झबरी को वैसे ठीक से नींद नहीं आई थी। दिमाग उन्हीं चीजों में उलझा रहा था जो कबरी ने बताई थीं। और नए सवाल निकल रहे थे—इस धुएं से कैसे छुटकारा पाया जाए, क्या कहीं और चलें, क्या जमीन पर भी इसका असर पड़ता है? चूहे जो गायब हो गए हैं -क्या इसका भी इससे कुछ लेना-देना है? कबरी बोली- चल पहले कुछ खा पी लें। झबरी का मन लगा हुआ था बातों पर, फिर भी खाना तो था ही। दोनों ने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, सामने वाले प्लॉट में कुछ सूखी रोटी के टुकड़े पड़े हुए थे, चलो आज इसी से काम चलाया जाए। खाने-पीने, साफ-सफाई से फारिग हो कर दोनों अपनी पसंदीदा जगह -गेट पर चढ़ गयीं और बातें शुरू हो गयीं।

झबरी चालू हो गई—कुछ साल पहले उस चारदीवारी के पास चूहों ने बड़ा सा घर बना रखा था। आस-पास के घरों में रात को घुस कर अपने खाने का इंतजाम कर लेते थे। उनके घरों में कई कोठरियाँ और सुरंग थे, मैंने एक बार देखा था। दाल चावल के दानों के लिए एक अलग कोठरी थी। बड़ी मुश्किल से हम घुसे थे, निकलना और कठिन था। लेकिन उस दिन अच्छे चूहे मिले थे। अब क्या है कि इन बगानों, खेतों में पता नहीं क्या-क्या डाला जाता है, कीड़ों से पौधों को बचाने के लिए। इधर कुछ दिनों से देख रहें हैं कि चूहे इन दवाओं को सूंघते ही भाग जाते हैं। अब शायद इनमें कुछ ऐसा है जिससे उन्हे खतरा है। कहीं और जाकर बस गए होंगे जहां ये जहरीली दवाएं नहीं हैं। सोचो तो सभी जीवों के लिए मुश्किल हो गई है। हम उन्हें इतना तो नहीं सताते थे कि वो भाग जाएं। इन आदमियों ने तो जैसे ठान लिया है कि सबका खात्मा करके ही छोड़ेंगे।

लेकिन मौसी एक बात बताओ -झबरी बोली -ये अगर सबको मार देंगे तो खुद भी तो मरेंगे। हाँ ये तो है, लेकिन इनकी समझ को क्या कहें। इन्हें न भगवान पर भरोसा है न प्रकृति पर। सोचते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं। अपने ऐश-ओ-आराम और शान-ओ-शौकत के लिए ईंट-पत्थर, डीजल-पेट्रोल, सोना-चांदी, लोहा-लक्कड़ सब कुछ जमीन के अंदर से खोद-खोद कर निकालते हैं और इतना ज्यादा कि मुझे लगता है जमीन खोखली होती जा रही है। अब देखो पहले तालाबों -कुओं में आसानी से पानी मिल जाया करता था। अब इतना पानी खींचा जा रहा है कि खूब गहरे चले जाओ तब पानी तक पहुँच पाते हैं।

तो उपाय क्या है मौसी?

उपाय तो एक ही है-सब चीजों का खर्चा कम करो। हम लोगों को, और ज्यादा आदमियों को भी क्या चाहिए—भर पेट खाना-पानी और थोड़ी रहने की जगह। इतने बड़े आलीशान घर बना कर क्या करना है, इतना सारा खाना क्यों फेंकना?

हाँ मौसी ये तो ठीक कही। लेकिन ये माने तब तो।

तभी तो अब भुगत रहे हैं।

क्या मतलब?

अरे ये जो कीड़ा सबको घेरे हुए है। क्या कहते है उसे… कोरोना। मुझे लगता है ये जमीन के अंदर से निकला है। जमीन को इतने गहरे तक खोदा जा चुका है कि ये जो आराम से अंदर सोये रहते थे बाहर निकल कर अपने रहने की जगह तलाश रहें हैं और इन्हें मिल गए आदमी, सो इन्हीं को धर दबोचा। कैसे रामायण में कुंभकरण छह महीने की नींद से उठ कर बहुतों को मार देता था। वैसे ही ये कोविड/कोरोना अब गुस्से में उठा-पटक कर रहा है।

 अच्छा मौसी, तो इससे बचने के लिए ये आदमी लोग क्या कर रहे हैं?

यही तो पेंच है, कोई कुछ कर नहीं पा रहा है, लॉकडाउन लगा देते हैं।

लॉकडाउन?

हाँ, लॉकडाउन। यानी सब चुपचाप अपने घरों में बंद हो जाएं, सिनेमा-बाजार सब बंद, दफ्तर-कारोबार सब बंद। तभी तो सब तरफ़ सन्नाटा छाया रहता है, तभी तो दीपा नहीं आ पाती थी।

लेकिन इसका नतीजा।

कुछ नहीं, देखते जाओ, अभी कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। पूरी दुनिया जुटी है दवा बनाने में, ये बीमारी फैलती ही जा रही है, लोग मरते जा रहे हैं। लेकिन अपने रहने के तरीके बदलने को तैयार नहीं हैं। डर ये है कि ये बीमारी कहीं हमारे पास न आ जाए…

मौसी क्यों न हम कहीं दूर चलें, जहां खाना, हवा-पानी साफ हो, रहने की जगह साफ हो। चल इस पर सोचते हैं, जल्दी करनी पड़ेगी। इन आदमियों को भी यही सोचना है, अगर शहरों की भीड़-भाड़ से हट कर खुली जगहों में रहने लगें तो इस बीमारी से बच सकते हैं।

चलो इनकी बात छोड़ो, हम अपनी तैयारी करें, दूर जाना पड़ेगा….

—जयवती श्रीवास्तव, गुड़गांव।

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