Hindi Katha: प्राचीन समय की बात है, एक बार महर्षि कश्यप पर्वतराज हिमालय के महल में पधारे। हिमालय ने उनका यथोचित सत्कार कर उनकी पूजा-आराधना की। तत्पश्चात् विनम्र स्वर में बोले – ” मुनिश्रेष्ठ ! आप तो परम ज्ञानी और विद्वान हैं। कृपया बताएँ कि किस उपाय से संसार में मेरी प्रसिद्धि हो सकती है ? सत्पुरुषों में मैं किस प्रकार पूजनीय समझा जा सकता हूँ? मुझे मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकता है ?”
महर्षि कश्यप बोले – “राजन ! आप जो प्राप्त करना चाहते हैं, उसका एकमात्र साधन श्रेष्ठ गुणों से युक्त संतान है। श्रेष्ठ संतान के होने पर सबकुछ स्वतः प्राप्त हो जाता है। आप जानते ही हैं कि ब्रह्माजी और अनेक ऋषि-मुनियों सहित मेरी प्रसिद्धि भी केवल उत्तम संतान के कारण है । अत: गिरिराज ! आप घोर तपस्या करके एक श्रेष्ठ संतान उत्पन्न करें। ‘
महर्षि कश्यप के परामर्शानुसार गिरिराज हिमालय ने अनेक वर्षों तक घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी साक्षात् प्रकट हुए और उनसे वर माँगने को कहा।
हिमालयराज उनकी स्तुति करते हुए बोले – ” पितामह ! आपने इस तुच्छ सेवक को दर्शन देकर कृतार्थ कर किया। प्रभु ! आप भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करने में सक्षम हैं। आपकी कृपा-दृष्टि प्राप्त कर मनुष्य समस्त दुखों से मुक्त हो जाते हैं। प्रभु ! यदि आप मेरी तपस्या से संतुष्ट हैं तो मुझे श्रेष्ठ गुणों से युक्त एक संतान प्रदान करने की कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले – “गिरिराज ! इस तप के प्रभाव से तुम्हारे घर एक कन्या जन्म लेंगी, जो साक्षात् भगवती दुर्गा होंगी। उनके कारण ही तुम तीनों लोकों में आदर और यश के पात्र बन जाओगे। तुम्हारे यहाँ असंख्य तीर्थों की स्थापना होगी और तुम देवगण द्वारा पूजित होकर अपने पुण्य से उन्हें भी पावन करोगे । संसार में तुम सदा विद्यमान रहोगे ।” इस प्रकार वर देकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए।
कुछ समय बाद हिमालय की पत्नी मैना ने पार्वती नामक एक पुत्री को जन्म दिया। पार्वती बचपन से ही भगवान् महादेव की अनन्य उपासक थीं। वे सदा उनके ध्यान में ही मग्न रहती थीं। एक बार उन्होंने अनेक दिनों तक निराहार रहकर भगवान् भोलेनाथ की आराधना की। इससे उनका शरीर अत्यंत दुर्बल और शक्तिहीन हो गया । पुत्री की यह दशा देखकर दुखी मैना ने ‘उमा’ (ऐसा मत करो ) कहकर उन्हें उपवास भंग करने के लिए कहा। तभी से देवी पार्वती संसार में उमा नाम से प्रसिद्ध हुईं।
देवी पार्वती ने अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनके तप के तेज से तीनों लोक जल उठे। चारों ओर हाहाकार मच गया। तब ब्रह्माजी साक्षात् प्रकट हुए और बोले – “कल्याणी ! आपने ही इस सृष्टि की रचना की है। किंतु आपके तप की प्रचण्ड ज्वालाएँ इसे जलाकर भस्म कर देना चाहती हैं। देवी ! सृष्टि के कल्याण के लिए आप अपनी तपस्या का त्याग करें। आप अपने तेज से तीनों लोकों को धारण करती हैं। फिर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसे आप तपस्या द्वारा प्राप्त करना चाहती हैं?”
देवी पार्वती बोलीं- ‘पितामह ! आप मेरी तपस्या का उद्देश्य भली-भाँति जानते हैं। मैंने स्वयं को भगवान् शिव के चरण-कमलों में समर्पित कर दिया है और उन्हीं को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए मैं कठोर तप कर रही हूँ । ‘
ब्रह्माजी बोले – “कल्याणी ! आप जिनके लिए तपस्या कर रही हैं, कुछ समय बाद ही वे आपका वरण करेंगे। देवी ! भगवान् शिव सम्पूर्ण लोकों के स्वामी हैं। देवाधिदेव महादेव देवताओं के साथ-साथ दैत्य, ऋषि, मुनि, नाग, किन्नर, भूत, पिशाच, गंधर्व आदि के लिए भी पूजनीय हैं। उनका स्वरूप बड़ा ही उदार है। वे आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण करेंगे। किंतु सृष्टि के कल्याण के लिए आप इस घोर तप का त्याग करें।” यह कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए और देवी पार्वती तप से निवृत्त होकर आश्रम में रहने लगीं।
एक दिन जब वे भगवान् शिव की पूजा-आराधना में मग्न थीं, उसी समय देवाधिदेव महादेव वहाँ पधारे। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने विकृत स्वरूप धारण कर रखा था। उनकी नाक कटी हुई थी और पीठ पर एक बड़ा-सा कूबड़ उभरा हुआ था। उनका मुख अत्यंत भयानक था ।
वे पार्वती से बोले – “देवी ! तुम बड़ी सुंदर और श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न हो । मैं तुम्हारा रूप-सौंदर्य देखकर तुम पर आसक्त हो गया हूँ और इसी क्षण तुम्हारा वरण करता हूँ।”
अपने तपोबल द्वारा देवी पार्वती जान गई थीं कि ये साक्षात् देवाधिदेव महादेव हैं। उन्होंने विभिन्न सामग्रियों द्वारा उनका पूजन किया और नम्र स्वर में बोलीं “दयानिधान ! मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। मेरे पिता ही मुझे देने में समर्थ हैं। “
भगवान् शंकर बोले – “देवी ! मैं तुम्हारे पिता के पास भी गया था, उन्होंने तुम्हारा ‘स्वयंवर होने की बात कही है। उसमें तुम जिसका वरण करोगी, तुम्हारा पति होगा। उस समय किसी रूपवान को छोड़कर तुम मुझ जैसे विकृत का वरण कैसे करोगी?”
उनकी बात सुनकर वे बोलीं- ‘भगवन् ! आप निश्चित रहें। स्वयंवर में भी मैं आपका ही वरण करूँगी। किंतु यदि आपको कोई संदेह हो तो मैं यहीं आपका वरण करती हूँ।” यह कहकर उन्होंने हाथों में पकड़ा अशोक का गुच्छा भगवान् शिव के कंधे पर रख दिया।
भगवती पार्वती के इस प्रकार वरण करने पर भगवान् शिव अशोक वृक्ष को वर देते हुए बोले – ” हे अशोक ! तुम्हारे परम पवित्र गुच्छे से मेरा वरण हुआ है, इसलिए तुम अजर-अमर रहोगे। तुम जैसा चाहोगे, वैसा रूप धारण कर सकोगे। तुम में इच्छानुसार फूल लगेंगे। तुम समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले और मेरे साथ- साथ देवताओं के भी अत्यंत प्रिय होगे ।
इसके बाद देवी पार्वती से विदा लेकर भगवान् शिव अंतर्धान हो गए।
