Hindi Kahaniya: “दीदी, नीचे आ जाओ एक बढ़िया खबर है। तुम्हारी किस्मत खुल गई है और सत्यम की तो लॉटरी लग गई है।” भाभी की आवाज़ सुनकर रिचा कमरे से बाहर आ गई। पास से निकलने पर भी मुंह दूसरी ओर घुमा लेने वाली अंजू भाभी की आवाज़ आज़ बदल कैसे गई ? यही सोचकर हैरान थी रिचा।
“अंजू क्यूं चिल्लम चिल्ली कर रही है? सत्यम ने फिर सात्विक को पीट दिया होगा। जा नीचे उतर कर सत्यम को यहीं लेकर आजा। थोड़ी देर अपने पैर दबवाऊंगी।” अंदर से मां की आवाज़ आई। रिचा छज्जे पर ही खड़ी थी। तुरंत नीचे उतर कर आ गई सीढ़ियों से। अंजू तो जैसे इसी पल का इंतज़ार कर रही थी। रिचा से लिपट गई।
“दीदी, आपके मुसीबत के दिन गए। वो बुढ़िया टपक गई। अब मकान, जमीन, दुकान सब कुछ आपको और सत्यम को ही मिलेगा।” रिचा समझ गई कि भाभी की खुशी का क्या कारण था। वह मुश्किल से भाभी के चंगुल से छूटकर भाई की ओर देखकर बोली ,” क्या सत्यम की दादी अब नहीं रही, भैया ?”
भाई ने हां में सिर हिलाया और रिचा को अंदर चलने का इशारा करके कमरे में आ गया। सामने वाले घरों से भी लोग निकलकर बाहर आ गए थे और देखकर हैरान थे कि आखिर अंजू अपनी ननद से गले क्यों मिल रही थी। रिचा को पिछले दो साल से अंजू किस तरह सताती आ रही थी यह सभी जानते थे। अंजू के ज़ोर देने पर ही रिचा का इकलौता प्यारा भाई जीतू अपनी मां से अलग हो गया था। मां सब कुछ करके भी रिचा को दूसरी शादी के लिए नहीं मना पाई थी। यही बात अंजू भाभी ने पकड़ ली और पति को अलग करवाकर ही मानी। अब रिचा अपनी मां और पांच साल के बेटे सत्यम के साथ घर के उपर बने एक कमरे में रहती थी और भाभी भाई और अपने दोनों बच्चों के साथ पूरे घर पर कब्ज़ा जमा चुकी थी। अलग होने के बाद आज़ पहली बार भाभी ने रिचा को आवाज़ लगाई थी।
“देख रिचा, कमज़ोर नहीं पड़ते हैं। तेरा भाई है तेरे साथ। वहां किसी की हिम्मत नहीं जो कुछ भी कहे तुझसे। उस घर का आखिरी सदस्य सत्यम की दादी ही थी।” जीतू समझाने में लगा था अपनी बहन को।
“भाई सत्यम की दादी के घरवाले अच्छे लोग नहीं हैं, आप जानते हो। जब तक वो रही उनसे एक बार बात भी नहीं होने दी उन्होंने।” रिचा की आंखों के सामने वो दृश्य घूम गया जब अपने पति अविनाश के पार्थिव शरीर को लेकर वह भाई के साथ अपनी ससुराल पहुंची थी। सास तो उसे हत्यारिन साबित करने में लगी हुई थी। उसके घरवाले उसे उकसाने में लगे थे। चौथे के दिन ही सास ने रिचा की शादी अपने भतीजे से करवाने की ज़िद पकड़ ली थी।
“मम्मी आपके अनुसार तो मैंने ही आपके बेटे को मारा है। फिर अपने भतीजे को मौत के मुंह में क्यों धकेलना चाहती हो ?” रिचा की सहनशीलता ख़त्म हो गई थी। उसने पहली बार सास के सामने मुंह खोला था। जीतू बहन के साथ वहीं रुका हुआ था। वह जानता था कि जिस लड़के से रिचा को बांधने की ज़िद हो रही है वो कुछ नहीं करता है। बारहवीं भी पास नहीं कर पाया और कोई बुरी लत उसने छोड़ी नहीं थी। अविनाश ने मां के कहने से उसे अपने साथ काम में लगा लिया था। रिचा चाहकर भी मना नहीं कर पाई थी। अविनाश के जाने के बाद उसकी और उसके परिवार की ख्वाहिशें ज्यादा ही बढ़ गई थी। मामा मामी का कहना था कि अविनाश और उसकी मां को संभालने में वो दोनों इतने व्यस्त रहे कि अपने बेटे की परवरिश पर ध्यान ही नहीं दे पाए। रिचा अगर मान जाती तो जो भी अविनाश का था वो सब उसका होने वाला था। मकान, दुकान और गांव की ज़मीन भी। रिचा बहुत अच्छी तरह से जानती थी कि सास के भाई और भाभी कुछ भी करके उसे और सत्यम को अपने चंगुल में रखना चाहेंगे इसीलिए वह चौथे के दिन ही सत्यम को साथ लेकर अपने भाई जीतू के साथ मायके चली आई।
“क्यों रखा नहीं ससुराल वालों ने अपनी लाडली बहू को ? पढ़ी लिखी, नौकरी वाली हो फिर भी इसी छोटे शहर में वापिस आ गई हो।” अंजू भाभी के तंज ने तार तार कर दिया था रिश्तों की ओढ़नी को। जीतू भाई हमेशा की तरह कुछ नहीं बोले। उन्होंने तो अपना उसूल ही बना लिया था घर की औरतों को कुछ नहीं कहना। उस दिन उनका चुप रहना बहुत बुरा लगा था रिचा को। मां भी चुप थी। दो साल के अविनाश को लेकर रिचा फिर वहीं आ गई थी। मन ही मन खुद को कोसती ,” मां ने क्यों मुझे जन्म दिया। जीतू भाई और दीदी काफ़ी थे। मैं तीसरी संतान फालतू ही रहूंगी ज़िंदगी भर।” दीदी के पति सेना में अधिकारी थे। उनकी पोस्टिंग बॉर्डर एरिया में होने के कारण वह अपने बच्चों के साथ ससुराल में हो रह रही थी। दोनों बच्चे पढ़ रहे थे। वह चाहकर भी रिचा और सत्यम को अपने साथ नहीं रख सकती थी। रिचा प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर रही थी वह भी अब छोड़नी पड़ी थी। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। लगातार कड़ी मेहनत के बाद उसे शहर के एक सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई।
“हमेशा के लिए यहीं इसी घर में डेरा डालने का इरादा कर लिया है, तुम्हारी बहन ने। कुछ बोलते क्यों नहीं हो ? मैं अब एक दिन भी इस घर में नहीं निभा सकती हूं। मैडम नौकरी करेंगी और मैं इनके बच्चे को पालूंगी। नहीं कर सकती यह सब। जा रही हूं अपने घर।” भाभी के शब्दों ने नौकरी मिलने की खुशी का भी एहसास नहीं होने दिया। जाने कैसे सास को खबर मिल गई थी, अगले ही दिन आ धमकी। घर पर नहीं, पड़ोस में। मां मिलने गई। घर लाने की पूरी कोशिश की लेकिन उन्होंने फिर से एक उल्टी ज़िद पकड़ रखी थी।
“बहनजी, तुम्हारी बेटी ने मेरी बात नहीं मानी इसमें उसका ही नुकसान है। उसे तो नौकरी मिल गई है लेकिन सत्यम का क्या होगा ? मेरे पोते को मेरे साथ भेजो तभी तुम्हारे घर में पैर रखूंगी। वरना मेरा आपके घर से कोई रिश्ता नहीं है।” स्कूल से आते ही मां ने बताया तो रिचा तिलमिला उठी। मां पर ही बरस पड़ी।
“तुम्हे इतना समझ नहीं आता मां कि सत्यम से उन लोगों को कोई मतलब नहीं है। दो साल से वो बच्चा किस हाल में रह रहा है, उन्होंने कभी पूछा क्या ? अपने स्वार्थ में अंधे होकर उसकी मां को भी उससे दूर करना चाहते हैं। तुम तो समझने की कोशिश करो मां।” कहते कहते वह फफक फफक कर रो पड़ी। आज़ वह अपने पैरों पर खड़े होकर भी स्वयं को असहाय महसूस कर रही थी। उसने सोचा था नौकरी मिलने से भाई और मां के ऊपर उसका और सत्यम का बोझ नहीं आएगा लेकिन परिस्थितियां बिगड़ती ही जा रही थी। अंजू भाभी बच्चों को लेकर घर छोड़कर चली गई थी। जैसे प्रतियोगिता कर रही थी रिचा के साथ। मां ने जीतू भाई को समझा कर उनके मायके भेजा।
“हमारी बेटी तुम लोगों की नौकर नहीं है। माना कि ज्यादा पढ़ी लिखी नही है लेकिन काम वाली बाई नहीं है। बहु बनाकर ले गए थे, बहु बनाकर रखोगे तो ही विदा करेंगे।” भाभी के माता पिता ने भाई को अपना फैसला सुना दिया था। साथ में दो शर्तें भी जोड़ी थी।
“बेहतर हो कि अपनी बहन रिचा की दूसरी शादी कर दो और यदि नहीं कर सकते तो जीतू अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर अलग रहे। घर के दो हिस्से कर दो।” जीतू भाई ने बार बार पूछने पर मां को ये दोनों शर्तें बताई। उस दिन पहली बार मां फूट फूट कर रोई।
“तेरे पापा इतनी कम उम्र में छोड़कर गए पर मैं डटी रही। सास के साथ मिलकर तीनों बच्चों को पाला पोसा और उनकी दुकान भी संभाली। पर अब कोई सुनता नहीं है मेरी। बेबस हो गई हूं। कम पढ़ी हुई बहू इसलिए ली कि घर को संभाल लेगी लेकिन संभालना तो दूर बहू ही घर तोड़ने पर अड़ी हुई है।” अगले ही दिन उन्होंने वकील को बुलाकर अपनी वसीयत दे दी। पूरा घर जीतू भाई के नाम लिख दिया। ऊपर का एक कमरा और छत पर अपने पास रखी। रिचा खुद को रोज़ ही कोसती थी। ” कितने अरमानों से मां और भाई ने मेरी शादी की थी लेकिन मेरी किस्मत मुझे फिर से इन दोनों को दुखी करने के लिए यहीं लेकर आ गई। मां को अकेले छोड़कर जा भी नहीं सकती हूं और रहना तो दुभर सबका हो गया है।”
ज़िंदगी ने एक बार फिर से रफ़्तार पकड़ ली। नौकरी मिलने से समय कटने लगा था। सत्यम को मां ही स्कूल भेजती थी। जीतू भाई के दोनों बच्चे भी उसी स्कूल में पढ़ते थे। एक ही बस में बैठकर स्कूल जाते लेकिन स्कूल पहुंचने पर ही एक दूसरे से बात कर पाते थे। घर में साथ खेलने की भी अनुमति अंजू भाभी नहीं देती थीं। छुट्टी के दिन जब भी रिचा से सामना हो जाता तभी कोई न कोई तंज कसने से बाज़ नहीं आती थी।
“तू मुंह मत लगियो इसके। इसने तो लाज शर्म छोड़ दी है। पुलिस की धमकी देती है, जीतू को भी। वो तो साथ ही रह रहा है। हम दोनों तो दुश्मनों में हैं। तैयार रहती है, वार करने के लिए।” मां लगभग रोज़ ही रिचा को यह बात समझा देती। रिचा भी मां को और मानसिक कष्ट नहीं देना चाहती थी इसलिए सुनकर अनसुना कर देती। सत्यम अब पांचवी कक्षा में आ चुका था। एक दो बार और उसकी दादी ने उससे मिलने की कोशिश की लेकिन स्कूल वालों ने रिचा को तुरंत फ़ोन करके बता दिया। उन्हे जीतू भाई ने एडमिशन के समय ही सब समझा दिया था।
सत्यम की दादी के मरने की ख़बर सुनते ही जीतू भाई रिचा और सत्यम को लेकर उसकी ससुराल जाने को तैयार हो गए। अंजू भाभी ख़ुद ही तैयार हो गई। मां जीतू भाई के बच्चों के पास ही रुक गई। वहां का माहौल बहुत ही तनावपूर्ण था। सास के भाई और भाभी ही नहीं उनका बेटा भी मुंह लटकाए हुए था। रिचा जाकर आंगन में औरतों के साथ बैठ गई। उनकी खुसर पुसर साफ़ सुनाई दे रही थी। “अपना खून तो अपना ही होता है। बुढ़िया ने कितनी कोशिश की पोते को घर वापिस लाने की और आखिर में सब कुछ उसी के लिए छोड़कर चली गई।” दूसरी ने भी अपनी बात रखी। ,”पर भतीजे को भी कुछ तो देना ही चाहिए था। मरते दम तक वही तो साथ रहा। बेटा तो चला ही गया था, पोते की तो शक्ल से भी तरसती गई।” तीसरी भी चुप नहीं रही। ,”भतीजे के लक्षण सामने आ गए थे उसके। अविनाश का जब एक्सीडेंट हुआ तब भी गाड़ी में यही उसके साथ था। कहती कुछ नहीं थी पर जान सब गई थी।” रिचा वहां से उठ कर जीतू के पास आ गई। सत्यम को अपने सीने से चिपकाकर बैठ गई। औरतों की बातों से डर गई थी। जीतू भाई वकील को बुला कर ले आए थे। आदमियों में से किसी ने उन्हें बताया था कि सत्यम की दादी ने अपनी वसीयत बनवाई थी उनसे और उन्ही के पास रख दी थी।
“शकुंतला सदन, दुकान और गांव में जो जमीन है वो सभी शकुंतला देवी ने अपने पोते सत्यम के नाम कर दी है। जब तक सत्यम बालिग नहीं होता तब तक इसकी देखभाल अविनाश की पत्नी और सत्यम की मां रिचा करेगी।” वकील की बात पूरी होते ही सन्नाटा पसर गया। ,” मैं अपनी दुकान नहीं छोडूंगा। बुआ पगला गई थी क्या वसीयत लिखवाते समय। हर बात के लिए मुझे आवाज़ लगाती थी और वसीयत लिखवाने इस वकील के पास चली गई।” भतीजा अपने असली रंग में आ गया था। उसके मां बाप ने मुश्किल से उसे शांत करवाया। अब तो रिचा का ही नाम सबकी जबान पर था। अविनाश के मामा मामी जिन्होंने उसकी ज़िंदगी में ज़हर घोलने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी वो बेटा कहने लगे थे रिचा को।
“अब तो तुम्हारा राज आ गया है, दीदी। छोड़ो नौकरी वोकरी और मजे करो अब तो। सब तुम्हारा ही तो है। बस अपने भाई भाभी को मत भूलना। बुरे वक्त में हम ही तुम्हारे काम आए।” अंजू भाभी भूल गई थी कि मातम का माहौल है। उनकी खुशी उनसे छुपाए नहीं छुप रही थी। शब्द बनकर टपक रही थी। जीतू भाई भाभी को लेकर वापिस लौट गए। रिचा न चाहते हुए भी सत्यम के साथ शकुंतला सदन में ही थी। दुकान बंद थी। मामा मामी अपने बेटे के साथ वापिस लौट गए थे। जाते जाते मामी हाथ जोड़कर रिचा से प्रार्थना करके गई थी उनके बेटे को ही दुकान चलाने की इजाज़त दी जाए। उसने और कुछ नहीं सीखा है और नई दुकान खरीदने के उनके पास पैसे नहीं थे। स्कूल की छुट्टी पूरी हुई तो वापिस मां के पास उसी कमरे में लौट आई थी रिचा। अंजू भाभी तो अब पूरी तरह बदल गई थी।
“दीदी, मम्मीजी को बोलो अब नीचे ही आकर रहें हमारे साथ। आखिर हम ही उनके साथ रहेगें। तुम तो आई थी और चली भी गई। उनकी गुजर तो हमसे ही है।”
“मैं नौकरी नहीं छोड़ रही हूं भाभी। मां के साथ ही रहूंगी।” रिचा की बात सुनकर अंजू भाभी का मुंह खुला का खुला रह गया लेकिन अब हालात बदल चुके थे और यही कारण था कि उन्होंने बात तुरंत बदल दी।
“अरे दीदी, अनपढ़ गंवार भाभी होगी तो ऐसे ही बात करेगी। चाय पियो आप। थक गई हो। अकेले सब संभाल रही हो अब। मेरे मुंह से भी कहीं भी कुछ भी निकल जाता है। बुरा मत मानना।” तभी मां भी आ गई। जाने कैसे सीढियां उतरी थी। गठिया के कारण ठीक से चल भी नहीं पाती थी। बेटी को ऊपर पहुंचने में देर हो गई थी शायद इसीलिए ख़ुद को रोक नहीं पाई थी। “कैसी हो रिचा ? सत्यम कैसा है ? कई दिन लगा दिए वापिस आने में। फ़ोन भी नहीं किया उस दिन से।” बोलते बोलते आंखों में आंसू आ गए थे मां की आंखों में। आवाज़ भरभरा रही थी। भाभी की दी हुई चाय नहीं पी उन्होंने। सत्यम की खुशी का ठिकाना नहीं था आज़ उसे अपने भाई बहनों के साथ खेलने का मौका मिल रहा था और मामी अपने बच्चों को डांटकर वापिस नहीं बुला रही थी।
“मां, भाई ने आपको बताया होगा अब वहां पर भी सब देखना पड़ेगा। मकान भी और दुकान भी। बस वही सब करने में कई दिन लग गए।” रिचा ने मां के गले से लिपट कर कहा। अंजू भाभी को दोनों का मिलाप सुहा नहीं रहा था। “दीदी मकान को बंद करके आई हो या किसी को छोड़कर आई हो ?” अचानक पूछे सवाल से रिचा घबराई नहीं। “अभी तो बंद ही करके आई हूं भाभी।” भाभी ने फिर से अपनी भाषा बदली। ,”क्यों नौकरी के चक्कर में पड़ी हो अब ? तीनों बच्चों को लेकर अपने घर में रहो। बाकी सब हम संभाल लेंगे।” जीतू भाई भी वहीं आ गए थे। कई सालों बाद परिवार साथ बैठा था। “मकान में रहने के लिए ही नौकरी कर रही हूं, भाभी।” रिचा ने जीतू भाई की ओर देखकर कहा। “अंजू एक कप चाय मुझे भी पीनी है और अपने लिए भी बना लो। बहुत दिन हो गए साथ बैठकर चाय पीए हुए।” अंजू मुंह बनाकर रसोई में चली गई लेकिन चाय चढ़ाकर तुरंत ही वापिस आ गई।
“आपकी बात का मतलब नहीं समझी दीदी। खुलकर बताओ सब।” इस बार जवाब जीतू ने दिया।
“अविनाश के जाने के बाद मकान बैंक जब्त करने वाला था क्योंकि लोन का पैसा बाकी था। रिचा की नौकरी से ही लोन की किश्ते जा रही हैं।”
“यही बात जब इसकी सास को पता चली तब उसने वकील के पास जाकर वसीयत बनवाई।” पहली बार मां कुछ बोली थी। जीतू की चाय आ गई थी। अंजू भी कुर्सी पर चाय लेकर बैठी थी। जीतू ने बात आगे बढ़ाई।
“अविनाश चाहते थे कि मकान रिचा के नाम किया जाए लेकिन रिचा ने अपनी सास शकुंतला के नाम करवाया। और उस नाम को बचाया भी।” अंजू को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन पति कभी झूठ नहीं बोलते यह जानती थी वह।
“भाभी मैं उसी शहर में ट्रांसफर ले रही हूं बस मां को साथ लेकर जाऊंगी। उनका खयाल रखने की ज़िम्मेदारी मैं उठाना चाहती हूं। बच्चों को तो आप ही अच्छे से रख सकते हो।” अंजू किस कहने वाली थी लेकिन जीतू उससे पहले ही बोल उठा। ,”मेरी बहन तुझे जो चाहिए ले। जिसे चाहिए साथ में रख। तूने जिस तरह अपनी ज़िम्मेदारी हर तरफ निभाई है, मैं भी नहीं निभा पाया हूं।”
“हां दीदी, आपके भाई सही कह रहे हैं।” अंजू ने पति की बात का समर्थन किया। बच्चे भी तब तक वहीं पर आ गए थे। “पापा, क्या सत्यम अपने घर वापिस जा रहा है ?” दोनों बच्चों ने एक साथ सवाल किया।
“हां, उसकी दादी कहकर गई है ना। इसलिए जाना तो पड़ेगा ही। लेकिन छुट्टियां होते ही तुम लोग उससे मिलने आ जाना।” रिचा ने तीनों बच्चों को पास बुलाकर समझाया और उपर चलने के लिए मां का हाथ पकड़ लिया।
