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बिल्लू-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां
Billu-Balman ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

“अरे …देखिए जी, बिल्लू ने फिर से कॉपी का पेज फाड़कर दरवाजे के पीछे मरोड़ कर फेंका है। कितना भी समझाओ पर यह नहीं समझता। पढ़ना तो चाहता ही नहीं कॉपी का पेज फाड-फाडकर फेंकता रहता है। पता नहीं क्या होगा इसका! आप तो इसे कुछ कहते नहीं।” बिल्लू की माँ वीणा, जो कमरे में झाडू लगा रही थी, झल्लाते हुए पति ताराकांत से बोली।

“अभी बहुत छोटा है अपना बिल्लू। थोड़ी शैतानी तो करेगा ही। बड़ा होकर ठीक हो जाएगा। वैसे खोल कर तो देखो, आज क्या करामात की है कॉपी के पेज के साथ इसने।” ताराकांत जी मुस्कुराते हुए बोले।

वीणा ने फेंके हुए पेज को खोलकर देखा। उसमें बिल्लू ने अपने हाथों से सुंदर चित्र बनाए थे। तीसरी कक्षा का छात्र बिल्लू अद्भुत कलाकार था, किंतु उसकी इस विलक्षण प्रतिभा की ओर किसी का ध्यान नहीं जा सका था।

बिल्लू की रुचि पढ़ाई में बिलकुल नहीं थी। गणित विषय का नाम सुनते ही वह घबड़ा जाता था। स्कूल में अक्सर वह कक्षा से गायब रहता था। पानी पीने के बहाने जो बाहर निकलता, तो कई पीरियड बाहर ही रहता। बाहर के बच्चों के साथ पतंग उड़ाने और कंचे खेलने में मस्त हो जाता था। नतीजा तो तय था…कक्षा में सबसे खराब छात्र होने की पहचान। उसकी शिकायतें सुन-सुनकर घर वाले ऊब चुके थे। इसकी वजह से बिल्लू को डाँट-फटकार के साथ-साथ यदाकदा पिटाई भी लग जाती थी। इससे घर का माहौल बिगड़ जाता था। वीणा और ताराकांत ने बहुत बार बिल्लू को किसी अच्छे बोर्डिंग स्कूल में डालने के बारे में सोचा, लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण वह भी न हो सका।

बिल्लू थोडा और बड़ा हुआ। अब वह ऊँची कक्षा में पहुँच चुका था। पर उसकी आदतों में जरा भी सुधार नहीं हुआ। अब आस-पड़ोस के घरों से भी शिकायत आने लगी। जिन पडोसी महिलाओं के साथ वीणा के अच्छे संबंध थे, वे भी बिल्लू के कारण उसे खरी-खोटी सुनाने लगीं। उनकी एक ही शिकायत हुआ करती थी- “… तुम अपने बेटे को सुधार नहीं सकती, तो उसे अपने घर के अंदर ही रखो। वह खुद तो कुछ पढ़ता नहीं, हमारे बच्चों को भी बिगाड़ देगा। दिन भर पतंग उड़ाता रहता है। खेल में वक्त बर्बाद करता है और हमारे बच्चों को भी बुलाकर ले जाता है।” वीणा क्या जवाब देती। लोगों के ताने-उलाहने सुन-सुनकर अपमान का जहर पीकर रह जाती थी और अपना क्रोध अपने कलेजे के टुकड़े बिल्लू पर उतार देती थी और अकेले में खूब रोती थी।

कक्षा दसवीं तक हालात ऐसे हो गए कि बिल्लू को स्कूल से हटाना पड़ा। घर में ही उसकी पढ़ाई की व्यवस्था की गई। किसी तरह वह दसवीं पास तो हो गया, लेकिन उसके बाद गमसम रहने लगा। किसी से भी ज्यादा बात नहीं करता था। उसकी हालत देखकर माँ का कलेजा फटता था।

फिर एक दिन वीणा की एक सहेली ने बिल्लू को संगीत विद्यालय में डालने की सलाह दी।

संगीत का संग पाकर बिल्लू का हृदय कमल खिल उठा। उसमें अद्भुत परिवर्तन आ गया। वह ऐसा गिटार बजाने लगा, मानो साक्षात् सरस्वती वीणा बजा रही हो। अब वह खुद ही ध्यान लगाकर पढ़ने लगा। खूब पढ़ाई की उसने। अब बिल्लू अर्थात बलराम एक बहुत बड़ी कंपनी में मैनेजर है। वह अपने माता-पिता को तो ईश्वर का दर्जा देता ही है, दूसरों की भी निःस्वार्थ सहायता करता है। वह समझ गया था कि हर बच्चे में एक विशेष प्रतिभा होती है। यह बहुत आवश्यक है कि बच्चे की प्रतिभा की पहचान कर उसे विकसित करने का अवसर दिया जाये।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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