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बालमन की कहानियां
Rishtey-Balman ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

“क्या हुआ हरीश, तुम इतने उदास क्यों रहते हो? और कक्षा में सबसे अलग भी बैठते हो? तुम लंच भी सबके साथ नहीं करते…?” गौतम ने लंच टाइम में हरीश के पास जाकर पूछा।

“मुझे नहीं मालूम गौतम। मेरे साथ ना तो कोई बैठना चाहता है और ना ही कोई लंच करता है।” -हरीश ने उदासी भरे शब्दों में कहा।

गौतम ने हाल ही में शहर के सबसे नामी स्कूल में दाखिला लिया था और उसके व्यवहार को देखकर सब उससे दोस्ती की इच्छा रखते थे। पर सिर्फ एक हरीश ही था, जिससे उसकी बात नहीं होती थी। वो अक्सर हरीश को कक्षा में सबसे अलग और उदास बैठे हुए पाता।

“अच्छा! ये बताओ, क्या शुरू से ही तुमसे कोई बात नहीं करता?”

“ऐसा नहीं है गौतम! दाखिले के समय सब मुझसे बात करते थे। पर मालूम नहीं क्यों, धीरे-धीरे सब दूर हो गए।” गौतम ने मायूस स्वर में कहा।

“कोई बात नहीं हरीश, आज से मैं तुम्हारा दोस्त हूं।” गौतम ने उसकी तरफ अपनी दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कहा।

“सच…!”

“हाँ हरीश…!” इतना सुनते ही हरीश खुशी से उछल पड़ा। सभी बच्चे छुट्टी के समय भागकर गौतम के पास आए और सब उसे कुछ खुसुर-पुसुर करने लगे। कुछ ही समय पहले खुश दिखता हरीश सोच में पड़ गया। यह सब देखकर फिर से उसके चेहरे पर मायूसी छा गई।

दूसरे दिन हरीश जब स्कूल पहुंचा, तो उसका मन उदास था। रह-रहकर यही ख्याल आता… पता नहीं और बच्चों की भाँति गौतम भी कहीं दोस्ती का हाथ ना छोड़ दे…!

हरीश क्लास में पहुँचकर यथावत् सबसे आखिरी बेंच पर जाकर बैठ गया। पर उसकी नजरे गौतम पर ही टिकी हुई थी। सारे बच्चे क्लास में पहुँच गए थे। गौतम भी आकर अपने अन्य दोस्तों के साथ बैठ गया। यह देखकर हरीश की आशा टूट गई।

तभी टीचर भी क्लास में पहुँची और बच्चों की हाजिरी लेने लगीं। गौतम ने बीच में ही उठकर कहा- “मैम, मेरी सीट हरीश के साथ कर दीजिए। आज से मैं वही बैठूंगा।”

यह सुनते ही सारे बच्चे आश्चर्य भरी नजरों से गौतम को घूरने लगे।

टीचर समझ गई और उन्हें गौतम के फैसले पर प्रसन्नता हुई। उन्होंने गौतम की पीठ थपथपाते हुए कहा- “ठीक है। गौतम आज से तुम वहीं बैठना।”

गौतम अपना बैग लेकर हरीश के पास चला गया।

“मै सब जानता हूँ दोस्त, तुम्हारे पापा इस स्कूल में एक बहुत ही छोटे ओहदे पर काम करते है ना… शायद इसी वजह से बच्चे ना तो तुम्हारे साथ बैठना चाहते हैं, ना ही लंच शेयर करते हैं।” गौतम ने सबको सुनाते हुए कहा-“मगर उदास मत हो हरीश, आज से हम पक्के दोस्त हुए और हम दोनों अपना लंच भी मिल-बाँटकर खाएंगे।” -गौतम ने फिर कहा।

यह सुनकर हरीश के मुख पर खुशी की चमक आ गई।

समझ में नहीं आ रहा था कि यह रिश्ता हरीश के साथ गौतम की दोस्ती का था, या फिर कुछ और…।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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