bachche man ke sachche
bachche man ke sachche

इधर कोई हफ्ते भर से सांताक्लाज चुपके-चुपके बच्चों के दिल का हाल जानने के लिए पूरी दुनिया में चक्कर लगा रहा था और रात-दिन उसकी यात्राएँ जारी थीं। यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ। कुछ ही दिनों में पूरी दुनिया की थका देने वाली परिक्रमा उसे करनी थी, ताकि धरती के बच्चों के दिल का हाल जल्दी से जल्दी जान ले। और इस काम में उसे बड़े अजीब-अजीब अनुभव हो रहे थे। कभी-कभी तो ऐसे-ऐसे दृश्य देखने को मिलते, जो उसकी आँखों में चुभ-से गए थे और लगता, वह उन्हें कभी भूल ही नहीं पाएगा।

कई बार सांता के चेहरे पर गहरी उदासी छा जाती। तब एक ही गीत उसके होंठों पर आता, ‘बच्चे, मन के अच्छे…सारे जग की आँख के तारे…!’ और देखते ही देखते सारा दुख, उदासी गायब हो जाती। होंठों पर मंद-मंद मुसकान नाचने लगती। फिर एकाएक उसकी आँखों में उन बच्चों के चेहरे घूम जाते, जो जाने कहाँ-कहाँ उसका इंतजार कर रहे थे, और उसके पैरों में पंख लग जाते।

सचमुच, दुनिया भर में कितने ही बच्चे थे, जो उसकी बाट जोह रहे थे। अनगिनत बच्चे। इनमें कुछ तो ऐसे कि उसने पक्का सोच लिया था कि चाहे कुछ हो जाए, पर उनके लिए तो वह खिलौने और दूसरे अनमोल उपहार लेकर जाएगा ही। इन्हीं में एक हैरी भी था, जिसके लिए उसने एक सुंदर सी डाॅल समेत कुछ अच्छे खिलौने और एक सुंदर सी गरम शर्ट का इंतजाम अभी से कर लिया था। डाॅल वही थी, जो हँसते हुए सबको हैट उठाकर ‘नमस्ते’ कहती है और जिसकी हैरी ने फरमाइश की थी।

‘ओह, हैरी यह सब पाकर कितना खुश होगा!’ सोच-सोचकर सांता के मन में एक हिलोर-सी पैदा हो जाती थी।

अब तक उसने इतना तो पता लगा लिया था कि लालपुर मोहल्ले के हैरी के मम्मी-पापा दोनों कोई छोटी-मोटी नौकरी करते थे। वे सुबह-सुबह काम पर चले जाते और हैरी स्कूल जाता। पर स्कूल में कोई बच्चा उसे अपने साथ नहीं खिलाता था, क्योंकि उसके पास ढंग के कपड़े नहीं थे। शाम को आसपास के मोहल्ले के बच्चे भी उसे दूर-दूर ही रखते। इशारों से ही दूर-दूर करते। हैरी की आँखों में आँसू छलछला आते।

“मम्मी, सब बच्चों के पास खिलौने हैं, मेरे पास तो एक भी ढंग का खिलौना नहीं है। बस, एक एलीफेंट है, पर उसकी सूँड़ टूट गई है। कब तक उससे खेलूँ…? और बच्चों के पास कितने सुंदर-सुंदर खिलौने हैं!” उसने बड़े उदास स्वर में मम्मी को बताया।

“ओह, मेरा बेटा…!” मम्मी ने उसे छाती से लगा लिया, “तू तो मेरा लाड़ला बेटा है न, कितना समझदार। तुझे पता है न, हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं। जैसे-तैसे तुझे पढ़ा रहे हैं।…फिर अभी तो तेरे लिए गरम कपड़े बनवाने हैं।” कहते हुए हैरी की मम्मी के चेहरे पर भी गहरी उदासी आ गई। कुछ रुककर उन्होंने समझाया, “खिलौने नहीं हैं तो क्या हुआ? तू और बच्चों के साथ खेल लिया कर, हैरी!”

“मम्मी, मुझे कोई नहीं खिलाता। सब कहते हैं, तेरे पास तो कोई ढंग का खिलौना तक नहीं है। तू हमारे खिलौने भी तोड़ देगा।” कहते-कहते हैरी सचमुच रो पड़ा।

“तो इसी बात पर रो रहा है तू, पागल कहीं का! अरे, इसमें रोने की क्या बात है? जिनके पास पैसे नहीं हैं, उन्हें भी तो जीने का हक है। फिर तू पढ़-लिखकर लायक बनेगा तो खूब कमाएगा और मम्मी-पापा को भी सुख से रखेगा। बोल, रखेगा ना? तब तक तो हम भी बूढ़े हो चुके होंगे, तेरे पुराने वाले एलीफेंट की तरह!…कहीं ऐसा तो नहीं कि तब तुझे हम भी बुरे लगने लगें, जैसे तुझे अपना एलीफेंट लगता है…?” मम्मी ने हँसते हुए कहा।

“नहीं-नहीं, मम्मी, ऐसा मत बोलो। मैं आप दोनों की खूब सेवा करूँगा। आप लोग इतनी मेहनत करके मुझे पढ़ा-लिखा रहे हैं, तो क्या मेरा कोई फर्ज नहीं है? मैं उसी पुराने वाले एलीफेंट से काम चला लूँगा मम्मी, और आपसे कोई शिकायत नहीं करूँगा।…प्रॉमिस, मम्मी!” हैरी कह रहा था।

“ओह, मेरा राजा बेटा…! तू कितना अच्छा है। मेरा मन तो यह है कि तुझे दुनिया की सारी अच्छी चीजें दूँ। पर हमारे पास पैसे कम हैं, इसी में घर चलाना है। इसी में तेरी फीस और किताबें…! फिर भी हम हिम्मत तो नहीं हारे ना, तो तू क्यों परेशान होता है?” हैरी की मम्मी ने उसे दिलासा दिया।

“मम्मी, क्रिसमस आने वाला है। मैंने सुना है, क्रिसमस पर सांताक्लाज सब बच्चों को सुंदर-सुंदर उपहार देता है।…क्या सच्ची है यह बात?” हैरी ने पूछा।

“मैं क्या जानूँ बेटा? सुना तो मैंने भी है कि वह रात में चुपके से आता है और तकिए के नीचे उपहार रखकर चला जाता है। पर…पता नहीं कि वह हमारे मामूली से घर में आएगा कि नहीं। और फिर यहाँ लालपुर में आएगा कैसे? यहाँ तक का तो रास्ता ही उसे नहीं पता होगा। देख नहीं रहे, कितनी तंग, अँधेरी गलियाँ हैं और रास्ता कितना ऊबड़-खाबड़। फिर उसे कैसे पता चलेगा किसमें हैरी रहता है और उसे कौन सा खिलौना चाहिए?”

“मम्मी, सांता आया तो मैं उसे बोलूँगा कि वह मेरे लिए डाॅल लाए। बड़ी सुंदर वाली डाॅल, जो संजू के पास है। वही वाली मम्मी, जो हैट उठाकर सबको हँसकर नमस्ते कहती है। और हाँ, वह बड़ा अच्छा डांस भी करती है…!” कहते-कहते हैरी की आँखों में खुशी झलमल करने लगी।

दीवार के पीछे कान लगाए सांता यह सुन रहा था। उसने तय कर लिया कि इस बार हैरी को उसकी पसंद की डाॅल लाकर देनी ही है। उसका मन भारी था। बार-बार एक ही बात उसके मन में आ रही थी कि एक ओर इतने अमीर लोग हैं। उनके बच्चों के पास ढेर-ढेर बेशकीमती खिलौने हैं, जो यहाँ-वहाँ लापरवाही से पड़े रहते हैं। और दूसरी ओर यह बेचारा हैरी…जो एक खिलौने के लिए तरस रहा है।…जैसे भी हो, हैरी को उसकी पसंद की डाॅल तो उपहार के रूप में देनी ही होगी।

आऊँगा मैं लेकर सचमुच, वही खिलौना,

हाँ-हाँ, बच्चे, वही खिलौना,

सुन लो हैरी, वही खिलौना!

जो तुमने माँगा था, सच्ची,

वही खिलौना…!

साथ तुम्हारे खेलेगा वो हँसकर, गाकर,

तुम्हें रिझाएगा जो मीठे गीत सुनाकर,

कभी सुनाएगा जो प्यारे-प्यारे किस्से,

ले लेगा वे दुख जो आए तुम्हारे हिस्से।

हँसना तुम्हें सिखाएगा जो, वही खिलौना,

जीना तुम्हें सिखाएगा जो, वही खिलौना,

दुनिया तुम्हें दिखाएगा जो, वही खिलौना,

संग-संग दौड़ लगाएगा जो, वही खिलौना,

तुमको साथ खिलाएगा जो, वही खिलौना।

नाच-नाचकर तुम्हें रिझाएगा वो छौना,

हिरनी का बच्चा भर देगा कोना-कोना,

हँस-हँसकर कर देगा तुम पर, सच्ची, टोना

भरा मिठाई का एक प्यारा-प्यारा दोना,

कलाकंद का, रबड़ी का जी, प्यारा दोना।

खाना उसको और खिलाना मम्मी को भी,

थोड़ा-थोड़ा सब मित्रों को वही खिलाना,

खुश होंगे वे, तुम उनके संग-संग मुसकाना,

आना, आना फिर मेरे सपने में आना,

गाना, गाना, गाकर सबका मन बहलाना।

लाऊँगा मैं वही खिलौना, वही खिलौना, वही खिलौना,

भरा हुआ जो मीठी रबड़ी का है दोना,

हाँ-हाँ, हाँ-हाँ, वही खिलौना,

हाँ-हाँ हैरी, वही खिलौना,

लाऊँगा मैं बच्चे, ऐसा एक खिलौना,

हाँ-हाँ, हाँ-हाँ, वही खिलौना, वही खिलौना, वही खिलौना…!

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)