Hindi Kavita: घर की बुजुर्ग महिलाएं बैठी हैं तशरीफ़ लिए चौखटों पर ,
सयानी हो रही अल्हड़, हठी लड़कियों की करने के लिए हिफाज़त,
उनको ख़ुद खुलकर हँसने की इजाज़त नहीं दी
परंपराओं ने,
संस्कारों और विरासत में वही सौंप रही हैं यौवनाओं को,
इसलिए कुंवारियां भी नहीं हंसती आँगनों में लगाकर ठहाके,
वो चिपकी हैं भुरभुरी रेत की भीतों से, खुलेआम बतियाती नहीं ,
एक- दूसरे के कानों में करके खुसुर फुसुर, हंसती भीतर ही भीतर ,
खिई.. खिआई हंसती भी हैं तो मुंह को हाथों से ढककर,
खुश होने की उनकी ये संकुचित लरज़न,
पहुंच धान की बाली में,
बन खुश्बू महकाती संपूर्ण भूमंडल,
प्रेमियों के किस्से, चुलबुली, खट्टी मीठी बातें,
देखो अपने रेशमी स्वप्न हेतु खुरदरे धरातल लाई हैं चुन के ,
दृष्टिगत होती हरितमा जिनकी खेत खलियानों तक,
ये सुतली से केशों में लगाए हैं रिबिन, सुसज्जित किए जंगली फूल को,
ऊंचे कुर्ते सलवार होते इनके पहरन,
तब लगती मुझे ये कोहरों के बीच छिपी जैसे कोई अप्रतिम मूर्त,
आंचलिक भूगोल की छोरियां, उमड़ती हैं लिए धारा सी हिलोरन,
हिय में पहाड़ सी पीर लिए पगडंडियों पर फुदकती हैं,
छिपाकर रखती हैं दिल के बक्से में खव्वाहिशें तह लगाकर ऐसे,
जैस दुनियां से छिपा कर सहेज, अनदेखे प्रेम पत्र रखता है,
मौन आंखों, लबों में गहनानीभूति के भाव संजोए
गांव की छोरियां बुजुर्गों की पहरेदारी में भी देखो तो सही,
कितने अनबोले ही अलबेलेपन से संवाद करती हैं।
