Short Story in Hindi: मीना एक मध्यम वर्ग के परिवार की लड़की जो छह भाई बहनों में दूसरे नंबर की संतान थी।मीना का मन पढ़ने में खूब लगता था ।अपने भाई-बहनों में सबसे होशियार,अपनी क्लास में हरदम अव्वल आती।पढ़ाई के साथ-साथ स्कूल की सांस्कृतिक एवं खेल-कूद गतिविधियों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती।पिता सेना में थे।दादाजी बुजुर्ग होने के कारण उनकी सेवा करने के लिए माँ गांव में ही रहती और सब भाई-बहन गांव में ही पढ़ रहे थे।
बड़ी बहन की शादी थी उस समय वह दसवीं कक्षा में थी।सब बहन -भाई बहुत उत्साहित थे, कि शादी में खूब मौज-मस्ती करेंगे।
नियत समय पर बारात आई,खूब धूम-धाम से बारात का स्वागत-सत्कार हुआ।बातों ही बातों में दोनों समधियों की बात हुई और मीना की शादी भी उसकी दीदी के देवर के साथ, जो भाई की शादी में बाराती बनकर आया था दोनों पक्षों की रजामंदी के बाद उसी समय दूल्हा बनाकर मीना की भी उसी मण्डप में शादी कर दी गई। दीदी की देवरानी बनकर मात्र चौदह साल की उम्र में ससुराल आ गई । दसवीं की परीक्षा तो कैसे भी करके उसने पास कर ली पर अब मीना का पढ़ लिख कर कुछ बनने का सपना कभी ना पूरा होने वाला सपना बन कर रह गया। छह साल तक पढाई से पूरी तरह नाता छूट गया।ससुराल एक छोटा सा गांव था ,जहाँ बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था।जमींदार परिवार का बहुत फैला हुआ काम खेत-खलिहान और घर पर आने-जाने वालों व मेहमानों का तांता लगा ही रहता। संयुक्त परिवार का काम और दोनों बहनों व ननदों के मिलाकर आठ दस बच्चे तो हर समय घर में रहते ही थे।घर के काम और बच्चों को सम्भालने में ही समय निकलने लगा। मीना का सपना बचपन से ही शिक्षिका बनने का था, मगर यह एक कभी न पूरा होने वाला सपना बनकर रह गया! एक दिन पति से इस बात पर चर्चा हुई तो मीना ने कहा कि उसकी बहुत इच्छा थी कि वह शिक्षिका बने ।वह आगे पढ़ना चाहती है,उन्होंने आगे पढ़ने की बात पर सहमति दे दी। अब बारी घर में सास-ससुर जी से अनुमति लेने की आई तो ससुर जी ने तो सहर्ष स्वीकृति दे दी मगर सास ने कहा कि –
“कौनसी बी.ए. पास करके नौकरी करनी है ,हमारे खानदान में तो आजतक किसी ने की नही।”
मीना ने अपने सरल व्यवहार से सबके दिल में जगह बना ली थी।सब घर के काम वह बड़ी ही तन्मयता से करती।कुछ दिनों की ना- नुकुर के बाद सास ने भी यह कहकर अनुमति दे दी कि –
“घर के किसी भी काम में कोताही नहीं चलेगी। जब घर का काम करके पढाई करेगी तो कुछ ही दिनों में पढ़ने का फितूर अपने आप उतर जायेगा। “
मीना को तो जैसे आसमान में उड़ने के लिए पंख मिल गए!उसके मन की मुराद पूरी हो गई। वह जी जान से अपने सपने को पूरा करने में लग गई।
बाहरवीं के बाद सी. लिब. किया तब तक बच्चे भी स्कूल जाने वाले हो गये,गांव में अच्छा स्कूल नहीं था ।दिन मे घर का काम ,गाय, भैंस का सारा काम, बच्चों की पढ़ाई एवं रात मे पढ़ते-पढ़ते बी.ए.पास कर लिया। उसके बाद प्राइवेट ही बी. लिब. किया। बच्चे छोटे होने के कारण पास के शहर में स्कूल के लिए दो किलोमीटर पैदल चल कर आठ किलोमीटर बस का सफ़र तय करना अकेले दोनों बच्चों के बस का नही था। पास के शहर में एक कॉलेज में सहायक लाइब्रेरियन की पोस्ट निकली। घर वालों के थोड़े से विरोध व पतिदेव की सहमति से आवेदन किया। कॉलेज में नियुक्ति मिल गई सहायक लाइब्रेरियन बन गई। सुबह चार बजे उठकर घर के काम निपटाती और कॉलेज जाते हुए बच्चों को स्कूल छोड़ती व आते समय लेकर आती। इसी दौरान हिन्दी से स्नातकोत्तर किया एवं उसके बाद एम.लिब.करके उसी कोलेज में लाइब्रेरियन बनी। जब बेटी ने एम. ए. बी.एड. व बेटे ने एम.सी. ए.कर लिया तो कॉलेज से इस्तीफा दे दिया क्योंकि ससुर जी को अल्जाईमर हो गया था वह बीमार रहने लगे।
अब घर पर रहते हुए भी वह कुछ करना चाहती थी घर -गृहस्थी के कामों को निपटाने के बाद जो समय मिलता उसको व्यर्थ नही होने देना चाहती थी इसलिए बचपन में जो लिखने -पढ़ने का शौक था ,उसे पूरा करने का सोचा। कलम डायरी को अपना साथी बनाया ।बेटे ने स्मार्ट फोन लाकर दिया और कई साहित्यिक समूहों से जोड़ दिया और कहा कि –
“मम्मी अब आप अपने पढने लिखने के शौक को पूरा कीजिए, जो आज तक घर के काम व हमारी परवरिश में लगे रहने के कारण नही कर सकी।”
मन के भाव कभी कहानी बनकर तो कभी कविता बनकर काग़ज़ पर उतरने लगे। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं मे रचनाएं छपने लगी। फ़ेसबुक पर लोगों को पसन्द आने लगी तो लेखनी को प्रोत्साहन मिलने लगा।साहित्यिक प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगी और विजेता होती तो और उत्साह के साथ लिखती रहती ।साझा संग्रहों मे रचनाएं छपने लगी, कवि सम्मेलनों में पति के प्रोत्साहन से जाने लगी मीना की अपनी पहचान बनने लगी। आकाशवाणी में व दूरदर्शन में काव्य गोष्ठी के लिए निमंत्रण आने लगे।महिला सशक्तिकरण व नारी कलम जैसे कई कार्यक्रमों में भाग लेने लगी।
यूट्यूब पर भी उसने अपना साहित्यिक चैनल बनाया और अपनी रचनाओं का वाचन करते हुए विडिओ बना कर डालने लगी तो साहित्य जगत में उसके नाम की पहचान देश-विदेश में होने लगी।
एक दिन बहुत बड़े साहित्यिक आयोजन में उसे मुख्य अतिथि के लिए निमंत्रण पत्र आया ।निमंत्रण पत्र पति ने उसे पकड़ाते हुए कहा कि
” तुम तो बहुत बड़ी लेखिका बन गई हो ,तुम्हारे चर्चे तो आए दिन अखबारों में होते है एवं फेसबुक पेज भी मोनेटाइज हो गया है भई अब तो तुम डालर कमाने लगी हो!”
मीना बड़े ही कृतज्ञ भाव से बोली कि-
” इसका श्रेय मैं तुम्हें देती हूँ, अगर तुम न होते !तो मैं अपने गांव की सबसे पहली स्नातकोत्तर महिला एवं नौकरी करने वाली बहू और लेखिका एवं फेसबुक से डालर कमाने वाली बहू नही होकर आज एक आम ग्रामीण महिला जो केवल घर का चूल्हा-चौका ही संभालते हुए जी रही होती जिसकी कोई पहचान नही होती!
