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अब पप्पू कैसे पास होए! | Hindi kahani | Grehlakshmi

पापा ने पप्पू को पढ़ाई के लिए मनाने की जद्दोजहद में ना जाने कितने ही पापड़ बेल लिए। लोक-लुभावन और पप्पू को मनभावन चीजों का हवाला दे-दे कर दसवीं से तो बाहर निकाल लिया लेकिन अब ग्यारहवीं पास करवाने के लिए कौन-सा तिकड़म अपनाया जाए!

पप्पू का दसवीं में तीसरा बसंत था। दसवीं में वो दो बसंत देख चुका था। पप्पू के पापा को चिंता थी कि कहीं वह दसवीं में ही बसंत पंचमी न मना ले। इस साल उसे दसवीं से उबारना जरूरी था। पापा को याद आया कि पिछली बार जब पप्पू आठवीं में अटका था तब उसे मोबाइल फोन लेकर देने का वादा किया था। उसी साल वह आठवीं से निकला था। पापा ने पप्पू से कहा कि यदि वह दसवीं क्लियर करता है तो उसे महंगी वाली बाइक दिला देंगे।

उस समय पापा को पता नहीं था कि कोरोना के कारण पप्पू की परीक्षा होगी भी या नहीं पर उन्होंने सोचा कि यदि परीक्षा होती है तो बाइक वाला तीर निशाने पर लग जायेगा। पप्पू की किस्मत इतनी अच्छी निकली कि कोरोना के कारण सभी विद्यार्थियों को बिना परीक्षा के ही पास कर दिया गया। दसवीं पास होने में पप्पू का कोई योगदान नहीं था। फिर भी पापा वादे के पक्के थे, उन्होंने पप्पू को लेटेस्ट वाली महंगी बाइक खरीद कर दे दी।

जिस समय बाइक खरीदी उस समय लॉकडाउन चल रहा था। बाइक चलाने के लिए पप्पू का मन बहुत मचलता था पर बाहर पुलिस का कड़ा पहरा था।

सो, वह बाहर नहीं निकल पाता था। एक दिन मौका देखकर उसने बाइक निकाली पर जैसे ही चौराहे पर पहुंचा वहां खड़े पुलिस ने डंडे की नोक पर उसे फिर घर भिजवा दिया।

 पप्पू अब बेसब्री से लॉकडाउन खुलने का इंतजार करने लगा। आखिर वह दिन भी आ गया और शहर धीरे-धीरे अनलॉक होने लगा।

अब पप्पू अपनी नई बाइक फर्राटे से चलाने लगा। पढ़ाई के चक्कर में और परीक्षा की टेंशन में उसे लाइसेंस बनवाने का समय ही नहीं मिल पाया था। बिना लाइसेंस के ही बाइक चलाता था। उसका कहना था बहुत सारे लोग ऐसा ही करते हैं।

उसने अपनी बाइक को तरह-तरह की एक्सेसरीज से सजा लिया था। हेड लाइट और हॉर्न तो इतने पावरफुल थे मानो किसी सुपरफास्ट ट्रेन के हों। नंबर भी उसने अपनी पसंद का लिया था और लिखवाया भी एकदम स्टाइल में था ‘डैड्स गिफ्टÓ।

अब तो वह हर जगह बाइक से ही जाता था ताकि समय की बचत हो सके। यही बचाया हुआ समय वह अपने दोस्तों के साथ किसी पान की गुमटी या किसी चौराहे पर गुजारता था, जहां से कन्याओं की आवाजाही ज्यादा होती थी। नई बाइक मिलने के बाद वह समय का पाबंद रहने लगा। कहीं पहुंचने के लिए बाइक को तेज भगाता था। यदि कोई बीच में आ जाये तो जोर से हॉर्न बजाते हुए ब्रेक लगा देता।

सिग्नल पर रुकना उसके लिए समय की बर्बादी थी। इसलिए वह उसी सिग्नल पर रुकता था जहां पुलिस वाला हो। सिग्नल पर कभी कोई छिपा कर्मठ पुलिस कर्मी उसे धर लेता ऐसे समय के लिए वह अपनी बहूजेबीय जीन्स पैंट की जेब में रुपये भी रखता था, अर्थात् पापा से मिलने वाली पॉकेट मनी। भीड़ में तो बाइक पर उसकी कलाबाजियां देखने लायक रहतीं।

साइड स्टैंड निकाल कर बहुत ही स्टाइल में वह अपनी बाइक पार्क करता था। महंगा पेट्रोल रुपये से नहीं मिलता। इसके लिए पापा का क्रेडिट कार्ड भी जीन्स की जेब में रहता था। पेट्रोल की कीमत कुछ भी हो उसकी बाइक का टैंक हमेशा फुल ही रहता था।


उसका एक मित्र था लप्पू जिसके पास बाइक नहीं थी। पप्पू उसे अपनी बाइक पर शहर की सैर कराता। लप्पू के दो दोस्त थे। जब वो उसके साथ होते तो चारों मिलकर बाइक पर घूमते। पप्पू की एक गर्लफ्रेंड थी- पप्पी। उसे भी वह अपनी बाइक पर एक दो बार शहर की सीमा के बाहर तक लॉन्ग ड्राइव पर ले जा चुका था। पप्पी जब बाइक की फिसल पट्टी नुमा सीट पर चिपट कर बैठती तो सीट पर पीछे की तरफ इतनी सारी जगह बचती कि दो लोग और बैठ सके।

पप्पू का बाइक के प्रति दीवानापन बहुत बढ़ गया था। उसने पढ़ाई पर ध्यान देना बंद ही कर दिया। उसे देखकर पापा फिर चिंताग्रस्त रहने लगे। इस साल वह ग्यारहवीं की परीक्षा देने वाला था। वे सोच रहे थे पिछले साल तो कोरोना ने बचा लिया पर हर साल तो ऐसा नहीं होगा। अब इस साल पप्पू को क्या देने का वादा करें कि वह इस साल भी पास हो जाये।

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