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जीवन में सूर्य प्रकाश का महत्व

सूर्य मात्र रोशनी का स्रोत ही नहीं बल्कि रंगों व ऊर्जाओं का भी विपुल भंडार है।  भगवान सूर्य ने केवल धर्म बल्कि चिकित्सा के क्षेत्र में भी विशेष योगदान रखते हैं। सूर्य चिकित्सा का असल स्रोत रंग ही है क्योंकि रंग ही प्रकाश का मूल तत्त्व है। सूर्य की किरणों में सात रंग पाए जाते हैं। लाल, पीला, नारंगी, हरा, नीला, आसमानी और बैंगनी। सातों रंगों की अपनी प्रकृति एवं प्रभाव है। सबकी अलग अलग विशेषताएं ही इन्हें एक दूसरे से भिन्न करती है। रंगों की अलग प्रकृति के अनुरूप ही इनका चिकित्सा में प्रयोग होना चाहिए। ऐसा देखने में आता है कि अधिकांश सूर्य चिकित्सक अपनी सुविधा के अनुसार इन रंगों को तीन समूहों में विभाजित कर उनका प्रयोग करते हैं।

ये तीन समूह इस प्रकार है-लाल, पीला, नारंगी, 2. हरा, 3. नीला, आसमानी और बैंगनी। इन तीनों समूहों में तीन मुख्य रंग हैं जैसे प्रथम समूह में नारंगी, द्वितीय समूह में हरा एवं तीसरे समूह में नीला। यानी, नारंगी, हरे एवं नीले रंग द्वारा ही संपूर्ण सूर्य चिकित्सा की जाती है।

नारंगी रंग

यह रंग गर्मी प्रदान करता है। इसका प्रयोग सर्दी के रोगों कफ आदि में किया जाता है। यह रंग कमजोरों एवं वृद्धों के लिए टॉनिक का काम करता है। यह शरीर के रक्त संचार में तेजी लाता है तथा आयोडिन की कमी को पूरा करता है। नारंगी रंग के प्रयोग से लीवर, गुर्दे व पेट की कमजोरी दूर होती है। यह आंतों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। नारंगी रंग मांसपेशियों की सिकुड़न को दूर कर उन्हें स्वस्थ रखता है तथा शरीर की शिथिलता को दूर करके उसकी कार्य क्षमता बढ़ाता है। नारंगी रंग केे प्रयोग से मानसिक शक्ति का विकास होता है एवं इच्छाशक्ति प्रबल हो जाती है। नारंगी रंग का सेवन करने से अद्भुत साहस का संचार होता है।

रोगों में लाभ- नारंगी रंग कफ जनित रोगों में अधिक लाभकारी होता है। यह रंग कफ जनित खांसी, बुखार, गैस, निमोनिया, स्नायु रोग, फेफड़ों के रोग, गठिया, एनिमिया, खून में लाल रक्त कणों की कमी को दूर करना, स्नायु दुर्बलता, हृदय रोग, श्वास प्रकोप, पक्षाघात, बदहजमी आदि में प्रयोग होता है। चूंकि यह रंग अधिक गर्म होता है इसलिए इसका प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। लंबे समय तक इस रंग का प्रयोग हानिकारक हो सकता है।

हरा रंग

दूसरे समूह का हरा रंग अपने समूह का एकमात्र महत्त्वपूर्ण रंग है। यह नीले एवं पहले रंग के मिलने से बनता है। हरे रंग की प्रकृति मध्यम, संतुलित एवं रक्त शोधक होती है। यह शरीर के विषाक्त पदार्थों को नष्ट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह रंग ठंडा है। यह गंदे खून को साफ करता है तथा उदर के रोगों को नष्ट कर देता है। हरा रंग शरीर में मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है तथा दिमाग को ठंडा रखता है। हरे रंग से त्वचा की रौनक बढ़ती है तथा चर्म रोग समाप्त हो जाते हैं। यह रंग ऐसे रोगों के जीवाणुओं को पनपने नहीं देता जो संक्रामकता फैलाते हैं। इस रंग की खास विशेषता यह है कि इससे कब्ज का नाश होता है।

रोगों में लाभ- यह रंग उत्तम कार्य करने की प्रेरणा देता है, ईर्ष्या व स्वार्थ को समाप्त करता है। हरे रंग का प्रयोग करने से कैंसर में भी लाभ होता है। कैंसर के मरीजों को अंगूर के सेवन की सलाह भी दी जाती है। टायफाइड, मलेरिया, गुर्दों की सूजन, सिरदर्द, चर्मरोग, चेचक, दाद, खुजली, आंतों की बीमारी, पेट दर्द, नेत्र रोग, उच्च रक्तचाप, पथरी व सूखी खांसी आदि रोगों को समाप्त करने के लिए हरे रंग की दवा प्रयोग में लाई जाती है। इस रंग को सूर्य चिकित्सा की रामबाण औषधि भी कहा जाता है।

नीला रंग

इस रंग में आसमानी एवं बैंगनी रंग शामिल किए जाते हैं। इस रंग की प्रकृति अत्यंत शीतल होती है। यह रंग अत्यंत सुखद, शांतिदायक एवं स्वप्न जगत में विचरण करने वाला होता है। यह रंग प्रेम को जन्म देता है एवं सुन्दरता का प्रतीक माना जाता है। नीला रंग हृदय को विशाल बनाता है, इस रंग को वायरस विरोधी भी कहा गया है।

रोगों में लाभ- नीले रंग का प्रभाव मुंह, गले एवं मस्तिष्क तक होता है। यह रंग शरीर की किसी भी प्रकार की जलन को शांत करता है व सूजन को मिटाता है। यदि शरीर में कहीं पस बन रही हो तो यह रंग विशेष प्रभाव दिखाता है। यह समस्त कीटाणुओं को समाप्त कर देता है। गर्मी के दिनों में यह रंग गर्मी से उत्पन्न होने वाले समस्त वायरसों को नष्ट कर देता है। नीले रंग का प्रयोग सिरदर्द, लू लगना, हिस्टीरिया, पागलपन, नींद की कमी, उच्च रक्तचाप आदि रोगों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह रंग उल्टी, डायरिया, हैजा आदि में भी लाभदायक सिद्ध होता है। नीला रंग वस्तुत: जहर का प्रतिरोधक माना जाता है। इस प्रकार सूर्य की सात रश्मियों के सातों रंगों को तीन समूहों में विभाजित किया गया है। प्रत्येग रंग की अपनी प्रकृति और गुण हैं। सूर्य चिकित्सा में ये रंग विशेष गुणकारी साबित होते हैं। हरा रंग विभिन्न रोगों में अपना विशेष प्रभाव दिखाता है।

सूर्य औषधि की विधि

सूर्य औषधि के निर्माण के लिए उसी रंग की कांच की साफ बोतल प्रयोग मे लाई जाती है। विभिन्न रंगों की बोतल न मिलने पर उस रंग का पतला कागज बोतल पर चिपका दिया जाता है। सात रंगों के अनुसार सात प्रकार की बोतलें लेने के स्थान पर प्रत्येक रंग समूह से एक-एक रंग लेने से तीन बोतलों से ही काम चल जाता है। ये तीन रंग हैं- नारंगी, हरा एवं पीला। बोतलों को अच्छी तरह साफ करने के बाद उनमें शुद्ध जल भरा जाता है। बोतलों को कम से कम तीन अंगुल खाली छोड़ा जाता है। इसके बाद इन्हें ढ़क्कन लगाकर बंद कर दिया जाता है। शुद्ध जल से भरी इन बोतलों को धूप में 6-8 घंटे रखकर दवा तैयार की जाती है। धूप में बोतलों को इस प्रकार रखें कि एक बोतल की छाया दूसरे रंग की बोतल पर न पड़ें। इस प्रकार तैयार दवा को दिन में तीन या चार बार सेवन किया जाता है। एक बार में बनाई गई दवा को चार या पांच बार सेवन किया जा सकता है। साधारण नारंगी रंग की दवा भोजन के बाद 15-30 मिनट के भीतर लेनी चाहिए। हरे और नीले रंग की दवाएं खाली पेट या भोजन से एक घंटा पहले लेने का विधान है। हरे रंग की दवा प्रात: खाली पेट ली जाती है। यह दवा शरीर को शुद्ध करती है। इन दवाओं का कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता। 

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