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VARUN-MUDRA

 

Varun Mudra: हमारा शरीर सृष्टि में विद्यमान पांच तत्त्वों से मिलकर बना है। जो बाहर मौजूद है वही हमारे शरीर में भी है। उंगलियों की विभिन्न मुद्राओं से पंच तत्त्व की छिपी शक्तियों को उपयोग में लाया जा सकता है और कई रोगों से मुक्त हुआ जा सकता है।

शिव का अर्थ है ‘कल्याण।’ इस शब्द के अनुसार ही भगवान ने जो लीला की उसमें लोक व परलोक के मंगल की कामना निहित थी। शिव का तांडव नृत्य भी विध्वंसक न होकर सृजन का कारण था। उसमें हुई डमरू की ध्वनि से संस्कृत के व्याकरण के सूत्रों की रचना हुई जिससे यह भाषा देव, वैज्ञानिक भाषा नहीं बनी है। ताण्डव नृत्य के समय जिस प्रकार से प्रदर्शन किए गए, उसको ऋषियों (महात्मा) ने तप के माध्यम से समझकर उन आकृतियों के महत्त्व को समझा एवं इसके द्वारा किस विधि से इस प्रकृति व मनुष्य का क्या शारीरिक, मानसिक, अध्यात्मिक लाभ हो सकता है इसको समझा। ऋषियों ने इनका महत्त्व समझने के बाद यह जाना कि इन आकृतियों का अनुकरण करने से जीवन की अनेक समस्याओं का हल निरापद प्रकार से हो जाता है तथा इन आकृतियों का ही एक प्रकार है मुद्राएं व वरुण मुद्रा इनमें से एक है।

वरुण मुद्रा

इसमें वरुण मुद्रा भी एक बहुउपयोगी मुद्रा है। वरुण मुद्रा आपको अम्ल पित्त के रोग, जलन, बेचैनी, गर्मी के रोगों से भी लाभ पहुंचाती है। ग्रीष्म ऋतु में इसका उपयोग अवश्य करना चाहिए। इससे गर्मी कम लगेगी, शरीर में शीतलता बनी रहेगी। लू की चपेट से मुक्ति मिलेगी। ऐसे व्यक्ति जिन्हें गर्मी अधिक लगती है, उनके लिए यह मुद्रा बहुत सहायक है। आप इस कहीं भी कभी भी कर सकते हैं।

 

विधि- इस मुद्रा को कनिष्ठ उंगली (सबसे छोटी उंगली) व अंगूठे को मिलाकर बनाया जाता है। किसी भी स्थान पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके वरुण देव या जल या जल स्रोत अथवा तरल पदार्थ का ध्यान करें। सुखासन (सहज बैठकर) में रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर पूरे शरीर को शिथिल छोड़कर यह मुद्रा बनानी चाहिए। यदि ऐसी मुद्रा श्वेत, नीले, आसमानी रंग के आसन, वस्त्र, प्रकाश या इस रंग के फर्श अथवा संबंधित क्षेत्र में इस रंग की कोई भी वस्तु के सामने बनाई जाए, तो उसका बहुत अधिक लाभ मिलता है। यह मुद्रा प्रतिदिन कुल 10 से लेकर 30 मिनट तक करें। यह एक दिन में एक बार या तीन बार में भी कर सकते हैं।

प्रभाव- इस मुद्रा से शरीर का रूखापन नष्ट होता है। त्वचा हमेशा चिकनी व मुलायम रहती है। चर्म रोग जैसे खाज, खुजली, मुहांसे, झुॢरयों का आना कम होकर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। वरुण मुद्रा का संपूर्ण लाभ 20 दिन बाद से मिलने लगता है।

 

यह क्रिया आपको अम्लपित्त के रोग, जलन, घबराहट, बेचैनी, गर्मी के रोग में भी लाभ पहुंचाती है। इससे गर्मी कम लगेगी, शरीर में शीतलता बनी रहेगी। लू की चपेट से मुक्ति मिलेगी। रक्तचाप में वृद्धि, रक्त की कमी, रक्त की गुणात्मकता का हृास, कमजोरी, पीलिया आदि रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों को इस मुद्रा से लाभ होता है। कफ-खांसी अथवा शीत प्रकृति से ग्रस्त व्यक्तियों को वरुण मुद्रा का उपयोग नहीं करना चाहिए। 

 

(साभार – शशिकांत सदैव, साधना पथ)

 

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