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Climate Change Diseases: बदलता मौसम बढ़ते रोग
Climate Change Diseases

Climate Change Diseases: जब भी कोई मौसम बदलता है तो मानव शरीर सबसे पहले चपेट में आता है। खास तौर पर गर्मी और बरसात के मौसम में। इन ऋतुओं में सबसे ज्यादा रोग लू (गर्म हवा) एवं बरसात के प्रदूषित जल के कारण उत्पन्न होते हैं। हवा और पानी जितनी सरलता से दूषित होते हैं उतनी ही सरलता एवं शीघ्रता से यह शरीर में रोगों का संचार भी करते हैं। पानी और हवा मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। इसलिए सतर्कता बरतना बहुत जरूरी है, क्योंकि प्रदूषित जल और वायु हमें पेट एवं त्वचा संबंधित रोग अधिक देते हैं और यह रोग कभी-कभी आगे चलकर महारोग में भी परिवर्तित हो जाते हैं।

चिलचिलाती गर्मी हो या रुका हुआ पानी, धरती की उमस हो या कूलर-टंकी में जमा पानी। गंदे पानी की काई हो या मक्खी-मच्छर सभी इस मौसम में बिमारियों का स्रोत बन जाते हैं। फिर खाने-पीने का खुला भोजन हो या नमी के कारण डब्बे में फफूंदी वाला बंद खाद्य पदार्थ सभी कुछ विषैला हो जाता है।

पीलिया

rainy season : बरसात के मौसम में
Jaundice

लक्षण-इस रोग में रक्त स्थित ‘बिलीरुबिन’ नामक पदार्थ सामान्य से अधिक हो जाता है, जिसके फलस्वरूप त्वचा, नाखून, पेशाब और मुंह के अंतराल में पीलापन दिखायी देने लगता है। बिलीरुबिन नामक रंगदार पदार्थ हमारे शरीर में नित्य प्रतिदिन बनता है, जिसकी उत्पत्ति का मूल स्रोत है, रक्त के लाल कणों का जीवनकाल लगभग 120 दिन माना गया है। इसके पश्चात वे नष्ट हो जाते हैं नष्ट होने पर इनके शरीर में बिलीरुबिन नामक पदार्थ उत्पन्न होता है। जो रक्त मार्ग द्वारा शरीर में भ्रमण करता रहता है। इस प्रकार यह यकृत में पहुंच जाता है, जहां इसका कुछ अंश नष्ट हो जाता है तथा कुछ भाग पित्त-रस द्वारा छोटी आंत में पहुंचकर मल के साथ मिल जाता है तथा मल का रंग तरह-तरह का होता है। बिलीरुबिन को यकृत से आंत तक पहुंचाने वाली ‘बाइलडेक्ट’ में यदि रुकावट आ जाए तो यह पदार्थ आंत में नहीं पहुंच पाता। परिणामत: मल का रंग श्वेत पड़ जाता है। और श्वेत मल का होना इसी बीमारी का प्रधान लक्षण माना जाता है। इसी प्रकार बिलीरुबिन की कुछ मात्रा मूत्र ये सब सामान्य क्रियाएं हैं, जो हमारे शरीर में नित्य प्रति होती रहती है, परंतु यकृत की खराबी के फलस्वरूप बिलीरुबिन का चक्र बिगड़ जाता है। परिणामत: इसकी मात्रा रक्त में बढ़ जाती है, जो आंख त्वचा और नाखून इत्यादि अंगों में एकत्र हो जाती है। इस प्रकार ये अंग पीले दिखायी देने लगते हैं और शरीर में कमजोरी बढ़ जाती है।

इलाज- 

1. पीली हरड़ का छिलका पानी में भिगोकर रोगी को पिलाएं।

2. मेंहदी की पत्तियां दो तोले रात को पानी में भिगो दें। इसे सवेरे छानकर पिलाएं तो कुछ दिनों के प्रयोग से पीलिया दूर हो जाता है।

3. मीठे (बेदाना) या मीठ- कंधारी अनार का रस प्याला भर लोहे के पात्र (बर्तन) में रात को छत पर रख दीजिए। प्रात: उठकर उसमें मिश्री घोल लें। इसे एक पक्ष (15 दिन) तक पीने से पीलिया बिल्कुल दूर हो जाता है।

4. बिना धुले एक केले के ऊपर भीगा हुआ चूना लगा दें। रात भर ओस में पड़ा रहने दें। सवेरे इसे छीलकर खा लें। प्रतिदिन ऐसा करने से एक से तीन सप्ताह के अंदर पीलिया दूर हो जाएगा।

5. कड़वे कद्दू (तोमड़ी) का टुकड़ा पानी में घिसकर नाक में सुड़कें। कुछ दिनों के प्रयोग से आंखों का पीलापन जाता रहेगा।

6. 100 ग्राम गेहूं कड़ाही में अथवा एक बर्तन में डालिए। करछी में गेहूं का तेल-सा स्निधद्रव लग जाएगा। इसे अंगुली के द्वारा रोगी की आंखों में अंजन की भांति लगाने से रोग दूर होगा।

7. आंवले के आकार के आधा किलो प्याज को चौकोर चीरा देकर सिरके में डाल दीजिए। ऊपर से जरा-सा नमक और काली मिर्च डाल दीजिए। प्रतिदिन प्रात:काल और सायं काल एक-एक प्याज निकालकर रोगी को खिलाएं। पीलिया दूर होगा।

8. मूली के पत्तों को कूटकर उनका पानी दस तोला निचोड़ें और उसे आग पर रखें। जब खौल जाये तो नीचे उतार लें, छानकर और दो तोले लाल शक्कर मिलाकर रोगी को पिलाएं। साथ ही मूली और उसके पत्तों को पकाकर खाएं। पीलिया में उपयोगी है।

9. एक बताशे पर कच्चे पपीते का रस 10 बूंद डालिए। 10-15 दिन खाने से पीलिया दूर होगा।

हैजा

Climate Change Diseases: बदलता मौसम बढ़ते रोग
cholera

लक्षण-हैजे का प्रकोप प्राय: गर्मी के दिनों में होता है। यह अचानक होने वाली बीमारी है। रोगी को इसका पूर्वाभास नहीं होता, यद्यपि कुछ रोगियों में हैजा होने के चार-पांच दिन पहले से ही अतिसार लगने की शिकायत पाई जा सकती है। जब बीमारी पूर्ण रूप से प्रकट होती है, रोगी को वेग से दस्त आने प्रारंभ हो जाते हैं और उल्टियां आने लगाती हैं। अतिसार एवं वमन का यह क्रम एक ही दिन में सैकड़ों बार हो सकता है। बार-बार शौच जाने के कारण रोगी मूर्छित हो सकता है।

इस रोग की मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं मानी जाती हैं।

निगर्मन की अवस्था- इस दशा में विशेषत: अतिसार और वमन की शिकायतें होती हैं। यह स्थिति लगभग 10-12 घंटे रहती है रोगी को तीव्र गति से उल्टियां होनी प्रांरभ हो जाती हैं। इसके पश्चात अतिसार होने लगते है। पेट में पीड़ा एवं ऐंठन की शिकायत हो जाती है। दो चार बार मल त्यागने पर, मल का रंग चावल के मांड के समान श्वेत पड़ जाता है। हाथ-पैरों में अत्यंत पीड़ा होने लगती है और नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है।

शीतावस्था- यह कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकती है। इस अवस्था में रोगी ठंडा पड़ जाता है और मूर्छित हो जाता है। रोगी मृत शरीर के समान निश्चेष्टï दिखायी देता है। त्वचा श्वेत पड़ जाती है। शरीर का तापमान बढ़ सकता है। इस अवस्था में अतिसार बंद हो जाते हैं, किंतु उल्टियां आती रहती हैं। मूत्र की मात्रा कम हो जाती है अथवा बिल्कुल बंद हो जाती है। पेट की ऐंठन में कोई कमी नहीं होती। नाड़ी की गति अनुभव नहीं होती वह अत्यंत मंद पड़ जाती है।

प्रत्यावर्तन की अवस्था- इस अवस्था में रोगी अत्यंत दुर्बल हो जाता है। साधारणत: वह अपने शरीर को हिला भी नहीं सकता। शरीर के भार में कमी आ जाती है और नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है। आंतों में रुकावट आने के कारण पेट फूल सकता है। मूत्र का रंग गंदला पड़ जाता है और उसकी मात्रा कम हो जाती है। रक्तचाप सामान्य से कम हो जाता है। इस दशा में वमन एवं अतिसाार बंद हो जाते हैं, परंतु रोगी के श्वास में एक विशेष प्रकार की दुर्गंध आना शुरू हो जाती है यदि इस रोगी की चिकित्सा न की गई तो उसकी मृत्यु हो जाती है। 

इलाज- 

1. यदि हैजे का रोगी दस्तों की अधिकता से निढाल हो जाएं तो अफीम आधी रत्ती को एक रत्ती चूने में मिलाकर खिला दें (चूना, जो पान में मिलाकर खाया जाता है) तुरंत दस्त बंद हो जाएंगे और रोगी को नींद आ जाएगी।

2. नींबू का बीज, अर्क गुलाब में पीसकर देने से भी दत बंद हो जाते हैं।

3. आक की जड़ उखाड़ कर मिट्टी साफ करके उसका छिलका उतारें और उसके बराबर काली मिर्च मिलाकर अदरक के रस में मिलाकर चने के बराबर गोलियां बनाएं। एक-एक गोली, दो-दो घंटे के बाद दें। छोटी इलायची और पुदीना को पानी में गर्म कर ठंडा करके घूंट-घूंट पिलाएं।

लू लगना

लक्षण-ग्रीष्म ऋतु में मध्य अप्रैल के बाद से जून के अंत तक गर्मी और लू का प्रकोप रहता है, जिसके कारण प्रति वर्ष अनेक व्यक्ति गर्मी और लू के शिकार होते हैं। 

लू लगने से रोगी का तापमान एकाएक इतना बढ़ जाता है कि उसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। रोगी कुम्हलाए हुए पौधे की भांति मुरझा जाता है। सारे शरीर में दाह और जलन बढ़ जाती है। आंखें लाल हो जाती हैं, जी मिचलाता है और प्यास बढ़ जाती है। पेशाब गहरे पीले रंग का हो जाता है, सिर में दर्द और तंद्रा, बेहोशी हो जाती है। रोगी बेचैनी और परेशानी की अवस्था में बार-बार इधर-उधर हाथ-पैर मारता है। दस्त भी हो सकते हैं।

इलाज-रोगी को पूर्ण विश्राम करना आवश्यक है। बुखार को शांत करने के लिए सिर पर बर्फ रखें और आवश्यकता पड़ने पर रोगी के समूचे शरीर को बर्फ के पानी में भिगोए वस्त्र से लपेट दें। पंखे का प्रयोग ठीक रहता है। खस के पंख को पानी में भिगोकर हवा करने से रोगी को राहत मिलती है। ध्यान रहे कि लू से पीड़ित रोगी के बुखार को शांत करने पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। यदि रोगी का बुखार नियंत्रित हो जाता है तो रोगी के ठीक होने में देर नहीं लगती।

1. रोगी को नींबू की शिकंजी पिलाना चाहिए, इसके अतिरिक्त फालसे का रस, आम का पन्ना और प्याज के रस का प्रयोग भी उत्तम समझा जाता है।

2. पकी इमली को जल में घोलकर थोड़ी चीनी मिलाइए, इमली के इस पन्ने को पीने से लू का प्रभाव नष्ट हो जाता है। 

3. चने के सूखे साग को ठंडे जल में भिगो कर शरीर पर मल लीजिए। इसी जल को रोगी को पिलाइए और हाथ-पैरों पर मलिए। प्यास लगने पर खस और चंदन का शर्बत पिलाते रहना चाहिए।

4. इस रोग से बचने के लिए प्याज बहुत ही गुणकारी औषधि है। गर्मी के दिनों में प्याज को खाना और पास रखना दोनों ही समान रूप से गुणकारी हैं।

5. तुलसी के रस में हल्का-सा नमक मिलाकर घर से बाहर निकलने के पहले पान करें तो लू नहीं लगेगी, अधिक पसीना नहीं आएगा और प्यास भी कम लगेगी।

6. भुने हुए प्याज को पीसकर, उसमें जीरे का चूर्ण और मिश्री मिलाकर खाने से लू का प्रकोप नष्ट होता है।

7. खरबूजे के बीजों को पीसकर सिर पर तथा शरीर पर लेप करें। इनसे बनी हुई ठंडाई भी लाभप्रद है।

8. जौ का सत्तू (पतला) पानी मिलाकर नमकीन या मीठा, गर्मी में पीने से गर्मी या लू नहीं लगती है।

9. लू लगने पर या शरीर में जलन होने पर जौ के आटे को पतला पानी मिलाकर पूरे शरीर में लगाना चाहिए।

10. ग्रीष्मकाल में पुदीने की चटनी का नियमित सेवन करने से लू लगने की आशंका नहीं रहती है।

11. गर्मियों में मुलैठी का शर्बत पीने से लू नहीं लगती।

12. आलू बुखारे को गरम जल में डालकर रखें और फिर उसी जल में मसल लें। इसे पिलाने से, लू लगने पर बेचैनी और घबराहट दूर होती है।

13. नारियल के दूध के साथ काले जीरे को पीसकर शरीर पर मलने से, लू लगने पर जलन कम होती है।

14. धनिए को पानी में भिगोकर मसलकर उसमें शक्कर मिलाकर पीने से गर्मियों में लू नहीं लगती और लगी लू मिट जाती है।

15. ताजा छाछ पिलाने से रोगी को पेशाब ज्यादा आएगा और उसे राहत मिलेगी।

खुजली के रोग

Climate Change Diseases: बदलता मौसम बढ़ते रोग
scabies diseases

लक्षण-खुजली एक जीवाणुजन्य रोग है। ये जीवाणु अत्यन्त सूक्ष्म परंतु जूं के समान होते हैं, रोमकूपों में छिपकर अंडा दे देते हैं, तथा प्राय: रात में निकलकर जहां-तहां त्वचा को काटते हैं और खुजली पैदा करते हैं। जनन-क्रिया द्वारा वे असंख्य बन जाते है तथा एक से दूसरे व्यक्ति में चले जाते हैं। इस प्रकार यह बीमारी बड़ी शीघ्रता के साथ फैलती है और घर-परिवार, पास-पड़ोस तथा गांव-मोहल्लों में अपना जाल बिछा देती है। प्राय: ये जीवाणु गर्दन से ऊपर वाले अंगों को प्रभावित नहीं करते, अर्थात्ï चेहरा, कान, सिर आदि बच जाते हैं। दूसरी बात यह है कि जीवाणु उंगलियों के बीच वाले स्थान में छिपकर काटते हैं तथा वहां पर खुजली हो सकती है।

खुजली के कारण जब रोगी नाखूनों से खुजाता है तो त्वचा फट जाती है और वहां पर ‘बैक्टीरियाजन्य इंफेक्शन’ पैदा हो जाता है। यही कारण है कि त्वचा में जहां-तहां पकाव पैदा हो सकता है।

खुजली छूत की बीमारी है, एक से दूसरे व्यक्ति को लग जाती है। यह रोग साथ-साथ उठने बैठने अथवा वस्त्रादि का सामूहिक प्रयोग करने से होता है। यही कारण है कि घर में एक बार जब यह बीमारी आ जाती है तो घर लगभग भी सदस्य इससे ग्रस्त हो जाती हैं। स्मरण रहे, घर में जितने सदस्य इस रोग के शिकार बन गये हैं, उन्हें एक साथ इलाज प्रारंभ करना चाहिए। अन्यथा इन जंतुओं का जीवन चक्र समाप्त नहीं हो सकता।

इलाज-दवा लगाने से पहले नीम के साबुन से भली प्रकार स्नान करना आवश्यक है। सायं काल पुन: अच्छी तरह स्नान करिए। दो दिन इसी तरह स्नान करें। दवा का प्रयोग तीन दिन बाद किया जा सकता है।

1. सरसों के तेल में शुद्ध गंधक पीसकर लगाएं। गंधक द्वारा ये जंतु नष्ट हो जाते हैं।

2. छह माशे सोडा बाइकार्ब में आधा कागजी नींबू का रस निचाड़ लें। डेढ़-दो तोले सरसों का तेल मिलाकर सारे शरीर पर मल लें।

3. गोबर में जरा सा नमक और नींबू का रस मिलाकर सारे शरीर पर उबटन करें। सर्दियां हो तो धूप में बैठे रहें। दस-पंद्रह मिनट बाद स्नान कर लें। गर्म पानी में समान भाग गोमूत्र मिलाकर तैयार रखा रहना चाहिए। इससे स्नान करना लाभप्रद होगा।

4. सरसों का तेल पाव भर लेकर कड़ाई में डालकर आग पर पकाएं और आक के 21 पत्ते एक-एक डालकर जलाएं। जब सब पत्ते जलकर राख हो जाएं तो आग से नीचे उतार लें। इसमें थोड़ा सा मैनसिल बारीक करके मिलाएं। दो-तीन दिन मालिश करने से खुजली जाती रहेगी।

5. सत्यानाशी के बीच एक तोला पानी में पीस-छानकर कुछ दिन पीने से खुजली में लाभ होता है।

6. नींबू का रस और चमेली का तेल दोनों बराबर की मात्रा में मिलाकर लगाने से खुजली जाती रहती है। 

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