googlenews
monsoon-health-tips-hindi

Monsoon health tips Hindi

जब भी कोई मौसम बदलता है तो मानव शरीर सबसे पहले चपेट में आता है, खास तौर पर गर्मी और बरसात के मौसम में। इस मौसम में सबसे ज्यादा रोग, लू (गर्म हवा) लगने एवं बरसात के प्रदूषित जल के कारण उत्पन्न होते हैं। कौन से हैं वो रोग तथा क्या है उनका उपचार आइए जानें।

मौ सम की विविधता जितनी भारत में देखने को मिलती है शायद ही कहीं और देखने को मिलती हो इसी के चलते भारत को ऋतुओं का देश भी कहा जाता है। हर ऋतु की अपनी ही विशेषताएं एवं प्रभाव हैं। ये ऋतुएं न केवल हमारे वातावरण को बल्कि हमारे जीवन को भी प्रभावित करती हैं जिसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष असर हमारे शरीर, स्वास्थ्य, भोजन तथा पहनावे एवं दिनचर्या आदि पर भी पड़ता है।

जब भी कोई मौसम बदलता है तो मानव शरीर सबसे पहले चपेट में आता है। खास तौर पर गर्मी और बरसात के मौसम में इन ऋतुओं में सबसे ज्यादा रोग लू (गर्म हवा) एवं बरसात के प्रदूषित जल के कारण उत्पन्न होते हैं। हवा और पानी जितनी सरलता से दूषित होते हैं उतनी ही सरलता एवं शीघ्रता से यह शरीर में रोगों का संचार भी करते हैं। पानी और हवा मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। इसलिए सतर्कता बरतना बहुत जरूरी है, क्योंकि प्रदूषित जल और वायु हमें पेट एवं त्वचा संबंधित रोग अधिक देते हैं और यह रोग कभी-कभी आगे चलकर महारोग में भी परिवर्तित हो जाते हैं।

चिलचिलाती गर्मी हो या रुका हुआ पानी, धरती की उमस हो या कूलर-टंकी में जमा पानी। गंदे पानी की काई हो या मक्खी-मच्छर सभी इस मौसम में बिमारियों का स्रोत बन जाते हैं। फिर खाने-पीने का खुला भोजन हो या नमी के कारण डब्बे में फफूंदी वाला बंद खाद्य पदार्थ सभी कुछ विषैला हो जाता है। ऐसे मौसम में अपने पेट एवं त्वचा से संबंधित रोगों की रक्षा कैसे करें, आइए जानें।

हैजा

लक्षण- हैजे का प्रकोप प्राय: गर्मी के दिनों में होता है। यह अचानक होने वाली बीमारी है। रोगी को इसका पूर्वाभास नहीं होता, यद्यपि कुछ रोगियों में हैजा होने के चार-पांच दिन पहले से ही अतिसार लगने की शिकायत पाई जा सकती है। जब बीमारी पूर्ण रूप से प्रकट होती है, रोगी को वेग से दस्त आने प्रारंभ हो जाते हैं और उल्टियां आने लगती हैं। अतिसार एवं वमन का यह क्रम एक ही दिन में सैकड़ों बार हो सकता है। बार-बार शौच जाने के कारण रोगी मूर्च्छित हो सकता है।
इस रोग की मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं मानी जाती हैं।

निर्गमन की अवस्था- इस दशा में विशेषत: अतिसार और वमन की शिकायतें होती हैं। यह स्थिति लगभग 10-12 घंटें रहती है। रोगी को तीव्र गति से उल्टियां होनी प्रारंभ हो जाती हैं। इसके पश्चात् अतिसार होने लगते हैं। पेट में पीड़ा एवं ऐंठन की शिकायत हो जाती है। दो-चार बार मल त्यागने पर, मल का रंग चावल के मांड के समान श्वेत पड़ जाता है। हाथ-पैरों में अत्यंत पीड़ा होने लगती है और नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है।

शीतावस्था- यह कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकती है। इस अवस्था में रोगी ठंडा पड़ जाता है और मूचर््िछत हो जाता है। रोगी मृत व्यक्ति के समान निश्चेष्ट दिखाई देता है। त्वचा श्वेत पड़ जाती है। शरीर का तापमान बढ़ सकता है। इस अवस्था में अतिसार बंद हो जाते हैं, किंतु उल्टियां आती रहती हैं। मूत्र की मात्रा कम हो जाती है अथवा बिल्कुल बंद हो जाती है। पेट की ऐंठन में कोई कमी नहीं होती। नाड़ी की गति अनुभव नहीं होती व अत्यंत मंद पड़ जाती है।

प्रत्यावर्तन की अवस्था- इस अवस्था में रोगी अत्यंत दुर्बल हो जाता है। साधारणत: वह अपने शरीर को हिला भी नहीं सकता। शरीर के भार में कमी आ जाती है और नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है। आंतों में रुकावट आने के कारण पेट फूल सकता है। मूत्र का रंग गंदला पड़ जाता है और उसकी मात्रा कम हो जाती है। रक्तचाप सामान्य से कम हो जाता है। इस दशा में वमन एवं अतिसार बंद हो जाते हैं, परंतु रोगी के श्वास में एक विशेष प्रकार की दुर्गंध आनी शुरू हो जाती है यदि इस रोगी की चिकित्सा न की गई तो उसकी मृत्यु हो जाती है।

इलाज

  1. यदि हैजे का रोगी दस्तों की अधिकता से निढाल हो जाए तो अफीम आधी रत्ती को एक रत्ती चूने में मिलाकर खिला दें (चूना, जो पान में मिलाकर खाया जाता है) तुरंत दस्त बंद हो जाएंगे और रोगी को नींद आ जाएगी।
  2. नींबू का बीज, अर्क गुलाब में पीसकर देने से भी कै और दस्त बंद हो जाते हैं।
  3. आक की जड़ उखाड़ कर मिट्टी साफ करके उसका छिलका उतारें और उसके बराबर काली मिर्चें मिलाकर अदरक के रस में खरल करके चने के बराबर गोलियां बनाएं। एक-एक गोली, दो-दो घंटे के बाद दें। छोटी इलायची और पुदीना को पानी में जोश देकर ठंडा करके घूंट-घूंट पिलाएं।

जब घर के किसी व्यक्ति को हैजा हो जाए तो उसे दूसरे स्वस्थ व्यक्तियों से अलग कमरे में रखें, उसके खाने-पीने के बर्तन भी अलग रखें। देखभाल करने वाले को रोगी के कपड़े या बर्तन छू जाने के बाद अपने हाथों को गर्म पानी और साबुन से धो डालना चाहिए।
रोगी के कै-दस्त को किसी गड्ढï़े में डालकर दबा देना चाहिए और जब रोगी अच्छा हो जाए तो उसके कमरे में सफेदी कराई जाए और उसके बिस्तर तथा कपड़ों को पानी में जोश देकर धोया जाए अथवा उन्हें जला दिया जाए। इस प्रकार रोगी की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है।

लू लगना

लक्षण- ग्रीष्म ऋतु में मध्य अप्रैल के बाद से जून के अंत तक गर्मी और लू का प्रकोप रहता है, जिसके कारण प्रति वर्ष अनेक व्यक्ति गर्मी और लू के शिकार होते हैं।
लू लगने से रोगी का तापमान एकाएक इतना बढ़ जाता है कि उसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। रोगी कुम्हलाए हुए पौधे की भांति मुरझा जाता है। सारे शरीर में दाह और जलन बढ़ जाती है। आंखें लाल हो जाती हैं, जी मिचलाता है व प्यास बढ़ जाती है। पेशाब गहरे पीले रंग का हो जाता है सिर में दर्द और तंद्रा, बेहोशी हो जाती है। रोगी बेचैनी और परेशानी की अवस्था में बार-बार इधर-उधर हाथ-पैर मारता है। दस्त भी हो सकते हैं।

इलाज- रोगी को पूर्ण विश्राम करना आवश्यक है। बुखार को शांत करने के लिए सिर पर बर्फ रखें और आवश्यकता पड़ने पर रोगी के समूचे शरीर को बर्फ के पानी में भिगोए वस्त्र से लपेट दें। पंखे का प्रयोग ठीक रहता है। खस के पंख को पानी में भिगोकर हवा करने से रोगी को राहत मिलती है। ध्यान रहे कि लू से पीड़ित रोगी के बुखार को शांत करने पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। यदि रोगी का बुखार नियंत्रित हो जाता है तो रोगी के ठीक होने में देर नहीं लगती।

  1. रोगी को नींबू की शिकंजी पिलाना चाहिए, इसके अतिरिक्त फालसे का रस, आम का पना और प्याज के रस का प्रयोग भी उत्तम समझा जाता है।
  2. पकी इमली को जल में घोलकर थोड़ी चीनी मिलाइए, इमली के इस पने को पीने से लू का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
  3. चने के सूखे साग को ठंडे जल में भिगो कर शरीर पर मल लीजिए। इसी जल को रोगी को पिलाइए और हाथ-पैरों पर मलिए। प्यास लगने पर खस और चंदन का शर्बत पिलाते रहना चाहिए।
  4. इस रोग से बचने के लिए प्याज बहुत ही गुणकारी औषधि है। गर्मी के दिनों में प्याज को खाना और पास रखना दोनों ही समान रूप से गुणकारी हैं।
  5. तुलसी के रस में हलका-सा नमक मिलाकर घर से बाहर निकलने के पहले पान करें तो लू नहीं लगेगी, अधिक पसीना नहीं आएगा और प्यास भी कम लगेगी।
  6. भुने हुए प्याज को पीसकर, उसमें जीरे का चूर्ण और मिश्री मिलाकर खाने से लू का प्रकोप नष्ट होता है।
  7. लू लगने पर ठंडे पानी में बर्फ और गुलाबजल मिलाकर माथे पर कपड़े की पट्टी करें।
  8. खरबूजे के बीजों को पीसकर सिर पर तथा शरीर पर लेप करें। इनसे बनी हुई ठंडाई भी लाभप्रद है।
  9. जौ का सत्तू (पतला) पानी मिलाकर नमकीन या मीठा, गर्मी में पीने से गर्मी या लू नहीं लगती है।
  10. लू लगने पर या शरीर में जलन होने पर जौ के आटे को पतला पानी मिलाकर पूरे शरीर में लगाना चाहिए।
  11. ग्रीष्मकाल में पुदीने की चटनी का नियमित सेवन करने से लू लगने की आशंका नहीं रहती है।
  12. गर्मियों में मुलैठी का शर्बत पीने से लू नहीं लगती।
  13. आलू बुखारे को गरम जल में डालकर रखें और फिर उसी जल में मसल लें। इसे पिलाने से, लू लगने पर बेचैनी और घबराहट दूर होती है।
  14. नारियल के दूध के साथ काले जीरे को पीसकर शरीर पर मलने से, लू लगने पर जलन कम होती है।
  15. धनिए को पानी में भिगोकर मसलकर उसमें शक्कर मिलाकर पीने से गर्मियों में लू नहीं लगती और लगी लू मिट जाती है।
  16. ताजा छाछ पिलाने से रोगी को पेशाब ज्यादा आएगा और उसे राहत मिलेगी।
  17. जौ का आटा तथा पिसा हुआ प्याज मिलाकर शरीर पर लेप करने से लू से तुरंत राहत मिलेगी।
  18. रोगी को उल्टियां एवं दस्त लगने पर पानी में नींबू, नमक एवं शक्कर मिलाकर थोड़ी-थोड़ी देर में पिलाएं।

खुजली के रोग

लक्षण- खुजली एक जीवाणुजन्य रोग है। ये जीवाणु अत्यंत सूक्ष्म परंतु जूं के समान होते हैं, रोमकूपों में छिपकर अंडा दे देते हैं तथा प्राय: रात में निकलकर जहां-तहां त्वचा को काटते हैं और खुजली पैदा करते हैं। जनन-क्रिया द्वारा वे असंख्य बन जाते हैं तथा एक से दूसरे व्यक्ति में चले जाते हैं। इस प्रकार यह बीमारी बड़ी शीघ्रता के साथ फैलती है और घर-परिवार, पास-पड़ोस तथा गांव-मोहल्लों में अपना जाल बिछा देती है। प्राय: ये जीवाणु गर्दन से ऊपर वाले अंगों को प्रभावित नहीं करते, अर्थात् चेहरा, कान, सिर आदि बच जाते हैं। दूसरी बात यह है कि जीवाणु उंगलियों के बीच वाले स्थान में छिपकर काटते हैं तथा वहां पर खुजलीयुक्त दाने पैदा कर देते हैं। इसके अतिरिक्त हथेली में भी खुजली हो सकती है।

खुजली के कारण जब रोगी नाखूनों से खुजाता है तो त्वचा फट जाती है और वहां पर बैक्टीरियाजन्य इन्फेक्शन पैदा हो जाता है। यही कारण है कि त्वचा में जहां तहां पकाव पैदा हो सकता है।
खुजली छूत की बीमारी है, एक से दूसरे व्यक्ति को लग जाती है। यह रोग साथ-साथ उठने-बैठने अथवा वस्त्रादि का सामूहिक प्रयोग करने से होता है यही कारण है कि घर में एक बार जब यह बीमारी आ जाती है तो घर के लगभग सभी सदस्य इससे ग्रस्त हो जाते हैं।

स्मरण रहे, घर में जितने सदस्य इस रोग के शिकार बन गए हैं, उन्हें एक साथ इलाज प्रारंभ करना चाहिए। अन्यथा इन जंतुओं का जीवन-चक्र समाप्त नहीं हो सकता।
इलाज- दवा लगाने से पहले नीम के साबुन से भली प्रकार स्नान करना आवश्यक है। सांयकाल पुन: अच्छी तरह स्नान करिए। दो दिन इसी तरह स्नान करें। दवा का प्रयोग तीन दिन बाद किया जा सकता है।

  1. सरसों के तेल में शुद्ध गंधक पीसकर लगाएं। गंधक द्वारा ये जंतु नष्ट हो जाते हैं।
  2. छह माशे सोडा बाइकार्ब में आधा कागजी नींबू का रस निचोड़ लें। डेढ़-दो तोले सरसों का तेल मिलाकर सारे शरीर पर मल लें। धूप में दो घंटे बैठे रहने के बाद स्नान करें। सूखी खुजली के लिए यह लाभदायक है।
  3. गोबर में जरा-सा नमक और नींबू का रस मिलाकर सारे शरीर पर उबटन करें। सर्दियां हों तो धूप में बैठे रहें। दस-पंद्रह मिनट बाद स्नान कर लें। गर्म पानी में समान भाग गोमूत्र मिलाकर तैयार रखा रहना चाहिए। इससे स्नान करना लाभप्रद होगा।
  4. सरसों का तेल पाव सेर लेकर कड़ाई में डालकर आग पर पकाए और आक के 21 पत्ते एक-एक डालकर जलाएं। जब सब पत्ते जलकर राख हो जाएं तो आग से नीचे उतार लें इसमें थोड़ा-सा मैनसिल बारीक करके मिलाएं। दो-तीन दिन मालिश करने से खुजली जाती रहेगी।
  5. सत्यानाशी के बीज एक तोला पानी में पीस-छानकर कुछ दिन पीने से खुजली में लाभ होता है।
  6. नींबू का रस और चमेली का तेल दोनों बराबर की मात्रा में मिलाकर लगाने से खुजली जाती रहती है।
  7. तराह के शुद्ध तेल की मालिश करने से भी खुजली ठीक हो जाती है।
  8. खसखस के बीज दो तोले पानी में पीसकर इसमें नींबू का रस मिलाकर सारे शरीर पर मालिश करें। यह दवा सूखी खुजली में अत्यंत उपयोगी है।

दाद

यह अत्यंत कष्टदायक त्वचा रोग है। यह शरीर पर विशेषतया जांघों पर, गर्दन, कमर और नितंबों पर होता है। पहले गोल-गोल दाने उभरते हैं जो फुंसी बनकर खुजली पैदा करते हैं। ये फुंसिया बाद में लाल दाग-चकत्तों का रूप ले लेती हैं। इसमें खुजली इतनी ज्यादा होती है कि रोगी तंग आ जाता है।

इलाज-

  1. गेंदे के पत्तों को पीसकर लेप करने से या उसका रस लगाने से यह रोग दूर हो जाता है।
  2. सुहागा नींबू के रस में पीसकर दाद के स्थान को पहले खुजला लें, बाद में लगाएं।
  3. बड़ी हरड़ घिसकर लगाने से दाद अच्छा हो जाता है।
  4. तुलसी के पत्ते पीसकर लगाने से दाद में लाभ पहुंचता है।
  5. नींबू का रस लगाने से भी दाद मिट जाता है।
  6. पुराने दाद पर आक का दूध लगाने से दाद दूर हो जाता है। इससे जलन ज्यादा होती है।

फोड़े-फुंसियां

गर्मियों में प्राय: फोड़े-फुंसी देह पर निकल आते हैं अत: अधिकतर ठंडे और शीतल खाद्य-पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए।

इलाज-

  1. पान का पत्ता घी में चुपड़ कर थोड़ा गर्म करें और फोड़े पर बांधे।
  2. नीम की छाल घिसकर फोड़े-फुंसी पर लेप करें।
  3. असगंध के पत्ते गर्म कर फोड़े-फुंसी पर बांधें।
  4. पीपल का पत्ता घी में भिगोकर हल्का गर्म करें और बांध दें तो कुछ दिनों में फोड़ा पककर फूट जाएगा।

Leave a comment