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Benefits of laughter: सस्ती, सरल और असरकारक चिकित्सा-हास्य चिकित्सा
Benefits of laughter

Benefits of Laughter: थोड़ी-सी सामान्य बुद्धि, थोड़ीसी सहनशीलता थोड़ा सा हास्यबोध अगर यह आपके पास है तो आप नहीं जानते कि इस ग्रह पर आप अपने को कितना सुखी बना सकते हैं। ‘समरसेट माम के इन शब्दों से स्पष्ट होता है कि जीवन में हास्य का कितना महत्त्वपूर्ण स्थान है। वास्तव में जिस व्यक्ति के जीवन
में विनोद का कोई स्थान नहीं उसे दुखी होने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। वह बिना प्रयास किए ही नित्य निरंतर दुखी रह सकता है। एक पल की मुस्कुराहट अथवा एक भरपूर ठहाका जीवन की दिशा बदलने में सक्षम है। ‘बेकन के अनुसार, ‘व्यक्ति का हंसमुख स्वभाव दीर्घायु का सर्वोत्तम साधन है। टैगोर कहते हैं कि, ‘जब मैं हंसता हूं तो मेरे मन का बोझ हल्का हो जाता है। गांधीजी की लोकप्रियता का राज था उनकी विनोदप्रियता। गांधीजी लिखते हैं कि, ‘हंसी मन की गांठें बड़ी आसानी से खोल देती है। मेरे मन की ही नहीं तुम्हारे मन की भी।

मनुष्य होने का प्रमाण है हास्य

हंसी एक सहज-स्वाभाविक क्रिया है लेकिन है एक अद्वितीय क्रिया। यह एक मूल प्रवृत्ति है जो केवल मानव में ही पाई जाती है। कहा गया है कि साहित्य, संगीत और कला से विहीन मनुष्य पशु के समान
है, यह बात कुछ हद तक ठीक है लेकिन व्यावहारिक स्तर पर देखें तो जो व्यक्ति प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत्त इस अमूल्य उपहार हंसी का अपने जीवन में उपयोग नहीं कर पाता वह सबसे बड़ा पशु है।
मनुष्येतर प्राणियों में सिर्फ चिंपांजी ही एक ऐसा प्राणी है जो कुछ सीमा तक हंसने जैसी क्रिया कर सकता है अन्यथा पूरी सृष्टि में मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जिसे प्रकृति ने यह अमूल्य निधि प्रदान की है। अत: हास्य रूपी इस अमूल्य निधि का भरपूर प्रयोग कीजिए और अपने मनुष्य होने का प्रमाण दीजिए।

हास्य है मन की सत्ता का विसर्जन

मानव शरीर वस्तुत: एक प्रयोगशाला की तरह है जिसमें हर क्षण निरंतर जीवरासायनिक (बॉयोकैमिकल) तथा विद्युत-चुम्बकीय (इलैक्ट्रो-मैग्नेटिक) परिवर्तन होते रहते हैं। इन्हीं विभिन्न परिवर्तनों के फलस्वरूप मनुष्य को प्रसन्नता अथवा पीड़ा की अनुभूति होती है। मन की इसमें निर्णायक भूमिका होती है। हमारी मनोदशा के अनुसार ही हमारे शरीर की जीवरासायनिक संरचना प्रभावित होती है। सकारात्मक मनोदशा का अच्छा तथा नकारात्मक मनोदशा का बुरा प्रभाव हमारे
शरीर की जीव-रासायनिक संरचना पर पड़ता है। हंसना एक ऐसी प्रक्रिया है जो मानव शरीर पर केवल सकारात्मक प्रभाव डालती है क्योंकि हंसने की प्रक्रिया में मन की भूमिका गौण या नगण्य हो जाती है। हंसने वाला व्यक्ति तत्क्षण अ-मन अर्थात्नो थॉट स्टेट की अवस्था में पहुंच जाता है जो ध्यान की ही अवस्था होती है। यहां प्रश्न उठ सकता है कि अ-मन की अवस्था में हंसी का नकारात्मक प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? कारण स्पष्ट है कि अ-मन की अवस्था में हम सुख-दुख, राग-द्वेष आदि परस्पर विरोधी भावनाओं से पूर्णत: मुक्त हो जाते हैं। ऐसी अवस्था परमानंद की अवस्था होती है अत: नकारात्मक प्रभाव पड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता। वैसे भी हंसन का संबंध प्रसन्नता से है। जब हम प्रसन्न होते हैं तभी हंसते हैं। ऐसा हमारी सहस्राब्दियों की कंडीशनिंग के कारण भी होता है अत: यदि हम बिना बात भी हंसेंगे तो स्वाभाविक रूप से प्रसन्नता की प्राप्ति होगी और प्रसन्नता की मनोदशा में शरीर की जीव-रासायनिक संरचना में स्वास्थ्य के अनुकूल परिवर्तन होगा। हास्य के कई सोपान हैं जैसे मुस्कराना, हंसना और ठहाके लगाना। इन तीनों सोपानों को भी कई श्रेणियों और तरीकों में विभाजित किया जा सकता है लेकिन हास्य जिस तरीके से भी प्रकट किया जाए उसका हंसने वाले के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव ही पड़ेगा।

एक संपूर्ण ध्यान-पद्धति है हंसना

जब आप हंसते हैं तो उन क्षणों में आप गहन ध्यान अथवा मेडिटेशन की अवस्था में स्वत: ही पहुंच जाते हैं क्योंकि एक ही समय पर हंसना और चिंतन करना असंभव है। हंसने का अर्थ है चिंतन प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न होना। यदि आप वास्तव में हंसते हैं तो चिंतन प्रक्रिया चाहे वह सकारात्मक हो अथवा नकारात्मक फौरन रुक जाती है क्योंकि एक समय में आप पूर्ण रूप से एक ही क्रिया कर सकते हैं। हमारी आधी-अधूरी क्रियाओं के कारण ही तो हमारा जीवन अस्त-व्यस्त और असंतुलित हो जाता है अत: जो भी क्रिया करें पूर्ण रूप से सचेत होकर करें। एक समय में एक ही क्रिया करें। एक क्षण के लिए भी यदि कोई क्रिया पूर्ण रूप से सचेत होकर की जाती है तो वह ध्यान ही है। हंसना एक ऐसी क्रिया है जिसमें पूर्ण मानसिक एकाग्रता का विकास संभव है और यही एकाग्रता ध्यान है।

योग और हास्य

योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने योग की जो परिभाषा दी है वह है योग: चित्तवृत्ति निरोध: अर्थात् चित्त वृत्तियों पर नियंत्रण ही योग है। हास्य में विशेष रूप से खिलखिलाकर हंसने अथवा जोरदार ठहाका
लगाने की अवस्था में हम अपने मन की चंचलता पर पूर्ण रूप से नियंत्रण कर पाते हैं चाहे वह क्षणिक ही क्यों न हो। मन की चंचलता पर वह क्षणिक नियंत्रण एक अद्वितीय घटना है। मनुष्य के लिए उसके अच्छे स्वास्थ्य के लिए एक लाभप्रद स्थिति है। हास्य वास्तव में इंस्टेंट योग की अवस्था है। इन क्षणों की जितनी अधिक पुनरावृत्ति होगी उतना ही हम योगमय जीवन के निकट होते चले जाएंगे। योगाभ्यास में हम क्रम से चलते हैं। पहले यम और नियम का पालन करना सीखते हैं। फिर विभिन्न योगासनों और प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों का अभ्यास करते हैं। तत्पश्चात् प्रत्याहार और धारणा की अवस्थाओं से गुजरते हुए ध्यान की अवस्था में पहुंच जाते हैं लेकिन एक जोरदार ठहाका
अथवा अट्टाहस हमें सीधे ध्यानावस्था के निकट ले जाकर छोड़ देता है। हंसी एक क्षणिक सी घटना है। लेकिन शरीर और मन पर इसका प्रभाव निरंतर आधा-पौना घंटे तक बना रहता है।

स्वतंत्र चिकित्सा बनने योग्य हास्य

Benefits of laughter: सस्ती, सरल और असरकारक चिकित्सा-हास्य चिकित्सा
Independent therapy humor

हंसने से व्यायाम के लाभ भी मिलते हैं। जोर से हंसने पर श्वास-प्रक्रिया भी प्रभावित होती है अत: योगासन और प्राणायाम, दोनों का अभ्यास इस क्रिया में हो जाता है। हंसने से शरीर में अतिरिक्त कैलोरीज के खर्च हो जाने से वजन को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है। पूरे शरीर में रक्त प्रवाह
बढ़ जाने से शरीर में तथा विशेष रूप से चेहरे की मांसपेशियों में ताजगी उत्पन्न होती है। योग एक संपूर्ण उपचार पद्धति है। हास्य भी किसी प्रकार योग से कम नहीं बैठता इसलिए हास्य द्वारा चिकित्सा को हास्य योग से अभिहित किया जाता है। हास्य का जीवन में इतना अधिक महत्त्व है कि हास्य को एक स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार कर इसे निरंतर विकसित किया जा रहा है और साथ ही दूसरी चिकित्सा पद्धतियों और अन्य उपयोगी क्रियाकलापों के साथ भी इसे जोड़ा जा रहा है। योगाभ्यास अथवा अन्य शारीरिक क्रियाओं यथा एरोबिक्स व ऐथलेटिक्स आदि के अभ्यास के बाद हंसने का अभ्यास भी अवश्य कराया जाता है। खेल-कूद अथवा मानसिक श्रम करने के बाद हंसने से शरीर की थकावट दूर होकर शरीर में पुन: चुस्ती-स्फूर्ति आ जाती है।

खेलकूद में भी अनिवार्य

खेलकूद में ही नहीं अपितु व्यक्तित्वविकास विषयक तथा प्रेरणात्मक कार्यशालाओं में भी प्रशिक्षण के दौरान हास्य का समावेश अनिवार्य है क्योंकि एक ठहाके के बाद व्यक्ति का ध्यान अधिक एकाग्र
होकर पुन: विषय की ओर केंद्रित हो जाता है। साहित्य, संस्कृति और कला सभी में किसी न किसी रूप में हास्य अवश्य विद्यमान रहता है अन्यथा पाठक या प्रेक्षक तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता। लोक-साहित्य और लोक-संस्कृति में हास्य एक अनिवार्य तत्त्व है जो उसे जीवंतता प्रदान करता है।
क्लासरूम में विषय की नीरसता को सरसता में परिवर्तित करने के लिए भी हास्य अनिवार्य लगता है। एक अच्छा वक्ता हास्य का सहारा लेकर अपने श्रोताओं को बांधे रखता है और अपना संदेश अपेक्षित श्रोताओं तक पहुंचाने में सफल होता है। साहित्य में नवरस सूची में हास्य रस किसी भी तरह
उपेक्षणीय नहीं है अपितु आज सब जगह हास्य रस का ही बोलबाला है। कवि सम्मेलनों में लोग अपने प्रिय हास्य कवियों को मनोरंजक नाटक देखना ही पसंद करते हैं।

शिष्ट अशिष्ट हास्य

हास्य के कई रूप हो सकते हैं। हास्य शिष्ट भी हो सकता है और अशिष्ट भी। जरूरी नहीं कि हास्य के नाम पर सभी मर्यादाओं को तोड़ दिया जाए। अमर्यादित अशिष्ट हास्य न केवल व्यक्ति के मनोभावों को विकृत करता है अपितु इस प्रकार के हास्य से आपसी संबंधों में बिगाड़ की भी संभावना भी रहती है। मर्यादित शिष्ट हास्य ही जीवन का रस है क्योंकि इससे न केवल व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति होती है अपितु संबंधों में खुलापन आता है और अच्छे संबंधों का विकास होता है। शिष्ट हास्य द्वारा गंभीर से गंभीर वातावरण को खुशनुमा बनाया जा सकता है। जो लोग हंसते-हंसाते रहते हैं उनके मित्रों की संख्या भी सर्वाधिक होती है।

एक उपचारक प्रक्रिया है हास्य

हंसना एक संपूर्ण व्यायाम है जिससे शरीर की सभी नाड़ियां खुलती हैं तथा शरीर की थकावट दूर होकर ताजगी उत्पन्न होती है। खुलकर हंसने से फेफड़ों, गले और मुंह की अच्छी कसरत हो जाती है। पेट एवं छाती के स्नायु मजबूत होते हैं। डायफ्राम मजबूत होता है तथा इससे मुंह, गले तथा फेफड़ों संबंधी व्याधियों के उपचार में मदद मिलती है। हंसने से रक्त संचार की गति तीव्र होती है जिसमें खून में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। इस पूरी प्रक्रिया से चेहरे पर रौनक आ जाती है। जो जितना अधिक हंसताहंसाता है उसका चेहरा उतना ही अधिक दमकता है। शरीर में जितनी अधिक मात्रा
में आक्सीजन का अवशोषण होता है उतनी ही अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है और जितनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न होगी हम उतने ही अधिक स्वस्थ तथा रोगमुक्त होंगे। इस प्रकार हास्य जीवन का उपचारक एवं पोषक तत्त्व है और इसे जीवन का रस कहा जा सकता है।

हास्य द्वारा जीवन रस की प्राप्ति

हास्य द्वारा हमारे शरीर की जीव-रासायनिक संरचना में परिवर्तन आता है। हंसने से तनाव उत्पन्न करने वाले हार्मोंस कार्टिसोल तथा एपिनप्राइन के स्तर में कमी आती है जिससे शरीर तनावमुक्त हो जाता है और तनाव मुक्ति का अर्थ है स्वास्थ्य। इसके अतिरिक्त हंसने से एंडोर्फिन नामक हार्मोन की मात्रा में वृद्धि होती है जो शरीर के लिए स्वाभाविक रूप से दर्द निवारक और रोग अवरोधक का काम करता है। कहने का तात्पर्य ये है कि हंसने से शरीर के लिए उपयोगी हार्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है इस प्रकार हंसना अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक और पर्याय है। ‘कैलिफॉर्निया की लोमालिंडा यूनिवर्सिटी के ‘डॉ. ली बर्क की रिसर्च के अनुसार हंसने और खुश रहने से टी. लिंफोसाइट्स अधिक क्रियाशील हो जाते हैं जिनसे उन प्राकृतिक सेलों के निर्माण में वृद्धि होती है जिन्हें किलर सेल कहते हैं। ये किलर सैल कैंसर पैदा करने वाल भयानक सेल्स को
नष्ट करने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार हंसने-हंसाने से भयानक रोगों से छुटकारा पाने में भी सहायता मिलती है।

हास्य चिकित्सा का उद्भव

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Emergence of humor therapy

एनॉटमी ऑफ ऐन इललैस नामक पुस्तक के ‘लेखक नॉर्मन कजिन को हास्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। उन्होंने स्वयं अपनी लाइलाज बीमारियों की इस विधि से उपचार करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने विचार किया कि अगर नकारात्मक या बुरे विचार शरीर को हानि पहुंचाने वाले रसायन या हार्मोंस उत्पन्न कर सकते हैं तो इसके विपरीत भी सच होना चाहिए अर्थात्
सकारात्मक विचार या प्रसन्नता के भाव भी शरीर में लाभदायक रसायन या हार्मोंस उत्पन्न करेंगे और प्रसन्नता के लिए हास्य जैसी क्रिया का कोई सानी नहीं हो सकता। डॉ. नॉर्मन कजिन ने हास्य को ही उपचार का माध्यम बना लिया। डॉ. नॉर्मन कजिन अस्पताल का कमरा छोड़कर एक होटल के कमरे में चले गए और वहां उनकी दिनचर्या होती थी हंसी-मजाक की फिल्में देखना और ठहाके
लगाना। इस प्रकार हंसते-हंसाते ही उन्होंने स्वयं को रोगमुक्त कर लिया और साथ ही एक नई चिकित्सा-पद्धति भी अविष्कृत कर डाली, जिसे कहते हैं ‘लॉफ्टरथैरेपी या ‘हास्य-चिकित्सा। आज हास्य चिकित्सा का पर्याप्त प्रचार-प्रसार हो रहा है और पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में तो इसका
जवाब नहीं। जब आप अवसाद से घिरे हों तो हास्य ही एकमात्र ऐसी औषधि है जो आपके अवसाद को समाप्त कर सकती है। हंसने से सारी पीड़ा, सारा तनाव पिघल जाता है। शरीर शिथिल होकर आराम पाता है। अच्छी नींद आती है। एक हंसमुख व्यक्ति कभी भी अवसाद से ग्रस्त नहीं होता और न ही
आत्महत्या जैसा कार्य करता है। वस्तुत: जितनी भी तनावजन्य व्याधियां हैं उन सभी का उपचार हास्य में छिपा है।

जीवन की विभिन्न अवस्थाएं और हास्य

कुछ लोग सदैव गंभीर बने रहते हैं। अवसादग्रस्त लटके हुए चेहरे लिए घूमते रहते हैं। उनकी त्वचा से, उनके चेहरों से उनकी उम्र का पता ही नहीं चलता। चालीस की अवस्था में वो साठ के प्रतीत होते हैं।
उर्दू शायर जफर गोरखपुरी का एक दोहा है। हद से अधिक संजीदगी, सच पूछो तो रोग, आगा-पीछा सोचते, बूढ़े हो गए लोग। जो लोग जितने गंभीर बने रहते हैं उतने ही ज्यादा उम्र के दिखते हैं और उसी के अनुसार उनका उत्साह भी मंद पड़ता जाता है। इस प्रकार हंसी का संबंध न केवल आरोग्य और दीर्घायु से है अपितु बुढ़ापा रोकने में भी हास्य की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वस्तुत: हास्य ही एकमात्र औषधि है जो बाह्र रूप से आपके चेहरे की झुर्रियों को रोकने में सक्षम है तथा आंतरिक रूप से आपको उत्साहपूर्ण बनाए रखने में क्योंकि हास्य व्यायाम के साथ साथ बुढ़ापे के लिए एक उत्तम टॉनिक भी है। गंभीरता से बचें ओशो कहते हैं, ‘मैं नहीं चाहता कि तुम गंभीर रहो। मैं गंभीरता के कतई खिलाफ हूं- यह एक आध्यात्मिक बीमारी है। हंसी आध्यात्मिक स्वास्थ्य है, हंसी बोझ रहित है। जब तुम हंसते हो तो अपने मन को आसानी से अलग रख सकते हो। जो व्यक्ति हंस नहीं सकता उसके लिए बुद्धत्व के द्वार बंद हो जाते हैं। मेरे लिए हंसी का बहुत महत्त्व है। किसी धर्म ने इस बारे में कभी
नहीं सोचा। वे हमेशा गंभीरता पर जोर देते रहे और इसी कारण सारा विश्व मनोवैज्ञानिक
रूप से बीमार होता चला गया। इस मनोवैज्ञानिक रुग्णता से बचना है तो हंसना सीखिए। हंसने की बात को हंसी में मत उड़ाइए। जो जीवन को गंभीरता से ले रहे हैं उन्हें हंसने की सख्त जरूरत है। हास्य ही गंभीरता को तरल बना सकता है और यह तरलता आपको तनावमुक्त कर स्वस्थ बना सकती है।
इसलिए जीवन में ऐसे अवसर खोजिए जो आपके बार-बार मुस्कराने और हंसने के अवसर उपलब्ध कराएं। भूतकाल की उन घटनाओं को मन में लाएं जो हंसने का अवसर प्रदान करें।

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